सिंदबाद की तीसरी यात्रा की कहानी | The story of Sindbad’s third journey

सिंदबाद की तीसरी यात्रा की कहानी

सिंदबाद की तीसरी यात्रा की कहानी | The story of Sindbad’s third journey

“मैं पिछली यात्राओं की सारी परेशानियां भूल गया था और फिर से यात्रा पर निकलने के लिए बेचैन हो रहा था।” सिंदबाद ने अपने मेहमानों को बताया, “इस बार मैंने ज्यादा माल ले लिया। मैंने अपने पुराने नाविक साथियों के अलावा कुछ नए साथी लिए और हम लोग निकल पड़े।” 

व्यापारी बीच-बीच में बंदरगाहों पर अपना माल बेचते रहे। कुछ दिनों तक सब कुछ बहुत अच्छा चलता रहा। लेकिन एक दिन समुद्र में भारी तूफान आया और जहाज अपने रास्ते से भटक गया। 

“काश! मैं इस टापू पर न आया होता।” कप्तान ने चिंतित होते हुए कहा, “यह जगह तो भयानक बौनों से भरी है। वे झुंड बनाकर आते हैं और लोगों पर हमला करके उन्हें जान से मार देते हैं।” 

सिंदबाद ने कहा, “आप इस समय ऐसी बातें न करें। हमें अपने नाविकों को इस विषय में चेतावनी देकर सचेत कर देना चाहिए।” 

इससे पहले कि नाविकों को खतरे का एहसास होता, उन्होंने बौनों का झुंड अपनी ओर आते देखा। वे लाल बालों वाले दो फुट के बौने थे। वे पानी में छलांगें मारते हुए जहाज तक पहुंच गए। 

सिंदबाद की तीसरी यात्रा की कहानी

उन्होंने सभी नाविकों को एक सुनसान टापू पर उतार दिया और जहाज लेकर चले गए। अब नाविकों के पास बचने का कोई उपाय नहीं था। 

नाविक इधर-उधर भटकने लगे और पेड़ों पर लगे फल खाकर भूख शांत करने लगे। अचानक उन्हें एक महल दिखाई दिया और वे उस ओर चल दिए। वहां पहुंचकर उन्हें पता चला कि वह एक बड़ा किला है। 

नाविक किले के दरवाजे से अंदर चले गए। वहां एक अजीब-सी खामोशी छाई थी। उनके आसपास इन्सानी हड्डियों का ढेर पड़ा था। एक आदमी को आग में भूना जा रहा था। यह देखकर नाविकों की जान ही निकल गई। 

पूरे किले में उस आदमी की चीखें गूंज रही थीं, लेकिन उसे बचाने वाला कोई नहीं था। शायद वह भी उनकी तरह कोई नाविक था, जो भटककर उस ओर आ गया था। 

सारे नाविक वहीं निढाल पड़े थे। भूख-प्यास और भय से उनकी जान निकल रही थी। 

दिन ढलने वाला था और नाविक हिल भी नहीं पा रहे थे। तभी उन्हें किसी के पैरों की आहट सुनाई दी। कोई ‘धम-धम’ करता आ रहा था। वे काले राक्षस को अपनी ओर आता देखकर कांप उठे। 

उसके माथे पर एक आंख थी। उसके दांत और नाखून लंबे तथा तीखे थे। उसका निचला होंठ ठुड्डी तक लटका था और उसके कान हाथी के कान की तरह बड़े थे।

नाविकों को वहां पड़ा देखकर राक्षस सोचने लगा कि उनमें से सबसे मोटा कौन है। सिंदबाद अपनी सांस रोके पड़ा था। 

सिंदबाद को देखकर राक्षस बोला, “छि:! इसमें तो सिर्फ हड्डियां हैं। मुझे मोटा माल खाना है।” 

फिर राक्षस ने सबसे मोटे नाविक को पकड़ लिया। वह उसे सींक में लगाकर भूनने के बाद खा गया। इसके बाद काला राक्षस सो गया और खर्राटे भरने लगा। 

सिंदबाद की तीसरी यात्रा की कहानी

बाकी बचे नाविकों का डर के मारे बुरा हाल था। वे समझ गए कि एक न एक दिन सबको इसी तरह बेमौत मरना है। राक्षस के लिए कई दिन के खाने का प्रबंध हो गया था। वह मस्ती से झूम रहा था। उसे इन्सानी मांस खाने का स्वाद आ गया था। 

सुबह राक्षस उठकर कहीं चला गया, लेकिन नाविक जानते थे कि वे उसके चंगुल से नहीं बच सकते थे। पहले बौनों ने लूटा और अब राक्षस उन्हें खाना चाहता था। हर रात काला राक्षस वापस आता और उनके एक साथी को भूनकर खा जाता। 

नाविक वहां से भागने की योजना बनाने लगे। जब राक्षस दिन में वहां नहीं था, तो उन्होंने पेड़ की टहनियों और सरकंडों से पानी में तैरने के लिए बेड़े बना लिए थे। वही उनके जीवन की रक्षा कर सकता था। आखिर में सिंदबाद और उसके आठ साथी बचे थे। बाकी सबको काला राक्षस खाकर अपनी भूख मिटा चुका था। 

सिंदबाद ने शेष साथियों को एकत्र किया और उन्हें हिम्मत बंधाई। उसने कहा कि अगर वे चाहें, तो अब भी अपनी जान बचा सकते थे। जब तक इन्सान की सांस चल रही हो, तब तक उसे हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। वे उसकी बात से सहमत हो गए। उसने उन्हें अपनी योजना बताई, जिसे सुनकर सारे नाविकों ने वैसा ही करने का वचन दिया। 

सिंदबाद की तीसरी यात्रा की कहानी

उस रात जब राक्षस सो रहा था, तो सबने आग में गरम की हुई सींकों को उसकी आंख में भोंक दिया। वह दर्द के कारण तिलमिलाकर उठा और नाविकों को पकड़ने की कोशिश करने लगा। वे सब इधर-उधर छिप गए। अंधा राक्षस किले में चिल्लाते हुए भागने लगा। 

तत्पश्चात् सभी नाविक दौड़कर अपने बेड़े पर चढ़ गए। इतनी देर में अंधा राक्षस बहुत से राक्षसों के साथ उनके पीछे पहुंच गया। उन्होंने बड़ी-बड़ी चट्टानें फेंककर कई नाविकों को लहूलुहान कर दिया। 

चारों ओर भारी चीख-चिल्लाहट मची थी। नाविकों की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन जिंदा बचा और कौन मारा गया। एक बार तो सिंदबाद की आंखों के आगे भी अंधेरा छा गया। 

सिंदबाद की तीसरी यात्रा की कहानी

ऐसा लग रहा था कि राक्षसों के कहर से कोई भी आदमी नहीं बच सकेगा। वे सब अल्लाह को याद करने लगे। सिंदबाद ने नए सिरे से अपनी हिम्मत बटोरी और अपने बेड़े को दूसरी दिशा में बढ़ाने लगा। 

सिंदबाद किसी तरह दो नाविकों के साथ वहां से निकलने में कामयाब हो गया। वे लोग एक हरे-भरे टापू पर पहुंचे। कुछ फल खाने के बाद वे थककर सो गए। अचानक सांप की फुफकार सुनकर सिंदबाद की आंख खुल गई। सांप ने उसके एक साथी को मार डाला था। दूसरे साथी के साथ सिंदबाद एक पेड़ पर जा बैठा। वे उसी पेड़ के फल खाकर पेट भरने लगे। 

रात को सांप पेड़ पर चढ़ गया और सिंदबाद के साथी को निगल गया। सिंदबाद ने किसी तरह अपनी जान बचा ली। 

अगले दिन सिंदबाद ने सरकंडों, घास और सूखी लकड़ी से अपने लिए एक तंबू-सा तैयार कर लिया। उस रात सिंदबाद उसमें सुरक्षित रहा। सांप चाहकर भी उसका नुकसान नहीं कर सका। सारी रात उसे अपने तंबू के बाहर सांप के फुफकारने की आवाज सुनाई देती रही। 

सांप किसी तरह तंबू में घुसकर सिंदबाद की जान लेना चाहता था। सिंदबाद ने देख लिया था कि वह एक जहरीला सांप है। अगर उसकी सांस भी उसे छू जाती, तो शायद वह न बच पाता। सुबह होने पर सांप थककर अपने बिल में वापस चला गया। 

सिंदबाद की तीसरी यात्रा की कहानी

तब सिंदबाद बड़ी सावधानी से समुद्र के किनारे पहुंचा। वहां उसने एक जहाज देखा। वह चिल्लाकर उन लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने लगा। उन्होंने उसके बचाव के लिए एक नाव भेज दी। सिंदबाद नाव में बैठकर जहाज तक पहुंच गया और उन्हें धन्यवाद दिया। 

जहाज के कप्तान ने उसे भोजन और कपड़े देते हुए कहा, “हमारा एक साथी पिछली यात्रा में मारा गया। हमारे पास उसका सामान रखा है।” सिंदबाद ने देखा कि वह तो उसका ही सामान था और उस पर उसका नाम लिखा था। जब उसने कप्तान को अपने बारे में बताया, तो वह सिंदबाद को पहचान गया और उसे जिंदा देखकर बहुत खुश हुआ। 

जहाज व्यापार करते हुए बलसारा की ओर चल दिया। बलसारा में सिंदबाद ने कप्तान से विदा ली और अपने घर चला गया। 

सिंदबाद की तीसरी यात्रा की कहानी

कहानी सुनाने के बाद सिंदबाद ने हिंदबाद को सौ दीनारें दी और अगले दिन उसे अपनी कहानी सुनाने के लिए फिर बुलाया। हिंदबाद को सिंदबाद का व्यवहार काफी अच्छा लगा। उसके बारे में सोचे गए विचार गलत साबित हुए। हिंदबाद ने अपनी पत्नी को भी सिंदबाद के बारे में बताया। 

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