विश्व शांति की स्थापना के साधन के रूप में संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियां 

विश्व शांति की स्थापना के साधन के रूप में संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियां 

विश्व शांति की स्थापना के साधन के रूप में संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियां 

प्रायः युद्धोपरांत इस बात के लिये प्रयत्न किया जाता है कि भविष्य में युद्ध न हो, क्योंकि युद्ध के परिणाम बड़े ही विनाशकारी होते हैं। इसी उद्देश्य से प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् विश्व के राष्ट्रों में सहयोग, सद्भावना तथा प्रेम उत्पन्न करने और विश्व शांति बनाये रखने के लिये राष्ट्र संघ नामक संस्था की स्थापना की गई, किन्तु यह संस्था अपने उद्देश्य की पूर्ति में असफल रही और उसका अन्त हो गया। इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध हुआ जिसमें भीषण नरसंहार हुआ। भीषण नरसंहार ने पुनः विश्व के महान राष्ट्रों को मानव जाति की रक्षा के लिए विश्व में शांति और सुरक्षा की स्थापना के लिए अंतर्राष्ट्रीय संगठन के निर्माण की आवश्यकता का अनुभव कराया। इस आवश्यकता के परिणाम स्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की स्थापना 24 अक्टूबर, 1945 को हुई। इसके आज्ञापत्र में 111 अनुच्छेद और 19 अध्याय हैं। 

संयुक्त राष्ट्र संघ ने शांति स्थापना हेतु अपने कुछ महत्त्वपूर्ण उद्देश्य निर्धारित किये हैं जो इस प्रकार हैं- 

  • अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को स्थायी रूप प्रदान करना तथा शांति विरोधी तत्वों का दमन करना।
  • राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को विकसित करना।
  • शांतिपूर्ण उपायों से अंतर्राष्ट्रीय झगड़ों का निर्णय करना।
  • समस्त प्रकार की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मानवीय समस्याओं को हल करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग प्राप्त करना। 

उक्त सभी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राष्ट्रों द्वारा किये जाने वाले कार्यों में सामंजस्य उत्पन्न करने के लिए केंद्र बनाना। 

संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख उद्देश्य युद्धों को रोककर विश्व में शांति और सुरक्षा की स्थापना करना है। संयुक्त राष्ट्र ने अपनी स्थापना से लेकर अब तक कई महत्त्वपूर्ण विवादों का निपटारा कर शांति स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिसमें हैं-रूस-ईरान विवाद (1949) निपटारा, कोरिया संकट (1950-51) निपटारा, स्वेज नहर विवाद (1956), कांगो समस्या (1960), क्यूबा संकट (1962) आदि को सुलझाना एवं ईरान-इराक के बीच युद्ध विराम करवाना। 

उल्लेखनीय है कि भारत प्रारंभ से ही संयुक्त राष्ट्र का प्रबल समर्थक रहा है। भारत ने विश्व शांति बनाये रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र की बड़ी सहायता की है। यही नहीं विश्व में शांति बनाये रखने के लिए भारत ने स्वयं अनेक बार पहल की है और अपने उद्देश्य में सफल भी हुआ है। भारत ने जिन विवादों के शांतिपूर्ण हल में अपनी भूमिका निभाई है उनमें है कोरिया संकट, कांगो समस्या, साइप्रस समस्या, हिन्द-चीन समस्या, स्वेज नहर विवाद आदि। कोरिया संकट 25 जून 1950 को तब उत्पन्न हुआ जब उत्तरी कोरिया की सेनाओं ने दक्षिण कोरिया पर आक्रमण कर दिया और साम्यवादी चीन के स्वयंसेवक उत्तरी कोरिया की सेना को सहायता प्रदान करने के लिए युद्ध के मोर्चे पर आ डटे थे और भीषण युद्ध छिड़ जाने के आसार स्पष्ट दिखाई पड़ने लगे। ऐसे में शांति प्रयास हेतु सर्वप्रथम भारत ने पहल की और भारत के सुझाव पर दोनों पक्षों में शांति स्थापित हुई और युद्ध बंदियों की अदला-बदली के कार्य को पूरा करने के लिए तटस्थ देशों के अंतर्राष्ट्रीय आयोग का अध्यक्ष भारत को बनाया गया। 

“संयुक्त राष्ट्र ने कई बार ऐसा मंच दिया है जिससे इसे विरोध, आक्रोश को अभिव्यक्त करने का ‘सेफ्टी वाल्व’ का नाम दिया गया है।” 

स्वेज नहर विवाद तब शुरू हुआ जब 26 जुलाई 1956 को मिस्र की राष्ट्रीय सरकार ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस पर ब्रिटेन, फ्रांस और इजरायल की सम्मिलित सेनाओं ने मिस्र पर आक्रमण कर दिया। रूस ने इसका विरोध करते हुए मिस्र की ओर से लड़ने की चेतावनी दे डाली ऐसे में भारत के प्रयास से आक्रांत देशों की सेनाएं मिस्र की भूमि से हटी और स्वेज नहर के प्रश्न पर समझौते की वार्ता का मार्ग प्रशस्त हुआ। 

इन विवादों के निपटान के अतिरिक्त निःशस्त्रीकरण के संबंध में भी भारत ने संयुक्त राष्ट्र की महत्त्वपूर्ण सहायता की है। भारत प्रारंभ से ही इस बात के लिए प्रयत्नशील रहा है कि विश्व की शक्तिशाली शक्तियां निःशस्त्रीकरण के प्रश्नों पर एकमत होकर शस्त्रों पर व्यय होने वाली धनराशि को विश्व कल्याण योजनाओं में लगायें। नवंबर 1966 में संघ की राजनीतिक समिति ने भारी बहुमत से भारत के इस प्रस्ताव को स्वीकर कर लिया कि अणु-आयुधों के परीक्षण पर रोक लगा दी जाए। इस प्रकार भारत निःशस्त्रीकरण एवं अणु शक्ति के रचनात्मक प्रयोग के लिए सतत् प्रयत्नशील है। 

भारत संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर उपनिवेशवाद के उन्मूलन के लिए भी सतत् प्रयत्नशील रहा है। भारत ने ही सर्वप्रथम दिल्ली में एशियाई राष्ट्रों का सम्मेलन बुलाकर हिन्देशिया की स्वाधीनता की मांग को संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मुख रखा था। संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा द्वारा उपनिवेशवाद का उन्मूलन करने के लिए स्थायी प्रतिनिधि चन्द्रशेखर झा बनाये गये थे। स्पष्ट है कि राष्ट्र संघ के कार्यों में भारत का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। 

अगर विश्व शांति स्थापना के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका का मूल्यांकन किया जाए तो उसकी सफलता-असफलता की एक मिली-जुली तस्वीर उभरती है। यदि देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि संयुक्त राष्ट्र बड़े राष्ट्रों के बीच के विवादों या अमेरिका जैसे बड़े राष्ट्रों की मनमानी को रोकने में नाकाम रहा है। विशेष तौर से अफगानिस्तान और इराक के संदर्भ में इसकी निरर्थकता देखी जा सकती है। संयुक्त राष्ट्र को अमेरिका से मुक्त कराने के प्रयास भी किये गये जैसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन को साकार करके। संयुक्त राष्ट्र की कमजोरियों के बावजूद 1945 से अब तक तीसरा युद्ध रोका जा सका है। _ संयुक्त राष्ट्र ने कई बार ऐसा मंच दिया है जिससे इसे विरोध, आक्रोश को अभिव्यक्त करने का ‘सेफ्टी वाल्व’ का नाम दिया गया है। कोरिया युद्ध, वियतनाम युद्ध आदि प्रश्नों पर जब-जब विश्वयुद्ध की संभावना बनी तो संयुक्त राष्ट्र ने शांति का मरहम लगाया है। उल्लेखनीय है कि बड़े देशों के झगड़ों में भले ही संयुक्त राष्ट्र कारगर साबित न हुआ हो, किंतु छोटे देशों के विवादों को निपटाने में यह कारगर रहा। जैसे चाहे सोमालिया, इरीट्रिया का प्रश्न हो या अफ्रीकी देशों के बीच विवाद इसके प्रयासों से ये विवाद घटे हैं। 

“समस्त प्रकार की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मानवीय समस्याओं को हल करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग प्राप्त करना संयुक्त राष्ट्र संघ का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।” 

लेकिन संयुक्त राष्ट्र का जो सबसे बड़ा योगदान है वह न्यूयार्क के बाहर की संस्थाओं यानी संयुक्त राष्ट्र के अंगों के योगदान का है। इन अंगों की भूमिका से विश्व शांति, एकता यानी एक वैकल्पिक विश्व की संभावना बनी। यूनेस्को इस ओर प्रयास कर रहा है। 

सारांशतः संयुक्त राष्ट्र अपने विभिन्न अंगों के माध्यम से सृजनात्मक, सकारात्मक रूप से विश्व की एकता, सृजनात्मकता को चिह्नित कर सेवा कार्य कर रहा है और एक वैकल्पिक विश्व को संभव बनाने में योगदान दे रहा है तथा मानवीय समस्याओं को विश्व समस्याओं के रूप में देख रहा है जैसे-शरणार्थी समस्या। 

इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में शरणार्थियों के पुनर्वास का एक अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम पिछले 50 वर्षों से चल रहा है। 

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