आतंकवाद की समस्या और समाधान पर निबंध | Terrorism problem and solution in India

आतंकवाद की समस्या और समाधान पर निबंध

आतंकवाद की समस्या और समाधान पर निबंध अथवा आतंकवाद : क्या कर सकता है भारत अथवा भारत में आतंकवाद की समस्या एवं समाधान (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2008) अथवा आतंकवाद : एक जटिल समस्या (यूपी लोअर सबऑर्डिनेट मुख्य परीक्षा, 2008) अथवा बढ़ता हुआ आतंकवाद (यूपी लोअर सबऑर्डिनेट मुख्य परीक्षा, 2006) अथवा भारत के संदर्भ में आतंकवाद का मकाबला करने में मानवीय आसूचना एवं तकनीकी आसूचना दोनों ही निर्णायक हैं (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2011) 

फरवरी, 2019 में हुए पुलवामा आतंकवादी हमले तथा अप्रैल, 2019 में हुए श्रीलंकाई विस्फोट के बाद आतंकवाद को लेकर चर्चा फिर से जोरों पर है। भारत के संदर्भ में बात करें तो भारत ने कई वैश्विक मंचों मसलन जी-20 शिखर सम्मेलन, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन तथा संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया ह। इन्हीं गतिविधियों का प्रताप है कि अप्रैल, 2019 में संयुक्त राष्ट्र ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित कर दिया। ध्यातव्य है कि भारत निरंतर आतंकवाद की समस्या से जझ रहा है। सच तो यह है कि विश्व में फैले विभिन्न आतंकवादी संगठनों के निशाने पर भारत है। वस्तुतः आतंकवाद हमारे समय की सर्वाधिक अवांछित, किंतु सर्वाधिक व्याप्त परिघटना है। आतंकवाद का अर्थ है, हिंसा की धमकी अथवा हिंसा के कार्य अथवा भय पैदा कर अपनी मांगें मनवाना। यानी यह वह अवधारणा है, जिसका उद्देश्य लोगों के मस्तिष्क में डर-भय एवं आतंक पैदा करके अपने लक्ष्यों को प्राप्त करना होता है। लैटिन भाषा का शब्द टेरेरे (Terrere) से बना टेरर (Terror) का अर्थ आतंक या भय है। शुरुआती दौर में टेरर या टेररिज्म (आतंकवाद) के अर्थ में भिन्नता थी। इसे परिभाषित करना काफी कठिन था। क्योंकि भय और आतंक के सहारे किसी समूह द्वारा लक्ष्य प्राप्त कर लेने के बाद उसे स्वतंत्रता सेनानी मान लिया जाता था। ठीक इसके विपरीत असफलता की स्थिति में उसे आतंकवादी माना जाता था। फिर भी सामान्य रूप से राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की गयी नियमित हिंसा ही आतंकवाद है। बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा दी गयी परिभाषा काफी तर्कसंगत तथा अंतर्राष्ट्रीय रूप से स्वीकृत है। इस्रायल के पूर्व प्रधानमंत्री के अनुसार राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भय पैदा करने हेतु जानबूझकर क्रमबद्ध रूप से निर्दोषों को धमकी देना, उनका अंग-भंग कर देना या उनकी हत्या कर देना आतंकवाद कहलाता है। इस परिभाषा को 1978 में येरूशलम में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में मान्यता प्रदान की गयी। स्पष्ट है कि आतंकवाद का कोई दर्शन या आंदोलन नहीं हो सकता, बल्कि यह अंततः कुछ राजनीतिक हितों को पूरा करने की एक अन्यथा प्रणाली भर है। यह राजनीतिक मंतव्यों और लक्ष्यों से प्रेरित एक ऐसी परिघटना है, जिसे अंजाम देने के लिए व्यवस्थित रूप से बल प्रयोग किया जाता है और प्रायः आतंककारी माहौल पैदा करके निशाने पर लिए गए लोगों, समुदायों एवं एजेंसियों को काबू में किया जाता है। इसकी सर्वत्र एक सामान्य स्थिति यह होती है कि इसमें प्रायः निर्दोष लोग मारे जाते हैं। 

आतंकवाद के कई स्वरूप देखने को मिलते हैं। यथा-धार्मिक आतंकवाद (धार्मिक कट्टरता से प्रेरित वह आतंकवाद, जिससे अलकायदा, तालिबान, लश्कर-ए-तोएबा एवं सिमी जैसे संगठन प्रेरित हैं), नारका आतंकवाद (मादक पदार्थों की तस्करी के परिणामस्वरूप विकसित आतंकवाद), साइबर आतंकवाद (कंप्यूटर एवं इंटरनेट के जरिए फैलाया जाने वाला आतंकवाद), आत्मघाती आतंकवाद (मानव बमों द्वारा पैदा किया जाने वाला आतंक), एथनो-राष्ट्रवादी आतंकवाद (एथनिक भिन्नताओं के कारण पृथकतावादी आकांक्षाओं से प्रभावित आतंकवाद), वैचारिक आतंकवाद (किसी विशेष विचारधारा से प्रेरित आतंकवाद वैचारिक आतंकवाद हो सकता है) एवं राज्य प्रायोजित आतंकवाद (भारत में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद राज्य प्रायोजित आतंकवाद का स्वरूप है) आदि। आधुनिक आतंकवाद की खास प्रणालियों में विस्फोटक व बमबारी, गोलीबारी करते हुए हमले व हत्याएं, अपहरण, बंधक बनाना एवं विमान अपहरण आदि शामिल हैं। अब आतंकवादी आतंक फैलाने के लिए अनेक परिष्कृत साधनों का प्रयोग करने लगे हैं, जिनमें आणविक, रासायनिक, जीवाणु फैलाने वाले हथियार (जैविक हथियार) तथा मानव बम आदि आधुनिक परिकल्पनाएं हैं। इंटरनेट भी एक सशक्त माध्यम सिद्ध हो रहा है। 

“आतंकवाद का अर्थ है, हिंसा की धमकी अथवा हिंसा के कार्य अथवा भय पैदा कर अपनी मांगें मनवाना। यानी यह वह अवधारणा है, जिसका उद्देश्य लोगों के मस्तिष्क में डर-भय एवं आतंक पैदा करके अपने लक्ष्यों को प्राप्त करना होता है।” 

भारत में बढ़ते आतंकवाद के पीछे कई कारण हैं। विश्व के प्रमुख देश भारत को एक उभरती ताकत मानते हैं। उनका मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारत सकारात्मक और स्थायी भूमिका निभाएगा, किंतु हमारे पड़ोसी देश भारत के विकास के प्रति ऐसा सकारात्मक विचार नहीं रखते। भारत से अलग हुए पाकिस्तान और बांग्लादेश की भारत के प्रति हमदर्दी नहीं है। आईएसआई का लक्ष्य भारत को लहूलुहान करना है। आतंकवादी संगठनों का मानना है कि इतनी पंथिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधता के कारण भारत का एक देश के रूप में कायम रहना संभव नहीं है। उन्हें यह लगता है कि भारत टूट कर बिखर जाएगा। पड़ोसी देशों ने 1971 में पूर्वोत्तर राज्यों, आठवें दशक में खालिस्तानी अलगाववादियों और नौवें दशक से अब तक कश्मीरी आतंकवादियों को पोषित किया है। आतंकी हमले हमारे पड़ोसी देश में रहने वाले कट्टरपंथियों द्वारा प्रायोजित हैं। अलकायदा के उभार के बाद बांग्लादेश में भी आतंकी संगठन सक्रिय हो गए और उन्होंने भारत के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। परमाणु परीक्षण के बाद भारत अंतरिक्ष शक्ति और आईटी शक्ति के तौर पर तो उभरा ही, उसकी आर्थिक विकास वृद्धि दर भी अच्छी रही। इससे विश्व समुदाय ने भारत को शक्ति संतुलन कायम रखने वाले छह शक्तिशाली राष्ट्रों की श्रेणी में रखा है। यह स्थिति भारत के कई पड़ोसी देशों को नागवार लगती है। भारत की आर्थिक प्रगति में बाधा पहुंचाने के लिए ये देश आतंकवादियों को प्रोत्साहित करते हैं। भारत के महत्त्वपूर्ण शहरों में आतंकी हमलों के पीछे विदेशी निवेश और पर्यटन को हतोत्साहित कर भारत की आर्थिक संवृद्धि पर रोक लगाना प्रमुख उद्देश्य है। भारत की आर्थिक सफलता में प्रगति होने के कारण आतंकी हमलों में बढ़ोत्तरी हुई है। देश को इनसे निपटने के लिए पूरी तरह कमर कस लेनी चाहिए। दुर्भाग्य से इस संबंध में भारी चूकें देखने को मिलती हैं। भारत में आतंकवाद को रोकने के लिए साधारण कानून पर्याप्त नहीं है। साथ ही सिविल पुलिस भी इसे रोकने में अक्षम है। भारतीय पुलिस बल संख्यात्मक अभाव के साथ साथ आधुनिक शस्त्रों एवं सुरक्षात्मक उपकरणों के अभाव से जूझ रही है। आतंकवादियों से निपटने के लए आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों की कमी महसूस की जाती है, तो बुलेटप्रूफ जैकेटों एवं अन्य संसाधनों का भी अभाव है। हमारा खुफिया तंत्र भी उतना चुस्त-दुरुस्त नहीं है, जितना उसे होना चाहिए। ये कमियां एवं कमजोरियां भी भारत में द आतंकवाद के बढ़ने के कारण हैं। हमारे देश की ‘सॉफ्ट स्टेट न डिप्लोमेसी’ से भी आतंकवाद बढ़ा है। 

जैसे-जैसे आतंकवाद बढ़ता है, वैसे-वैसे इसके नकारात्मक है प्रभाव भी सामने आते हैं। आतंकवाद की वजह से निर्दोष लोगों की । हत्या होती है। उनके घर-परिवार उजड़ जाते हैं। जान-माल का व्यापक नुकसान होता है। देश में अस्थिरता एवं अशांति बढ़ती है, जिससे लोकतंत्र कमजोर होता है। आतंकवाद से प्रभावित देश में विदेशी निवेश में तो कमी आती ही है, विदेशी पर्यटकों की आमद मरने से विदेशी पूंजी की आमद भी घट जाती है। आर्थिक प्रगति एवं विकास में गतिरोध पैदा होता है, तो आतंकवाद की आड़ में तस्करी और विदेशी घुसपैठ बढ़ जाती है। हमारी आतंरिक सुरक्षा तार-तार हो जाती है, तो सीमाओं पर भी संकट बढ़ता है। आतंकवाद का राजनीतिक मंतव्य तब और भी संगीन रूप में सामने आता है, जब अलग-अलग आतंकवादी समूहों और राज्य मशीनरी के बीच ‘प्रतिआतंकवाद’ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। आतंकवाद के कारण अलगाववादी एवं विघटनकारी प्रवृत्तियों को तो बल मिलता ही है, धार्मिक आतंकवाद के कारण साम्प्रदायिक सौहार्द भी बिगड़ता है। सारतः यह कहा जा सकता है कि आतंकवाद विध्वंस एवं विनाश का पर्याय है। 

भारतीय संसद ने जुलाई, 2019 में राष्ट्रीय अन्वेषण अधिकरण संशोधन विधेयक, 2019 को पारित किया। इस विधेयक के माध्यम से राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम, 2008 में संशोधन किया गया है, जो एनआईए को अनुसूचित अपराधों में सूचीबद्ध अपराधों की जांच और मुकदमा चलाने की अनुमति देता है। 

भारत में कानूनी स्तर पर आतंकवाद पर अंकुश के लिए समय-समय पर सरकार की तरफ से पहलें होती रही हैं। इस क्रम में वर्ष 1987 में टाडा (Terrorism and Disruptive Activities Prevention Act, 1987-TADA) बनाया गया। इसके बाद व 2002 में पोटा (Prevention of TerrorismAct, 2002) को लागू किया गया। कतिपय विवादों एवं आलोचनाओं के कारण इन दोनो ही कानूनों को समाप्त कर अब गैरकानूनी गतिविधि नियंत्रण अधिनियम, 1967 को संशोधित कर प्रभावशाली बनाया गया है। देश के आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन को और अधिक चुस्त-दुरुस्त बनाने के उद्देश्य से दिसंबर, 2008 में संसद द्वारा ‘राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण विधेयक, 2008’ पारित किया गया। विदित हो कि आतंकवाद के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को मजबूत बनाने के लिए भारतीय संसद ने जुलाई, 2019 में राष्ट्रीय अन्वेषण अधिकरण संशोधन विधेयक, 2019 को पारित किया। इस विधेयक के माध्यम से राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम, 2008 में संशोधन किया गया है, जो एनआईए को अनुसूचित अपराधों में सूचीबद्ध अपराधों की जांच और मुकदमा चलाने की अनुमति देता है।

तटीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने के उद्देश्य से जहां समुद्री सीमा की रक्षा की पूरी जिम्मेदारी नौसेना को सौंपी जा चुकी है, वहीं एनएसजी, मार्कोस एवं कोबरा जैसे कमांडो दस्तों की संख्या बढ़ाई गई है। यहां इन पहलों के परिप्रेक्ष्य में यह रेखांकित किया जाना आवश्यक है कि इन पहलों को और असरदार बनाने की आवश्यकता है, तभी आतंकवाद का सफाया हो सकता है। कानूनों के सटीक प्रवर्तन एवं विधायी प्रणालियों को सशक्त बनाने के साथ यह भी आवश्यक है कि हम आतंकवाद से निपटने के तौर-तरीकों को अति आधुनिक स्पर्श दें। 

चूंकि आतंकवाद विश्व शांति के लिए भी एक बड़ा खतरा है, अतएव इसके निवारण के लिए वैश्विक स्तर पर भी प्रयास होते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के अनुसार किसी देश की क्षेत्रीय अखण्डता या राजनैतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग निषिद्ध है। अनुच्छेद 2(7) के अनुसार मानवता के आधार के अलावा अन्य किसी भी कारण से किसी राष्ट्र के आंतरिक मामलों में दखल देना निषिद्ध है। यह विधि सभी देशों पर बाध्यकारी है भले ही वे इससे असहमत हो। 1970 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित प्रस्ताव में कहा गया था कि प्रत्येक देश का यह कर्त्तव्य है कि वह निम्न कार्यों से बचे 

  • किसी विद्रोही सैन्य समूह को संगठित या प्रोत्साहित करना तथा किसी देश में भाड़े के सैनिकों के घुसपैठ में सहयोग करना।
  • सीमा क्षेत्र विवाद तथा सीमांत राज्यों की समस्याओं सहित किसी भी अंतर्राष्ट्रीय विवाद को सुलझाने के लिए किसी देश को धमकी देना या विद्यमान अंतर्राष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन करते हुए सैन्य कार्रवाई करना।
  • किसी अन्य देश में नागरिक विद्रोह या आतंकवादी गतिविधियों को संगठित करना, सहयोग देना, उकसाना या भागीदार होना अथवा अपने सीमा क्षेत्र में इस प्रकार की गतिविधियों को पनपने देना।

11 सितंबर 2001 की घटना के बाद संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रस्ताव 1373 पारित किया गया। इस प्रस्ताव के अध्याय 7 में आतंकवादियों तथा इन्हें प्रश्रय देने वाले देशों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात की  गयी है। सदस्य देशों को आतंकवादियों को आर्थिक सहायता, समर्थन व प्रश्रय देने से बचने की चेतावनी दी गई है। 

भारत के संदर्भ में आतंकवाद का मुकाबला करने में मानवीय आसूचना (Human Intelligence) एवं तकनीकी आसूचना (Tech nical Intelligence) दोनों ही निर्णायक सिद्ध हो सकती हैं। मानवीय आसूचना को बेहतर बनाकर हम अपने खुफिया तंत्र को मजबूत बना | सकते हैं। आतंकवाद से संबंधित अनेक घटनाओं में प्रायः खुफिया | तंत्र की विफलता उजागर होती रही है। आतंकवादी घटनाओं को | अंजाम देकर नौ-दो ग्यारह हो जाते हैं और हमारी खुफिया एजेंसियां हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती हैं, उन्हें आतंकवादियों की गतिविधियों की भनक तक नहीं लगती। इस कमी को दूर किए जाने की आवश्यकता है। मानवीय आसूचना को बेहतर बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम दूसरे देशों के अच्छे खुफिया तंत्रों के अनुरूप अपने खुफिया तंत्र को मजबूत और असरदार बनाएं। अक्सर देश की गुप्तचर एजेंसियों के मध्य समन्वय की कमी के कारण ससमय सूचनाओं का अदान-प्रदान नहीं हो पाता है। इस कमी को दूर करना होगा। आजकल आतंकवादियों द्वारा आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने एवं अपने संजाल को बढ़ाने में सूचना प्रौद्योगिकी एवं आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़-चढ़कर किया जा रहा है। इसे ध्यान में रखते हुए तकनीकी आसूचना को बेहतर बनाकर इसका एक सुदृढ़ तत्र विकसित किए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम अपनी खुफिया एजेंसियों, सुरक्षा बलों एवं पुलिस तंत्र को अत्याधुनिक तकनीकों से लैस करें तथा इनमें सूचना प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञों की भर्ती कर तकनीकी आसूचना को उच्च आयाम प्रदान करें। 

कुछ और उपाय भी आतंकवाद विरोधी मुहिम में महत्त्वपूर्ण एवं निर्णायक सिद्ध हो सकते हैं। मसलन, राष्ट्रहित में गुप्त सूचनाओं को सार्वजनिक न किया जाए, मीडिया एवं नागरिक समाज जांच एजेंसियों का सहयोग करें, स्थानीय स्तर पर पैसे के लालच में आकर आतंकवादियों को सहयोग देने वालों पर पैनी नजर रखी जाए तथा नागरिक समाज भी ऐसे लोगों के प्रति सतर्क व सचेत रहे। अवैध प्रवासियों की रोकथाम हो तथा उन स्रोतों का सफाया किया जाए जिनसे आतंकी संगठनों को वित्तपोषित किया जाता है। इन स्रोतों में कालाधन भी एक है। इस पर भी रोक लगानी होगी। यह भी जरूरी है कि देश की आतंरिक एवं वाह्य सुरक्षा से जुड़े मामलों में हम ‘हार्ड स्टेट डिप्लोमैसी’ का परिचय दें, साथ ही सभी राजनीतिक दल आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर आपसी विद्वेष त्याग कर एकजुटता का परिचय दें। 

भारत की आर्थिक संवृद्धि, विकास, प्रगति, लोकतांत्रिक जीवंतता, शांति, स्थिरता एवं मजबूत वैश्विक स्थिति के लिए यह आवश्यक है कि सरकार प्रतिबद्ध तरीके से आतंकवाद का सफाया करे और भारत को आतंकवाद से मुक्त राष्ट्र बनाए। सरकार की इस मुहिम में व्यक्तिगत, सामूहिक एवं सामाजिक स्तरों पर भी सहयोग अपेक्षित है। यानी हर देशभक्त को आतंकवाद के विरुद्ध उठ खड़ा होना चाहिए। 

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