Upsc ka Essay in hindi | बंदूक संस्कृति पर निबंध | बंदूक संस्कृति के दुष्परिणाम

बंदूक संस्कृति पर निबंध

बंदूक संस्कृति का बढ़ता वर्चस्व|Upsc ka Essay in hindi | बंदूक संस्कृति पर निबंध |बंदूक संस्कृति के दुष्परिणाम

अमेरिका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान सहित दुनिया के अनेक देशों में बंदूक संस्कृति का वर्चस्व बढ़ने से अशांति और हिंसा बढ़ी है। बंदूक संस्कृति को प्रोत्साहन देने वाले कुछ देश तो आतंकवाद से प्रभावित हैं, किंतु यह अत्यंत विरोधाभासी स्थिति है कि आतंकवाद का सिर कुचलने का दावा करने वाला अमेरिका अपने देश के भीतर बढ़ रही बंदूक की संस्कृति के प्रति गंभीर नहीं है। अमेरिका में बंदूक की संस्कृति का बढ़ता वर्चस्व आज वैश्विक चर्चा का विषय बन चुका ही इस बंदक की संस्कृति को हवा देने वाले आतंकवादी नहीं हैं, बल्कि ये अमेरिकी नागरिक ही हैं, जिन्हें हथियार खरीदने और रखने की आसान सुविधा अमेरिका के हुक्मरान ने दे रखी है। इस देश में मान लॉबी’ अत्यंत सशक्त हो चुकी है और इस गन लॉबी के वर्चस्व को तोड़ने की जरा-सी भी इच्छा-शक्ति इस देश के नीति-निर्माताओं और राजनीतिज्ञों में नहीं दिख रही है, जो कि गंभीर चिंता का विषय 

“बंदूक की संस्कृति को हवा देने वाले आतंकवादी नहीं हैं, बल्कि ये अमेरिकी नागरिक ही हैं, जिन्हें हथियार खरीदने और रखने की आसान सुविधा अमेरिका के हुक्मरान ने दे रखी है।” 

अमेरिका में रह-रहकर बंदूकें गरज उठती हैं और निरीह एवं निर्दोष मारे जाते हैं। कुछ घटनाएं देखिए। 5 जनवरी, 2019 को अमेरिका में गोलीबारी की एक और घटना सामने आई। अमेरिका के लॉस एंजिल्स के पास एक खेल परिसर में हुई गोलीबारी में तीन लोगों की मौत हुई जबकि चार घायल हुए। इसके पूर्व नवंबर, 2018 में अमेरिका के कैलिफोर्निया के एक कॉलेज में एक बंदूकधारी द्वारा अंधाधुंध फायरिंग हुई जिसमें एक पुलिस अधिकारी सहित 13 लोगों की मौत हो गई। अमेरिका के नेवादा प्रांत के लॉस वेगास शहर में 1 अक्टूबर, 2017 की रात चल रहे म्यूजिक कांसर्ट पर 64 वर्षीय स्टीफन पैडॉक नामक एक सिरफिरे बंदूकधारी ने आयोजन स्थल के पास स्थित मांडले बे (Mandalay Bay) होटल की 32वीं मंजिल से अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें 5 500 से भी अधिक घायल हुए। पुलिस की गिरफ्त में आने से पहले इस हत्यारे ने स्वयं को भी खत्म कर लिया। धीरे-धीरे अमेरिका में गोलीबारी की ऐसी घटनाएं आम हो चली हैं। इससे पहले भी जून, 2016 में अमेरिका के ओरलैंडों के नाइट क्लब में हुई गोलीबारी में 49 लोग मारे गए थे। फरवरी, 2018 में फ्लोरिडा के कोलंबीन हाई स्कूल और सैंडी हुक एलीमेंट्री स्कूल में हुई गोलीबारी की घटनाओं में 14 छात्रों सहित 17 लोगों की जानें गईं। इस तरह की अनेक घटनाएं वहां पहले हो चुकी हैं। यानी वहां बंदूक की हुकूमत चल रही है। यह हुकूमत आतंकवादियों ने नहीं कायम कर रखी है, क्योंकि स्वयं अमेरिका की खुफिया एजेंसियों और वहां की पुलिस का मानना है कि ऐसी घटनाओं का आतंकवाद से कोई संबंध नहीं है। हो भी कैसे, इसे तो अमेरिका के बाशिंदे ही अंजाम दे रहे हैं और जो गोलीबारी करने से पहले ‘जेहादी’ नारे नहीं लगाते हैं। 

अब जरा कुछ आंकड़ों पर गौर करिए। तीन साल पहले के एक आंकड़े के अनुसार, अमेरिका में पुलिस और नागरिकों के पास हथियारों की संख्या 37 करोड़ थी, जबकि उस समय वहां की कुल आबादी 32 करोड़ थी। एक दूसरा आंकड़ा यह है कि वर्ष 2014 में अमेरिका में हत्या के कुल दर्ज लगभग सवा चौदह हजार मामलों में से 68% में बंदूकों का इस्तेमाल किया गया था। एक तथ्य यह भी है कि अमेरिका का नेशनल राइफल एसोसिएशन वहां ‘कॉमन सेंस गन कंट्रोल लॉ’ को लागू करने का विरोध करता है। 

स्थिति यह है कि अमेरिका में बच्चे तक बंदूक की बढ़ती संस्कृति से दुष्प्रभावित हो रहे हैं। खुद सरकार की तरफ से कराए गए एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आ चुका है कि अमेरिका में 17 वर्ष से कम के लगभग 1300 बच्चे सालाना बंदूक से घायल होते हैं। 

“बंदूक संस्कृति के साथ-साथ अमेरिका में असंतोष का बढ़ना भी आग में घी का काम कर रहा है। इस असंतोष की जड़ में है वहां के समाज में बढ़ रही नस्लीय भावना, श्वेत-अश्वेत का भेदभाव तथा कट्टर ईसाइयत।” 

अमेरिका में बंदूक की यह संस्कृति अकारण नहीं बढ़ी है। इसकी वजह वहां के लचर हथियार कानून हैं। इन लचर कानूनों की वजह से यहां हथियार और गोलियां आसानी से प्राप्त की जा सकती है। अमेरिका में किसी दुकान पर जाकर ठीक उसी प्रकार बंदकें खरीदी जा सकती हैं, जिस प्रकार भारत में हम बिस्कुट-ब्रेड खरीदते हैं। बस इसके लिए उसके पास कोई अधिकृत पहचान पत्र होना चाहिए। वहां हथियार के खरीदारों का कोई न्यायिक रिकॉर्ड भी नहीं रखा जाता। स्वाभाविक है कि ऐसी व्यवस्था में गन लॉबी तो मजबूत होगी ही। 

अमेरिका में एक तरफ तो बंदूक की संस्कृति बढ़ रही है, तो इस संस्कृति को भयावह बनाने वाली स्थितियां भी वहां विद्यमान हैं। बंदूक संस्कृति के साथ-साथ अमेरिका में असंतोष का बढ़ना भी आग में घी का काम कर रहा है। इस असंतोष की जड़ में है वहां के समाज में बढ़ रही नस्लीय भावना, श्वेत-अश्वेत का भेदभाव तथा कट्टर ईसाइयत। समस्या के परिप्रेक्ष्य में इन सभी को जोड़कर देखा जा सकता है। अमेरिका में जहां श्वेत-अश्वेत के बीच तनातनी बढ़ी है, 

वहीं नौकरियों पर काबिज हो रहे अप्रवासियों के कारण भी श्वेतों को यह लगने लगा है कि अप्रवासी उनकी नौकरियां छीन रहे हैं। स्थानीय और अस्थानीय का भी झगड़ा बढ़ा है। मूल अमेरिकी को यह भी लगने लगा है कि उसकी संस्कृति पर हमला कर उसे क्षतिग्रस्त किया जा रहा है। सारतः यह कहा जा सकता है कि विविध कारणों से अमेरिकियों में कुंठाएं बढ़ी हैं और वे अप्रवासियों को खौफजदा करना चाहते हैं। ऐसे में गन लॉबी की असंवेदनशीलता का सामने आना स्वाभाविक है। 

“बंदूक रखने के गैरजरूरी शौक एवं पनपी कुंठाओं का ही यह मिश्रित परिणाम है कि अमेरिका में असंवेदी हिंसा का बोलबाला बढ़ता जा रहा है और निर्दोष इसमें मारे जा रहे हैं।” 

बंदूक रखने के गैरजरूरी शौक एवं पनपी कुंठाओं का ही यह मिश्रित परिणाम है कि अमेरिका में असंवेदी हिंसा का बोलबाला बढ़ता जा रहा है और निर्दोष इसमें मारे जा रहे हैं। अमेरिका में पिछले नौ-दस वर्षों में नस्ल के बहाने या किसी अन्य कुंठा जनित कारण से गोलीबारी की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जिनसे वहां की आंतरिक सुरक्षा जर्जर हो रही है। इन सबके बावजूद इस असंवेदी हिंसा को नियंत्रित करने के लिए न तो वहां नीतिगत उपायों पर विचार किया जा रहा है और न ही गन लॉबी की धार कुंद करने के ही उपाय होते दिख रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे को लेकर गहरा सन्नाटा पसरा है। जरूरत इस सन्नाटे को तोड़ने की है। यदि यह सन्नाटा जल्द न टूटा तो वैश्विक आतंकवाद के फन को कुचलने का दावा करने वाला अमेरिका घरेलू मोर्चे पर हिंसा के नियंत्रण के मामले में फिसड्डी साबित हो सकता है। यह एक अच्छा संकेत है कि फरवरी, 2018 में फ्लोरिडा के दो स्कूलों में हुई गोलीबारी की घटना के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बंदूक से होने वाली हिंसा को रोकने के लिए संकल्प लिया है तथा इसका स्थायी हल तलाश करने की बात कही है। ट्रंप ने कहा कि अब बंदूक रखने वाले लोगों की पृष्ठभूमि की जांच की जाएगी तथा उनके मानसिक स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। यह भी कहा कि बंदूकधारियों की हिंसा को रोकने के लिए शिक्षकों को हथियार चलाने का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। वे कक्षाओं में हथियार लॉक कर सुरक्षित रख सकेंगे और जरूरत पड़ने पर गोलीबारी की घटनाओं को रोकने के लिए इनका इस्तेमाल कर सकेंगे। ट्रंप का यह संकल्प अमेरिका में बढ़ रही गोलीबारी की घटनाओं को किस हद तक रोक सकेगा, यह भविष्य के गर्भ में है। 

अमेरिका में बंदूक की बढ़ती संस्कृति के साथ वहां बढ़ रही नस्लीय भावना, श्वेत-अश्वेत का भेदभाव एवं कट्टर ईसाइयत की भावना ने त्रासद स्थिति पैदा कर दी है। यह स्थिति कोढ़ में खाज जैसी है। इससे जहां वहां घरेलू हिंसा बढ़ी है, वहीं अप्रवासियों-अश्वेतों का विश्वास भी वहां की कानून व्यवस्था से उठ रहा है। यदि इस पीड़ित पक्ष की तरफ से भी ऐसी ही कोई प्रतिक्रिया होती है, तो स्थिति अत्यंत विस्फोटक हो सकती है। इस संभावना को ध्यान में रखते हुए अमेरिका की ‘गन लॉबी’ पर अंकुश लगाना आवश्यक हो गया है। यह निर्दोषों की सुरक्षा एवं घरेलू शांति दोनों के लिए आवश्यक है। इससे दुनिया की अगुवाई कर रहे इस देश की वैश्विक छवि भी विश्व मंच पर साफ-सुथरी बनी रहेगी। 

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