तृतीय कर्नाटक युद्ध |Third Battle of Karnataka History in hindi

तृतीय कर्नाटक युद्ध

 तृतीय कर्नाटक युद्ध | (Third Battle of Karnataka) (1758-1763 ई०) 

कर्नाटक के द्वितीय युद्ध में फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले के नेतृत्व में लड़े सैनिक, ब्रिटिश सैनिकों से हार गए थे; इस हार के बाद सन् 1754 ई० में फ्रांसीसी सरकार ने डूप्ले को वापस बुला लिया था। डूप्ले के वापस जाने के चार वर्ष बाद तक दक्षिण भारत में शान्ति बनी रही। 

सन् 1756 ई० में यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेज और फ्रांसीसी एक-दूसरे से युद्ध में लिप्त हो गए। यूरोप में उक्त देशों के बीच छिड़ चुके युद्ध का प्रभाव भारत में पड़ना स्वाभाविक था। भारत में दोनों देशों ने अपनी कालोनियां बना रखी थीं, तथा शक्ति सन्तुलन में एक-दूसरे पर भारी पड़ने की जद्दोजहद में लगे हुए थे-यूरोप में दोनों देशों में युद्ध छिड़ने के बाद भारत में भी दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा। 

भारत में युद्ध संचालित करने अपनी शक्ति बढ़ाने के ध्येय से फ्रांसीसी सरकार ने बाकायदा तौर पर काउन्टलैली नामक सैन्य अधिकारी को भेजा। जो 1758 में भारत आ पहुंचा। लैली अत्यन्त वीर, साहसी तथा उग्र प्रवृत्ति का सैन्य अधिकारी था। उसने भारत पहुंचते ही अंग्रेजों के कब्जे वाले फोर्ट, सेन्ट डेविड पर गोलाबारी का आदेश देकर वहां मौजूद सारे ब्रिटिश सैनिकों को मौत के मुंह में पहुंचा दिया, तथा उस पर अपना अधिकार कर लिया। 

लैली का काम यहीं पर खत्म नहीं हो गया-उसे अपनी सेना तथा सरकार के लिए आर्थिक सहायता का प्रबन्ध करना था-इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने तंजौर पर आक्रमण कर दिया। उसने आक्रमण का बहाना बनाया कि तंजौर के राजा पर फ्रांस की कम्पनी कि 56 लाख रुपया बकाया हैं जिसे वह अदा नहीं कर रहा है। 

तंजौर राजा के पास विशाल सेना थी-उस पर फ्रांसीसी हमले का कोई नुकसान न हुआ, उल्टे फ्रांसीसी सेना को भयानक क्षति उठाकर भागना पड़ा।

इस असफलता से बौखलाकर क्षतिपूर्ति के लिए लैली ने खुले समुन्द्र में अंग्रेजों के जहाजों पर आक्रमण कर दिया। दोनों ओर के जहाजी बेड़ों में भयंकर युद्ध छिड़ा तथा यहां पर भी लैली को असफलता का मुंह देखना पड़ा तथा फ्रांसीसी जहाजी बेडों को भारी नुकसान उठना पड़ा। 

इस दोहरी असफलता से खिसियाकर लैली ने आर्थिक साधन मुहैया कराने का उद्देश्य से युद्ध का रुख मद्रास की ओर मोड़ दिया, उसने सहायता के लिए हैदराबाद से अन्य फ्रांसीसी अधिकारी बुसी को बुला लिया। 

बुसी को हैदराबाद से मद्रास के लिए बुलाया जाना लैली की बहुत बड़ी भूल साबित हुई। बुसी के हैदराबाद में न होने की बात खुलकर अंग्रेजों के पास पहुंच गयी थी। अंग्रेजों ने नेतृत्वविहीन फ्रांसीसियों का क्षेत्र पाकर दिसम्बर, 1758 ई० में, अंग्रेज सेनापति कर्नल फोडे के नेतृत्व में कन्दूर पर आक्रमण कर फ्रांसीसियों को हैदराबाद से खदेड़कर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। इस जीत के उत्साह में भरे अंग्रेजों ने मद्रास में फ्रांसीसियों से दो-दो हाथ करने के लिए फरवरी, 1759 ई० में युद्ध थोप दिया। अंग्रेजों ने समय रहते ब्रिटिश सरकार को अपनी अगली रणनीति की जानकारी दे दी थी, फलस्वरूप जब मद्रास में ब्रिटिश सेना बढ़ी तो उनकी सहायता के लिए एक प्रबल जहाजी बेड़ा आ गया। 

लैली को वहां भी हार का सामना करना पड़ा। निरन्तर पराजय के बाद लैली की स्थिति दिनो-दिन खराब होती जा रही थी। 

सन् 1760 ई० में अंग्रेज सेनापति सर आमर कूट ने बाण्डेवास के युद्ध में फ्रांसीसियों को बुरी तरह परास्त कर बुसी को बन्दी बना लिया। इसके बाद अंग्रेजों ने पाण्डिचेरी को घेर लिया। 1761 ई० में उस पर अपना अधिकार कर लिया। 

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इस बीच अंग्रेजों ने माही और जिजी पर भी अपना अधिकार कर लिया। 

लैली की असफलता से फ्रांस सरकार इतनी अप्रसन्न हुई कि उसे भारत से कैद करके फ्रांस ले जाया गया तथा सन् 1763 ई० में प्राण दण्ड दे दिया गया। 

सन् 1763 ई० में ही यूरोप में छिड़े फ्रांसीसी और ब्रिटिश के बीच छिड़ा सप्तवर्षीय युद्ध समझौते के अन्तिम परिणाम पर पहुंचा। पेरिस में दोनों देशों के बीच सन्धि सम्पन्न हुई। भारत से फ्रांसीसियों का अधिकार अंग्रेजों ने पूर्णतः खत्म कर दिया था। उत्तर भारत का अधिकांश क्षेत्र अंग्रेजों के कब्जे में चला गया था। अब इनका भारत में कोई प्रतिद्वन्द्वी न रह गया था। वे भारत में साम्राज्य स्थापना के कार्य में लग गए। 

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