तीस वर्षीय युद्ध |Thirty Years’ War History in Hindi

तीस वर्षीय युद्ध

तीस वर्षीय युद्ध (Thirty Years’ War) (1618 से 1648 ई०) 

प्रोटेस्टैंट और रोमन कैथिलिकों के बीच धर्मयुद्धों का तीस वर्षीय युद्ध (1618-1648 ई०) का युद्ध का इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। कहने को तो यह धर्म-युद्ध था, पर उसके मूल में हैप्सबर्ग और बूबों वंश के बीच चल रही प्रतिद्वद्विता के कारण युद्ध होना प्रमुख कारण था। तीस वर्षीय युद्ध इस युद्ध की शुरूआत बोहेलिया में हुई। धीरे-धीरे युद्ध सारे जर्मनी में फैल गयी। सारे पश्चिमी यूरोप के शासक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस युद्ध में शामिल हुए। कभी युद्ध का धार्मिक स्वरूप रहा तो कभी राजनीतिक, तो कभी दोनों। विभिन्न देशों ने अलग-अलग समय पर विशेष रूप से युद्ध में हस्तक्षेप किया। इस युद्ध को चार कालों में विभाजित किया जाता है-बेहेमियन (1618-1625), डेनिस (1625-29), स्वेडिस (1630-35) और स्वेडिस-फ्रैंच (1635-48)। तीस वर्षीय युद्ध का तात्कालिक कारण 

पवित्र रोम सम्राट मैथियस ने बोहेमिया में अपनी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास आरम्भ किया। हैप्सबर्ग वंश, लगभग एक शताब्दी से बोहेमिया का अधिपति था, लेकिन बोहेमिया के चेक निवासी अभी तक अपने राजा द्वारा ही शासित हो रहे थे। सन् 1618 ई० में जब बोहेमिया की गद्दी खाली हुई तो मैथियस ने अपने एक सम्बन्धी स्टीरिया के ड्यूक फर्डीनैंड को यहां का राजा बनाने का षड्यन्त्र किया। उसने बोहेमियन ड्यूक फर्डीनैंड को राजा बनाने के लिए बाध्य किया। परिणामतः चेक नेताओं ने इसका विरोध किया। उस समय तक बोहेमिया में लूथरवाद की स्थापना हो चुकी थी। सम्राट फर्डीनेंड ने प्रोटेस्टैंस लोगों की सभाओं पर प्रतिबन्ध लगाकर उनकी एकजुटता को कुचलने का प्रयास किया। इसके परिणामस्वरूप प्रोटेस्टैंटों ने राजा का खुला विद्रोह कर दिया। 

सन् 1618 ई० में सम्राट फर्डीनेंड के दो प्रतिनिधि प्रोटेस्टैंटों से वार्ता के लिए प्राग आए। वार्ता के दौरान चेक प्रोटेस्टैंटों ने उन दोनों प्रतिनिधियों को खिड़की से बाहर फेंक दिया। यह सम्राट की सत्ता और कैथोलिक लीग को खुली चुनौती थी। फ्रेडेरिक ने सेना भेजकर इस विद्रोह को दबाने और अपनी अधिसत्ता बनाए रखने का प्रयास किया। सैनिक कार्रवाई से उत्तेजित होकर बोहेमियावासियों ने सम्राट फर्डीनेंड को गद्दी से उतारने और नए राजा के निर्वाचन की घोषण कर दी। प्रोटेस्टैंट संघ के नेता पेलेटाइन के एलेक्ट को बोहिमिया का राजा घोषित किया गया जो फ्रेडरिक पंचम के नाम से बोहेमिया की गद्दी पर बैठा। उसने प्रोटेस्टैंट संघ की ओर से बोहेमियावासियों को सहायता दिलायी। डचों ने उनकी पैसों से सहायता की और टान्सिलवानिया के राजा ने हैप्सबर्ग सेना पर पीछे से आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण से बेतहाशा जान माल की हानि हुई। 

हैप्सबर्ग सम्राट फर्डीनेंड ने पोप से आर्थिक सहायता प्राप्त की एवं स्पेन तथा बवेरिया से सैनिक सहायता प्राप्त कर 1620 ई० के व्हाइट माउन्टेन (White Mountain) में बोहेमियावासियों पर भयंकर युद्ध छेड़ दिया। इस युद्ध में हजारों-हजार बोहेमियावासी मारे गए। उन्हें पूरी तरह परास्त होना पड़ा। बोहेमिया वासियों की पूरी पराजय के बाद स्पेनी सेनापति टिली ने फ्रेडरिक पंचम को बोहेमिया छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया। राजा फ्रेडरिक पंचम ने पैलिटिनेट नामक स्थान पर जाकर शरण लेनी चाही तो स्पेन की सेनाओं ने उसे वहां भी न ठहरने दिया, उसे वहां से भी खदेड़ दिया गया। 

तीस वर्षीय युद्ध

बोहेमियन युद्ध का परिणाम यह निकला कि राइन क्षेत्र में स्पेन ने अपनी स्थिति पूरी तरह से मजबूत कर ली तथा बोहेमिया पर हैब्सबर्ग सम्राट फर्डीनेंड का फिर से प्रभुत्व स्थापित हो गया। उसने फिर अपने को बोहेमिया का सम्राट घोषित कर दिया। उसने दोबारा सत्तासीन होते ही बोहेमियनों को प्रताड़ित करने के इरादे से लगभग आधे बाहेमियन कुलीनों की जमीनें जब्त कर लीं। उसने उस जमीन को या तो कैथोलिक चर्चों और मठों को दान के रूप में दे दिया या उन लोगों को दे दिया जो युद्ध में उसके साथ आए थे और उसकी सैनिक सेना में भर्ती हो गए थे। ऐसा होने के बाद अब बोहेमिया में एक नया जमींदार वर्ग पैदा हो गया। राजा का संरक्षण प्राप्त कर बोहेमिया का कैथोलिकीकरण तेजी के साथ होने लगा। केवल बोहेमिया में ही नहीं आस्ट्रिया से भी प्रोटेस्टैंटवाद को मिटाया जाने लगा, क्योंकि उसने युद्ध में बोहेमिया का साथ दिया था। ऐसे समय में जबकि प्रोटेस्टैंटवाद का सितारा पूरी तरह से गर्दिश में था और उनके उन क्षेत्रों से मिट जाने का अंदेशा पैदा हो गया था, ऐसे समय में डेनमार्क के राजा क्रिश्चियन चतुर्थ ने प्रोटेस्टैंटों की रक्षा का संकल्प उठाया। वह जानता था कि यदि कैथोलिक लोगों का इसी तरह विस्तार होता रहा तो वह भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहेगा। 

वह लूथरवादी था और उसके राज्य का एक हिस्सा होल्सटीन, जर्मन साम्राज्य में पड़ता था। वह जर्मनी के कुछ धर्म-प्रान्तों (Brishopries) पर कब्जा करके अपने बेटे के लिए एक राज्य का निर्माण करना चाहता था। इस सबके लिए उसने इंग्लैण्ड और नीदरलैण्ड से सहातया प्राप्त की, रिशलू से समर्थन का आश्वासन पाया। उसने प्रोटेस्टों को अपनी ओर मिलाया, और उनको सेना में मुख्य रूप से स्थान देकर रोमन कैथोलिकों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। यहां से तीस वर्षीय युद्ध का दूसरा दौर शुरू हुआ। 

राजा क्रिश्चियन चतुर्थ केवल जर्मन प्रोटेस्टैंट वर्ग के हित में, वरन् अपने हित में भी निर्णायक रूप से हिस्सा लेना चाहता था। वह जानता था कि कौथिलिक लोगों की विजय यदि पूर्ण हो गयी तो वह भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहेगा। 

पवित्र रोमन सम्राट फर्डीनेंड ने अल्बर्ट वेलन्सटाइन नामक प्रसिद्ध सैनिक सामन्त के नेतृत्व में एक विशाल सेना क्रिश्चियन चतुर्थ के विरुद्ध भेजी। वेलेन्सटाइन ने यूरोप के विभिन्न देशों के लड़ाकू और महत्वाकांक्षी व्यक्तियों को संभावित लाभों का लालच देकर सेना में भर्ती करना शुरू किया। उसके पास पचास हजार की शक्तिशाली और अनुशासित सेना तैयार हो गयी। 

वेलन्सटाइन और टिली की मिली-जुली सेना के सम्मुख डेनमार्क की सेना टिक न सकी। क्रिश्चियन चतुर्थ को भागना पड़ा। कैथोलिक सेना बाल्टिक तट तक पहुंच गई। यदि पवित्र रोमन सम्राट के पास समुद्रिक सेना होती तो डेनमार्क पर भी कब्जा हो सकता था। क्रिश्चियन को ल्यूबेक की सन्धि करनी पड़ी, जिसके अनुसार उसे जर्मन क्षेत्र से हटना पड़ा और कैथोलिक सम्पत्ति से भी हाथ धोना पड़ा। दो आर्च विशेपों, एक दर्जन बिशपों के क्षेत्रों और सैकड़ों मठों पर कैथोलिकों का कब्जा शुरू हुआ, जिस पर पूर्व में प्रोटेस्टैंटों ने कब्जा कर लिया था। 

ऐसे समय में फ्रांस के मंत्री रिशुलू बोर्बो ने अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए पवित्र रोमन सम्राट को हटाना आवश्यक समझा। सन् 1631 ई० में वह दक्षिणी बाल्टिक तट पर एक शक्तिशाली सेना के साथ उतरा और युद्ध का रुख बदल दिया। युद्ध चलता रहा। सन् 1634 ई० में स्वीडन को पराजित होना पड़ा। पर उस समय अजीब सी निश्चितता थी; कहीं किसी की जीत हो रही थी, कहीं किसी की हार । न कोई विजेता था ना पराजित। लम्बे युद्ध और भारी जान-माल के नुकसान के बाद दोनों ही पक्ष समझौते की बात करने लगे थे। 

ऐसे समय में 1636 ई० में फ्रांस के रिशलू ने प्रोटेस्टैंट पक्ष से युद्ध में हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया। ऐसा करने के पीछे उसका उद्देश्य रोमन सम्राट और उसके वंश हैप्सबर्ग परिवार को नीचा दिखाना था। उसने स्वीडन और हालैण्ड से समझौता कर लिया क्योंकि दोनों ही प्रोटेस्टैंट थे और हैप्सबर्ग परिवार के विरोधी थे। उत्तर से स्वीडन और दक्षिण-पश्चिम से फ्रांस ने हमला कर दिया। 

इधर हैप्सबर्ग परिवार के अधीन स्पेन में, फ्रांस को उत्तर-दक्षिण में जबरदस्त युद्ध की चुनौती दी। पर स्पेनिया राजा फिलिप चतुर्थ की सेना शैयेन और बारबैंडी कौ रौंदती हुई पेरिस तक पहुंच गयी। फ्रांस को लूट लिया गया। फ्रांस ने स्पेन के विरुद्ध पुर्तगाल और कैटेलोनिया के विद्रोह का समर्थन कर उन्हें स्वतन्त्र राज्य के रूप में मान्यता दे दी। इसके बाद दोनों पक्ष ही युद्ध से थके हुए प्रतीत हुए। सन् 1648 ई० में वेस्टफालिया की सन्धि द्वारा 30 वर्षीय युद्ध को विधिवत् समाप्त कर दिया गया। 

युद्ध समाप्ति के बाद समझौते में जो बातें सामने आयी थीं वे सभी पक्षों को मान्य थीं। सन्धि की मुख्य शर्ते निम्नलिखित थीं 

(i) पवित्र रोमन सम्राट की अदालतों में, जहां धर्म सम्बन्धी फैसले होते थे, वहां कैथोलिक और प्रोटेस्टैंट जजों की संख्या बराबर कर दी गयी।

(ii) जनवरी, 1624 ई० तक चर्च की जो सम्पत्ति जिसके पास थी, उसे ही उसका अधिकारी मान लिया गया। इसके बाद के परिवर्तन के अमान्य कर दिया गया।

(iii) हालैण्ड और स्विटजरलैण्ड यूरोप के नए राज्यों के रूप में प्रतिष्ठित 

(iv) इस सन्धि द्वारा कालबिन वादियों को भी लूथरवादियों के साथ मान्यता मिल गयी।

(v) पैलिटीनेट राज्य, जहां युद्ध का प्रारम्भ हुआ था, विभाजित कर दिया गया। आधा फ्रेडरिक के पुत्र को और आधा बयेटिया के शासक को देकर उन्हें सम्राट के चुनाव का अधिकार दे दिया गया। इस तरह इलेक्टर लोगों की संख्या बढ़ गयी।

(vi) फ्रांस और जर्मन डायट के नए सदस्य बन गए। अब जर्मन समस्याओं के विषय में उनकी भूमिका निर्णायक बन गयी।

(vi) दक्षिणी बाल्टकतट पर स्वीडन का अधिकार स्थापित हो गया। पोमेटेनियो का एक हिस्सा, एल्ब तथा वेजर नदियों का क्षेत्र भी स्वीडन को मिल गया।

(viii) फ्रांस को उत्तरी-पूर्वी सीमान्त का अल्सस का प्रान्त दे दिया गया। एक हद तक रिशलू का लक्ष्य पूरा हो गया।

(ix) पवित्र रोमन साम्राज्य का ब्राह्य संगठन तो बना रहा, परन्तु अब हर सदस्य राज्य स्वयं युद्ध और शान्ति सम्बन्धी निर्णय ले सकता था।

More from my site

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

5 × 3 =