सिंदबाद की सातवीं यात्रा की कहानी | The story of the seventh journey of Sindbad

सिंदबाद की सातवीं यात्रा की कहानी

सिंदबाद की सातवीं यात्रा की कहानी | The story of the seventh journey of Sindbad

“मैं समुद्री यात्राओं और खतरों से परेशान हो गया था। लेकिन एक दिन खलीफा का संदेश आ गया कि मुझे इंडीज के राजा के पास उनकी ओर से दोस्ती स्वीकारने का संदेश और कुछ उपहार लेकर जाना होगा।” सिंदबाद ने अपने मेहमानों को बताया।

सिंदबाद ने खलीफा को बताना चाहा कि अब वह कहीं नहीं जाना चाहता; लेकिन खलीफा के आगे उसकी एक न चली। वे सिंदबाद के अलावा

किसी दूसरे को यह काम नहीं सौंपना चाहते थे। इंडीज के राजा ने खलीफा को काफी उपहार और दोस्ती का संदेश भेजा था। यदि वे जवाब न देते, तो इसे अशिष्टता माना जाता।

बगदाद के खलीफा चाहते थे कि सिंदबाद ही उनकी ओर से संदेश और उपहार लेकर जाए। ऐसे महत्वपूर्ण काम के लिए वे किसी दूसरे पर भरोसा नहीं कर सकते थे।

खलीफा ने यात्रा के लिए सिंदबाद को अपना जहाज दे दिया था। सिंदबाद आराम से इंडीज पहुंचा और राजा ने उसका भव्य स्वागत किया। सिंदबाद नेखलीफा की ओर से भेजे गए उपहार दिए। उनमें कई रंगों और नमूनों वाले पलंग, भारी कशीदाकारी वाले पचास चोगे, मिस्र के सफेद-रेशमी चोगे तथा अन्य बहुत से कीमती सामान शामिल थे।

खलीफा के उपहारों में एक मूर्ति भी थी, जिसमें एक व्यक्ति शेर को तीर से मार रहा था। इसके अलावा एक बेशकीमती मेज भी थी, जिसे किसी जमाने में राजा सोलोमन प्रयोग करता था। इन उपहारों के साथ खलीफा ने राजा को उसकी दोस्ती के लिए धन्यवाद भी भेजा था।

सिंदबाद की सातवीं यात्रा की कहानी

राजा खलीफा का संदेश और उपहारों को पाकर खुश हो गया। राजा ने खलीफा को उसकी दोस्ती स्वीकार करने का संदेश भेजा था। उसने सिंदबाद को उपहारों से लाद दिया था। इसके बाद सिंदबाद कुछ दिन वहीं रहा और उनके राज्य का भ्रमण करता रहा। नए-नए स्थानों और रीति-रिवाजों को देखकर उसे बहुत आनंद आया।

तत्पश्चात् सिंदबाद ने अपनी वापसी की यात्रा आरंभ की। शुरू के पांच दिन तो सब ठीक रहा, फिर समुद्री लुटेरों ने हमला कर दिया। उन्होंने कुछ नाविकों को मार डाला और बाकी लोगों को बंदी बना लिया। सबके कीमती सामान छीनकर उन्हें मैले चोगे पहना दिए तथा एक सुदूर स्थान पर ले जाकर गुलामों की तरह बेच दिया।
सिंदबाद एक अमीर व्यापारी का गुलाम बन गया। वह बहुत दयालु आदमी था। उसने सिंदबाद को साफ कपड़ा और भोजन दिया। फिर उसने सिंदबाद के बारे में जानना चाहा।

सिंदबाद ने उसे बताया कि वह एक धनी व्यापारी था, लेकिन जहाज लुटने के कारण गुलाम बनकर बाजार में बिक गया।

व्यापारी ने उससे पूछा कि क्या उसे धनुष-बाण चलाना आता है। सिंदबाद ने कहा, “मैं धनुष-बाण चलाना तो जानता हूं, लेकिन बहुत समय से अभ्यास छूट गया है। उम्मीद है कि जल्द ही सीख लूंगा।”

सिंदबाद की सातवीं यात्रा की कहानी

कुछ दिनों बाद व्यापारी सिंदबाद को अपने साथ हाथी पर बिठाकर घने जंगल में ले गया और बोला, “इस वन में हाथियों के झुंड आते हैं। तुम किसी हाथी को मारकर मुझे बताना।” इसके बाद वह सिंदबाद को भोजन तथा धनुष-बाण देकर वापस लौट गया।

सिंदबाद एक पेड़ पर चढ़ गया। अगले दिन हाथियों का झुंड आया। सिंदबाद ने उन पर तीर छोड़ा और एक हाथी मारा गया। सिंदबाद नीचे उतराऔर व्यापारी को जाकर बताया कि उसने एक हाथी मार दिया है।

अमीर व्यापारी उसके साथ जंगल में गया। उन्होंने उस हाथी को दफना दिया। व्यापारी बोला, “हम इसका कंकाल बनने तक इंतजार करेंगे, ताकि इसके दांत निकाल सकें।”

सिंदबाद उस व्यापारी के आदेश से रोज एक हाथी मारकर उसे दफनाने लगा। ऐसा दो माह तक चलता रहा।

व्यापारी सिंदबाद के खाने-पीने का सारा प्रबंध रखता था। सिंदबाद का काम यही था कि वह पेड़ पर छिपकर बैठ जाए और जब हाथी वहां से निकलें, तो वह एक हाथी को मार डाले। सिंदबाद ऐसा ही करता था। जब बाकी हाथी वहां से चले जाते, तो वह मृत हाथी को उठवाकर मिट्टी में गाड़ देता था।

सिंदबाद की सातवीं यात्रा की कहानी

एक दिन हाथियों के झुंड ने उस पेड़ पर हमला कर दिया, जिस पर सिंदबाद बैठा था। वे उस जगह को पहचान गए थे। एक हाथी उसे अपनी सूंड में उठाकर घने जंगल में ले गया। फिर उसे उस जगह छोड़ दिया, जहां हाथियों के कंकाल और हाथी-दांत बिखरे पड़े थे। वे उसे यह दिखाना चाहते थे कि उनके साथियों को जान से मारना कितनी बुरी बात है। सिंदबाद को अपनी भूल का एहसास हो गया। सारे हाथी उसे कोई हानि पहुंचाए बिना वापस चले गए।

सिंदबाद उन जानवरों की महानता और समझदारी का कायल हो गया। उसने जाकर व्यापारी को सारी घटना बताई और हाथी-दांत से भरी पहाड़ी के बारे में भी बताया।

उस समय बारिश का मौसम शुरू हो गया था, अतः घने जंगल में जाना संभव नहीं था। जंगल में जाने के लिए बारिश खत्म होने का इंतजार करना था। सिंदबाद शीघ्र ही व्यापारी को उस जगह ले जाना चाहता था।

सिंदबाद की सातवीं यात्रा की कहानी

सिंदबाद के मालिक अर्थात् उस व्यापारी को उसकी बातें इतनी अच्छी लगीं कि उसने उसे गुलामी से आजाद कर दिया। वह सिंदबाद को बहुत से उपहार देना चाहता था, लेकिन सिंदबाद ने कहा कि उसकी आजादी ही सबसे बड़ा उपहार थी। अब मालिक उससे अपने भाई की तरह व्यवहार करने लगा था।

सिंदबाद बारिश का मौसम खत्म होने तक वहीं रुका, फिर वे दोनों हाथी-दांत वाली पहाड़ी पर गए। वहां उसके मालिक के अलावा सारे शहर के व्यापारियों के लिए भी भरपूर हाथी-दांत बिखरा हुआ था। सबने वहां से माल उठाया और अपने गोदाम भर लिए।

मालिक ने सिंदबाद के जाने की सारी व्यवस्था करवा दी तथा उसे यात्रा के लिए भरपूर सामान दिया, जिसमें हाथी-दांत और कई उपहार भी थे।

सिंदबाद की सातवीं यात्रा की कहानी

सिंदबाद के जाते समय मालिक उसे गले से लगाकर रोने लगा। वह बोला, “सिंदबाद! तुमने मेरी आंखें खोल दीं। मैं आज के बाद किसी इन्सान को अपना गुलाम नहीं बनाऊंगा। सभी इन्सान एक समान होते हैं। मैंने जानवरों
को मारकर जो धन कमाया, उसके लिए भी मुझे बहुत  दुख है। आज के बाद मेरे हाथों किसी जानवर की हत्या नहीं होगी।” सिंदबाद ने उसे धन्यवाददिया और अपने घर की ओर चल पड़ा।

सिंदबाद को शक था कि कहीं इस बार भी कोई अनहोनी न हो जाए, इसलिए उसने जहाज छोड़कर पैदल मार्ग से जाने का विचार किया। उसने हाथी-दांत बेचकर सोना खरीद लिया। फिर वह पैदल जाने वाले कारवां में शामिल हो गया।

बगदाद पहुंचकर सिंदबाद ने खलीफा को सारी घटना सुनाई। खलीफा ने उसे बहुत-सा धन और उपहार देकर विदा किया। सिंदबाद अपने परिवार के पास लौट गया।

सिंदबाद की सातवीं यात्रा की कहानी

सिंदबाद ने हिंदबाद से कहा, “मेरे दोस्त, यह सारी दौलत किस्मत से नहीं मिली। इसे मैंने कड़ी मेहनत और खतरे मोल लेकर कमाया है।” हिंदबाद ने सिंदबाद को धन्यवाद दिया कि उसने उसकी आंखें खोल दी। इसके बाद हिंदबाद अपने घर चला गया। उसे एक प्यारा दोस्त मिल गया था।

जब हिंदबाद घर आया, तो उसकी पत्नी बोली, “आपने मुझसे वादा किया था कि आप मुझे विस्तार से सब कुछ बताएंगे।” पत्नी की बात सुनकर हिंदबाद ने उसे सिंदबाद के बारे में सब कुछ बता दिया। वह भी उन कहानियों
को सुनकर हैरान रह गई।

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