UPPSC Essay in hindi-भारत में वृद्धावस्था की समस्या (Problems of Old Age) 

भारत में वृद्धावस्था की समस्या 

UPPSC Essay in hindi-भारत में वृद्धावस्था की समस्या (Problems of Old Age) 

वृद्धावस्था मानव जीवन से जुड़ा वह यथार्थ है, जिसका सामना प्रायः हर किसी को करना पड़ता है। वृद्धावस्था को जीवन की शाम कहा गया है। इस शाम के गहराने के साथ ही वृद्धावस्था से जुड़ी अनेक समस्याएं सिर उठाने लगती हैं और जीवन की यह शाम बोझिल होने लगती है। वस्तुतः वृद्धावस्था अपने आप में एक ऐसी बीमारी है, जिससे उबर पाना इस उम्र में संभव नहीं रह पाता है। वेद व्यास महाभारत में कहते हैं कि वृद्धावस्था और मृत्यु के वश में पड़े हुए मनुष्य को औषधि, मंत्र, होम और जप भी नहीं बचा पाते हैं। इस बात से हम वृद्धावस्था की भयावहता को समझ सकते हैं। 

“वेद व्यास महाभारत में कहते हैं कि वृद्धावस्था और मृत्यु के वश में पड़े हुए मनुष्य को औषधि, मंत्र, होम और जय भी नहीं बचा पाते हैं। इस बात से हम वृद्धावस्था की भयावहता को समझ सकते हैं।” 

वृद्धजनों की औसत आयु बढ़ने से वृद्धों की आबादी भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में बढ़ी है। यही कारण है कि अब वृद्धावस्था को वैश्विक स्तर पर सामाजिक, आर्थिक व मानवीय मुद्दा माना जाने लगा है। इस संदर्भ में भारत की स्थिति कुछ ज्यादा ही विकट है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष का यह आकलन है कि वर्ष 2050 तक समूचे विश्व में प्रत्येक 6 सर्वाधिक बुजुर्गों में से एक भारत का निवासी होगा तथा चीन एकमात्र ऐसा राष्ट्र होगा जहां विश्व के सर्वाधिक संख्या में बुजुर्ग लोग दीर्घ जीवन व्यतीत करेंगे। 

भारत में अच्छी चिकित्सकीय सेवाओं, खाद्यान्न की पर्याप्त उपलब्धता एवं आर्थिक विकास के कारण जीवन प्रत्याशा बढ़ी है। फलतः वृद्धों की आबादी भी बढ़ी है। वर्ष 1951 में हमारे देश में वृद्धों की संख्या मात्र 1.98 करोड़ थी, जो कि अब बढ़ कर लगभग 11 करोड़ हो चुकी है। स्पष्ट है कि वृद्धों की आबादी में निरंतर वृद्धि हो रही है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष’ एवं ‘हेल्पएज इंडिया’ नामक संस्था के आकलन से यह पता चलता है कि वर्ष 2026 तक भारत में बुजुर्गों की संख्या बढ़कर 17.3 करोड़ तक पहुंच सकती है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि वृद्धों की आबादी का बढ़ना जीवन प्रत्याशा में वृद्धि का सकारात्मक संकेत है, किंतु इससे जुड़ा एक नकारात्मक पहलू यह भी है कि वृद्धों की आबादी बढ़ने के साथ-साथ उनसे जुड़ी अनेकानेक समस्याएं भी बढ़ रही हैं। वृद्धों को विभिन्न प्रकार की शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस अवस्था में ये समस्याएं अत्यंत भारी पड़ती हैं, क्योंकि इनसे निपटने का दम-खम बुजुर्गों के पास नहीं रहता है। आइये पहले इन समस्याओं पर गौर करें।

सबसे बड़ी समस्या वृद्धों के एकाकीपन की है। वृद्धावस्था एक ऐसी अवस्था होती है, जिसमें परिवार के सहारे की आवश्यकता बढ़ जाती है। जब यह सहारा नहीं मिलता है अथवा परिवार के सदस्य बजर्गों की उपेक्षा करने लगते हैं, तो स्थिति अत्यंत दयनीय हो जाती है। अपमान, प्रताड़ना और उपेक्षा की वजह से वृद्धों को उनकी अवस्था एक बीमारी जैसी लगने लगती है। वे अवसाद के शिकार हो जाते हैं। जीवन उन्हें बोझ लगने लगता है। यह एक संत्रासपूर्ण स्थिति होती है, जिससे बचाव की हर मुमकिन कोशिश होनी चाहिए। यह भी दुखद है कि वृद्धों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा मधुमेह, दृष्टिदोष, आर्थराइटिस, रक्तचाप और तनाव जैसी बीमारियों का शिकार रहता है। इनमें उपचार के साथ-साथ देखभाल करने वालों की भी जरूरत पड़ती है। वाह्य उपचार के लिए वृद्ध अकेले नहीं जा सकते और जब देखभाल करने वाले नहीं होते, तो स्थिति कष्टप्रद हो जाती है। यह लाचारी भरी स्थिति वृद्धों के लिए किसी संत्रास जैसी होती है। 

अकेले रहने वाले बुजुर्गों की सुरक्षा भी एक बड़ी समस्या है। स्थिति इतनी चिंतनीय है कि आपराधिक मानसिकता वाले तो इन्हें अपना शिकार बना ही लेते हैं, अक्सर धन-सम्पदा के लालच में परिजन या नजदीकी रिश्तेदार तक इन्हें शिकार बनाते हैं। आए दिन ऐसी घटनाएं प्रकाश में आती रहती हैं, जब वृद्धों के विरुद्ध अपराधियों या उनके ही नजदीकियों द्वारा आपराधिक कृत्यों को अंजाम दिया जाता है। यह वृद्धों की सुरक्षा का एक अहम व चिंतनीय बिन्दु है, जिसकी तरफ सरकारें या समाज को पर्याप्त ध्यान देकर कोई ठोस पहल करनी होगी। 

वद्धावस्था में आर्थिक असुरक्षा दुश्वारियों को और अधिक बढ़ा देती है। आर्थिक तंगी लाचारी को और बढ़ा देती है और वृद्धजन ससम्मान जीवनयापन नहीं कर पाते। परिजनों या दूसरों पर आश्रित रहने वाले वृद्धजनों को अक्सर झिड़कियों या दुत्कार का सामना करना पड़ता है। अर्थाभाव में वे अच्छे उपचार और देखभाल से वंचित रह जाते हैं। अध्ययनों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार शहरी क्षेत्रों में 64 प्रतिशत वृद्ध महिलाएं तथा 46 प्रतिशत वृद्ध पुरुष अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरे तौर पर दूसरों पर आश्रित रहते हैं। वृद्धावस्था की खुशहाली के लिए आर्थिक मजबूती बहुत आवश्यक होती है, जिसका हमारे देश में नितांत अभाव है। संयुक्त राष्ट्र भी वृद्धों की आर्थिक असुरक्षा पर चिंता जता चुका है। 

भारत में 60 वर्ष की आयु तक पहुँचने वाला एक व्यक्ति आज सामान्य तौर पर कम से कम 15 और वर्षों तक जीवित रहने की आशा कर सकता है। परंतु इनमें से अधिकांश अपने इस शेष 15 वर्ष के जीवन को सहज एवं सामान्य ढंग से जीने हेतु आवश्यक आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ हो जाते हैं। आंकड़ों के अनसार 56 प्रतिशत पुरुष एवं 55 प्रतिशत महिलाएं 60 वर्ष की अवस्था के बाद भी आर्थिक आमदनी हेतु कार्य करना जारी रखते हैं। पुरुषों एवं महिलाओं का यह प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत और अधिक ही पाया जाता है। ऐसा पाया गया है कि 80 वर्ष अथवा उससे भी अधिक आयु होने के बावजूद 20 प्रतिशत पुरुष एवं 13 प्रतिशत महिलाएं अभी भी पैसे कमाने हेतु मजबूर है और परिणामस्वरूप कार्यरत् हैं। ऐसा सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के अभाव एवं उच्च गरीबी स्तर के कारण हो रहा है। 

“भारत में बुजुर्गों की आर्थिक असुरक्षा की स्थिति इतनी विकट है कि जहां भारत में मात्र 11 प्रतिशत आबादी के पास ही सेवानिवृत्ति के बाद आय के स्रोत उपलब्ध हैं, वहीं सरकार का वृद्धावस्था कार्यक्रम 10 प्रतिशत वृद्धों तक भी नहीं पहुंच पाता। यह तथ्य हेल्पएज इंडिया के सर्वेक्षण में भी उजागर हो चुका है।” 

भारत में बुजुर्गों की आर्थिक असुरक्षा की स्थिति इतनी विकट है कि जहां भारत में मात्र 11 प्रतिशत आबादी के पास ही सेवानिवृत्ति के बाद आय के स्रोत उपलब्ध हैं, वहीं सरकार का वृद्धावस्था कार्यक्रम 10 प्रतिशत वृद्धों तक भी नहीं पहुंच पाता। यह तथ्य हेल्पएज इंडिया के सर्वेक्षण में भी उजागर हो चुका है। 

देश में वृद्धों की बढ़ती आबादी एवं वृद्धावस्था की समस्याओं को ध्यान में रखकर वृद्धों को संबल प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। सबसे अच्छी पहल ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम’ (Main tenance and Welfare of Parents and Senior Citizen Act, 2007) को प्रभावी बनाकर की गई है। इस अधिनियम में जहां लाभार्थियों के लिए वृद्धाश्रम की स्थापना तथा अस्पतालों में वृद्ध नागरिकों के लिए अलग से सुविधाएं प्रदान करने का प्रावधान है, वहीं ऐसे माता-पिता जो अपनी आय या सम्पत्ति से अपना खर्च उठाने में अक्षम हैं, वे अपने वयस्क बच्चों से अपने रख-रखाव के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस रख-रखाव में उचित भोजन, आवास, कपड़े एवं चिकित्सकीय खर्चे शामिल हैं इसमें जहां वरिष्ठ नागरिकों के लिए जिले में एक अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित करने का प्रावधान है, वहीं दोषी व्यक्ति को 3 माह की कैद या 5000 जुर्माना या दोनों सजाएं एक साथ भुगतनी पड़ सकती हैं। वृद्धों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उन्हें घरेलू हिंसा अधिनियम के दायरे में लाया गया है, तो सीआरपीसी की धारा 125 में भी माता-पिता के भरण-पोषण का प्रावधान है। 

वृद्धों के कल्याण एवं उन्हें न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा के दायरे में लाने के उद्देश्य से संविधान के अनुच्छेद 41 एवं 42 में वर्णित नीति-निदेशक तत्वों के अनुपालन में वर्ष 1995 में हमारे देश में राष्ट्रीय, सामाजिक सहायता कार्यक्रम का सूत्रपात किया गया था। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना इसी कार्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। वृद्धों की देख-भाल, संरक्षण, सेवा एवं उनके प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने के उद्देश्य से हमारे देश में वर्ष 2011 में ‘नई राष्ट्रीय वृद्धजन नीति’ लागू की गई, जो कि वर्ष 1999 में घोषित की गई राष्ट्रीय वृद्धजन नीति का परिमार्जित स्वरूप थी। वृद्धजनों के बारे में नीतियों और कार्यक्रमों के विकास हेतु सरकार को सलाह-मशविरा देने के उद्देश्य से वर्ष 2005 में राष्ट्रीय वृद्धजन परिषद (National Council for OldAgeing-NCOA) को पुनर्गठित कर वृद्धों के कल्याण के उपाय सुनिश्चित किए गए तथा वृद्धों के कल्याण एवं उनसे संबंधित नीतियों के निर्धारण के लिए इस परिषद को सर्वोच्च सरकारी संस्था का दर्जा प्रदान किया गया। 

 हमारे देश में वृद्धों के लिए चलाया जा रहा ‘समन्वित कार्यक्रम’ भी महत्त्वपूर्ण है। यह एक समग्र कार्यक्रम है, जिसके तहत वृद्धों की जरूरतों को पूरा करने, भोजन, स्वास्थ्य देख-रेख, आश्रय, सक्रिय एवं उत्पादक वृद्धावस्था को प्रोत्साहित करने, वृद्धावस्था के संदर्भ में अनसंधान एवं जागरूकता निर्माण के उपाय सनिश्चित किए जा रहे हैं। इस कार्यक्रम की सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें बच्चों व युवाओं एवं वृद्धजनों के मध्य अच्छे अंतर-पीढ़ी संबंधों (Inter Generation Relations) को विकसित करने की दिशा में भी ध्यान दिया गया है। वृद्धों के हितों को ध्यान में रखकर जहां रेल के भाड़े में उन्हें रियायत प्रदान की गई है, वहीं वरिष्ठ नागरिक बचत योजना के तहत उनके लिए ब्याज दर 9 फीसदी निर्धारित की गई है। बैंक जमाओं पर भी वरिष्ठ नागरिकों के लिए अधिक ब्याज दर का प्रावधान है। वृद्धों के हितों को ध्यान में रखकर उनके लिए सरकार की तरफ से ‘क्षेत्रीय बुजुर्ग चिकित्सा विज्ञान केंद्र’ खोले जा रहे हैं। उक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि सरकार की तरफ से बुजुर्गों के कल्याण हेतु अच्छी पहलें की गई हैं। इन पहलों के अच्छे परिणाम तभी मिल सकेंगे जब इनका क्रियान्वयन ढंग से हो और इन्हें भरपूर सामाजिक सहयोग मिले। 

वृद्धावस्था जीवन का वह चरण है, जिससे होकर प्रायः हर किसी को गुजरना पड़ता है। इस बात को ध्यान में रखकर हमें बुजर्गों के साथ विनम्र और सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए, ताकि उनके सम्मान-बोध को किसी भी प्रकार की ठेस न पहुंचे। हमारा यह नैतिक व सामाजिक दायित्व बनता है कि हम बुजुर्गों की गरिमा का पूरा-पूरा ध्यान रखें। हमारे बुजुर्ग वे घनेरे वृक्ष होते हैं, जिनकी छांव अत्यंत सुखद और शीतल होती है। इसी छांव के तले हम पुष्पित-पल्लवित होते हैं। इन्हीं बुजुर्गों से हमें संस्कारों की पूंजी मिलती है। देश और समाज की सेवा करते हुए ये वृद्धावस्था में प्रवेश करते हैं। इस तरह देश और समाज के निर्माण में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान होता है, जिसे विस्मृत नहीं किया जा सकता। ऐसे में हमारा यह कर्त्तव्य बनता है कि हम अपने इन बुजुर्गों के जीवन की शाम को बोझिल न होने दें। हम उनका संबल बनें, उनका सहारा बनें, उन्हें अपना सान्निध्य व सहयोग प्रदान कर एकाकीपन का शिकार न होने दें। हम ऐसे प्रयास करें जिनसे बुजुर्गों को विश्राम और विश्रांति प्राप्त हो और उन्हें किसी भी प्रकार की असुरक्षा का भय न सताए। 

परिवार के हर सदस्य का यह दायित्व बनता है कि वह घर के बुजुर्गों की देखभाल करे और उन्हें समुचित समय प्रदान करे। बुजुर्गों को आर्थिक सुरक्षा मुहैया करवाना समाज, परिवार और सरकार सभी की जिम्मेदारी बनती है। हमें इससे विमुख नहीं होना चाहिए। बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील व मानवीय बर्ताव कर हम एक ऐसा प्रेरक माहौल । प्रस्तुत कर सकते हैं, जिससे उनकी स्थिति में सुधार आ सकता है और वे मानसिक संतापों व कष्टों से बच सकते हैं। चूंकि परिवार, समाज की प्रारंभिक इकाई होता है, अतएव यह प्रेरक पहल परिवार से ही शुरू होनी चाहिए, ताकि बुजुर्गों के प्रति एक सम्मानजनक और गरिमामय वातावरण निर्मित हो सके। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे बुजुर्ग परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए किसी धरोहर के समान होते हैं, अतः हमें अपनी इन धरोहरों की सेवा तन-मन से करनी चाहिए। ऐसा करके ही हम वृद्धावस्था को अभिशाप बनने से बचा सकते हैं। 

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