पंचतंत्र की कहानी सुनाइए-आज्ञाकारी पति

पंचतंत्र की कहानी सुनाइए

पंचतंत्र की कहानी सुनाइए-आज्ञाकारी पति

राजा नंद का राज्य बहुत ही विशाल था। पूरा राज्य समुद्र से घिरा हुआ था। नंद इतना शक्तिशाली राजा था कि उसके आसपास के सारे राजा भी उसकी प्रजा की तरह रहते थे। उसका नाम दूर-दूर तक फैला हुआ था। 

उसके अनेक मंत्री थे पर उसे वररुचि बहुत प्रिय था। वह दर्शन और राजनीति की गहरी समझ रखता था इसलिए राजा को उससे हर रोज अलग-अलग विषयों पर चर्चा करना बहुत अच्छा लगता था। राजा का दरबार भी हर रोज लगता था। 

एक दिन वररुचि सही समय पर दरबार में नहीं आया। उसे आने में बहुत देर हो गई। दरअसल उसकी पत्नी बहुत बुरे स्वभाव की थी। वह अक्सर रो-पीट कर, किसी न किसी बात पर तमाशा बना देती। वररुचि ने अपनी पत्नी को राजी करने की हर संभव कोशिश की परंतु पत्नी ने कुछ भी सुनने से साफ इनकार कर दिया। वह किसी भी तरह से पति की बात नहीं मान रही थी। वररुचि ने हार कर कहा, “प्रिये! तुम चाहती क्या हो? जो कहोगी, वही करूंगा। बस शांत हो जाओ।” 

उसकी पत्नी चाहती थी कि वह अपना सिर मुंडवा कर उसके पैर छुए। मंत्री को मजबूरन गंजा होना पड़ा। इसके बाद वह अपनी पत्नी के पैरों पर गिर पड़ा। इतना सब होने के बाद ही उसकी पत्नी के चेहरे पर मुस्कान आई। इसके बाद ही उसने पति को दरबार जाने की इजाजत दी। तभी उस दिन वररुचि दरबार में देर से पहुंचे थे।

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उधर महल में रानी भी किसी मुसीबत से कम नहीं थी। उसने भी राजा नंद की जान आफत में डाल रखी थी। वह भी राजा से लड़ाई करने के बाद मुंह फुला कर बैठ गई थी। राजा ने अपनी ओर से उसे मनाने की पूरी कोशिश की पर वह नहीं मानी। उसने कोई भी गहने-कपड़े लेने से मना कर दिया। उसे अपने लिए रेशमी कपड़े नहीं चाहिए थे। वह एक कोने में बैठ कर जोर-जोर से रोने लगी। 

राजा ने हार मान ली। उसे दरबार में जाने के लिए देर हो रही थी। उसने अपनी रानी से पूछा कि वह असल में चाहती क्या है। वह बोली, “वादा करो, मैं जो चाहती हूं, तुम उसे पूरा करोगे?” 

“हां, मैं वादा करता हूं,” राजा ने अपनी जान छुड़ाने के लिए कह दिया। भला उसके लिए क्या देना मुश्किल था। रानी मुस्कुराने लगी। 

इसके बाद वह बोली, “मैं चाहती हूं कि तुम मेरा घोड़ा बनो। मैं तुम्हारे मुंह में लगाम लगाऊंगी और तुम्हारी सवारी करूंगी। इस तरह महल में तुम मुझे सैर करवाओगे।” 

राजा की हालत खराब हो गई। इतने बड़े राज्य का सम्राट अपनी पत्नी के आगे घोड़ा बनने जा रहा था। उसने हामी भर दी। उसके पास दूसरा कोई विकल्प ही कहां था। वह वादा जो कर चुका था। 

उसने सारे दरबानों और दासियों को महल से बाहर जाने का आदेश दे दिया। उसके बाद रानी ने बड़े मजे से घोड़ा बने हुए राजा की सवारी की। अंत में कहीं जा कर रानी का गुस्सा खत्म हुआ और राजा दरबार जाने के लिए तैयार हुआ। 

जब वह दरबार में पहुंचा तो पता चला कि वररुचि भी देर से आया था। वह गंजा भी दिखाई दे रहा था। उसने पूछा, “क्या हुआ मित्र?” 

वररुचि बोला, “महाराज! मैं थोड़ी परेशानी में पड़ गया था।” 

महाराज खिसियानी हंसी के साथ बोले, “हां, मित्र! मैं जानता हूं कि हमारी पत्नियां हम पर राज करती हैं।” 

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वररुचि महाराज को देख कर मुस्कुराने लगा क्योंकि महाराज ने उसके मुंडे हुए सिर को देख कर उसकी हालत का अंदाजा लगा लिया था। पूरे दरबार में सभी दरबारी यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर राजा और मंत्री आपस में एक-दूसरे को देख कर बार-बार मुस्कुरा क्यों रहे हैं। उस दिन वे सब अपनी-अपनी अटकलें ही लगाते रहे, पर सच को कोई नहीं जान सका। 

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