Upsc Essay in hindi medium-शिक्षा और जीवन मूल्य 

Upsc Essay in hindi medium-

Upsc Essay in hindi medium-शिक्षा और जीवन मूल्य 

इसे विडम्बना नहीं तो और क्या कहेंगे कि मनुष्य ज्यों-ज्यों शिक्षा प्राप्त करता जा रहा है त्यों-त्यों शिक्षा का अवमूल्यन होता जा रहा है। यह तो निर्विवाद है कि आज जितने लोग शिक्षित हैं उतने कभी नहीं थे और शिक्षा देने-लेने के जितने उपकरण आज उपलब्ध हैं, शिक्षा का क्षेत्र जितना व्यापक है और जितने प्रकार की शिक्षा आज उपलब्ध है पहले कभी नहीं थी। शिक्षा का परिमाणात्मक और गुणात्मक दोनों स्तरों पर विस्तार हुआ है। पर क्या मनुष्य और समाज को उसी अनुपात में सकारात्मक लाभ हुआ है ? क्या मनुष्य पहले की अपेक्षा अधिक शिक्षित हुआ है? काश हम बेझिझक सकारात्मक उत्तर दे पाते। 

“ज्यों-ज्यों शिक्षा का मूल्य बढ़ता जा रहा है त्यों त्यों जीवन के मूल्य कम होते जा रहे हैं और उन्हें समृद्ध करने में शिक्षा की भूमिका कम होती जा रही है।” 

ज्यों-ज्यों शिक्षा का मूल्य बढ़ता जा रहा है त्यों-त्यों जीवन के मूल्य कम होते जा रहे हैं और उन्हें समृद्ध करने में शिक्षा की भूमिका कम होती जा रही है। क्या जीवन के मूल्यों को निर्धारित और उन्हें संस्कारित-परिष्कृत करने में शिक्षा की कोई भूमिका रही है और हो सकती है? यह तो तभी स्पष्ट हो सकता है जब हम जीवन मूल्य और शिक्षा की अर्थवत्ता समझ लें। 

किसी चीज का मूल्य उसकी आवश्यकता, प्रभाविता और उपलब्धता से तय होते हैं। जो चीज जीवन के लिए जितनी ही आवश्यक होती है और जीवन पर जितना ही सकारात्मक प्रभाव डालती है और जितनी कम और कठिनाई से उपलब्ध होती है वह उतना ही मूल्यवान होनी चाहिए। पर आधुनिक काल में मूल्य तय करने वाला एक बिचौलिया बाजार के रूप में पैदा हो गया है। बाजार विविध हथकंडों से चीजों के मूल्य निर्धारित करता है। वास्तव में मूल्य का निर्धारक चीजों की अन्तर्व और उसकी गुणवत्ता होती है। चीजों के मूल्यों के अनुसार वे मल्यवान होती हैं। यही बात जीवन के बारे में भी कही जा सकती है। जीवनी उतना ही मूल्यवान हो सकता है जितना व्यक्ति और समाज के जीवन की अन्तर्वस्तु और गुणवत्ता समृद्ध होती जाती है। पर चीजें स्वयं अपना इस्तेमाल नहीं करतीं जबकि जीवन का धारक मनुष्य जीवन का उपभोक्ता भी होता है और मनुष्य अनिवार्यतः एक सामाजिक प्राणी होता है। इसलिए मनुष्य का व्यक्तिगत जीवन सामाजिक जीवन से भी आनुषंगिक रूप से जुड़ा होता है। इसलिए जीवन मूल्य वे उत्प्रेरक और कभी-कभी संचालक आदर्श और कारक होते हैं जो व्यक्ति और समाज के जीवन को अधिक सार्थक, सकारात्मक और सृजनात्मक बनाते हैं। इसमें व्यक्ति और  समुदाय की चेतना तथा उस व्यवस्था की निर्णयात्मक भूमिका होती है जो व्यक्ति और समुदाय के जीवन को संचालित-शासित करती है। व्यवस्था जीवन मूल्यों को लगातार प्रभावित करती है और अपने हित में ऐसा पर्यावरण बनाती है जिसमें वे मूल्य पनपे और उस व्यवस्था का हित-पोषण करें। जबकि मनुष्य की चेतना व्यवस्था के मन्तव्य को समझ कर उसके विरुद्ध भी निर्णय ले सकती है। कोई व्यवस्था की ‘सेवा’ को जीवन का मूल्य बना सकता है तो कोई उसे बदलने के लिए ‘बलिदान’ को। 

अब जरा शिक्षा की अर्थवत्ता समझ लें। फ्रांस की क्रांति के नेता दांते का ऐतिहासिक मत था : “रोटी के बाद शिक्षा जीवन में सबसे मूल्यवान है।” रोटी जैविक जीवन के लिए अनिवार्य है और शिक्षा सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के लिए। उर्दू के बेमिसाल शायर मिर्जा गालिब का कहना था : “आदमी को भी मयस्सर नहीं ‘इंसां होना। यानी जो हाड़-मांस का पुतला है आदमी, वह इंसान तभी बनता है जब उसमें इंसानियत पैदा होती है यानी जब वह एक सामाजिक-सांस्कृतिक प्राणी बन जाता है। और ऐसा आसानी से नहीं होता, हर आदमी इंसान नहीं बन पाता। क्योंकि वह वे जीवन-मूल्य नहीं विकसित कर पाता जिनके कारण आदमी इंसान बन सकता है। 

जब कुछ बंदर आदमी बन गए तो आदमी की एक नई नस्ल पर हो गई। यानी आदमी तो आदमी रहेगा वह मूर्ख हो या विद्वान हो , असहाय हो या शक्तिमान हो, सद्गुण संपन्न हो या अनाचारी। पर बनने की प्रक्रिया जारी है और जारी रहेगी। इसलिए मूल्य का प्र हमेशा प्रासंगिक और आवश्यक बना रहेगा। 

“मूल्यों का संबंध साध्य ही नहीं साधन की पवित्रता से भी जुड़ा है और आज साध्य संकुचित और साधन की पवित्रता अप्रासंगिक होती जा रही है।”

इंसान बनने के लिए उसे सोचने वाला प्राणी (Homo Sapi ens) बनना पड़ा। इसलिए मनुष्य प्रकृत्या विचारवान होता है। वह हाथ का मानो विस्तार कर उपकरण बनाने लगा फिर और जंतुओं की तरह स्वयं को अनुकूलित करने के बजाय पर्यावरण को अनुकूलित करने लगा। उसे समुदाय का बोध हो गया और उसने ‘स्वयं’ और ‘पर’ के बीच तरह-तरह के संबंध विकसित करना शुरू कर दिया और एक समष्टि बोध पैदा हुआ। इस तरह मस्तिष्क और उपकरणों का विकास करता हुआ मनुष्य विकासमान बना रहा है। 

मनुष्य जैसे ही जीवन की क्षण भंगुरता को थोड़ा सुरक्षित महसूस करने लगा उसने करणीय और अकरणीय को सही और गलत, अच्छा और बुरा कहना शुरू किया। इसे ही धर्मों ने पुण्य और पाप का जामा पहना दिया। जो सही और अच्छा यानी हितकर है उसे जीवन मूल्य करार देकर उसे करणीय करार दिया गया और जिसे मनुष्य और समाज के लिए अहितकर समझा गया उसे ही गलत, अनैतिक और पाप की कोटि में रखा गया। 

पर समाज की व्यवस्था ने कुछ निहित हितों की रक्षा में भेदभाव बढ़ाने शुरू कर दिए। इसलिए सबके लिए समान नियम-कानून और नैतिकता की जगह अंतर किया जाने लगा। पहले नारी-पुरुष के बीच मूल्य बदले और पुरुष वर्चस्व को नैतिक और सांस्कृतिक आवरण में स्थापित कर दिया गया। फिर बारी आई मेहनत करने वालों की। बौद्धिक श्रम और शारीरिक श्रम में अंतर कर शारीरिक श्रम करने वालों को निकृष्ट बनाए रखने वाली नैतिकता स्थापित कर दी गई। उदाहरण के लिए ‘संतोषम् परम् सुखम्’ को एक वांछित और श्रेष्ठ जीवन मल्य की तरह स्थापित किया गया पर समाज के अन्य वर्गों ने इसका पालन नहीं किया और वंचित लोग संतोष और ‘करम गति टारे नहीं टरे’ के जाप के साथ जीवन ढोते रहे। 

बहरहाल आधुनिक काल में जीवन के सभी क्षेत्रों की तरह जीवन मूल्यों के क्षेत्र में भी परिवर्तन आया। बस एक बात नहीं बदली-जीवन मूल्य नीचे समाज में सहज रूप से जन्मे और विकसित हुए थे पर अब ऊपर से स्थापित किया जाने लगा था। वह जारी रहा परन्तु धर्म केंद्रिता की जगह मानव केंद्रिता आधुनिक काल का निर्णायक विकास रहा है। इसके कारण नैतिकता और जीवन मूल्य भी परिवर्तित होते गए हैं। उदाहरण के लिए व्यक्ति का सम्मान, जनवाद, राष्ट्रवाद आदि व्यक्ति के श्रेष्ठ मूल्य की तरह स्थापित होते गए हैं। 

इसमें शिक्षा की निर्णायक भूमिका रही है। ज्यों-ज्यों मनुष्य शिक्षित होता जाता है त्यों-त्यों वह ग्रंथों के आतंक से मुक्त होता जाता है- हाँलाकि हमेशा ऐसा नहीं होता, पर संभावना तो बनी ही रहती है। शिक्षा मनुष्य को सूचना, ज्ञान और विवेक देती है। सूचना और ज्ञान का गलत इस्तेमाल भी हो सकता है-होता है, पर विवेक तो सही गलत में पहचान को ही कहते हैं। हो सकता है कि कभी विवेक के विरुद्ध जाकर व्यक्ति किसी मजबूरी या दबाव में गलत भी कर बैठे पर प्रायः विवेक सही ही करवाता है। 

शिक्षा रूढ़ि, परंपरा और परिवर्तन में अंतर बता देती है तो मनुष्य अपनी राह चुन सकता है। वास्तव में जीवन मूल्य व्यक्ति के चुनाव से तय होता है। मिथकों की मानें तो सत्य युग में भी दानव होते थे और असत् का बोलबाला था। तभी तो ‘सत्यमेव जयते’ कहना पड़ा था कि अन्ततः सत्य की विजय होती है। उसी तरह ‘कलियुग’ में भी महात्मा होते आए हैं। कुल मिलाकर कौन व्यक्ति जीवन से क्या चाहता है और तदनुकूल अपने जीवन को किस राह पर ले जाना चाहता है इससे ही जीवन मूल्य की सार्थकता सिद्ध होती है। आज की दुनिया में गलत का वर्चस्व स्थापित होता जा रहा है। मूल्यों का तेजी से क्षरण हो रहा है। यह तभी शुरू हो गया था जब पूंजीवाद के विकास के बाद ब्रिटेन में ‘आनेस्टी इज द बेस्ट पॉलिसी’ की स्थापना हुई थी यानी, ईमानदारी नैतिकता नहीं नीति का प्रश्न बन गई थी- ईमानदार होने को ‘मनाफे’ से जोड़ दिया गया था। 

हमारे समाज में मनीषियों ने जब कहा था ‘तमसो मा ज्योर्तिगमय, | असतो मा सद्गमय’ तब जीवन मूल्य तय करने का सूत्र पकड़ा दिया था। पर धीरे-धीरे प्रकाश और अंधकार, सद और असद तथा मृत्यु और जीवन का अर्थ ही बदलता गया है और मनुष्य खुशी-खुशी अंधकार, असत्य और मृत्यु की राह पर अग्रसर है। जीवन की सार्थकता को सफलता और सफलता को किसी कीमत पर निजी और तात्कालिक लाभ से निर्धारित किया जाने लगा है। मूल्यों का संबंध साध्य ही नहीं साधन की पवित्रता से भी जुड़ा है और आज साध्य संकुचित और साधन की पवित्रता अप्रासंगिक होती जा रही है। पर इससे मनुष्य तनावग्रस्त और असुरक्षित भी होता जा रहा है। 

सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि आज इतनी प्रगति के बावजूद जीवन मूल्य नैतिकता के प्रश्न हैं, वैधानिकता के नहीं। विधि का संरक्षण नहीं प्राप्त है नैतिकता को, और न जीवन मूल्यों को। इसलिए खुलेआम न्याय कानून के आगे नैतिकता की अवहेलना करता रहता है। न्याय की आंखों पर पट्टी बांध कर एक ऐसे मिथक की रचना की गई जिससे अभी तक मनुष्य मुक्त नहीं हो पाया है। जीवन मूल्य तभी समाज का संचालन करेंगे, तभी ‘दार्शनिक-राजा’ या ‘कवि-राजा’ की प्राचीन परिकल्पना सच होगी जब आरोपित कानून से बड़ी सत्ता हो जाएगी जीवन मूल्यों की, नैतिकता की। और ऐसा हो सकता है क्योंकि इसी में व्यक्ति और समाज का उच्चतम हित पोषण होगा। और इसमें शिक्षा की निर्णायक भूमिका होगी। पर इसके पहले शिक्षा के अन्तर्वस्तु और रूप को बदलना होगा। उसे वास्तव में मनुष्य के । सर्वोत्तम को उजागर करने का उपकरण बनाना होगा। 

आज मानव इतिहास अपने सबसे चुनौतीपूर्ण संक्रमण काल से गजर रहा है। मानव सभ्यता यहां से गुणात्मक छलांग लगा सकती है या फिर और आत्मघात की राह पर आगे बढ़ती जा सकती है। ऐसे में जीवन मूल्य यानी सृजनात्मक, समष्टिवादी, नैतिकता प्रकाश स्तंभ की तरह राह दिखा सकते हैं और उनका अहसास और समझ बनाने वाली शिक्षा भटक जाने से बचा सकती है। अब तो यह केवल आदर्श का मुद्दा नहीं रहा। अगर मानव समाज में शासक समुदाय संकीर्णता से नहीं उबरता और समाज को उच्चतर मूल्यों की राह नहीं दिखाता और समाज स्वयं सचेत होकर शासकों पर दबाव नहीं डालता तो जीवन और जगत आसन्न खतरों से बच नहीं सकेगा। 

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