सिंदबाद की छठी यात्रा की कहानी The Story of Sindbad’s Sixth Journey

सिंदबाद की छठी यात्रा की कहानी 

सिंदबाद की छठी यात्रा की कहानी  |The Story of Sindbad’s Sixth Journey

सिंदबाद ने कहा, “मेरे परिवार के सदस्यों और मित्रों ने विनती की कि मुझे खतरे से भरी यात्राएं करना छोड़ देना चाहिए। लेकिन एक साल बाद मेरा मन फिर से यात्रा करने के लिए मचलने लगा। इस बार मैं भारत चला गया, ताकि वहां के बंदरगाह से अपना सफर शुरू कर सकू।” 

सिंदबाद और उसके साथी बड़े आराम से भारत पहुंच गए। फिर उन्होंने वहां के एक बंदरगाह से जहाज लिया। तूफानी हवाओं के कारण उनका जहाज रास्ता भटक गया। उन्हें कोई अंदाजा नहीं था कि वे कहां जा रहे थे।

कप्तान को आभास हुआ कि शायद वे लोग समुद्र के सबसे खतरनाक हिस्से की ओर बढ़ रहे थे। लहरों का वेग उनके जहाज को उसी ओर खींचे ले जा रहा था। वे लोग एक पर्वत की ओर चले जा रहे थे। अचानक जहाज उस पर्वत से टकराकर चूर-चूर हो गया। उनका सारा सामान पानी में बिखर गया। वे समुद्र में तैरने लगे। लेकिन उन्हें इस बात की तसल्ली थी कि वे लोग सही-सलामत थे। तभी उन्हें अपने आसपास जहाजों के बहुत से टुकड़े और पूर्व में मरे हुए नाविकों की हड्डियां दिखाई दीं। ऐसा लगता था, जैसे उस स्थान से कभी कोई जिंदा वापस नहीं गया था। 

सिंदबाद की नजर तेज थी। इसी कारण उसने कई बार खतरनाक मामलों में भी सबका बचाव किया था। उसने देखा कि समुद्र के पास एक नदी बह रही है, लेकिन वह समुद्र की ओर नहीं जा रही है। वह जानता था कि सभी नदियां समुद्र में जाकर मिल जाती हैं। फिर उसके साथ ऐसा क्यों है?

वह नदी मेहराबदार चट्टानों के बीच से बहती जा रही थी। वह उस जगह पर पहुंचा। वहां हीरे, मोती, जवाहरात वगैरह नदी के किनारे बिखरे हुए थे। कप्तान के पास थोड़ा खाना था। उसने सबको खाना बांट दिया, लेकिन जल्द ही नाविक भूख से दम तोड़ने लगे। 

सिंदबाद की छठी यात्रा की कहानी 

कैसी अजीब बात थी। उनके चारों ओर हीरे, मोती और जवाहरात का ढेर लगा था, लेकिन वे उनके किसी काम के न थे। इन्सान को जब भूख-प्यास सताती है, तो उसे खाने के लिए भोजन ही चाहिए। इन चीजों से उसका पेट नहीं भरता। नाविकों ने कोई भी कोशिश किए बिना खुद को हालात के हवाले कर दिया था। उन्हें वहां से निकलने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था।

सिंदबाद ने सोचा, ‘मैं भी भूख-प्यास से मर जाऊंगा। लेकिन इस तरह मरने से बेहतर होगा कि नदी के दूसरी ओर जाने का उपाय किया जाए। शायद इस तरह जान बच सके।’ 

तत्पश्चात् सिंदबाद ने वहां पड़ी लकड़ियों की मदद से एक बेड़ा बनाया और उस पर बैठकर नदी में निकल पड़ा। उसने अपने साथ बहुत से हीरे, मोती, जवाहरात और बचा भोजन रख लिया था। उसे उम्मीद थी कि उसकी जान बच जाएगी। 

सिंदबाद की छठी यात्रा की कहानी 

बेड़ा लहरों के वेग के साथ आगे बढ़ रहा था। अंधेरा हो गया था और सिर्फ पानी बहने की आवाज सुनाई दे रही थी। कई बार तो रास्ता इतना तंग हो जाता था कि सिंदबाद को नीचे झुकना पड़ता था। वह कई दिनों तक इसी तरह नदी में चलता रहा। जब उसे भूख लगती, तो थोड़ा-सा खाना खा लेता और थकने पर सो जाता।।

वह नदी तो समुद्र से भी बड़ी निकली। उसने अपने जीवन में इतनी लंबी और संकरी नदी नहीं देखी थी। कई जगह तो दोनों ओर इतना घना जंगल आ जाता कि उसे डर लगने लगता। आसपास खड़े पेड़ों की टहनियां उसके बेड़े तक पहुंच जाती थीं। वह अपने साथियों से बहुत दूर निकल आया था। उसने दुआ की कि अल्लाह उनकी मदद के लिए किसी को भेज दे। 

एक दिन जब वह सोकर उठा, तो यह देखकर हैरान रह गया कि उसका बेड़ा नदी के किनारे बंधा था और बहुत से काले रंग वाले लोग उसे देख रहे थे। ऐसा लगता था कि वे उससे दोस्ती करना चाहते हैं, लेकिन उनकी बातें उसकी समझ में नहीं आ रही थीं। लेकिन जब सिंदबाद ने अरबी में कुछ शब्द कहे, तो उन्हें एक आदमी ने समझ लिया। 

सिंदबाद की छठी यात्रा की कहानी 

उसने बताया कि वे लोग सिंदबाद को पानी से बचाकर लाए थे। सिंदबाद ने उनसे थोड़ा खाना मांगा और बताया कि उसके साथ क्या हुआ था। उन्होंने सिंदबाद को एक घोड़े पर बिठाया और इंडीज में सेरेनदिब नगर के राजा के पास ले गए। उन्होंने उसका बेड़ा भी साथ ले लिया था। सिंदबाद को बहुत दिनों बाद भरपेट खाना मिला था, इसलिए उसे बहुत अच्छा लगा। 

सिंदबाद ने अपनी हिम्मत के बल पर अपनी जान बचा ली, वरना उस जगह पर उसका मरना तय था। वे लोग अपने इलाके में सिंदबाद को देखकर हैरान थे और उसके बारे में जानना चाहते थे। 

सिंदबाद ने कहा, “मैं सिंदबाद नाविक हूं।” 

वहां का राजा बहुत शिष्ट और मेहमान-नवाज था। वह सिंदबाद की पूरी कहानी सुनकर बहुत खुश हुआ। उसने उसके हाथों तैयार किया गया बेड़ा देखकर कहा कि उसकी कहानी को सोने-चांदी के अक्षरों में लिखकर राज्य के इतिहास के रूप में रखना चाहिए। 

सिंदबाद राजा का खजाना देखकर चौंक गया। उसने अपने पूरे जीवन में इतनी दौलत नहीं देखी थी। राजा ने उससे कहा कि जो भी दिल में आए, उसमें से उठा लो। सिंदबाद के मना करने पर राजा को अच्छा लगा। उसने उसे बहुत से उपहार दिए। 

सिंदबाद की छठी यात्रा की कहानी 

सिंदबाद के मन में लालच नहीं था। यदि वह चाहता, तो राजा के कहने पर उसके खजाने से बहुत-सा सोना-चांदी और हीरे-मोती ले सकता था, लेकिन उसे अपनी मेहनत की कमाई पर यकीन था। उसकी यही बात राजा को बहुत अच्छी लगी और वे उसे पसंद करने लगे। 

सिंदबाद को वह राज्य बहुत सुंदर लगा। दिन और रात एक समान थे। संसार के सबसे ऊंचे पहाड़ों के बीच सुंदर घाटियां थीं। वहां कीमती रत्न पाए जाते थे। उस राज्य में बहुत से दुर्लभ पौधे भी थे। समुद्र के किनारे मोती और घाटियों में हीरे बिखरे हुए थे। राजा शाही हाथी पर सवार होकर लोगों का सुख-दुख जानने के लिए निकलता था। 

सिंदबाद की छठी यात्रा की कहानी 

राजा ने बगदाद के खलीफा के लिए दोस्ती का संदेश और उपहार देकर सिंदबाद को अपने जहाज से वापस भेज दिया। उसने सिंदबाद को सोने, जवाहरात और सांप की खाल से बना एक ऐसा बर्तन भी दिया, जिसमें रखा शरबत किसी भी रोग को दूर कर सकता था। इसके अलावा उसे बहुत-सा कपूर, पिस्ते, मेवे और गुलाम भी दिए। 

इस बार सिंदबाद का पूरा जहाज राजा द्वारा दिए गए उपहारों से भर गया था। उसने सोचा भी नहीं था कि उसकी यात्रा का ऐसा अंत होगा। वापसी के समय उसे कुछ भी नहीं करना पड़ा। 

राजा ने जहाज को संभालने के लिए कुशल नाविक भी साथ भेजे थे। सिंदबाद बड़े आराम से अपने घर की ओर चल पड़ा। 

सिंदबाद बगदाद पहुंचा और खलीफा हारून अल-रशीद को सारे उपहार देकर पूरी कहानी सुनाई। खलीफा को उस राजा के बारे में सुनकर बहुत अच्छा लगा। उसे सिंदबाद के साहस पर बड़ा गर्व था कि वह कितने खतरे सहकर भी जीवित लौट आया। खलीफा ने सिंदबाद का सम्मान किया और उसे बहुत से उपहार दिए। 

सिंदबाद खुशी-खुशी घर लौटा। उसने परिवार के सदस्यों और मित्रों के साथ दावत की। सब लोग उसकी यात्राओं के किस्से सुनकर दंग रह गए। 

जब हिंदबाद यह कहानी सुनकर जाने लगा, तो सिंदबाद ने उसे पुनः सौ दीनारें इनाम में दीं। 

सिंदबाद की छठी यात्रा की कहानी 

हिंदबाद को सिंदबाद से बहुत स्नेह हो गया था। वह उसका सम्मान करने लगा था। हिंदबाद ने दीनारें लौटाते हुए कहा, “आपने मुझे अपने जीवन के जो अमूल्य अनुभव दिए हैं, वही मेरे भविष्य के लिए काफी हैं। आप ये दीनारें वापस ले लें।” 

“जब तुम मुझे अपना दोस्त मानते हो, तो इन्हें रख लो। दोस्त से मिले नजराने को अस्वीकार नहीं किया जाता।” यह कहकर सिंदबाद ने उसे गले से लगा लिया। हिंदबाद के गालों पर आंसू चमक रहे थे। 

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