भारत में आरक्षण के औचित्य पर प्रकाश डालिए |Throw light on the rationale of reservation in India.

भारत में आरक्षण के औचित्य पर प्रकाश डालिए |

भारत में आरक्षण के औचित्य पर प्रकाश डालिए (यूडीए एलडीए विशेष मुख्य परीक्षा, 2010) अथवा आरक्षण का औचित्य (यूपी लोअर सबॉर्डिनेट मुख्य परीक्षा, 2008) अथवा भारत में आरक्षण नीति : आवश्यकता एवं समस्याएं (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2004) अथवा आरक्षण से हानि-लाभ (यूपी लोअर सबॉर्डिनेट मुख्य बैकलॉग परीक्षा, 2002) 

हाल ही में भारत सरकार द्वारा सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों को शिक्षा एवं सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भारतीय संविधान में सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों के लिए ही आरक्षण का प्रावधान था। अतः सरकार को भारतीय संविधान में संशोधन हेतु 103वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित करना पड़ा। सरकार के इस कदम से कुल आरक्षण सीमा 59.5% हो गई। इस घटनाक्रम के बाद आरक्षण की चर्चा ने फिर जोर पकड़ लिया। वस्तुतः आरक्षण की अवधारणा सामाजिक न्याय, वितरणमूलक न्याय एवं सामाजिक कल्याण पर बल देकर समानता एवं स्वतंत्रता को सुनिश्चित कर एक स्वस्थ एवं जीवंत लोकतंत्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करती है। जब राज्य को लगता है कि समाज में समानता एवं स्वतंत्रता की स्थिति में असंतुलन के कारण सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करने में बाधा आ रही है, तो राज्य की तरफ से सामाजिक न्याय को निश्चित करने के उद्देश्य से आरक्षण नीति को प्रभावी बनाया जाता है, जिसके तहत निर्बल, कमजोर एवं पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण संबंधी संरक्षणमूलक संवैधानिक प्रावधान किए जाते हैं तथा इस निमित्त सरकारी प्रतिष्ठानों, शिक्षण संस्थाओं, लोकसभा एवं प्रांतीय विधान सभाओं तथा नौकरियों में आरक्षण की सुविधा प्रदान की जाती है। सारतः हम यह कह सकते हैं कि समाज में उपलब्ध अवसरों को किसी वर्ग विशेष के लिए उपलब्ध कराना या अवसरों के लिए निर्धारित मानदंडों में किसी विशेष वर्ग के लिए छूट देना ही आरक्षण है। 

“आरक्षण की अवधारणा सामाजिक न्याय, वितरणमूलक न्याय एवं सामाजिक कल्याण पर बल देकर समानता एवं स्वतंत्रता को सुनिश्चित कर एक स्वस्थ एवं जीवंत लोकतंत्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करती है।” 

भारतीय परिप्रेक्ष्य में आरक्षण के संबंध में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब भारतीय संविधान नागरिकों के बीच भेदभाव का निषेध करता है, तो फिर आरक्षण की आवश्यकता का औचित्य क्या? इस प्रश्न के जवाब में यही कहा जा सकता है कि भारतीय समाज में शोषण, भेदभाव, ऊंच-नीच, दमन, वंचन, अस्पृश्यता जैसी कुरीतियां सदैव विद्यमान रही हैं। समाज जाति बंधनों से जकड़ा रहा। जाति-प्रथा जहां कुछ के लिए लाभप्रद रही, वहीं कुछ के लिए यह अभिशाप बनी। इन्हीं सब कारणों से एक ऐसा तबका सदैव अस्तित्व में बना रहा, जो निर्योग्यताओं का शिकार बना रहने के कारण न तो यथेष्ट प्रगति कर पाया और न ही मुख्य धारा से जुड़ पाया। राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही यह अनुभव कर लिया गया था कि राष्ट्र के समग्र विकास के लिए आर्थिक तथा सामाजिक दृष्टि से पिछड़े तथा शोषित वर्गों का उत्थान आवश्यक है। सामाजिक न्याय और आर्थिक लोकतंत्र को स्थापित किए बिना स्वतंत्रता का कोई औचित्य नहीं, कोई अर्थ नहीं। यहां यह रेखांकित करना समचीन रहेगा कि समानता के सिद्धांत का अर्थ समान परिस्थितियों में रहने वाले लोगों के साथ समान व्यवहार करना है न कि असमान परिस्थितियों में रहने वालों के साथ समानता का व्यवहार करना। भारत के संविधान के निर्माता इस तथ्य से परिचित थे। इसीलिए उनके द्वारा स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए भारतीय संविधान में कुछ विशेष संरक्षणमूलक प्रावधान किए गए, जिन्हें संरक्षणमूलक भेदभाव नीति (Protective Discrimina tion Policy) अथवा आरक्षण नीति के रूप में अभिहित किया जाता है। आरक्षण की व्यवस्था प्रारंभ में 10 वर्षों के लिए ही की गई थी, जिसे बराबर बढ़ाया जाता रहा। वस्तुतः आरक्षण के परिदृश्य ने स्वतंत्रता से पहले ही आकार लेना शुरू कर दिया था। आरक्षण के उद्देश्य से ही वर्ष 1882 में अंग्रेजों की हुकूमत ने हंटर कमीशन का गठन किया था। वर्ष 1891 में जहां ट्रावनकोर रियासत में वंचितों, शोषितों और पिछड़ों को विशेष रियायतें दिए जाने की मांग उठी, वहीं वर्ष 1901 में कोल्हापुर के छत्रपति शाहू जी महाराज ने वंचितों को सर्वप्रथम आरक्षण का लाभ दिया। वर्ष 1921 में जहां मद्रास प्रेसीडेंसी द्वारा आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई, वहीं वर्ष 1943 में अनुसूचित जातियों के लिए सार्वजनिक पदों हेतु 8 प्रतिशत कोटा निर्धारित किया गया। वर्ष 1909 में जहां मार्ले-मिंटो सुधार के जरिए भारत में धार्मिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान बनाया गया, वहीं वर्ष 1932 में आरक्षण के पौधे को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड के ‘कम्युनल अवॉर्ड’ द्वारा सींचा गया। इसी क्रम में 1935 के शासन अधिनियम में कतिपय वर्गों के लिए विशेष प्रावधान के उपबंध किए गए। 

अब यह जान लेना जरूरी है कि स्वाधीनता के बाद संवैधानिक व्यवस्था के तहत देश में आरक्षण की स्थिति क्या है? मौजूदा समय में सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति के लिए 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत तथा आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। संविधान के अनुच्छेद 330 में लोक सभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है। यह व्यवस्था दी गई है कि लोक सभा में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण राज्य या संघ क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुपात में होगा। इसी प्रकार, अनुच्छेद 332 में राज्य विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 331 में आंग्ल भारतीय समुदाय के प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया है। 93वें संविधान संशोधन अधिनियम 2005 द्वारा सरकार ने उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया जबकि 103वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई है। भारत में आरक्षण के संबंध में यह रेखांकित किया जाना आवश्यक है कि इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ के वाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह व्यवस्था दी गई थी कि असाधारण परिस्थितियों के अतिरिक्त अन्य किसी भी स्थिति में आरक्षण का प्रतिशत 50 से अधिक नहीं होना चाहिए। 

भारत में आरक्षण की व्यवस्था निर्विवाद नहीं है। इसके कारण जहां तनाव एवं संघर्ष बढ़ा है, वहीं आरक्षण की आड़ में राजनीतिक रोटियां भी सेंकी जा रही हैं। अपनी कति ‘कास्ट इन इंडियन पॉलिटिक्स में प्रो. रजनी कोठारी ने यह रेखांकित किया है कि आरक्षण जाति के राजनीतिकरण और राजनीति के जातीयकरण का कारण बन चुका है। यकीनन इससे सामाजिक ताना-बाना (Social Fabric) बिगड़ा है। आरक्षण को लेकर पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तर्क हैं। 

आरक्षण के पैरोकार इसके पक्ष में तर्क देते हुए यह कहते हैं कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के लोग भेदभावपूर्ण जाति प्रथा के कारण सदैव दमन का शिकार रहे और उत्थान नहीं कर पाए। ये मुख्य धारा से जुड़ नहीं पाए, अतएव आरक्षण प्राप्त करना इनका हक बनता है। जाति प्रथा के कारण हुई क्षति की भरपाई के लिए इन्हें लंबे समय तक आरक्षण का लाभ मिलता रहना चाहिए। 

आरक्षण समर्थकों की दूसरी दलील यह है कि आरक्षण एक समतामूलक प्रक्रिया है, जो वंचितों एवं प्रभुता व अधिकार संपन्न वर्ग के बीच की खाई को पाटती है। अतएव उपेक्षितों के लाभ हेतु इस समतामूलक प्रक्रिया को सतत बनाए रखना चाहिए। यह सामाजिक न्याय एवं सामाजिक संतुलन के लिए आवश्यक है। आरक्षण को जारी रखने की तीसरी दलील यह है कि यह व्यवस्था वितरणमूलक न्याय से जुड़ी हुई है। इसी के माध्यम से उपेक्षित वर्ग को उन्नति और 

प्रगति के समान अवसर प्राप्त हो सकते हैं। आरक्षण समर्थकों की चौथी दलील यह है कि समता और प्रगति की बुनियाद शिक्षा ही है। अतएव शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण को बनाए रखकर समता एवं प्रगति का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। 

जिस प्रकार आरक्षण के पक्ष में तर्क हैं, उसी प्रकार इसके विरोध में भी ठोस तर्क हैं। आरक्षण विरोधियों का यह मानना है कि आरक्षण के कारण योग्य व्यक्ति को योग्य पद न मिलने तथा भूमिका आवंटन में कौशल, गुणवत्ता एवं योग्यता की उपेक्षा किए जाने से सामाजिक असंतोष बढ़ता है, जिसकी परिणति संघर्ष, तनाव, विरोध एवं विचलन के रूप में सामने आती है। आरक्षण विरोधियों का जहां यह तर्क है कि आरक्षण के कारण जहां प्रतिभाशाली कंठित हो जाते हैं, वहीं अयोग्य व्यक्तियों को महत्त्वपूर्ण पद दिए जाने से देश का विकास प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है। इससे प्रतिभाओं के पलायन की समस्या बढ़ती है, तो लोकसेवा की गुणवत्ता का ह्रास भी होता है। आरक्षण विरोधियों का यह भी तर्क है कि आरक्षण के लाभार्थी आरक्षण के कारण स्वयं को सुरक्षित समझने लगते हैं। फलतः उनमें परजीविता की भावना घर कर जाती है और वे आत्मविकास नहीं कर पाते। आरक्षण विरोधियों की एक ठोस दलील यह भी है कि जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था के कारण बजाय जाति प्रथा का उन्मूलन होने के, जाति प्रथा की जड़ें और मजबूत हो रही हैं तथा जातीय विद्वेष एवं वैमनस्य बढ़ रहा है। आरक्षण के राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का माध्यम बनने के कारण स्थिति और संडाधपूर्ण हुई हैं। आरक्षण विरोधियों का यह भी मानना है कि आरक्षण की व्यवस्था एक उपचार के रूप में एक निर्धारित अवधि के लिए शुरू की गई थी। प्रश्न यह है कि यह उपचार आखिर कब तक जारी रहेगा? 

आरक्षण के पक्ष एवं विपक्ष में दिए जा रहे तर्कों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि भारत में आरक्षण का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील बन चुका है। इसकी संवेदनशीलता को देखते हुए अब यह आवश्यक हो गया है कि देश में आरक्षण नीति की पुनर्समीक्षा की जाए तथा ऐसा करते हुए इस बात का ध्यान रखा जाए कि हमें आजादी प्राप्त हुए जितना समय हो चुका है, वह सामाजिक बदलाव एवं उत्थान के लिए पर्याप्त है। ऐसे में अब जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था को विराम देना तो उचित रहेगा, किंतु कमजोर वर्ग के हितों की अनदेखी एकदम से की भी नहीं जा सकती। ऐसे में बेहतर विकल्प यही होगा कि जाति आधारित आरक्षण के बजाय आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को छात्रवृत्तियां, अनुदान, निःशुल्क शिक्षा, मुफ्त किताबें तथा निःशुल्क कोचिंग आदि की सुविधाएं देकर प्रोत्साहित किया जाए तथा उनके उन्नयन के उपाय सुनिश्चित किए जाएं। इससे उनका आत्मविकास भी होगा तथा सामाजिक समरसता भी बनी रहेगी। सभी को उन्नति एवं प्रगति के समान अवसर मिलेंगे। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

2 × five =