गुलिवर की यात्रा की कहानी |The Story of Gulliver’s Journey

गुलिवर की यात्रा की कहानी

गुलिवर की यात्रा की कहानी |The Story of Gulliver’s Journey

 इंग्लैंड में लेम्युअल गुलिवर नामक एक साहसी व्यक्ति रहता था। वह पानी के जहाज पर सवार होकर पूरी दुनिया के आश्चर्यजनक नजारे देखने के लिए हमेशा उत्सुक और तत्पर रहता था। 

गुलिवर सोचता था, ‘वे दिन कब आएंगे, जब मैं अपना जीवन लंबी यात्राओं और अनजान जगहों पर बिता सकूँगा।’ जब वह सागर की लहरों पर चमकती किरणों और नाचती डालफिनों को देखता, तो गुलिवर को यकीन हो जाता कि वे लहरें उसे संसार का सबसे सुखी इन्सान बना सकती हैं। फिर एक दिन वह डॉक्टर बनकर जहाज पर सवार हो गया। 

रात्रिकाल समुद्र में भारी तूफान आने से जहाज तहस-नहस हो गया। गुलिवर को निराशा ने घेर लिया। वह सोचने लगा, ‘क्या मेरा जीवन यूं ही बरबाद हो जाएगा।’ गुलिवर के अलावा बाकी सभी मुसाफिर पानी में डूब गए थे। वह एक अच्छा तैराक था। किनारे तक जाने के लिए उसे कई मील तैरना पड़ा। 

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वह बहुत थक गया था, अतः किनारे पहुंचकर सो गया। गुलिवर सारा दिन सोता रहा। जब उसकी आंख खुली, तो सूरज चमक रहा था। गुलिवर सोचने लगा कि क्या वह स्वर्ग में आ गया है। जब उसने उठना चाहा, तो उससे नहीं उठा गया। बहुत से बौने उसके शरीर पर चढ़े हुए थे।

पहले तो गुलिवर की समझ में कुछ नहीं आया। उसने अपने जीवन में कभी इतने बौने लोग नहीं देखे थे। वे बहुत छोटे थे। उसने सोचा कि कहीं वह किसी दूसरी दुनिया में तो नहीं आ गया। बौने छोटे होने के बावजूद उसे काबू में करने की पूरी कोशिश कर रहे थे। 

शायद वे गुलिवर को बंदी बनाना चाहते थे। उनकी कोशिश देखकर उसे मन-ही-मन में बहुत हंसी आई। उसे कई कहानियों में वर्णित राक्षसों की याद आ गई। उसने सोचा कि वे लोग उसे वैसा ही कोई राक्षस समझ रहे होंगे, क्योंकि वह उनके डील-डौल से सैंकड़ों गुना बड़ा था।

गुलिवर ने पूछा, “तुम लोग कौन हो? मुझे जाने दो।” उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और गुलिवर उन्हें हटाने में असफल रहा। उसके हाथ-पैर धरती से बंधे थे। सभी बौने उसके शरीर पर दौड़ रहे थे। उन बौनों का नेता गुलिवर के अंगूठे से भी छोटा था। वह आगे आकर बोला, “तुम लिलीपुट में हो, 

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हम लिलीपुट के वासी हैं। हम तुम्हें अपने राजा के पास ले जा रहे हैं। अगर तुम हमें परेशान करोगे, तो हम तुम्हारी जान ले लेंगे।” उसकी धमकी सुनकर गुलिवर को हंसी आ गई, लेकिन उसने चुपचाप हामी भर ली।

फिर पहियों वाला लकड़ी का एक बड़ा-सा ढांचा लाया गया। उन्होंने किसी तरह गुलिवर को उस पर धकेल दिया। जब वह लिलीपुट पहुंचा, तो उसने देखा कि बहुत से बौने धक्का-मुक्की करते हुए उसकी एक झलक पाने की कोशिश कर रहे थे। वह उनकी बातें सुन सकता था। वे लोग उसी के बारे में चर्चा कर रहे थे। एक बौना बोला, “देखो, ये कितना बड़ा है। इसकी छोटी उंगली भी मेरी लंबाई से अधिक है।”

दूसरे बौने ने गुलिवर की ओर देखते हुए कहा, “इसके समान बड़ा होने के लिए हमें बहुत भोजन करना होगा?”

तीसरा बौना व्यंग्य करते हुए बोला, “इतना बड़ा होने के लिए हमें कई सेनाओं का भोजन खाना पड़ेगा।” 

फिर वे बौने हंसने लगे। चारों ओर उत्सव का माहौल था। गुलिवर के साथ-साथ वे लोग भी आनंद उठा रहे थे। इसके बाद वे सब राजा के दरबार में गए। उस समय राजा दरबार में नहीं था, लेकिन बिगुल बजते ही वह वहां पहुंच गया।

 राजा ने कहा, “दैत्य जी, नमस्कार! मैं लिलीपुट का राजा हूं।” 

गुलिवर बोला, “महाराज, नमस्कार! मैं गुलिवर हूं। माफ करें, मैं आपको प्रणाम नहीं कर पा रहा हूं। इन लोगों ने मुझे बांध दिया है।”

 “अगर तुम यहां रहना चाहते हो, तो मेरी प्रजा की सेवा करनी पड़ेगी।” राजा ने भीड़ की ओर संकेत करते हुए कहा।

 “मैं तैयार हूं, महाराज! लेकिन आपको मुझे इस बंधन से आजाद करना होगा।” गुलिवर तत्परतापूर्वक बोला। 

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“तुम मुझे दिखने में बुरे नहीं लगते।” राजा ने कहा। फिर उसने सिपाहियों को आदेश दिया, “इस जिंदा पहाड़ को आजाद कर दो।” 

यह सुनकर गुलिवर को बहुत अच्छा लगा कि राजा ने उसे आजाद करने का हुक्म सुना दिया है। उसने मन-ही-मन में राजा को धन्यवाद दिया। 

लिलीपुट के नागरिक उसे एक मंदिर के खंडहर में ले गए। यही एक जगह थी, जहां गुलिवर रह सकता था। उसी दिन से गुलिवर और बौने लोगों के बीच काफी गहरी दोस्ती हो गई। उन्होंने गुलिवर को भोजन और पानी दिया तथा उसके कपड़े सिलने के लिए माप लिया। जब गुलिवर के नए कपड़े सिलकर आए, तो यह पूरे राज्य के लिए जश्न का दिन बन गया। सभी बौने सड़क पर जमा हो गए। उन्होंने अपने हाथों से गुलिवर की पोशाक तैयार की थी। उनके पास इतना बड़ा कपड़ा नहीं था, इसलिए कपड़ों के कई टुकड़े जोड़कर वह पोशाक बनाई गई थी। गुलिवर उनका अनूठा प्यार देखकर भावुक हो उठा। 

एक दिन राजा के महल में अचानक आग लग गई। 

“बचाओ-बचाओ! महल में आग लग गई है। रानी महल में हैं, बचाओ!” चारों ओर भारी चीख-पुकार मची थी। लोग महल की ओर दौड़ रहे थे। यह आवाजें सुनकर गुलिवर रानी की मदद करने के लिए भागा।

शीघ्र ही गुलिवर महल में पहुंच गया। रानी के कक्ष में भीषण आग लगी थी। उसने आग बुझाकर रानी को तलाश किया। रानी भय के कारण बेहोश हो गई थी। गुलिवर ने रानी को उठाकर अपनी जेब में रख लिया और वहां से बाहर आ गया। थोड़ी ही देर बाद रानी को होश आ गया। सभी बौनों ने गुलिवर को धन्यवाद दिया। लिलीपुट का राजा गुलिवर का एहसानमंद हो गया। तभी अचानक तोप चलने की आवाज सुनाई दी। पड़ोसी देश ब्लूयूस ने अपने जहाज से लिलीपुट देश पर हमला कर दिया था। राजा ने अपने देश के नागरिकों का हौसला बढ़ाते हुए कहा, “लिलीपुट के वासियो! साहस रखो। हम सब मिलकर अपनी मातृभूमि की रक्षा करेंगे।” लेकिन वहां के लोग डर के मारे इधर-उधर भागने लगे।

ऐसी स्थिति में गुलिवर ने एक योजना बनाई। वह सीधे समुद्र में गया और दुश्मनों के जहाज उठाकर पलटने लगा। वह सारा दिन यही करता रहा। दुश्मन देश के काफी सैनिक मारे गए और बाकी डरकर भाग गए। यह सब देखकर बौने बहुत खुश हुए। अब गुलिवर उन सबका हीरो बन गया था। 

राजा ने कहा, “मैं तुमसे बहुत खुश हूं। तुम जो जी चाहे, मांग लो।” 

गुलिवर ने कुछ पल सोचने के बाद कहा, “महाराज, आप मेरे लिए एक बड़ा-सा जहाज बनवा दें, जिस पर सवार होकर मैं अपने देश जा सकूँ।” 

लिलीपुट का राजा गुलिवर के कार्यों और व्यवहार से बहुत प्रसन्न था। वह उससे स्नेह करने लगा था। ऐसे में राजा यह नहीं चाहता था कि गुलिवर 

लिलीपुट से अपने देश वापस जाए। फिर भी उसने अपने मन को काबू में रखकर गुलिवर की यह मांग पूरी कर दी। 

 गुलिवर को भी राजा से प्यार हो गया था, लेकिन अभी उसकी यात्रा अधूरी थी। उसे तो पूरी दुनिया देखनी थी। 

फिर विदाई का समय आ गया। गुलिवर, लिलीपुट के राजा द्वारा बनवाए गए जहाज पर सवार होकर आगे चल दिया। 

“अलविदा गुलिवर, हम तुम्हें कभी नहीं भूलेंगे।” सब लोगों ने कहा।

“अलविदा! आप सबको शुभकामनाएं। लिलीपुट अमर रहे।” गुलिवर ने जवाब दिया। गुलिवर जानता था कि वह भी लिलीपुट के वासियों को कभी नहीं भुला सकेगा। फिर वास्तव में वह लिलीपुट के बौनों को कभी नहीं भूल पाया। वह इस बारे में अपने मित्रों और सगे-संबंधियों से चर्चा करता रहा। लेकिन अन्य स्थानों की यात्रा में उसे ऐसा अनूठा अनुभव नहीं हुआ था। अन्य स्थानों की यात्राएं तो केवल रोमांचक थीं। 

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