वसुधैव कुटुंबकम् : भारत का आदर्श (The World is One family) | वसुधैव कुटुम्बकम् पर निबंध

वसुधैव कुटुम्बकम् पर निबंध 

वसुधैव कुटुंबकम् : भारत का आदर्श (The World is One family)| वसुधैव कुटुम्बकम् पर निबंध 

‘वसुधैव कुटुंबकम्’ न सिर्फ भारत की परिकल्पना है, अपितु भारत का आदर्श भी है। यही कारण है कि भारत रत्न से अलंकृत देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेई ने तत्कालीन विदेश मंत्री के रूप में 4 अक्टूबर, 1977 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 32वें अधिवेशन में हिन्दी में दिए गए अपने भाषण में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा को विश्व समुदाय के समक्ष रखते हुए कहा था कि हमारा इस धारणा में सदैव विश्वास रहा है कि सारा संसार एक परिवार है। यह अवधारणा भारत की ज्ञानमय और श्रेष्ठ संस्कृति की देन है, जो विश्व को एक परिवार के रूप में देखती है। इसमें पूरब-पश्चिम का भेद नहीं है, न ही छोटे-बड़े का फर्क है। यह प्रेमपूर्वक, विश्वासपूर्वक सबका आलिंगन करने को उद्यत है। यह भारतीय संस्कृति का बहुआयामी पक्ष है। भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष पर अंकित यह वाक्यांश भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। 

‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा को विश्व समुदाय के समक्ष रखते हुए कहा था कि हमारा इस धारणा में सदैव विश्वास रहा है कि सारा संसार एक परिवार है। 

‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा के प्रबल पक्षधर महात्मा गांधी ने इसे समग्र विकास के लिए आवश्यक माना। गांधी विचारधारा के प्रमुख घटक यथा-समग्रवादी विकास (Holistic Development), जीवन के सभी स्वरूपों के प्रति सम्मान, अहिंसा का सिद्धांत आदि इस प्राचीन अवधारणा के ही विस्तार थे। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी वैश्विक मंचों से ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की पैरोकारी की है। आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित ‘वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल’ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि भारतीय संस्कृति बहुत समृद्ध है तथा उच्च मूल्यों से युक्त है। हम वो लोग हैं, जो ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ से ‘अहं ब्रह्मास्मि’ तक आए हैं। यानी हम वो लोग हैं, जो उपनिषदों से उपग्रहों तक पहुँचे हैं। 

‘वसुधैव कुटुंबकम्’ सनातन धर्म का मूल संस्कार तथा विचारधारा है, जो महोपनिषद् सहित कई ग्रथों में लिपिबद्ध है। इसका अर्थ है ‘धरती ही परिवार है’। महोपनिषद् के अध्याय 4 के 71वें श्लोक में यह इस प्रकार आया है 

अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥ 

इसका अर्थ है-यह अपना बंधु है और यह अपना बंधु नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो सम्पूर्ण धरती ही परिवार है। कितनी व्यापक है यह अवधारणा, जो सम्पूर्ण धरा को अपना परिवार मानती है। इस प्रकार इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी मनुष्य और जीव-जंतु एक ही परिवार का हिस्सा हैं। एक परिवार के नाते इस परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे के दुख-सुख के साथी हैं। इसमें अपनेपन की प्रबल और पुनीत भावना निहित है। 

मूलतः ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ जैसी उदात्त अवधारणा की संकल्पना प्राचीन भारतवर्ष के ऋषियों-मुनियों द्वारा की गई थी, जिसका उद्देश्य था-‘पृथ्वी पर मानवता का विकास’। इसके माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि सभी मनुष्य समान हैं और सभी का कर्तव्य है कि वे परस्पर एक-दूसरे के विकास में सहायक बनें, जिससे मानवता फलती फूलती रहे और यह संसार सुंदर बने। 

मूलतः ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ जैसी उदात्त अवधारणा की संकल्पना प्राचीन भारतवर्ष के ऋषियों-मुनियों द्वारा की गई थी, जिसका उद्देश्य था-‘पृथ्वी पर मानवता का विकास’। इसके माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि सभी मनुष्य समान हैं और सभी का कर्त्तव्य है कि वे परस्पर एक-दूसरे के विकास में सहायक बनें, जिससे मानवता फलती फूलती रहे और यह संसार सुंदर बने। भारतवासियों ने इस अवधारणा को सहर्ष अपनाया तथा एकरूपता के विस्तार के बजाय दृष्टिकोणों, व्यवहारों, प्रथाओं एवं संस्थाओं की विविधता का स्वागत किया, बांहें फैलाकर इसका स्वागत किया। यह अकारण नहीं है कि प्रायः सभी धर्मों के ग्रंथों में किसी न किसी रूप में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा निहित है। वेद कहते हैं कि प्रबुद्ध लोगों के लिए समूची मानव जाति एक परिवार है। रामायण में कहा गया है कि ईश्वर सभी में व्याप्त है। गीता समूचे मानव समुदाय के भले की बात कहती है। जैन धर्म के अनुसार मन-मस्तिष्क, शरीर और बोली से किसी भी जीव का अहित नहीं करना चाहिए। इस्लाम धर्म में समूची मानवता की समृद्धि की कामना की गई है। गुरुग्रंथ साहिब में कहा गया है कि समूची मानव जाति को प्रकाशित करने वाला एक ही स्रोत है, जो कि ईश्वर है। ईश्वर सभी के लिए समान है, इसलिए सभी धर्मों को एकता का एक समान दैवी संदेश देना चाहिए। 

भारत का सांस्कृतिक वैशिष्ट्य एवं विविधता ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ जैसी अवधारणा की ही देन है। इस अवधारणा से ओत-प्रोत होने के कारण ही समय-समय पर भारत ने हर जाति और धर्म के लोगों को शरण दी और उन्हें अपनाया। दुनिया को यह संदेश दिया कि विश्व एक परिवार है और परिवार के सदस्य एक-दूसरे के पीछे धकेल कर नहीं, बल्कि एक-दूसरे का सहारा बनते हुए आगे बढ़ते हैं। 

प्राचीन भारतीय अवधारणा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ न सिर्फ आज भी प्रासंगिक है, बल्कि अनेक वैश्विक समस्याओं का समाधान भी इसमें निहित है, फिर चाहे वह युद्ध और हिंसा की समस्या हो या आतंकवाद की, नस्लीय हिंसा हो या धार्मिक उन्माद। वस्तुतः आज का दौर आत्मकेन्द्रित हो चुका है, जिसमें अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए अपने बारे में ही सोचा जाता है। राष्ट्रों, समूहों, समुदायों आदि ने सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचना शुरू कर दिया है, समूची मानवता और विश्व के बारे में नहीं। यही अशांतिमूलक समस्या की जड़ है। वर्चस्ववादी नीतियों एवं आत्मकेन्द्रित सोच के कारण ही युद्ध, गृहयुद्ध, आतंकवाद, नस्लीय हिंसा जैसी विभीषिकाओं से सारा विश्व जूझ रहा है। कहीं लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का गला घोंटा जा रहा है, जो कहीं मूलभूत मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। 

अगर दुनिया ने वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा को अपनाया होता, तो उसे उन दो विश्वयुद्धों का सामना न करना पड़ता जिनसे मानवता कराही और कलंकित हुई। वैमनस्य बढ़ा और अस्थिरता व आतंक ने पैर पसारे। 

‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का आदर्श यदि वैश्विक स्तर पर मूर्तरूप नहीं ले पाया, तो इसके पीछे उपनिवेशवाद और राष्ट्रवाद दो प्रमुख कारण रहे। जब सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी में यूरोप में औद्योगीकरण की शुरूआत हुई, तो यूरोपीय देशों ने अपने उपनिवेश बनाने शुरू कर दिए। इसी के साथ एक नई अवधारणा ‘राष्ट्रवाद’ का जन्म हुआ, जो राष्ट्र तक ही सीमित थी। इन दोनों बातों ने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के आदर्श को तिरोहित कर दिया। उपनिवेशवाद का अंत होने के बाद भी राष्ट्रवाद दुनिया पर हावी बना रहा। यह वह वाद है, जिसमें व्यक्ति केवल अपने राष्ट्र के बारे में सोचता है, सम्पूर्ण मानवता के बारे में नहीं। राष्ट्रवाद एक भावात्मक राजनीतिक मान्यता है, जो सीधे शक्ति संघर्ष से सम्बन्ध रखती है। जर्मनी में हिटलर ने राष्ट्रवाद का अर्थ यह समझा कि जर्मन प्रजाति को संसार का स्वामी बनाया जाए। राष्टवाद के इसी स्वरूप से ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का आदर्श खंड-खंड होता रहा है |

अगर दुनिया ने वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा को अपनाया होता, तो उसे उन दो विश्वयुद्धों का सामना न करना पड़ता जिनसे मानवता कराही और कलंकित हुई। वैमनस्य बढ़ा और अस्थिरता व आतंक ने पैर पसारे। यह वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा को विस्मृत करने का ही परिणाम है कि हम धर्म, जाति, भाषा और रंग संस्कृति आदि के नाम पर इस हद तक बँट चुके हैं कि सभी के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के विचार को ही भूल चुके हैं। आज एकरूपता के विस्तार के लिए विविधता का दमन होने से अनेकानेक समस्याएँ जन्म ले रही हैं। आपसी मतभेद बढ़ रहे हैं, जिसकी परिणिति तनाव के रूप में सामने आ रही है। 

यह विडंबना ही तो है कि हमने पृथ्वी को बांटने के साथ संवेदनाओं से मुंह मोड़ लिया है और खुद को संकीर्णता के खोल में छिपा लिया है। आज का विश्व अलग-अलग समूहों में बँटा हआ है. जो सिर्फ और सिर्फ अपने-अपने अधिकरों और उद्देश्यों पर ही केन्द्रित है। वह अपना विकास तो चाहता है, दूसरे का भला नहीं। ऐसे में बैर-भाव, अन्याय और दमन की प्रवृत्तियों का सिर उठाना स्वाभाविक है। यही हो रहा है और प्रायः समूचा विश्व आतंक, भय और वैमनस्य से आच्छादित है। अस्त्र-शस्त्रों की होड़ बढ़ी है, हर देश परमाणु शक्ति से लैस होना चाहता है। एक छोटी-सी चिंगारी पूरे विश्व को तबाह कर सकती है। यानी हम विनाश की तरफ बढ़ रहे हैं, ऐसा विनाश जो समूची मानवता और सभ्यता को तबाह कर सकता है। इस तबाही से बचाव का एकमात्र रास्ता है-‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का भारतीय दर्शन। 

हालांकि यह दर्शन व्यावहारिक दृष्टि से दुरूह भी है। इसे परिवार के स्तर से ही समझ सकते हैं। समाज की पहली इकाई परिवार ही होता है, जो रिश्तों-नातों का एक ऐसा समूह है, जहां समरसता की अपेक्षा तो की जाती है, किन्तु प्रायः यह समरसता कायम नहीं रह पाती है। पारिवारिक सदस्यों के बीच भी लड़ाई झगड़े होते रहते हैं और वैचारिक मतभेदों के कारण बिखराव और विघटन भी देखने को मिलता है। यह आज से नहीं प्राचीनकाल से है। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में पारिवारिक कलह और विघटन का चित्रण देखने को मिलता है। स्पष्ट है कि व्यावहारिक दृष्टि से ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का आदर्श अत्यंत दुरूह है, तथापि विश्व शांति और भाईचारे का मर्म इसी महान विचार में समाहित है। इसमें एक सुन्दर और सार्थक विश्व की संकल्पना निहित है। इस संकल्पना को व्यवहार में लाकर ही हम एक आदर्श और सीमारहित विश्व की तरफ बढ़ सकते हैं और यही मानवता के विकास का चरम चरण भी होगा। 

यदि हम शांति चाहते हैं, संसार को सुन्दर-सुखी और समृद्ध देखना चाहते हैं, तो बैर-भाव और विद्वेष को भुलाकर वसुधैव कुटुंबकम् के भारतीय दर्शन को अपनाना होगा, जो सबको साथ लेकर चलने वाला दर्शन है, जो घनिष्ठता का दर्शन है, न कि वैमनस्य और घृणा का। यही वह अवधारणा है जिस पर आगे बढ़कर मानव कल्याण को अभीष्ट आयाम दिए जा सकते हैं, ईश्वर चित सृष्टि को और अधिक सुन्दर बनाया जा सकता है तथा विश्व को एक आदर्श-विश्व में बदला जा सकता है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र का सार्थक पहले करनी होंगी, ताकि मानवता के कल्याण के इस स्वप्न को साकार किया जा सके। 

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