भगवान शिव की कथा-कण्ठ में हलाहल 

भगवान शिव की कथा-कण्ठ में हलाहल 

बहुत समय पहले, एक दिन दुर्वासा ऋषि विष्णु भगवान से मिलकर वापस लौट रहे थे। वापस आते समय उनकी मुलाकात स्वर्ग के राजा, देवराज इन्द्र से हुई। इन्द्र भगवान अपने सफेद दिव्य हाथी ऐरावत पर सवार थे। दुर्वासा ऋषि ने अत्यन्त गर्मजोशी से इन्द्र का अभिवादन किया। 

अपनी श्रद्धा के प्रतीक के रूप में एक फूलों की माला इन्द्र को भेंट करते हुए दुर्वासा ऋषि ने कहा, “हे इन्द्र! तीनों लोकों के अमूल्य दुर्लभ फूलों से बना यह हार आपको समर्पित है।” मद में चूर इन्द्र भगवान ने वह हार ऐरावत के सूंड़ पर डाल दिया। हार की विशेषता से अंजान ऐरावत ने अगले ही पल उस हार को अपने पैरों तले रौंद डाला। 

दुर्वासा ऋषि अत्यन्त क्रोधित हो उठे। हिन्दू पौराणिक कथाओं में सदा से दुर्वासा ऋषि अपने क्रोधी स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। देवता हों या असुर कोई भी उनके क्रोध् से बच नहीं पाया था। क्रोध् में उन्होंने इन्द्र से कहा “इन्द्रदेव ऐसा अनादर अक्षम्य है। इस कृत्य की तुम्हें सजा अवश्य मिलेगी। शीघ्र ही तुम अपना राज-पाठ असुरों से हार जाओगे। वे सब कुछ नष्ट कर तुम्हें निकाल देंगे। सभी देवता त्राहि-त्राहि कर उठेंगे। चारों ओर अराजकता का राज्य होगा… यही मेरा श्राप है।” । 

दुर्वासा ऋषि अपने समय के अत्यन्त आदरणीय एवं ज्ञानवान ऋषि थे। तुरंत श्राप ने अपना रंग दिखाना प्रारम्भ किया। असुरों की विनाशलीला प्रारम्भ हो गई। इस दयनीय अवस्था को देखकर इन्द्रदेव ने दुर्वासा ऋषि से क्षमा माँगी और श्राप वापस लेने की प्रार्थना करने लगे किन्तु ऋषि ने नकार दिया। 

चारों ओर फैलती अराजकता तथा अपनी दिव्य शक्तियों को नष्ट होता देखकर देवता घबरा उठे। इन्द्रदेव को यह अनुभूति हुई कि यदि यह विनाश लीला रोकी नहीं गई तो संसार में अराजकता का ही राज्य होगा। शक्तिहीन देवता एक साथ विष्णु भगवान से सहायता माँगने गए और उनसे प्रार्थना करने लगे, “हे महाविष्णु! कृपया हमारी सहायता करें। दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण हमारी सारी शक्तियाँ खत्म हो गई हैं। असुर सदा ही हम पर हावी होना चाहते हैं। ऐसी अवस्था में यह उनके लिए अत्यन्त लाभकारी होगा। यदि हमने असुरों पर विजय प्राप्त नहीं की तो वे हमारा राज्य ले लेंगे।” 

देवताओं की दयनीय दशा पर विष्णु भगवान को दया आ गई। पालनहार होने के कारण वे देवताओं की सहायता के लिए तुरंत तैयार हो गए। विष्णु भगवान ने देवताओं से कहा, “इस उथल-पुथल के समय केवल अमृत पान ही आपको आपकी शक्तियाँ वापस दिला सकता है और संसार की रक्षा कर सकता है।” 

एक देवता ने पूछा, “हे विष्णु भगवान! यह अमृत हमें कहाँ से प्राप्त होगा?” 

विष्णु भगवान ने कहा, “जीवनदायक दिव्य अमृत समुद्र के तल में है। आपको क्षीर सागर मंथन करना होगा। मंदार पर्वत मथानी होगी और सर्पराज वासुकी रस्सी के रूप में होंगे। समुद्र मंथन के समय आपको बहुत सारी बहुमूल्य वस्तुएँ भी मिलेंगी। उनमें से एक अमृत भी होगा। दुर्वासा ऋषि के श्राप से मुक्त होने के लिए आपको वह अमृत पीना होगा तभी आप असुरों को हराकर संसार में पुनः शांति स्थापित कर सकेंगे। इसे पीने के बाद आप लोग अमर हो जाएंगे। किन्तु समुद्र मंथन का यह कार्य अकेले संभव नहीं है। आपको असुरों की सहायता लेनी होगी। अतः जाकर उनसे संधिकर, साथ मिलकर यह कार्य करें। बाद में उनके साथ अमृत भी बाँटें।” 

देवता असुरों के पास गये। उनसे समुद्र मंथन में सहायता माँगी। अमृत से होने वाले लाभ को जानकर असुर लोभ में आकर समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए। 

भगवान शिव की कथा-कण्ठ में हलाहल 

शीघ्र ही देवताओं और असुरों ने मंदार पर्वत को वासुकी से बांधा। असुरों ने वासुकी को मुख की ओर से पकड़ा और देवताओं ने पूँछ की ओर से। तत्पश्चात् देवता और असुर वासुकी को आगे-पीछे खींचने लगे। फलतः पर्वत घूमने लगा और क्षीर सागर का मंथन प्रारम्भ हो गया। समुद्र तल में छिपी अमूल्य निधियाँ एक-एक कर बाहर निकलने लगीं। सर्वप्रथम एक गाढ़ा, चिपचिपा झाग जैसा पदार्थ, हलाहल, वासुकी के मुँह से निकला। वह धीरे-धीरे पृथ्वी पर फैलने लगा। उसके ताप से देव और असुर दोनों ही भाग खड़े हुए। देव और असुर कोई भी उस हलाहल को लेने के लिए तैयार नहीं था। वह हलाहल इतना जहरीला था कि पूरा क्षीर सागर ही जहरीला बन जाता और पूरी सृष्टि नष्ट हो जाती। देवता अत्यंत चिंतित हो उठे। सभी देवता मिलकर शिव भगवान के पास सहायतार्थ गए। शिव भगवान ने उन्हें सांत्वना दी और हलाहल लेकर निगलने लगे। शिव भगवान को हलाहल पीते देख पार्वती देवी दौड़ी आई और उन्होंने शिव जी का गला पकड़ लिया। जिससे हलाहल गले से नीचे न उतरे। 

गले में ही हलाहल को रोक देने के कारण महादेव का कंठ नीला पड़ गया। इसलिए शिव भगवान तभी से नीलकंठ कहलाने लगे जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘नीले कंठ वाला’। 

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