सर्वसिद्धिप्रद कुंभ 

सर्वसिद्धिप्रद कुंभ 

सर्वसिद्धिप्रद कुंभ 

3 दिसंबर, 2017 को दक्षिण कोरिया के जेजू (Jeju) में यूनेस्को (UNESCO) के अधीनस्थ संगठन ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए गठित अंतर्सरकारी समिति’ (Inter governmental Committee for the Safeguarding of the Intangible Cultural Heritage) की 12वीं बैठक संपन्न हुई। इस बैठक में भारत में आयोजित होने वाले कुंभ मेले को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची’ (Representa tive List of Intangible Cultural Heritage of Humanity) # शामिल किया गया है। योग के बाद कुंभ भारत की दूसरी सांस्कृतिक विरासत है जिसे इस सूची में शामिल किया गया। योग को दिसंबर, 2016 में पारसी नववर्ष ‘नवरोज’ के साथ मानवता की अद्भूत सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया था। 

कुंभ एक धार्मिक आयोजन है जो भारत में चार स्थानों- प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में आयोजित किया जाता है। कुंभ के संबंध में यूनेस्को का मत है कि उपर्युक्त चारों स्थान पर लगने वाला कुंभ मेला धार्मिक उत्सव के तौर पर सहिष्णुता और समग्रता को दर्शाता है। 

कुंभ एक धार्मिक आयोजन है जो भारत में चार स्थानो प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में आयोजित किया जाता है। कुंभ के संबंध में यूनेस्को का मत है कि उपर्युक्त चारों स्थान पर लगने वाला कुंभ मेला धार्मिक उत्सव के तौर पर सहिष्णुता और समग्रता को दर्शाता है। यह विशेषतौर पर समकालीन विश्व के लिए अनमोल है। कुंभ विश्व का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आयोजन है। कुंभ मेला, 2019 का आयोजन प्रयागराज में हुआ। यह आयोजन 15 जनवरी से 4 मार्च, 2019 के मध्य संपन्न हआ। गौरतलब है कि प्रयागराज (इलाहाबाद) में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदी के संगम तट पर लगने वाले कुंभ मेले का अपना विशेष महत्त्व है। 

दिसंबर, 2017 में उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग ने 2019 में प्रयागराज के संगम तट पर आयोजित होने वाले कुंभ (अर्ध कुंभ, जिसे कुंभ नाम दिया गया है) मेला को विशिष्ट बनाने के लिए एक ‘टैगलाइन’ तय कर दी, जिसे ‘सर्वसिद्धिप्रद कुंभ’ नाम दिया गया है। अर्थात् कुंभ सभी तरह की सिद्धियां प्रदान करता है। इसके अलावा विभाग ने प्रयागराज (प्रयाग) में आयोजित होने वाले कुंभ के नाम में बदलाव करते हुए अर्धकुंभ को अब सिर्फ कुंभ और कुंभ को महाकुंभ का नाम दिए जाने का निर्णय लिया। विदित है कि 22 दिसंबर, 2017 को उत्तर प्रदेश की 17वीं विधानसभा के पहले शीतकालीन सत्र में ‘उत्तर प्रदेश मेला प्राधिकरण, इलाहाबाद विधेयक, 2017’ पारित हुआ, जिसमें कुंभ और अर्धकुंभ का नाम परिवर्तित करके क्रमशः कुंभ और महाकुंभ कर दिया गया है। कुंभ को अमृत महोत्सव भी कहा जाता है। इस संदर्भ में हिंदी के प्रसिद्ध कवि एवं निबंधकार हजारी प्रसाद द्विवेदी की कविता ‘अमृत महोत्सव कुंभ’ का उल्लेख किया जा सकता है 

संतों लगा कुंभ का मेला

एक हिलोर इधर से आई

एक हिलोर उधर से आई

फंसा भंवर बिच चेला

संतों लगा कुंभ का मेला।

सब सखियां मिल सोहर गावै

जन्मा राम गदेला

संतों लगा कुंभ का मेला।

जय-जयकार भई त्रिभवन में

साहेब खड़ा अकेला 

संतों लगा कुंभ का मेला

कुंभ से संदर्भित उल्लास, आह्लाद, आस्था और अटूट विश्वास को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की उक्त काव्य धारा से समझा जा सकता है। श्रीराम के जन्मोत्सव जैसा आह्लाद कुंभ से संदर्भित है। यह महापर्व जीवंत और उत्सवधर्मी भारतीय संस्कृति एवं सनातम धर्म की चेतना का अमृत महोत्सव है। समागम और समानता की भारतीय संस्कृति का वाहक यह पर्व अनूठा है। 

आसुरी सत्ता के प्रबल पक्षधर असुरों ने सोचा कि यदि इस अमृत कलश पर उनका कब्जा हो जाए तो वे अमरत्व प्राप्त करेंगे और इनकी सत्ता अक्षुण्ण रहेगी। देव संस्कृति के संवाहक देवगण यह कतई नहीं चाहते थे। 

कुंभ का अपना अलग धार्मिक, पौराणिक व सांस्कृतिक महत्व है। इसका सामाजिक और राजनीतिक महत्त्व भी कम नहीं है। यह हमें एक-दूसरे से जोड़ने का पर्व है, जिसके केन्द्र में है आस्था और विश्वास। यह जल के महत्त्व और उसकी वैज्ञानिकता से भी जुड़ा है। यह उत्तम कोटि का एक खगोलीय योग है। ग्रहों और नक्षत्रों के विशिष्ट योग से कुंभ का प्रादुर्भाव होता है। इस विशेष योग में स्नान, दान-पुण्य और साधना का अपना अलग ही महत्त्व है। तभी तो शास्त्रों में कहा गया है 

सहस्र कार्तिके स्नानं माघे शतानि च 

वैशाखे नर्मदा कोटि कुंभ स्नाने तत्फलम्।

अर्थात् एक हजार कार्तिक स्नान, एक सौ माघ स्नान तथा नर्मदा में एक करोड़ वैशाख स्नान के समान एक कुंभ का स्नान फल देता है। 

कुंभ का पौराणिक संदर्भ समुद्र मंथन से जुड़ा है। विरोधी विचारधारा और मानसिकता के दो समुदाय जब मिलकर मंथन करते हैं, तो परिणाम को लेकर हिंसा व अराजकता भी अपना प्रभाव दिखाती है। कुछ ऐसा ही देवों और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के समय भी हुआ था। समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत घट को लेकर अराजकता की स्थिति पैदा हो गई। 

आसुरी सत्ता के प्रबल पक्षधर असुरों ने सोचा कि यदि इस अमृत कलश पर उनका कब्जा हो जाए तो वे अमरत्व प्राप्त करेंगे और इनकी सत्ता अक्षुण्ण रहेगी। देव संस्कृति के संवाहक देवगण यह कतई नहीं चाहते थे। अतएव अमृत कलश पर अधिपत्य को लेकर संघर्ष शुरू हो गया। देवों के राजा इंद्र ने अमृत कलश को बचाने के लिए अपने पुत्र जयंत को संकेत किया। वह अमृत कलश को लेकर भागा। इस बीच उसने हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में अमृत घट को रखा, जहां अमृत की कुछ बूंदें छलकीं। वे स्थान अमृतमय हो गए और कुंभ के रूप में अमृत महोत्सव की शुरुआत हुई। परंपरागत रूप से इन स्थानों पर कुंभ का आयोजन होने लगा, जिसे कालांतर में शंकराचार्य ने व्यवस्थित स्वरूप दिया। कुंभ दैवीय अमृत के पात्र का प्रतीक है। इस तरह से देखा जाय तो यह अमृत को प्राप्त करने का विराट समागम है। 

निःसंदेह कुंभ एक ऐसा महाआयोजन है, जिसकी विराटता अप्रतिम है। धर्म, आध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान, भाषा, विचार व अंतरप्रांतीय संस्कृतियों व संस्कारों का समागम कुंभ में होता है। सिर्फ भारत से ही नहीं, विदेशों से भी काफी संख्या में लोग आकर इस विराट आयोजन के साक्षी बनते हैं और यहां आकर आध्यात्मिक चेतना को विकसित करते हैं।

यह एक अद्भुत आयोजन है। न कोई चिट्ठी न कोई संदेश, न ही आमंत्रण, फिर भी इतनी भीड़ कि जिसे जन सैलाब कहा जा सकता है। भीड़ भी वर्ग विहीन होती है यानी समता का भी यह अनुपम पर्व है। भारत के सिवा किसी अन्य देश में ऐसा महा आयोजन और विराट समागम देखने को नहीं मिलता।। 

कुंभ का आयोजन जिन चार स्थानों पर होता है, वे सभी नदियो के तट पर स्थित हैं। हरिद्वार में गंगा का किनारा, प्रयाग में गंगा यमुना और अंतः सलिला सरस्वती का पावन संगम क्षेत्र, उज्जैन में क्षिप्रा का तट तो नासिक में गोदावरी के घाट इस महापर्व के साक्षा बनते हैं। जल व जीवन का अटूट रिश्ता है। नदियां जीवन रखाए । होती हैं। इनमें अमृत रूपी तत्व निहित होते हैं। इस तरह हम कह  सकते हैं कि यह जीवन से जुड़ा महापर्व है। 

निःसंदेह कुंभ एक ऐसा महा आयोजन है, जिसकी विराटता अप्रतिम है। धर्म, आध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान, भाषा, विचार व अंतरप्रांतीय संस्कतियों व संस्कारों का समागम कंभ में होता है। सिर्फ भारत से ही नहीं, विदेशों से भी काफी संख्या में लोग आकर इस विराट आयोजन के साक्षी बनते हैं और यहां आकर आध्यात्मिक चेतना को विकसित करते हैं। वस्तुतः जिस अमृत की परिकल्पना अमरत्व के लिए की गई है, वह हमारी चेतना से संबंधित है। चेतना के लिए मन-प्राण और बुद्धि का समन्वय जरूरी होता है। यह संतुलित समन्वय ही अमृत तुल्य होता है। आशय यह कि कुंभ में हिस्सा लेकर हम मन प्राण और बुद्धि का संतुलित समन्वय स्थापित कर अमृत रूपी चेतना को प्राप्त करते हैं। यह चेतना हमें साधना और संयम से मिलती है, जिसका सर्वोत्तम समय कंभ काल ही होता है। 

प्राचीनकाल में धर्म, दर्शन और राजनीति से जडे विद्वानों के बड़े-बड़े सम्मेलन इस अवसर पर हुआ करते थे। शास्त्रार्थ की भी परंपरा थी। कमोबेश यह परंपरा आज भी कायम है। सम्मेलनों में धर्म, दर्शन, ज्योतिष, आयुर्वेद (चिकित्सा), साहित्य, संस्कृति और कला पर आज भी गंभीर मंथन होता है और इस मंथन के परिणामस्वरूप जो कुछ समाने आता है, वह आत्मसात करने योग्य अमृत ही तो होता है। 

कुंभ पर्व सिर्फ धर्म-कर्म, पूजा-पाठ और साधना तक ही सीमित नहीं है, बल्कि शस्त्र-शास्त्र और विद्वता से भी इसका संबंध है। इस अवसर पर ज्ञान-विज्ञान से जुड़े बड़े-बड़े आयोजन भी परंपरागत ढंग से आयोजित होते हैं। प्राचीनकाल में धर्म, दर्शन और राजनीति से जुड़े विद्वानों के बड़े-बड़े सम्मेलन इस अवसर पर हुआ करते थे। शास्त्रार्थ की भी परंपरा थी। कमोबेश यह परंपरा आज भी कायम है। सम्मेलनों में धर्म, दर्शन, ज्योतिष, आयुर्वेद (चिकित्सा), साहित्य, संस्कृति और कला पर आज भी गंभीर मंथन होता है और इस मंथन के परिणामस्वरूप जो कुछ समाने आता है, वह आत्मसात करने योग्य अमृत ही तो होता है। इतना ही नहीं, कालखंड से जुड़ी विसंगतियों, विडंबनाओं और समस्याओं पर भी इस अवसर पर गंभीर चिंतन-मनन होता है, जिससे एक दिशा समाज और देश को मिलती है। इस तरह से देखा जाए तो इन अवसरों पर होने वाला विद्वत समागम देश, समाज और राजनीति को दिशा बोध कराने का काम करता है। सत समाज से जुड़ी अनूठी परपराए भी कुभ में देखने को मिलती हैं। शास्त्र के साथ-साथ शस्त्र की भी परंपरा इस अवस पर देखने को मिलती है, जिसके मूल में धर्म रक्षा का भाव निहित है, क्योंकि “धर्मो रक्षति रक्षितः यतो धर्मस्ततो जयः” अर्थात् धर्म की रक्षा में ही हमारी रक्षा है। 

कुंभ को व्यवस्थित स्वरूप देने के साथ-साथ, आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने सनातम धर्म की रक्षा के लिए नागा संतों का संगठन भी तैयार किया था। उन्होंने अखंड भारत के चारों ओर धर्म राजधानियां भी बनाईं थीं, जिन्हें चार पीठ कहा जाता है। इनसे उन्होंने नागा संतो को जोड़ा था। इन्हें शस्र चलाने आदि की दीक्षा और नागा संत की मान्यता कुंभ पर ही दी जाती है। इस अनूठी परंपरा के निर्वहन का कुंभ विशेष काल होता है। निश्चित ही, यह धर्म-संस्कृति की विभिन्न धाराओं के मिलन का भी महापर्व है। 

सच तो यह है कि आस्था का अवरिल प्रवाह ही कुंभ है। विदेशी हमेशा यह जानने को उत्सक रहे हैं कि आखिर कुभ क अवसर पर अपार जन सागर कैसे गंगा के तट पर उमड़ आता ह। इस अद्भुत समागम को रूढ़िवादिता या अंधविश्वास से नहीं जोड़ा जा सकता। जो ऐसा करते हैं, वे शायद भ्रम में जी रहे हैं और हमारी संस्कृति की विराटता एवं गहराई से परिचित नहीं हैं। 

कुंभ कहीं भी आयोजित हो, एक लघु भारत वहां बसता है। विविधता में एकता का दृश्य वहां उपस्थित होता है। सदियों पुराना यह मेला हमें संदेश देता है, साम्य का, सहिष्णुता का। इतना ही नहीं, हमें अपनी परंपराओं, मूल्यों, संस्कृति व धर्म और दर्शन की पूंजी को अक्षुण्ण बनाए रखने का संदेश भी यहां मिलता है। 

यह पर्व गुरुओं की महत्ता से भी जुड़ा है। गुरु के प्रति आस्था और विश्वास में कभी कमी नहीं आती और उदंड व्यक्ति भी गुरुओं । की अनदेखी, उपेक्षा या अवहेलना नहीं करता है। कुंभ के अवसर पर धर्मगुरु एकत्र होते हैं। वे अपने शिष्यों व अनुयायियों को देश की | संस्कृति, मूल्यों व परंपराओं की रक्षा के लिए प्रेरित करते हैं। धर्म | संस्कृति और सभ्यता की भावी दशा-दिशा तय की जाती है। ये बातें | ही भारत को एकता के सूत्र में पिरोने का काम करती हैं। 

इसमें कोई दो राय नहीं है कि कुंभ के जरिए भारतीय | संस्कृति को विश्वव्यापी विस्तार भी मिला है। कुंभ के माध्यम से | न सिर्फ सारी दुनिया भारतीय संस्कृति से परिचित हुई है, बल्कि 

इसकी विशिष्टता और विराटता से अभिभूत भी हुई। कुंभ पर हमेशा विश्व की नजर रही है। मीडिया और संचार के माध्यमों से इसे इतना प्रचार मिला है कि असंख्य विदेशी पर्यटक यहां खिंचे चले आते हैं। उन्हें इस महापर्व में सम्मिलित होने की प्रतीक्षा रहती 

धीरे-धीरे कुंभ के स्वरूप में भी परिवर्तन हुआ है। अब यह सिर्फ धर्म और आस्था का कुंभ नहीं रहा, बल्कि इसके समानान्तर मीडिया और ग्लैमर का भी कुंभ होने लगा है। व्यवसाय और वाणिज्यिक गतिविधियां भी इसमें शामिल हुई हैं तथा भौतिकता की चमक-दमक भी बढ़ी है। कुंभ इस नए दौर में इंटरनेट से जुड़ गया है। वेबसाइट बन गई है। एक क्लिक के साथ तमाम सूचनाएं और जानकारियां कंप्यूटर स्क्रीन पर आ जाती हैं। साधु-संतों के टेंटों तक में इनका प्रयोग हो रहा है। धर्म के साथ अर्थ भी जुड़ गया है। आज के दौर को देखते हुए इस परिवर्तन से अचरज जैसा कोई बात नहीं है। आज का समय अर्थ प्रधान है। अर्थ होगा तभी धर्म-कर्म भी संभव | है। फिर कुंभ भी तो अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष का मार्ग ही प्रशस्त | करता है। सूचना एवं संचार के माध्यमों से मजबूती के साथ हुए कुंभ के जुड़ाव का हमें लाभ भी मिल रहा है। हमारी संस्कृति विश्व फलक पर अपनी अमिट छाप छोड़ रही है, तो संचार के माध्यम इसमें  अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। 

कुंभ पर आधुनिकता का प्रभाव भले बढ़ा है, मगर यह – आधुनिकता कहीं से भी आस्था के अविरल प्रवाह में बाधक नहीं बनी है। आधुनिक तकनीकों और सूचना तंत्र ने तो आस्थावानों के रास्ते को और सुगम बनाया है। इस सुगमता का ही नतीजा है कि सिर्फ भारत से ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों से लोग आकर कुंभ के निहितार्थ को सार्थक बनाते हैं। कुंभ के दौरान हमारी संस्कृति को नये आयाम मिलते हैं। निःसंदेह एकता, साम्य और चेतना का महाबोध करवाने वाला यह पर्व अतुलनीय है, अनुपम है, अप्रतिम है, अद्भुत है। 

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