सुनामी पर निबंध |Essay on Tsunami in Hindi |सुनामी UPSC,

Essay on Tsunami in Hindi

सुनामी पर निबंध |Essay on Tsunami in Hindi |सुनामी UPSC

मनुष्य कितनी ही वैज्ञानिक प्रगति क्यों न कर ले, किंतु प्राकृतिक कोपों के सामने वह असहाय नजर आता है। ऐसा ही एक प्राकृतिक प्रकोप सूनामी है, जो कि जल क्षोभ के रूप में सामने आता है। यह देखते ही देखते तबाही का पर्याय बन जाता है, जिसके सामने हम बेबस और बौने नजर आते हैं। सूनामी भी जल प्रलय का एक रूप है। इसकी तरंगों की श्रृंखला इतनी विध्वंसकारी होती है कि यह मार्ग में आने वाली प्रत्येक वस्तु को बहा ले जाती है। सूनामी से सबसे ज्यादा तबाही और दहशत तटीय क्षेत्रों में आती है। वैसे तो विश्व के सभी महासागरों में सूनामी पैदा होने की संभावना बनी रहती है, किंतु प्रशांत महासागर को सूनामी की दृष्टि से अधिक संवेदनशील माना जाता है। जल का यह क्षोभ जान-माल को भारी नुकसान तो पहुंचाता ही है, भीषण दुर्घटनाओं का भी कारण बनता हैं|कुछ समय पूर्व जापान के फुकुशिमा परमाणु संयंत्र में हुई दुर्घटना इसका ताजा उदाहरण है। 

‘सूनामी’ एक जापानी शब्द है। सूनामी शब्द जापानी भाषा के दो शब्द ‘सू’ और ‘नामी’ से बना है। ‘सू’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘बंदरगाह’ और ‘नामी’ का ‘तरंग’ है और इस प्रकार सूनामी शब्द का अर्थ ‘बंदरगाह तरंग’ है। इस शब्द की रचना जापान के उन मछुआरों द्वारा की गई है, जिन्होंने कई बार खुले समुद्र में तरंगों की कोई विशिष्ट हलचल न होने पर भी बंदरगाह को उजड़ा देखा था। इसलिए उन्होंने इस परिघटना को ‘सूनामी’ अर्थात् ‘बंदरगाह तरंगों’ का नाम दिया। मगर सभी सूनामी बंदरगाहों के आसपास ही नहीं आतीं, इसलिए ‘सूनामी’ शब्द भ्रामक है। सूनामी को ‘ज्वारीय तरंग’ नाम से भी जाना जाता रहा है लेकिन सूनामी का ज्वारीय तरंगों से कोई संबंध नहीं है। इसीलिए सूनामी को ज्वारीय तरंगें कहना भी भ्रामक है। कभी-कभी वैज्ञानिक, सूनामी को ‘भूकंपी समुद्री-तरंगों’ के रूप में भी परिभाषित करते हैं लेकिन सूनामी की यह परिभाषा भी सटीक नहीं है क्योंकि सूनामी कई अभूकंपीय घटनाओं जैसे भूस्खलन और क्षुद्र ग्रहों के पृथ्वी की सतह से टकराने से भी उत्पन्न हो सकती है। 

विज्ञान की भाषा में सूनामी समुद्र में संचरित होने वाली ऐसी तरंगों की एक श्रृंखला है जिनके तरंग-दैर्ध्य (वेवलेंथ) अस्वाभाविक रूप से लम्बे हैं। वे जैसे-जैसे तट के नजदीक पहुंचती हैं, इन लहरों की गति घटती जाती है और इनकी ऊंचाई बढ़ती जाती है। 

सूनामी तरंगों के तरंग-दैर्ध्य बहुत अधिक लंबे होते हैं। (लहर के एक शिखर के दूसरे शिखर के मध्य की दूरी) और सूनामी लंबी अवधि (दो उत्तरोत्तर लहरों के बीच के समय) की तरंगें होती हैं। सूनामी तरंगों की तरंग दैर्ध्य लगभग 500 किमी. और इनकी अवधि दस मिनट से लेकर दो घंटे तक हो सकती है। 

सूनामी तरंगों की गति पानी की गहराई और गुरुत्वीय त्वरण (9.8 मीटर प्रति सेकेंड) के गुणनफल के वर्गमूल के बराबर होती ह। जहा पानी अधिक गहरा होता है, वहां सूनामी तरंगें उच्च गति से संचरित होती हैं। प्रशांत महासागर में पानी की औसत गहराई लगभग 4000 मीटर है। उसमें सूनामी 200 मीटर प्रति सेकेंड या 700 किमी. प्रति घंटे की गति से चलती हैं। 

सूनामी तरंगें पानी की दीवार की तरह तट पर टकराती हैं या बहुत तेजी से बाढ़ या ज्वार की तरह आगे बढ़ती हैं और रास्ते में आने वाली हर चीज को बहा ले जाती हैं। इन दोनों में से किसी भी सूरत में सूनामी जान-माल के लिए खतरा पैदा करती हैं। यदि किसी क्षेत्र में सूनामी तरंगें उच्च ज्वार या तूफानी तरंगों के साथ आती हैं, तब इनका संयुक्त प्रभाव भारी पैमाने पर तबाही मचाता है। सूनामी तरंगे तट पर भारी ऊर्जा के साथ पहंचती है। सनामी लहरें बाल तटों की बालू को पूरी तरह बहा ले जाती हैं। जो कई वर्षों में जमा होता है। ये लहरें पेड़ों एवं अन्य तटीय वनस्पतियों को तहस-नहस कर देती हैं। सूनामी लहरें तटीय क्षेत्रों में बाढ़ ला सकती हैं और समुद्र तट से स्थल की ओर कई सौ मीटर दूर तक घरों एवं अन्य ढांचों को मिटा सकती हैं। 

सूनामी समुद्र में आई विकृतियों का परिणाम होती है। इनकी उत्पत्ति समुद्र तल में अचानक आई विकृति एवं उसमें उत्पन्न ऊपरी जल स्तर में विस्थापन के कारण होती है। समुद्र तल में इसी तरह की विकृति भूकंप के कारण पैदा होती है। भूकंप जल स्तंभ को उत्थान या अवतलन द्वारा छेड सकता है। सागर तल का बड़ा हिस्सा जब ऊपर उठता या नीचे बैठता है, तब सनामी उत्पन्न होती है। प्लेट सीमा पर भूपटल में बड़ी विकृति आ सकती है। उदाहरण के लिए प्रशांत महासागर के किनारों पर अधिक घनत्व वाली समुद्री प्लेट, महाद्वीपीय प्लेट के नीचे खिसकती है, जिसको अवरोहण कहते हैं। सूनामी उत्पन्न करने के लिए अवरोहण भूकंप कुख्यात है।

सूनामी विशाल जल राशि के विस्थापन के कारण उत्पन्न होती है। यह विस्थापन गुरुत्व के प्रभाव से क्षेत्र में साम्यावस्था लाने के लिए प्रयासरत रहता है। सूना विकृति के परिमाण पर निर्भर करती है। जल राशि का विस्थापन जितना ज्यादा होगा सूनामी लहरों की ऊंचाई भी उतनी ही अधिक होती है।

भूकंप से मुक्त हुई ऊर्जा समुद्र के पानी को सामान्य स्तर से ऊपर उठाकर स्थितिज ऊर्जा में बदल कर समुद्र के पानी में ही समाहित हो जाती है। यह स्थितिज ऊर्जा सूनामी तरंगों के उत्पन्न होने से गतिज ऊर्जा में बदल जाती है और ये ही ऊर्जा इन तरंगों को आगे प्रसारित करती हैं एवं भयंकर सूनामी तरंगों में तब्दील करते हैं।

सूनामी की उत्पत्ति के लिए भूकंप ही एकमात्र कारण नहीं है। कोई भी विक्षोभ जो जल की विपुल मात्रा को अपनी साम्यावस्था से विस्थापित करने की क्षमता रखता है, सूनामी का कारण बन सकता है। भूकंप या ज्वालामुखी के दब जाने के कारण अंतःसमुद्री भूस्खलन, ऊपरी जल स्तंभ में हलचल पैदा कर सूनामी का कारण बनते हैं। अंतःसमुद्री ज्वालामुखी विस्फोट की प्रचंड ऊर्जा भी जल स्तंभ को ऊपर उठा कर सूनामी उत्पन्न कर सकती है। 

सूनामी जैसे जल क्षोभ के आगे हमारे सारे के सारे बंदोबस्त धरे के धरे रह जाते हैं। सूनामी तबाही मचाती रहती है और हम बेबस बने रहते हैं। इसकी वजह से हमारा संचार तंत्र ध्वस्त हो जाता है। जान माल का भारी नुकसान होता है। सामान्य जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और सूनामी से होने वाले विनाश से उबरने में वर्षों लग जाते हैं। यह कोई नहीं जानता कि सूनामी कब, कहां और कैसे आएगी। इसके आने का कोई निश्चित समय भी नहीं होता। यह दिन में भी आ सकती है और रात में भी। ऐसे में इसके प्रकोप से बच पाना बहुत आसान नहीं है, तथापि पूर्वानुमानों के जरिये हम इसकी पूर्व सूचना देकर लोगों को सावधान कर सकते हैं। हालांकि सूनामी के अग्रिम संकेतों के आधार पर पूर्वानुमान की कोई सटीक प्रणाली हम विकसित नहीं कर पाए हैं और ये गलत भी सिद्ध हुए। गलत पूर्वानुमानों की स्थिति में संसाधनों के अपव्यय के रूप में हमें क्षति उठानी पड़ती है, | तो लोग भी परेशान होते हैं। हालांकि इस दिशा में वैज्ञानिकों का । प्रयास जारी हैं। इस दिशा में अमेरिका ने काफी पहले कदम आगे बढ़ाया था। 

अलास्का में आयी विध्वंसक सूनामी की विनाशकारी घटना के बाद अमेरिका के ‘नेशनल ओशेनिक एण्ड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्टेशन (एनओएए) द्वारा सन् 1965 में अंतर्राष्ट्रीय सनामी चेतावनी प्रणाली (टीडब्लूएस) की स्थापना की गई। इसकी स्थापना अमेरिकी सरकार द्वारा की गई। इस प्रणाली को विकसित करने के लिए उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीपों के अलावा चीन, जापान और रूस को भी शामिल किया गया। टीडब्लूएस के सूनामी चेतावनी केंद्र हवाई द्वीप में है। यह केंद्र प्रशांत महासागर के मध्य स्थित है, जहां सूनामी अधिकतर आती रहती है। 

शक्तिशाली भूकंप का पता लगते ही सूनामी चेतावनी प्रणाली सूनामी सूचकों, जैसे कि समुद्र तल के ऊपर उठने का पता लगाना शुरू कर देती है। सभी सूचनाओं का विश्लेषण कर सूनामी की चेतावनी को जारी करने में एक घंटे का समय लगता है। 

कुछ समय पहले विकसित डीप ओशेन ऐसेसमेंट एण्ड रिपोर्टिंग ऑन सूनामी (डी ए आर टी या डार्ट) प्रणाली द्वारा सूनामी चेतावनी प्रक्रिया में काफी सुधार आया है। इस प्रणाली को पहली बार सन् 2000 के अगस्त महीने में शुरू किया गया था। डार्ट प्रणाली वास्तविक काल संचार के लिए बॉटम प्रेशर रिकार्डर (बीपीआर) युक्ति और समुद्री लहरों पर तैरती एक सतही उत्प्लव को रखती है। गहरे जल में स्थित बीपीआर से उत्प्लव तक आंकड़े सूचनाएं सूनामी द्वारा ध्वनि माध्यम से प्रेषित होते हैं। उत्प्लव से आंकड़े या सूचनाओं को जियोस्टेशनरी ऑपरेशनल इन्वायरमेण्टल सैटेलाइट डाटा कलेक्शन सिस्टम तक पहुंचाया जाता है। यहां से आंकड़े भू-केंद्र पर पहुंचते हैं और उन्हें तत्काल एनओएए के सूनामी क्रियाशील केंद्र को भेज दिया जाता है। 

सूनामी के मामले में भारतीय सागरों को अधिक संवेदनशील नहीं माना जाता है। बंगाल की खाड़ी और हिन्द महासागर को वैसे तो सूनामी की दृष्टि से अत्यंत सुरक्षित माना जाता है, किंतु वर्ष 2004 में आई सूनामी ने न सिर्फ हमें स्तब्ध कर दिया, बल्कि इस जलीय क्षोभ के बारे में सोचने को भी विवश कर दिया। सूनामी से सुरक्षित क्षेत्र में शुमार होने के कारण हम इसके प्रति बेपरवाह रहे और इस संबंध में चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की दिशा में ध्यान नहीं  दिया। दिसंबर 2004 के विध्वंसकारी सूनामी ने भारत को सुनामी 

चेतावनी प्रणाली विकसित करने के लिये मजबूर कर दिया और आपदा के तुरंत बाद सूनामी चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की घोषणा की गई। ‘नेशनल अर्ली वार्निंग सिस्टम फॉर सूनामी एण्ड स्टॉर्म सर्लस इन इंडियन ओशन’ स्थापित हुआ। हिंद महासागरीय क्षेत्र में भारत पहला देश बन गया है जिसने अपनी प्रणाली तैयार की है। इस चेतावनी प्रणाली से भूकंप आने के बाद समुद्र के स्तर में होने वाले परिवर्तन की समय रहते सूचना मिल जाएगी। इस प्रणाली की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि सभी देश ईमानदारी से सूचनाओं का आदान-प्रदान करें, ताकि इससे लड़ने के लिए एक मजबूत अंतर्राष्ट्रीय संजाल तैयार हो सके। 

सूनामी से प्रभावी बचाव के लिए सिर्फ पूर्वानुमान और चेतावनियां ही पर्याप्त नहीं हैं। हमें लोगों को यह भी बताना होगा कि आने वाले खतरों से बचाव किस तरह से किया जाए। तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को इस संबध में पता रहे कि उन्हें सूनामी सबधी सूचना कहा मिल सकती है और सचना मिल जाने के बाद क्या करना चाहिए। यदि लोग यह नहीं जानते हैं कि सूनामी क्या कर सकती है और वे आने वाले खतरे से कैसे बच सकते हैं, तो सिर्फ सूचनाएं देने से उनकी विशेष मदद नहीं हो पाएगी। उन्हें जागरूक बनाने के साथ साथ यह भी जरूरी है कि हम आपदा प्रबंधन की भी एक ठोस और प्रभावी रणनीति तैयार करें। 

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