Upsc essay drishti Ias in hindi-राजनीतिक विचारधाराओं का साहित्य पर प्रभाव (U.P. PC.S. Main2017) 

Upsc essay drishti Ias in hindi

Upsc essay drishti Ias in hindi-राजनीतिक विचारधाराओं का साहित्य पर प्रभाव (Impact of Political Ideologies on Literature) (U.P. PC.S. Main2017) 

साहित्य समाज का दर्पण है, यह उक्ति बिल्कुल सटीक है। किसी भी समाज में साहित्य के माध्यम से मानवीय जीवन का प्रतिबिंब परिलक्षित होता है। साहित्य एवं सामाजिक चेतना एक दूसरे से संबंधित होते हैं जबकि सामाजिक चेतना एवं राजनीति में गहरा संबंध होता है। इस तरह साहित्य एवं राजनीति सम्बन्धी विचार एक-दूसरे से संबंधित नजर आते हैं। राजनीति समाज की दिशा तय करती है वहीं समाज राजनीति की। कहा जा सकता है कि जिस देश की राजनीतिक 

साहित्य एवं सामाजिक चेतना एक दूसरे से संबंधित होते हैं जबकि सामाजिक चेतना एवं राजनीति में गहरा संबंध होता है। इस तरह साहित्य एवं राजनीति सम्बन्धी विचार एक-दूसरे से संबंधित नजर आते हैं। राजनीति समाज की दिशा तय करती है वहीं समाज राजनीति की। 

ध्यातव्य है कि भारत की राजनीतिक यात्रा में राजनीतिक विचारधाराओं का साहित्य पर प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। सुविधा की दृष्टि से इस अन्योन्याश्रित संबंध को अग्रलिखित संभागों में देखा जा सकता है। 

भारत में क्रमबद्ध रूप से साहित्य का विकास 19वीं शताब्दी के आस-पास माना जा सकता है। इस समय भारत के नवप्रौढ़ मध्य वर्ग पर पुनर्जागरण का प्रभाव एवं स्वतंत्रता की पश्चिमी अवधारणा के प्रति झुकाव बढ़ रहा था। 1882 ई. में बंकिम चंद्र चटर्जी कृत ‘आनंदमठ’ में स्पष्ट रूप से राजनीतिक रूप से उन्नत स्वतंत्रता की अवधारणा कार्य कर रही थी। इस पुस्तक में संन्यासी विद्रोह का विस्तार से वर्णन है। इसके अतिरिक्त प्रेमचंद्र युग के साहित्यकारों में राष्ट्रीय भावनाओं को व्यक्त करने का उत्साह उस तरह नहीं देखा गया। 

जैसे-जैसे भारत में स्वतंत्रता की आवाजें तेज हो रही थीं वैसे वैसे राजनीतिक साहित्य रचे जा रहे थे। 1905 में स्वतंत्रता सेनानी विपिन चंद्र पाल द्वारा निकाला जाने वाला अखबार वंदे मातरम रहा हो, बारिंद्र कुमार घोष, अविनाश भट्टाचार्य एवं भूपेन्द्रनाथ दत्त द्वारा निकाली जाने वाली युगांतर पत्रिका हो इन सभी में राजनीतिक विचारों का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है। राजनीतिक विचारों का साहित्य पर प्रभाव की पड़ताल करें तो हम पाते हैं कि भारत में प्रचुर साहित्य रचे गये जिन पर राजनीतिक विचारों का प्रभाव था। हमको निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से इस बिंदु पर दृष्टि डालने की कोशिश करनी चाहिए 

1884 में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित ‘देवी चौधरानी’ उपन्यास जिसमें एक स्त्री द्वारा स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेना प्रदर्शित किया गया है। 

के. एस. वेंकटरमन द्वारा रचित उपन्यास ‘मुरुगन’ में महात्मा गाँधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन की स्पष्ट छाप थी।

मुल्क राज आनंद कृत उपन्यास ‘अनटचेबल्स’ में छुआछूत की दुर्दीत सोच का विशद वर्णन है।

राजाराव कृत ‘कंठपूरा’ में एक गाँवकी कहानी है जो अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करता है।

मार्क्सवादी साहित्यकार यशपाल द्वारा कृत उपन्यास ‘दादा कॉमरेड’ में स्पष्ट रूप से ‘क्रांतिकारी वामपंथी संगठनों की सक्रियता को स्वतंत्रता आंदोलन में देखा जा सकता है।

मुंशी प्रेमचंद द्वारा कृत उपन्यास ‘हृदय परिवर्तन’ में स्पष्ट रूप से गाँधीवाद की स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती है। मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि पर विशेष रूप से गांधीवादी विचारधारा का प्रभाव दिखाई पड़ता है।

भारतीय क्रांतिकारी राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ द्वारा कृत गजल ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ में स्पष्ट क्रांतिकारी धारा के दर्शन होते हैं। 

ध्यातव्य है कि मार्क्सवादी साहित्य आधुनिक काल में खूब लिखा गया। आधुनिक काल में मार्क्सवादी विचारधारा का व्यापक असर हुआ। महाश्वेता देवी का उपन्यास ‘1084वें की मां’ पर भी इस विचारधारा का असर देखा जा सकता है। हालांकि प्रसिद्ध उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ पर भी मार्क्सवाद की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। राममनोहर लोहिया का प्रभाव ओंकार शरद के उपन्यासों में दिखाई देते हैं। 

वर्तमान संदर्भ में देखा जाय तो वर्तमान राजनीति का कर एवं घृणित चेहरा उपन्यासों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। 

मार्क्स का प्रभाव मार्कंडेय, भैरव प्रसाद गुप्त और ज्ञान प्रकाश के उपन्यासों में दिखाई देता है। जनवाद और मार्क्सवाद आधुनिक भारतीय साहित्य का यूटोपिया है। चर्चित आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने जितनी भी मानक आलोचना की पुस्तकें लिखी हैं सब पर इस विचारधारा का स्पष्ट असर दिखाई पड़ता है। 

प्रसिद्ध साहित्यकार जैनेन्द्र द्वारा लिखित कई उपन्यासों मसलन तपोभूमि, जयवर्धन, सुखदा आदि में स्वतंत्रता आंदोलन की छाप है। 

इस प्रकार समकालीन भारतीय साहित्य पर राजनीतिक विचाराधारों का स्पष्ट प्रभाव समझा जा सकता है। जिस प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था रही उसी प्रकार के साहित्य रचे गये। सामंती काल में सामंती सहित्य रचे गए जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में साहित्य का केन्द्र नवोदित लोकतांत्रिक व्यवस्था रही। वर्तमान संदर्भ में देखा जाय तो वर्तमान राजनीति का क्रूर एवं घृणित चेहरा उपन्यासों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। इसका स्पष्ट उदाहरण मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’ और ‘पूस की रात’, ‘सद्गति’ इत्यादि कहानियां हैं जो व्यवस्था पर प्रहार करती हैं और सबसे बड़ी बात कि इसकी आज भी प्रासंगिकता है। संक्षेप में कहा जाय तो साहित्यके जन्म से लेकर वर्तमान तक साहित्य पर राजनीतिक विचारधाराओं की गहरी छाप रही है। 

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