सिंदबाद की चौथी यात्रा की कहानी | The story of Sindbad’s fourth journey

सिंदबाद की चौथी यात्रा की कहानी

सिंदबाद की चौथी यात्रा की कहानी | The story of Sindbad’s fourth journey

सिंदबाद ने अपने मेहमानों से कहा, “मुझे नई जगहों की सैर करना, नए-नए लोगों से मिलनऔर व्यापार करना बहुत अच्छा लगता था, इसलिए मैं जल्द ही फिर से सफर के लिए रवाना हो गया।” 

इस बार सिंदबाद ने तय किया कि वह फारस के बंदरगाह से जहाज लेगा। उसका सफर तो अच्छी तरह शुरू हुआ, लेकिन भारी तूफान के आगे किसी की एक न चली। जहाज टूट-फूट गया और ज्यादातर लोग मारे गए। सिंदबाद किसी तरह टूटे हुए जहाज के टुकड़ों को पकड़कर एक टापू के किनारे पहुंच गया। 

थोड़ी देर बाद सिंदबाद के कुछ साथी भी वहां पहुंच गए। वे लोग थकान के कारण सो गए। जब सुबह उठे, तो उन्हें कुछ झोंपड़ियां दिखाई दीं। तभी उन झोंपड़ियों से बहुत से काले लोग बाहर आए और उन्हें एक झोंपड़ी में ले गए। सिंदबाद और उसके साथियों के पास उनके साथ जाने के सिवा कोई उपाय नहीं था, क्योंकि उनके हाथों में हथियार थे। 

झोंपड़ी में काले लोगों ने उन्हें कुछ जड़ी-बूटियां दीं, जिन्हें सिंदबाद के साथी झट से खा गए। इसके बाद वे पागल होकर उल्टा-सीधा बोलने लगे। सिंदबाद सावधान था, इसलिए उसने जड़ी-बूटियां खाने के बजाय केवल दिखावा किया और उसे कुछ नहीं हुआ। 

सिंदबाद की चौथी यात्रा की कहानी

काले लोग उन्हें नारियल के तेल में पके चावल खिलाने लगे। सिंदबाद समझ गया कि उसे खाकर वे मोटे हो जाएंगे। उसके साथी पेट भरकर खाते रहे और मोटे हो गए। 

सिंदबाद ने केवल नाम के लिए खाया और पतला ही रहा। काले लोगों ने मोटे लोगों को मार डाला और उन्हें खा गए। 

सिंदबाद को इधर-उधर घूमने की आजादी दे दी गई। उस पर एक बूढ़े आदमी का पहरा था। एक दिन सिंदबाद उससे बचकर तट की ओर भागा। वह जानता था कि बूढ़ा उसका पीछा कर रहा है, लेकिन वह उसे आसानी से पीछे छोड़ सकता था। 

सिंदबाद ने घने जंगल की राह ली और बूढा वहीं भटकता रह गया। उस दिन काले लोग भी शिकार पर गए थे। घरों में औरतों और बच्चों के अलावा कोई नहीं था, इसलिए सिंदबाद आराम से तट तक पहुंच गया। तभी उसने देखा कि कुछ गोरे लोग काली मिर्च इकट्ठा कर रहे थे। उन्हें अरबी भाषा में बातें करता देखकर सिंदबाद बहुत खुश हुआ। उसने उन्हें अपने जहाज के टूटने और अपने साथियों की बुरी दशा के बारे में बताया। वे उसे जहाज पर बिठाकर अपने देश ले गए। 

गोरे लोग सिंदबाद को लेकर अपने राजा के पास पहुंचे। राजा बहुत दयालु और अतिथियों का सत्कार करने वाला था। उसने सिंदबाद की सारी कहानियां सुनीं। उसे अच्छा भोजन और कपड़े दिए। जल्द ही सिंदबाद संभल गया और शहर में घूमने के लिए चल दिया। 

उसने देखा कि वह अमीरों का शहर था। लोग घोड़ों की सवारी करते थे, लेकिन किसी लगाम या रकाब का इस्तेमाल नहीं करते थे। उसने एक कारीगर के पास जाकर नमूना बताया और राजा के लिए सोने की काठी और लगाम तैयार करवाया। 

सिंदबाद की चौथी यात्रा की कहानी

राजा इन उपहारों को पाकर बहुत खुश हुआ। उसने उनका इस्तेमाल करना सीख लिया। इस तरह उसे घुड़सवारी में काफी मजा आने लगा। 

राजा ने सिंदबाद से कहा कि वह उसके सभी अधिकारियों के लिए भी सारा सामान तैयार करवा दे। सिंदबाद को बहुत से उपहार मिले और वह भी अमीर आदमी बन गया। 

राजा सिंदबाद से बहुत प्रसन्न था और चाहता था कि सिंदबाद हमेशा वहीं रहे। उसने सिंदबाद से कहा कि राज्य की किसी सुंदरी से विवाह कर ले और यहीं बस जाए। सिंदबाद ने थोड़ी बहुत आनाकानी की, परंतु आखिरकार सिंदबाद को राजा की पसंद की लड़की से शादी करनी पड़ी। 

राजा ने शादी की बहुत शानदार दावत दी। सिंदबाद और उसकी पत्नी को रहने के लिए एक बहुत बड़ा घर भी दिया। सिंदबाद तथा उसकी पत्नी खुशी-खुशी उस घर में रहने लगे। 

एक दिन सिंदबाद के पड़ोसी की पत्नी मर गई। वह किसी भी तरह अपने पड़ोसी को दिलासा नहीं दे पा रहा था। तभी सिंदबाद को पता चला कि इस राज्य की प्रथा के अनुसार किसी की पत्नी या पति के मर जाने पर दूसरे जीवित प्राणी को उसके साथ ही दफना दिया जाता है। 

सिंदबाद ने देखा कि पड़ोसी की पत्नी को अच्छे कपड़ों और गहनों सहित दफनाया गया। उसके पड़ोसी को सात रोटियां और पानी से भरा मटका देकर उसी कब्र में दफना दिया गया। इसके बाद उस जगह को भारी पत्थर से ढक दिया गया। किसी ने भी उसके रोने-चिल्लाने की परवाह नहीं की। 

सिंदबाद की चौथी यात्रा की कहानी

सिंदबाद को पता चला कि यही रिवाज विदेशियों पर भी लागू होता था। यह सुनकर वह डर गया। उसने सोचा, ‘अगर मेरी पत्नी मर गई, तो ये लोग मुझे भी इसी तरह दफना देंगे।’ 

फिर कुछ दिनों बाद यही हुआ-उसकी पत्नी की मौत हो गई। सिंदबाद की एक नहीं सुनी गई। उसे भी एक गड्ढे में दफना दिया गया। वहां अंधेरा और सर्दी थी। बाहर निकलने का कोई उपाय नहीं था। उसने अपनी रोटी और पानी को धीरे-धीरे प्रयोग किया, लेकिन अंततः एक दिन सब खत्म हो ही गया। 

तभी उसने देखा कि एक बूढ़े की लाश के साथ उसकी पत्नी को भी दफनाया जा रहा था। वह एक बूढ़ी औरत थी, जो बुरी तरह बीमार थी। उसके साथ भी सात रोटियां और पानी रखा गया था, परंतु वह कुछ भी खा-पी नहीं सकती थी। 

सिंदबाद की चौथी यात्रा की कहानी

उसने सिंदबाद से विनती की कि वह उसे मार डाले। उससे अपना कष्ट नहीं सहा जा रहा है। सिंदबाद ने उसकी जान ले ली। इस तरह बूढ़ी औरत का खाना और पीने का पानी भी उसे मिल गया। 

इस प्रकार सिंदबाद कुछ दिन और जिंदा रहा। एक दिन उसे कहीं से आवाज सुनाई दी। आगे जाने पर दीवार में एक दरार-सी दिखी। वह उस संकरी-सी जगह में रेंगकर आगे बढ़ने लगा। वह जगह इतनी तंग थी कि उसके लिए उसमें से निकलना बहुत मुश्किल हो रहा था। 

सिंदबाद ने सोचा कि वह दरार उसे कहीं न कहीं बाहर की ओर ले जा सकती है। वह सारा दिन उसमें धीरे-धीरे रेंगता रहा। ऐसे में उसके कपड़े फट गए और हाथ-पैरों से खून रिसने लगा। लेकिन वह अपनी धुन का पक्का था, इसलिए उसने हिम्मत नहीं हारी। 

काफी दूर जाने के बाद सिंदबाद को थोड़ी रोशनी दिखाई दी। सुरंग का मुंह समुद्र की ओर खुलता था, जिसे देखकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सिंदबाद फिर से उसी जगह वापस गया और वहां दफनाए गए हीरे, जवाहरात आदि कीमती सामान निकाल लाया। जब वह बाहर आया, तो दूर से एक जहाज आता दिखाई दिया। उसने हाथ हिलाकर संकेत किया, तो जहाज के कप्तान ने उसे लाने के लिए नाव भेज दी।

 

सिंदबाद की चौथी यात्रा की कहानी

उस जहाज के नाविक बहुत दयालु थे। उन्होंने सिंदबाद की मदद के लिए उससे पैसा नहीं लिया। वे लोग व्यापार करते हुए घूमने लगे और आखिर में बलसारा बंदरगाह पहुंच गए। 

सिंदबाद को जिंदा देखकर वहां जश्न मनाया गया। वह फिर से अपने परिवार और दोस्तों के साथ चैन से जीने लगा। 

यह कहानी सुनकर हिंदबाद हैरान रह गया। वह तो सपने में भी नहीं सोच सकता था कि महलों में रहने और हर तरह का स्वादिष्ट भोजन करने वाले उस अमीर आदमी ने अपने जीवन में इतने कष्ट सहे होंगे। वाकई उसकी यह सोच गलत थी कि अमीरों को सब कुछ बैठे-बिठाए मिल जाता है। 

सिंदबाद ने हिंदबाद को सौ दीनारें दीं और अगले दिन उसे अपनी कहानी सुनाने के लिए फिर बुलाया। रहा। सिंदबाद फिर से उसी जगह वापस गया और वहां दफनाए गए हीरे, जवाहरात आदि कीमती सामान निकाल लाया। जब वह बाहर आया, तो दूर से एक जहाज आता दिखाई दिया। उसने हाथ हिलाकर संकेत किया, तो जहाज के कप्तान ने उसे लाने के लिए नाव भेज दी। 

उस जहाज के नाविक बहुत दयालु थे। उन्होंने सिंदबाद की मदद के लिए उससे पैसा नहीं लिया। वे लोग व्यापार करते हुए घूमने लगे और आखिर में बलसारा बंदरगाह पहुंच गए। 

सिंदबाद की चौथी यात्रा की कहानी

सिंदबाद को जिंदा देखकर वहां जश्न मनाया गया। वह फिर से अपने परिवार और दोस्तों के साथ चैन से जीने लगा। 

यह कहानी सुनकर हिंदबाद हैरान रह गया। वह तो सपने में भी नहीं सोच सकता था कि महलों में रहने और हर तरह का स्वादिष्ट भोजन करने वाले उस अमीर आदमी ने अपने जीवन में इतने कष्ट सहे होंगे। वाकई उसकी यह सोच गलत थी कि अमीरों को सब कुछ बैठे-बिठाए मिल जाता है। 

सिंदबाद ने हिंदबाद को सौ दीनारें दी और अगले दिन उसे अपनी कहानी सुनाने के लिए फिर बुलाया। 

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