Upsc essay solved pdf in hindi-भारतीय संस्कृति में अनेकता में एकता 

भारतीय संस्कृति में अनेकता में एकता |Unity in Diversity in Indian Culture

upsc essay solved pdf in hindi-भारतीय संस्कृति में अनेकता में एकता | Unity in Diversity in Indian Culture

भारत एक विशाल देश है जिसकी भौगोलिक स्थिति में भारी विविधता और अनेकता दिखाई पड़ती है। यह कहीं गर्म, कहीं ठण्डा और कहीं शीतोष्ण है। कहीं जंगल है तो कहीं रेत ही रेत और कहीं खूब हरे-भरे प्रदेश। इससे भारतीय संस्कृति को खेतों, खलिहानों, बस्तियों, जंगलों और रेगिस्तानों में खुलकर खेलने का अवसर मिला है। इन्हीं के बीच रहकर हमारी संस्कृति के बाह्य और आन्तरिक रूप का निर्माण हुआ है। भारत जातीय अजायबघर भी है, जिसमें दो हजार जातियां निवास करती हैं। भारत के 25 विभिन्न राज्यों में से दो सौ के लगभग बोलियां और भाषाएं हैं। विश्व के सभी प्रमुख धर्म भारत में विद्यमान हैं। जैसे—हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिक्ख, इस्लाम, जोरोस्ट्रिया (पारसी) तथा ईसाई धर्म। 

“भारतवर्ष सम्प्रदायों और रीति-रिवाजों, धर्मों एवं सभ्यताओं-विश्वासों और बोलियों, जातीय प्राकारों और सामाजिक व्यवस्थाओं का एक अजायबघर है। पर इन सारी विभिन्नताओं के होते हुए भी भारतीय संस्कृति में मूलभूत एकता है।” 

भारतीय संस्कृति की विशेषताओं में प्रधान है—कर्म प्रधानता, अध्यात्मिकता, प्राचीनता, अमरता, चिन्तन की स्वतंत्रता, सामूहिक कुटुम्ब प्रणाली, ग्रहणशीलता, विश्व कल्याण की भावना, सहिष्णुता और उदारता, स्थितियों परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तनशीलता तथा सबसे प्रधान विशेषता है-अनेकता में एकता। पाश्चात्य विद्वान इस विशेषता को मात्र शब्द का जादू ही मानते हैं। पर डॉ. राधा कुमुद मुकर्जी ने “भारत की आधारभूत एकता” में ठीक ही लिखा है, “भारतवर्ष सम्प्रदायों और रीति-रिवाजों, धर्मों एवं सभ्यताओं-विश्वासों और बोलियों, जातीय प्रकारों और सामाजिक व्यवस्थाओं का एक अजायबघर है। पर इन सारी विभिन्नताओं के होते हुए भी भारतीय संस्कृति में मूलभूत एकता है।” अजायबघर की अपेक्षा बगीचा कहना अधिक उपयुक्त होगा। रिजले लिखते हैं कि, “भौतिक और सामाजिक भाषायी परम्पराओं और धार्मिक वैविध्य के अंतर में भारत के जीवन में हिमालय से कैमोरिन तक एक एकता देखने को मिलती है।” 

“सांस्कृतिक एकता उतनी ही प्राचीन है जितनी कि भारतीय संस्कृति। सांस्कृतिक एकता का आदर्श बहुत पुराना है और सबकी रग-रग में समाया हुआ है।” 

बाह्य विभिन्नताओं के होते हुए भी भारतीय संस्कृति में भौतिक एकता पाई जाती है। यह एकता कोई हाल की घटनाओं या ब्रिटिश शासन का परिणाम नहीं मानी जा सकती बल्कि सांस्कृतिक एकता उतनी ही प्राचीन है जितनी कि भारतीय संस्कृति। सांस्कृतिक एकता का आदर्श बहुत पुराना है और सबकी रग-रग में समाया हुआ है। भारतीय संस्कृति को जन्म देने वाले ऋषि-मुनि भारत की एकता से पूरी तरह परिचित थे। विभिन्न क्षेत्रों में इस एकता के दिग्दर्शन से यह बात और भी स्पष्ट हो सकती है। 

प्रत्येक देश की कुछ भौगोलिक सीमाएं होती हैं—भारत की भी अपनी भौगोलिक सीमा है। लोगों को भारतीय संस्कृति की एकता में कभी-कभी संदेह इस नाते होता है कि देश की विशालता में उन्हें अनेकता दिखाई देती है। वैसे यदि हम भारत का मानचित्र उठाकर देखें तो हमें मालूम होगा कि भारतवर्ष प्रकृति द्वारा निश्चित की गई एक भौगोलिक एकता में बंधा हुआ है। यूरोप के छोटे-छोटे देशों में रहने वाले विद्वान भारतीय संस्कृति पर लिखते समय आश्चर्य में पड़ जाते हैं और भारत की प्राकृतिक विविधता को देखकर यह निश्चित नहीं कर पाते कि सचमुच भारतवर्ष भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता से बंधा हुआ है। प्राचीनकाल से ही भारतीय विद्वान भारत की भौगोलिक एकता से पूरी तरह परिचित जान पड़ते हैं। देश को भारतवर्ष के नाम से पुकारना ही इस बात का प्रमाण है कि पुराने भारतीय विद्वान भारतवर्ष को एक भौगोलिक इकाई के रूप में मानते थे। पुराणों और महाकाव्यों में भी भारत वर्ष को इसी नाम से पुकारा गया है। 

“उत्तरं यत्समुद्रस्य, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

वर्ष तद् भारतं नाम, भारती यत्र संतति॥” 

भारत वर्ष नाम में आधारभूत भौगोलिक एकता के चिह्न है। एकता की भावना से समन्वित यह धार्मिक विचारकों, राजनैतिक दार्शनिकों और कवियों के मस्तिष्क में सदैव रहा है, क्योंकि उन्होंने एक ही समूह द्वारा शासित हिमालय से हिन्द महासागर तक हजारों मीलों के विस्तार वाले साम्राज्य के विषय में विचार प्रकट किए हैं। मध्य काल में भी भारत वर्ष को भौगोलिक इकाई मानकर ही शासकों ने अपने साम्राज्य को इस समस्त देश पर फैलाने की चेष्टा की। आज भी जब हम भारत मां कहते हैं तो हमारे अंदर इसी भौगोलिक एकता की अनुभति होती है। वैसे भारत के मानचित्र को देखने से ही स्पष्ट हो जाता है कि भारतवर्ष शेष विश्व से बिल्कुल अलग है और इसकी सीमाएं प्रकृति द्वारा निश्चित कर दी गई हैं। 

धार्मिक क्षेत्र में भी अनेकता तो है परंतु एकता है। बाह्य रूप में देखने पर इनमें अनेकता दिखाई पड़ती है परंतु वह भिन्नता मात्र दर्शन की है, आभ्यन्तर में सांस्कृतिक जागरूकता के चिह्न एक ही हैं। यह सभी लोग जानते हैं कि भारत के प्रायः सभी सम्प्रदाय आत्मा की अमरता, एक देववाद, मोक्ष, श्रवण और मनन आदि सिद्धांतों को मानते हैं। इस तरह रास्ता अनेक होकर भी मूलभूत सिद्धांत लगभग एक ही है। मंदिरों का ही उदाहरण लीजिए। भारत के उत्तराखण्ड का निवासी यह कभी नहीं कह सकता कि मंदिर केवल उत्तर-भारत के हैं। सच भी है कि उत्तरी भारत से सुंदर मंदिर दक्षिण में देखने को मिल सकते हैं। ग्रन्थों में भी इनकी गुण-चर्चा मिलती है। राम और कृष्ण अवतार की कहानियां, उत्तरी और दक्षिणी भारत में समादरणीय हैं, जबकि उत्तर और दक्षिण का विवाद कोई नया नहीं है। गीता, महाभारत, पुराण और संहिता आदि का स्थान भारत के प्रत्येक घर में पूज्य है। चाहे वह हिन्दी-भाषी हो या बांग्ला-भाषी, तमिल-भाषी हों या पंजाबी-भाषी। ये ग्रंथ भारत के प्रत्येक व्यक्ति को सुख और शांति देते हैं। हिन्दुओं के तीर्थ स्थान (उत्तर) में बद्री नारायण, पश्चिम में द्वारका, दक्षिण में सेतुबंध रामेश्वरम और पूर्व में जगन्नाथ पुरी जो भारत के चारों कोनों में हैं—एकता के ही परिचायक हैं। यहां की यात्रा प्रत्येक हिन्दू के लिए पुनीत कर्म है। प्रतिदिन स्नान के समय की जाने वाली दैनिक प्रार्थना में भारत की सभी प्रमुख नदियों का नाम आता है- 

“गंगे यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।

नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु।” 

सांस्कृतिक एकता भी अनेकता में एकता का मूलभूत तत्व है। विभिन्न भाषाओं, रीति-रिवाजों के होते हुए भी विभिन्न सम्प्रदायों के साहित्य और विचारों पर सांस्कृतिक एकता की मुहर लगी हुई है। दर्शन, साहित्य-प्रथाओं और जीवन के दृष्टिकोण में एक आधारभूत एकता पाई जाती है। परिवार की पवित्रता, जाति के नियम, संस्कार और रसोई आदि की पवित्रतता के नियम, सभी सम्प्रदायों और समाजों में एक से माने जाते हैं। होली, रक्षा बंधन, दशहरा, दीवाली और अन्य त्योहार सारे देश में एक ही प्रकार से मनाए जाते हैं जो इस बात के प्रतीक हैं कि भारत में सांस्कृतिक एकता है। 

भाषायी समस्या का भी संबंध अनेकता में एकता से है। कहना न होगा कि यदि एक देश में कई भाषाएं हों तो देश की एकता बढ़ाने  में कठिनाई होती है। भारत में यह समस्या उपस्थित है पर संस्कृत भाषा के प्रचार में भाषा के भेद वाली कठिनाई को बहुत कुछ दूर किया है। उत्तर और दक्षिण भारत के लोग संस्कृत को एक भांति अपनी भाषा मानते हैं। संस्कृत और हिन्दू संस्कृति की छाया में रहकर विभिन्न भाषाओं और विभिन्न जातियों वाला यह देश एक हो गया है। संस्कृत भाषा ही प्राचीन भारत की शासक भाषा थी। संस्कृत भाषा के साथ प्राकत भाषा का भी प्रयोग मिलता है जो संस्कृत से बहुत कुछ मिलता है। उस समय संस्कृत विद्वानों की भाषा थी और प्राकृत सर्वसाधारण की भाषा थी। बहुत से संस्कृत विद्वानों ने इन दोनों भाषाओं का प्रयोग अपनी पुस्तकों में किया है जिसका कारण है तत्कालीन समय में संस्कृत भाषा के साथ प्राकृत भाषा का ही जनता में प्रचार। अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार में इसी भाषा की शरण ली थी। धीरे-धीरे इसका स्थान पाली भाषा ने ले लिया। बौद्धों के त्रिपिटक और जैनों का बहुत सा साहित्य पाली भाषा में ही है। पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि लोग पाली और प्राकृत भाषा के आगे संस्कृत भाषा को भूल गए। बल्कि संस्कृत को सभी सम्प्रदायों और धर्मों के अनुयायियों ने बिना किसी धर्म और जाति या भेदभाव के अपने धार्मिक ग्रंथों की रचना के लिए चुना क्योंकि पाली और प्राकृत भाषा तो संस्कृत की संतान भाषा कही जाती है। आज की हिंदी, मराठी, गुजराती, बांग्ला आदि भाषाएं भी संस्कृत से ही निकली हैं। तमिल और तेलुगु पर भी संस्कृत का प्रभाव है। इस तरह संस्कृत ही एक ऐसी भाषा है जिसमें भारत का समस्त प्राचीन धार्मिक तथा अन्य प्रकार का साहित्य उपलब्ध है। 

अपनी सांस्कृतिक अनेकता की एकता में राजनैतिक एकता का भी प्रमुख योग है। यह ठीक है कि भारत में पुराने समय से ही स्वतंत्र प्रांतपतियों, छोटे-छोटे राजाओं में युद्ध की परम्परा दीख पड़ती है, लेकिन इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इन राजाओं के सामने चकवर्ती सम्राट बनने का आदर्श मिथकों और इतिहास में सुरक्षित है।। प्रथ, दिलीप, अज, दशरथ, सगर, ययाति, मान्धाता आदि चक्रवर्ती इसके प्रमुख उदाहरण हैं। चक्रवर्ती बनने के लिए जो संघर्ष होता था उसमें लूटमार, सम्पत्ति छीनने की बात कम और भारत को एक राज्य में लाने की कल्पना अधिक थी। देश में अधिक से अधिक भूमि को अधिकार में लेकर बड़ी राजनैतिक सभा स्थापित करने की भावना अधिकांश राजाओं में उपस्थित रही। इस तरह प्राचीनकाल के हिंदू राजाओं में सर्वभौम विजय और सारे भारत पर अपने अधिकार की धारणा उपस्थित थी। भारत को राजनैतिक एकता में बांधने के इस प्रयास में बहुत से राजा सफल भी हुए। 

प्राचीनकाल से ही बहुत जातियां और कबीले (आर्य, शक, सीथियन, हूण) आदि आते रहे, पर आज उन्हें पहचानना कठिन है, क्योंकि इनको भारतीय संस्कृति ने अपने में आत्मसात कर लिया है। भारतीय संस्कृति इस देश में आकर बसने वाली अनेक जातियों की संस्कृतियों के मेले से तैयार हुई है और अब यह पता लगाना बहुत कठिन है कि उसमें किस जाति का कितना अंश अवशेष है। आर्य संस्कृति समस्त भारत पर शासन करती है और हमारे भूगोल, जाति तथा राजनैतिक इतिहास द्वारा निर्मित विभिन्नता के होने पर भी इसने भारत को आन्तरिक ऐक्य प्रदान किया है। भारत में दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में इस्लाम मानने वाले शासकों का प्रादुर्भाव हुआ। वे भारत में आत्मसात् होने को तैयार नहीं थे। पर धीरे-धीरे विशेषकर मुग़लकाल में इस्लाम ने भी भारत की स्थितियों परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढालना शुरू किया और समन्वय की प्रक्रिया खान-पान, आचार व्यवहार-विचार और साहित्य-कला में परिलक्षित होने लगी। इस तरह एकता नए रूप में अभिव्यक्त होने लगी। 

इसीलिए कह सकते हैं कि भारत में अनेकता विविध रूपों में उजागर है पर एक प्रकार की अन्तर्निहित एकता भी प्रवाहित रहती है। उसके सामने कई प्रकार की चुनौतियां आ खड़ी होती रही हैं पर उसका अस्तित्व हमेशा बना रहा है। आज की स्थितियों में अनेकता में निहित एकता को नए परिप्रेक्ष्य और नई आधारभूमि पर समझना और कार्यान्वित करना होगा। 

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