उपदेशक कहानी-लालची मित्र

उपदेशक कहानी-लालची मित्र

उपदेशक कहानी-लालची मित्र

बुद्धिवर्धक कहानियां-समझ को तराशने वाला अनूठा कहानी

बहुत समय पहले की बात है। चंदन नगर में सुखराम नाम का एक घसियारा था। वह बहुत भोला लेकिन ईमानदार था। वह दिन भर घास काटता और की गठरी जमींदार को बेच देता। इससे जो पैसे मिलते, उसी से अपना पेट भरता। सुखराम के दिन बहुत गरीबी से कट रहे थे। कभी-कभी तो उसके परिवार को रात में भूखा ही सोना पड़ता था। फिर भी सुखराम ईमानदारी से ही पैसे कमाता। 

एक दिन सुबह जब वह जंगल में घास काट रहा था कि अचानक आकाश में घने बादल घिर आए और देखते ही देखते गरज के साथ पानी की बौछारें पड़ने लगीं। सुखराम अपनी घास की गठरी समेटकर बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गया। पानी बहुत तेजी से बरसने के कारण सुखराम पानी से पूरी तरह भीग गया था। 

सुखराम देर तक पेड़ के नीचे बैठा रहा लेकिन पानी बरसता ही चला जा रहा था, रुकने का नाम नहीं ले रहा था। ठंड से उसका शरीर कांपने लगा। तभी अचानक सामने से कुछ फुसफुसाहट की आवाजें सुनाई पड़ीं। उसने नजर उठाकर सामने पीपल के पेड़ की तरफ देखा, पेड़ के आस-पास उसे कोई न दिखा लेकिन फुसफुसाहट की आवाज अब भी सुनाई पड़ रही थी। 

सुखराम उस आवाज को अब और ध्यान से सुनने लगा। उसे ऐसा लगा जैसे उससे कोई कुछ कह रहा हो। 

इस वीरान जंगल में आदमी की आवाज सुनकर सुखराम डरने लगा। उसने हिम्मत जुटाकर जोर से कहा, “कौन है?” 

तभी पीपल के पेड़ से धुंआ उठा और धुएं से एक दैत्य सामने आया। दैत्य ने सुखराम से कहा, “तुम डरो मत, मैं तुम्हारा नुकसान नहीं करूंगा बल्कि तुम्हारी गरीबी और ईमानदारी को समझकर तुम्हें कुछ धन देना चाहता हूं। लेकिन तुमको मुझ एक वचन देना होगा कि अब तुम इस पीपल के पेड़ के नीचे की घास कभी नहीं काटोगे। सुखराम कुछ देर तक उस दैत्य को देखता रहा। फिर साहस बटोर कर बोला, “इस पेड़ के नीचे की घास बहुत मुलायम है। इसका अच्छा दाम जमींदार मुझे देता है इसीलिए मैं यहां की घास काट रहा हूं।” 

सुखराम यह कहता हुआ तेज कदमों से अपने घर की ओर चलने लगा। तभी दैत्य ने पीछे से आवाज देकर कहा, “सुखराम, मैं तुम्हें खाली हाथ नहीं जाने दूंगा। इस पीपल के पेड़ के नीचे गड्ढे में बहुत धन है। इसमें से तुम अपनी जरूरत भर का धन ले जा सकते हो।” 

सुखराम उस गड्ढे में से कुछ धन लेकर अपने घर पहुंचा। घर पहुंचकर सुखराम ने अपनी पत्नी को सारी बात बताई। उसकी पत्नी रुपये देखकर बहुत खुश हुई।

अब सुखराम के दिन बड़े मजे से कटने लगे। सारा गांव आश्चर्य में था कि सुखराम अचानक कैसे धनी हो गया। सुखराम का एक पड़ोसी मित्र दीनू बहत लालची आदमी था। दीनू की पत्नी जब सुखराम की पत्नी से धन के बारे में पूछती तो सुखराम की पत्नी उसे टाल जाती। एक दिन सुखराम की पत्नी ने सुखराम से कहा, “आप कैसे आदमी हैं? इन थोड़े से रुपयों से जीवन तो कटेगा नहीं, कल ही दैत्य के पास जाकर कहो कि वह हमारे लिए एक सुंदर-सा घर बनवा दे।”

पत्नी की बात सुनकर सुखराम ने कहा, “भाग्यवान ! अधिक लालच करना ठीक नहीं। हमारे लिए इतना ही धन बहुत है।” लेकिन समझाने पर उसकी पत्नी नहीं मानी। आखिर हारकर दूसरे दिन उसे दैत्य के पास जाना पड़ा, लेकिन इस बार उसका पड़ोसी मित्र दीनू भी सुखराम के पीछे-पीछे चल दिया। 

जब सुखराम जंगल में पहुंचा तो वह पीपल के पेड़ के नीचे घास काटने लगा। तभी अचानक दैत्य सामने आ गया। सुखराम ने अपनी पत्नी की सारी इच्छा दैत्य को सुना दी। दैत्य चुपचाप सुनता रहा फिर बोला, “अब तुम घर जाओ, तुम्हारी पत्नी की इच्छा पूरी हो गई है।” सुखराम तेज कदमों से घर लौट आया। 

जब वह घर पहुंचा तो उसने देखा कि उसके टूटे-फूटे मकान के स्थान पर बहुत बड़ा महल खड़ा है। इतना बड़ा महल देखकर सुखराम खुशी से उछल पड़ा। सुखराम के मित्र दीनू ने उस पीपल के पेड़ के पीछे छुपकर दैत्य और सुखराम की बातों को सुन लिया था। दीनू जब अपने घर पहुंचा तो देखा कि सुखराम का मकान अब महल में बदल चुका था। दीनू ने अपनी पत्नी को उस दैत्य और धन की पूरी कहानी सुना दी जिससे सुखराम इतना बड़ा आदमी बन गया था। यह सुनकर दीनू की पत्नी ने कहा, “आप भी जंगल जाकर उस दैत्य से धन ले आओ।” लेकिन अब रात हो चुकी थी इसलिए दीनू डर के कारण जंगल नहीं गया। 

वह दूसरे दिन सुबह हंसिया लेकर जंगल में पीपल के पेड़ के नीचे जाकर  घास काटने  लगा. तभी दैत्य सामने आया। दैत्य को यह समझते देर न लगी कि इसे यहाँ का भेद  पता लग गया है। दैत्य ने दीनू से पूछा, “तुम्हें क्या चाहिए?” दीन ने दैत्य से कहा, “मुझे भी धन चाहिए?” और बोला, “इस गड्ढे में से अपनी जरूरत का धन निकाल लो।” दीन में आकर घास को चादर से हटाकर उसमें धन रखने लगा पर दैत्य उससे कुछ न बोला। 

दीनू धन लेकर अपने घर चल दिया। अब दीनू की भी गरीबी जाती रही। दीनू की पत्नी दीनू से बोली, “उस दैत्य से अपने लिए एक महल बनवा लो।” फिर दसरे दिन सुबह जंगल पहुंचकर उस पीपल के नीचे की घास काटने ही वाला था कि तभी दैत्य सामने आ गया। दैत्य ने दीनू से पूछा, “अब तुम्हें क्या चाहिए?” 

इस पर दीन बोला, “दैत्यराज! मुझे भी सुखराम जैसा महल बनवा दीजिए।” दैत्य समझ गया कि यह लालची आदमी है और इसकी इच्छाएं कभी खत्म नहीं होंगी इसलिए दैत्य ने दीनू से कहा, “देखो दीनू ! इस बार मैं तुम्हारी इच्छा पूरी किए देता हूं, पर दुबारा यहां कुछ मांगने नहीं आओगे, नहीं तो तुम्हारे प्राण संकट में पड़ जाएंगे।” पर दीनू कहां मानने वाला था। वह तो था ही लालची। 

वह फिर दूसरे दिन उससे और धन लेने के लालच में पीपल के पेड़ के नीचे की घास काटने लगा। परंतु इस बार दैत्य सामने नहीं आया। दीनू को गुस्सा आया और उस पीपल के पेड़ को ही काटने लगा। अभी उसने पेड़ पर दो-तीन वार ही किए थे कि अचनाक बेहोश होकर गिर पड़ा। जब रात हो गई, दीनू घर वापस न आया तो उसकी पत्नी चिंता में पड़ गई। तब उसने सुखराम को सारी कहानी सुनाई और सुखराम को दीनू की खोज में जंगल जाने की प्रार्थना की। 

जंगल में सुखराम को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वह पीपल के पेड़ के पास पहुंचा तो दीनू को बेहोश पाया। तभी अचानक दैत्य प्रकट हुआ और उसने सुखराम से उसके लालची मित्र दीनू के बेहोश होने की सारी कहानी बताई। सुखराम के प्रार्थना करने पर दैत्य ने दीनू को होश में ला दिया और कहा, “दीनू का सारा धन गायब हो जाएगा और मैं सदा के लिए इस पेड़ को छोड़कर चला जाऊंगा।” इतना कह कर दैत्य गायब हो गया।