भारतीय लोकतंत्र में नौकरशाही की भूमिका |The Role of Bureaucracy in Indian Democracy

भारतीय लोकतंत्र में नौकरशाही की भूमिका

भारतीय लोकतंत्र में नौकरशाही की भूमिका (The Role of Bureaucracy in Indian Democracy) 

राजनीतिक व्यवस्थाएँ अपनी ‘इच्छा’ को व्यावहारिक रूप देने के लिए राज्य के अधिकारियों और कर्मचारियों के विस्तृत समूह पर निर्भर करती है, जिसे सम्मिलित रूप से ‘नौकरशाही’ (Bureaucracy) कहा जाता है. जॉन पिफनर और आर. वी. प्रेस्थुस (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, 1961) के अनुसार, “नौकरशाही व्यक्ति और कार्यों का ऐसा व्यवस्थित संगठन है जिसके द्वारा सामूहिक प्रयत्न रूपी उद्देश्य को प्रभावशाली ढंग से प्राप्त किया जा सकता है.” लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में नौकरशाही का महत्त्व या भूमिका इस कारण और बढ़ जाती है क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व (Political Leadership) में आए दिन बदलाव आता रहता है. इसके अतिरिक्त पूर्वकाल के ‘पुलिस-राज्य’ (Police state) के स्थान पर ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) की अवधारणा के उदय, इसके परिणामस्वरूप सरकार की गतिविधियों और दायित्वों में अप्रत्याशित वृद्धि तथा सरकार के कार्यों की तकनीकी प्रवृत्ति ने नौकरशाही को राजनीतिक व्यवस्थाओं, विशेष रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का अपरिहार्य अंग बना दिया है. भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में नौकरशाही का महत्त्व बढ़ने का एक अन्य कारण यह भी है कि यहाँ राजनीतिक नेतृत्व प्रायः प्रशासन के तकनीकी चरित्र से अनभिज्ञ रहा है, जिसके चलते अनायास ही नौकरशाही पर उसकी निर्भरता बढ़ती गई है. समकालीन भारतीय राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में नीति निर्माण (Policy Making) तथा नीति-क्रियान्वयन (Policy-implementation) के मध्य की विभाजन रेखा बहुत स्पष्ट नहीं रह गई है, क्योंकि वस्तुस्थिति यह है कि आज भारत में नीति निर्माण में भी नौकरशाही की भूमिका पर्याप्त बढ़ गई. इसके चलते ही भारत जैसे विकासशील समाज में परिवर्तन तथा आधुनिकीकरण के एक संयंत्र के रूप में नौकरशाही की भूमिका पर बहस हो रही है. अब सामान्यतः यह माना जा रहा है कि एक नौकरशाह नीतियों का क्रियान्वयनकर्ता ही नहीं है वरन् वह सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया का प्रबन्धक भी है.

भारत में नौकरशाही : ब्रिटिश विरासत 

प्रो. श्यामल कुमार रे (Indian Bureaucracy At Crossroads, 1979) का मत है कि भारत को ब्रिटिश जनों से विरासत में प्राप्त समस्त राजनीतिक और प्रशासकीय संस्थाओं में कदाचित नौकरशाही ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण और जीवन्त रही है. ब्रिटिश जनों से उत्तराधिकार में प्राप्त नौकरशाही की व्यवस्था को यथावत् जारी रखने के भारतीय नेतृत्व के निर्णय को प्रायः आशंका की दृष्टि से देखा जाता रहा है, क्योंकि ब्रिटिश जनों ने इसका गठन अपने विशिष्ट साम्राज्यवादी हितों की दृष्टि से किया था, परन्तु इसी के समानान्तर यह भी स्मरण रखा जाना चाहिए कि स्वतंत्रता और इसके परिणामस्वरूप विभाजन से जन्मी स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में वरिष्ठ नौकरशाहों के अनुभव, निरपेक्षता (Objectivity) तथा कर्मठता की राष्ट्र को अति आवश्यकता थी. आशंका का एक कारण यह भी था कि औपनिवेशिक काल के नौकरशाहों का प्रशासकीय दृष्टिकोण अति संकुचित था और न्यूनाधिक रूप से वे जनमानस से विलग (Aloof) रहा करते थे. स्वतंत्र भारत में यह अनिवार्यता थी कि वे अपने दृष्टिकोण में वांछित बदलाव लाते. इन सबके बावजूद ब्रिटिश काल में नौकरशाही के कर्मठ निष्पादन (Efficient Performance) को देखते हुए पं. नेहरू और सरदार पटेल ने नौकरशाही के उसी तंत्र को बनाए रखने का निर्णय किया.

 ब्रिटिश जनों के प्रशासनिक तन्त्र को यथावत् बरकरार रखने के निर्णय के कारण भारत को औपनिवेशिक नौकरशाही की संरचनात्मक (Structural), समाजशास्त्रीय (Sociological) और प्रकार्यात्मक (Functional) विशेषताएँ विरासत में प्राप्त हुई हैं. नौकरशाही के संरचनात्मक पक्ष, यथा-भर्ती की पद्धति, प्रशिक्षण व्यवस्था, सेवा-शर्ते तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण धरातल पर अखिल भारतीय सेवाओं (All-India Services) को मामूली परिवर्तनों के साथ यथावत् बनाए रखा गया है. समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी नौकरशाही का अभिजनवर्गीय चरित्र (Elitist Character) यथावत् बना हुआ है. आज भी भारतीय नौकरशाही में उच्च जाति मध्यम वर्ग (Upper Caste-Middle) का वर्चस्व यथावत् बरकरार है. सामान्यतया नौकरशाह नगरीय, धनाढ्य और सुशिक्षित पारिवारिक पृष्ठभूमि के हैं. न्यूनाधिक रूप से इनके माता पिता समाज के उच्च तबके से सम्बन्धित हैं और विधि, अभियांत्रिकी चिकित्सा और विश्वविद्यालय शिक्षण जैसे व्यवसायों से जुड़े हैं. भारतीय प्रशासकीय सेवा के प्रशिक्षुओं (Probationers) के एक सर्वेक्षण से यह स्पष्ट हुआ है कि इसमें आने वाले अभ्यर्थियों में से अधिकांश समानता, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, आर्थिक नियोजन तथा आरक्षण जैसी बातों में विश्वास नहीं रखते. यह भी देखा गया है कि इनमें से प्रायः सभी व्यवसायी वर्ग से अच्छे सम्बन्ध रखने के पक्षधर थे. अनेक अवकाश प्राप्त नौकरशाह बड़े व्यावसायिक घरानों में उच्च पदों पर नियुक्त होते देखे गए हैं. इस पृष्ठभूमि में कदाचित नौकरशाहों के लिए ‘तटस्थ’ (Neutral) रह पाना कठिन ही प्रतीत होता है. अनेक समालोचकों का यह मानना है कि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के प्रति भारतीय नौकरशाही की भूमिका न्यूनाधिक रूप से नकारात्मक रही है. यह सत्य है कि हालिया वर्षों में भारतीय नौकरशाही में आरक्षण के चलते अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों का भी प्रवेश हो रहा है, परन्तु स्थिति में इससे कोई गुणात्मक परिवर्तन न तो आया दीखता है और न ही आने की कोई सम्भावना दिखती है. इसके कई कारण हैं—सर्वप्रथम तो यह कि दलित जातियों की अपेक्षाकृत समुन्नत (आर्थिक दृष्टि से) परिवारों के सदस्य ही नौकरशाही में प्रविष्ट हो पाते हैं. दूसरी बात यह है कि इन जातियों के लोग अपनी जातिगत प्रस्थिति के कारण एक अन्तर्निहित हीनभावना (Inferiority Complex) से ग्रस्त होते हैं और नौकरशाही में सम्मिलित होते समय प्रायः इनमें यह भावना होती है कि उच्च पद प्राप्त करके एक ओर तो ये अपनी जातिगत परिस्थिति से मुक्त हो सकते हैं और दूसरी ओर ये सहज ही सभी सुविधाएं प्राप्त कर सकते हैं. नौकरशाही का भाग बनने के बाद ये अपने पद और सुविधाओं का उच्च जातियों के सदस्यों की तुलना में कहीं अधिक दुरुपयोग करते देखे गए हैं. यही नहीं वे उच्च जातियों के सदस्यों की तुलना में कहीं अधिक दंभी (Snobbish) हो जाते हैं, जो शायद उनके अभावग्रस्त और सम्पीडित बचपन और युवावस्था का परिणाम होता है. यही नहीं प्रायः यह भी देखा गया है कि ये आम जनमानस, यहाँ तक कि अपने ही तबके से भी, अपना सम्बन्ध पूर्णतः तोड़ लेते हैं, उनके हित में कार्य करना भी वह अपना दायित्व नहीं समझते. 

भारतीय नौकरशाही के समक्ष चुनौतियाँ 

स्वतंत्र भारत में लोक प्रशासन के लिए कहीं अधिक उपयुक्त शब्द विकास प्रशासन (Development Administration) है, क्योंकि अब प्रशासन के केन्द्र में ‘भारत के लोग’ (People of India) हैं. इन्हीं के कल्याण के निमित्त नौकरशाही का जटिल संयंत्र कार्य करता है. इस परिवर्तन के चलते भारत में नौकरशाही के समक्ष तीन मुख्य चुनौतियाँ पैदा  हुई हैं-

(1) नौकरशाही को समतावादी समाज (Socialistic Pattern of Society) के निर्माण की दिशा में कार्य होता है, परन्तु एक लोकतांत्रिक राज्यव्यवस्था (Democratic Polity) की परिधि में ही रहकर यह कार्य किया जा सकता है. भारतीय संविधान आधुनिकीकरण, सामाजिक-आर्थिक न्याय की स्थापना और राजनीतिक सहभागिता को अभीष्ट मानता है और इन प्रक्रियाओं में नौकरशाही से जीवन्त भूमिका निर्वाह करने का आग्रह करता है. भारत में समतावादी समाज की स्थापना का आशय है—अस्पृश्यता का उन्मूलन, भूमि-सुधार, प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमिकीकरण, प्रौढ़ साक्षरता, समाज के कमजोर तबकों के जान-माल की रक्षा, सबके लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता तथा जनसामान्य की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति आदि. यथार्थ में इसका आशय हुआ उत्तराधिकार में प्राप्त पारम्परिक सामाजिक संरचना, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का समग्र परावर्तन (Transformation) और जनमानस को वितरणात्मक न्याय (Distributive Justice) की उपलब्धता. ऐसी स्थिति में भारत में नौकरशाही को विधि और व्यवस्था स्थापन का परम्परागत कार्य ही नहीं करना होता वरन् उससे जीवन के सभी क्षेत्रों में नेतृत्वकारी भूमिका के निर्वाह की अपेक्षा की जाती है. 

(2) भारत में नौकरशाही के समक्ष दूसरी प्रमुख चुनौती यह है कि अब प्रशासन एक विशेषज्ञ (Specialist) का कार्य बन गया है. इसके चलते भारत के कुछ राज्यों में सामान्य प्रशासक और विशेषज्ञों के मध्य संघर्ष भी देखने को मिलता रहा है. सरकार का मोटे तौर पर यह मानना है कि विशेषज्ञों को भी नौकरशाही में पर्याप्त स्थान दिया जाना चाहिए. सम्भवतः इसी कारण अखिल भारतीय और प्रान्तीय सिविल सेवाओं में अभियांत्रिकी और चिकित्सा विज्ञान जैसे विषयों को भी ऐच्छिक विषयों के रूप में सम्मिलित कर दिया गया है. 

(3) नौकरशाही के समक्ष तीसरी और कदाचित् सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यह है कि इसे शक्ति का जनप्रतिनिधियों के साथ बँटवारा करना होता है, तमाम प्रशासकीय शक्तियाँ नौकरशाही के हाथों में केन्द्रित होते हुए भी, भारत जैसे लोकतांत्रिक राज्य में इसे राजनीतिक सत्ता के साथ सामंजस्य बैठाना होता है.

नीतियों के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका 

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में नौकरशाही नीतियों के क्रियान्वयन के साथ-साथ नीतियों के निर्धारण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है. इसका कारण यह है कि सामान्यतया मंत्रिगण विभागीय मामलों में नौसिखिए होते हैं. मंत्रियों को अपने विभागों से सम्बन्धित मामलों में दक्षता प्राप्त करने का कम ही अवसर मिल पाता है. इसके कई कारण हैं—सर्वप्रथम तो यह कि उनके विभागों में आए दिन परिवर्तन होता रहता है; दूसरे, अधिकांश समय वे अपने निर्वाचन क्षेत्रों, राजनीति से सम्बन्धित कार्यों तथा संसदीय कार्यों में व्यस्त रहते हैं, तथा तीसरे, यदि कोई सदस्य किसी विभाग विशेष के कार्यों में दक्ष भी होता है तो जरूरी नहीं कि उसे उसी विभाग का मंत्री बनाया जाए. इन कारकों के चलते प्रायः मंत्रिगण नौसिखिए होते हैं. ऐसी स्थिति में उनके पास नौकरशाहों के परामर्श से निर्देशित होने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं होता. अतः स्वाभाविक है कि नीतियों के क्रियान्वयन के समानान्तर ही नीतियों के निर्धारण में नौकरशाह केन्द्रीय भूमिका का निर्वाह करते हैं. हाँ यह सत्य है कि यदि मंत्री बुद्धिमान, कर्मठ और जानकार है तो नीतियों के निर्धारण में उसकी व्यक्तिगत छाप भी होगी, परन्तु यदि मंत्री अनुभवहीन है तो निश्चित ही नौकरशाही की भूमिका बढ़ जाती है.

भारत में नौकरशाही : सुधार की रूपरेखा 

प्रायः समीक्षक भारतीय और पाश्चात्य दोनों ही यह तर्क देते हैं कि भारतीय लोकतांत्रिक समाजवादी व्यवस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति तभी सम्भव है कि जब नौकरशाही के पाश्चात्य मॉडल की पूर्णतया तिलांजलि देकर भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप विशिष्ट नौकरशाही की स्थापना की जाए, बात सही हो सकती है, पर कठिनाई यह है कि किसी भी समीक्षक ने विशिष्ट भारतीय मॉडल का प्रारूप प्रस्तुत नहीं किया है. नौकरशाही के विशिष्ट स्वदेशी मॉडल एशिया में केवल चीन और जापान में ही प्राप्त होते है. इन मॉडलों की जड़ें इन दोनों राष्ट्रों को विशिष्ट सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में हैं. इस प्रकार कमोबेश रूप से ये पाश्चात्य प्रभाव से अप्रभावित रही हैं. अतएव भारतीय नौकरशाही में सुधार के लिए रणनीति व्यवस्था में ताबड़तोड़ बदलाव अथवा व्यवस्था के त्वरित परिवर्तन न होकर इसमें धैर्यपूर्वक क्रमिक बदलाव की होनी चाहिए. परिवर्तन इस प्रकार से लाए जाएँ, जिनका विशिष्ट भारतीय मनोवृत्ति और मूल्यों से तारतम्य हो. इसमें सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं से निपटने में व्यवस्था की क्षमता बढ़ सकेगी. 

नौकरशाही में सुधार के लिए कुछ प्राथमिकताएँ निर्धारित की जानी चाहिए, यथा सर्वप्रथम, प्रगति में अवरोधक पुरानी परम्परागत मान्यताओं और आदतों को नकार दिया जाना चाहिए. इस प्रकार की कुछ आदत और मान्यताएँ हैं—संगठन के सोपानवद्ध पद्धति के प्रति अप्रत्याशित रुझान; विधि द्वारा स्थापित संस्थाओं की प्रशासकीय स्वायत्तता की समाप्ति की प्रवृत्ति सरकारी नौकरियों में अत्यधिक सुरक्षा का तत्त्व, जिससे यह भावना विकसित हो गई है कि अच्छे कार्य का कोई पुरस्कार नहीं मिलता और खराब कार्य का कोई खास दण्ड नहीं मिलता, सेवा समय पर आधारित प्रोन्नति; न्यायिक नियमों की ओर अत्यधिक रुझान; नित्य प्रति की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार से अपेक्षा करना और यह विश्वास की विधि और क्रियान्वयन एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं. 

दूसरी बात यह है कि नौकरशाहों में कतिपय मूल्यों को विकसित किए जाने की आवश्यकता है. यह एक सामान्य अवधारणा है कि भारत में प्रशासन की अपेक्षाकृत असफलता का एक मुख्य कारण नौकरशाहों में समाजवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप मूल्यों का अभाव है. आज वे जिन मूल्यों को लेकर प्रशासनिक दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं, वे कमोबेश रूप से वही मूल्य हैं जिन्हें उपनिवेशवादी शासन द्वारा भारत में प्रसारित किया गया. आज नौकरशाहों के पास जनमानस के हितों, मूल्यों और संस्थाओं के प्रति संवेदनशीलता नहीं के बराबर है. वह राष्ट्र के हितों की तुलना में अपने हितों की चिन्ता अधिक करते हैं, यही स्थिति ब्रिटिश समय में थी. हाल के वर्षों में हुए अनेक अध्ययनों का लगभग यही निष्कर्ष निकला है. प्रायः इसे घृणापूर्वक इस प्रकार कहा जाता है कि नौकरशाहों का उद्देश्य बन गया है ‘भड़कीले दफ्तर, वातानुकूलन सुविधाएँ, परिवहन की स्वतंत्र सुविधाएँ, शक्ति और सत्ता’ न कि जनमानस की सेवा. आज यदि समय-समय पर प्रशासन को अपने निर्णय की वैधता प्रमाणित करनी पड़ती है तो इसका एकमात्र कारण यही है कि निर्णय लेने वालों, कार्यान्वित करने वालों तथा जिनके लिए निर्णय लिया गया या कार्यान्वित किया जा रहा है, उनके मध्य कोई सेतु नहीं है. प्रशासन कोई स्व-नियंत्रित या स्व-नियमित व्यवस्था नहीं है बल्कि यह विशिष्ट सामाजिक हितों की प्राप्ति का एकमात्र साधन है. अतः यह वांछनीय है कि यह समाज के वृहत हितों और आयाम से जुड़ा रहे. यह जोड़ या तारतम्य जितना मजबूत होगा, उतना ही प्रशासनिक व्यवस्था सुघड़ और राज्य स्थायी होगा. 

तीसरी बात यह है कि प्रशासकों में उचित दृष्टिकोण के विकास किए जाने की समस्या है. अभी तक कमोबेश रूप में ऊपर से नीचे तक नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों, दोनों में ही, जनता की सेवा करने के स्थान पर, कृपा करने की मनोवृत्ति परिलक्षित होती है. प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर यह दृष्टिकोण सुस्पष्ट है. इससे जनमानस में यह दृष्टिकोण घर कर गया है कि कोई भी प्रशासनिक कार्य जान-पहचान अथवा रिश्वत देकर ही कराया जा सकता है. इसका परिणाम बहु-आयामीय भ्रष्टाचार के रूप में निकला है. प्रशासन में इस प्रकार के दृष्टिकोण को समाप्त किया जाना चाहिए. यह एक चुनौतीपूर्ण समस्या है, जिसे किसी जादुई चिराग से दूर नहीं किया जा सकता. वैसे भी पुरानी आदतों और दृष्टिकोण में बड़ी कठिनता से परिवर्तन होते हैं. शुरूआत प्रशासकों की नई पीढ़ी से की जानी चाहिए. साथ ही निष्पादन (परफार्मेन्स) एक निश्चत सीमा के बाद असन्तोषजनक पाए जाने पर अनिवार्यतः सेवानिवृत्त कर दिया जाना चाहिए. 

सुधार की नीति में उपर्युक्त प्राथमिकताओं को तभी व्यावहारिक रूप दिया जा सकता है, जब राजनीतिक इच्छा शक्ति उपलब्ध हो. राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाहों की दृढ़ इच्छा शक्ति से वर्तमान स्थिति में प्रशासन को दीमक की तरह चाट रहे दलालों से भी मुक्ति दिलवाई जा सकती है. जब तक राजनीति और प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर विचार और उद्देश्यों की पूर्ण एकता नहीं रहेगी तब तक हम राष्ट्र के समक्ष विद्यमान समस्याओं का समाधान नहीं कर सकेंगे.

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

eleven + ten =