गर्भावस्था की जानकारी | गर्भावस्था के सामान्य लक्षण | प्रेगनेंसी के लक्षण symptoms of pregnancy

गर्भावस्था की जानकारी

गर्भावस्था की जानकारी |गर्भावस्था के सामान्य लक्षण |प्रेगनेंसी के लक्षण symptoms of pregnancy

गर्भधारण न करने वाली स्त्री को प्रत्येक माह मासिक धर्म होता है और गर्भ ठहर जाने की अवस्था में मासिक धर्म बंद हो जाता है। गर्भावस्था की यह सबसे बड़ी पहचान है। यह निश्चित हो जाने पर कि गर्भ ठहर गया है, गर्भवती स्त्री को अपने निकट के जच्चा-बच्चा केंद्र अथवा किसी लेडी डॉक्टर से अपना चैकअप कराना चाहिए। साथ ही साथ आगे भी उसके आदेशानुसार समय समय पर अपना परीक्षण कराती रहे, ताकि किसी भी प्रकार की असावधानी के कारण गर्भ को कोई हानि अथवा समस्या न होने पाए। 

कभी-कभी अन्य कारणों से भी मासिक धर्म में बाधा आ जाती है। अगर आपके गर्भावस्था का लक्षण सकारात्मक आएगा तभी पता लग पाएगा कि आपने गर्भधारण कर लिया है अन्यथा नहीं। बहुत सी स्त्रियों को कई सप्ताह तक गर्भावस्था के लक्षणों का कोई पता ही नहीं चलता, जबकि कुछ स्त्रियां पहले ही दिन जान लेती हैं कि उन्हें गर्भ रह गया है। यदि आपको किसी भी लक्षण का आभास न हो, तो किसी योग्य लेडी डॉक्टर के पास जाकर अपना चैकअप अवश्य कराएं। 

 गर्भावस्था के सामान्य लक्षण 

गर्भावस्था के सामान्य लक्षण हैं-जी मिचलाना, मूर्छा आना, भोजन की इच्छा न होना, खट्टी चीजें खाने की इच्छा होना, मुंह में बार-बार थूक आना, शरीर टूटता सा प्रतीत होना, कोख में भारीपन अनुभव होना तथा अग्रभाग में कालिमा आदि। इन लक्षणों से स्त्री के गर्भवती होने की सूचना मिल जाती है। इसके अलावा तंद्रा, शरीर में भारीपन, स्फुरण या फड़कन, हृदय में हल्का कंपन, तीव्र प्यास, आंखों के आगे अंधेरा छा जाना, रोमांच, पलकों का भारी होना अथवा उनका बार-बार उठना-गिरना आदि भी गर्भवती होने के अन्य लक्षण हैं। स्त्री को उल्टियां होना भी इसका एक प्रमुख लक्षण है। 

गर्भधारण के बाद स्त्री के वक्ष काफी नरम हो जाते हैं। अनेक स्त्रियों के स्तन हल्के संवेदनशील, भरे-भरे और उन्हें छूने पर पीड़ा का अनुभव कराते हैं। ये भी गर्भावस्था के लक्षण हो सकते हैं। गर्भ ठहरने के बाद स्तनों के आकार में बदलाव आने के साथ-साथ कई अन्य परिवर्तन भी होते हैं। जैसे निप्पलों के इर्द-गिर्द का काला हिस्सा अधिक स्याह होने लगता है। साथ ही स्तनों का आकार भी बढ़ने लगता है। ये परिवर्तन इस बात के प्रमाण हैं कि गर्भावस्था से संबंधित हारमोंस ने अपना कार्य सुचारु रूप से आरंभ कर दिया है। 

इसके साथ ही स्तनों के निप्पलों के आसपास हल्के-हल्के गूमड़ फुसियों की तरह उभर आते हैं। ये तेल का स्राव करने वाली ग्रंथियां होती हैं, जो निप्पल और उसके आसपास के हिस्से को तैलीय बना देती हैं। यह आने वाले समय के लिए आपके स्तनों की तैयारी है, जो प्रमाणित करती है कि भावी शिशु को आपने दुग्ध पिलाने के निमित्त स्तनपान कराना है। 

माहवारी का रक्त न आना ही गर्भ ठहर जाने का पक्का प्रमाण है। यदि फिर भी किसी स्त्री को रक्त आए तो लेडी डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। यद्यपि कर्ड दशाओं में यह रक्त निकलना साधारण बात हो सकती है, किंतु डॉक्टर यह चैक कर सकती है कि यह किसी गंभीर रोग का कारण तो नहीं है। 

कुछ स्त्रियों में गर्भवती हो जाने पर भी माहवारी के रक्त के धब्बे आते हैं। ये धब्बे साधारणत: उन दिनों में आते हैं, जिन दिनों उन्हें माहवारी हुआ करती थी। ये धब्बे प्राय: तीसरे मास तक आते रहते हैं। इसका कारण यह समझा जा सकता है कि इस समय गर्भ में स्थित भ्रूण गर्भाशय को पूरी तरह नहीं भर पाया है, जिससे गर्भ में काफी जगह खाली पड़ी है। यह कोई गंभीर बात नहीं है और न ही इसका कोई बुरा प्रभाव माता तथा बच्चे पर पड़ता है। इसे रोकने के लिए किसी दवा की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी अपनी डॉक्टर से परामर्श कर लेना चाहिए। 

जब भ्रूण गर्भाशय में अपनी जगह बनाता है, तो कई स्त्रियों को हल्का स्राव होता है। यह आपके मासिक धर्म की तिथि से कुछ दिन पहले हो सकता है। इस स्राव का रंग लाल न होकर गुलाबी होता है। 

गर्भावस्था में शरीर में इतनी ज्यादा थकान महसस होती है कि किसी-किसी स्त्री को अपना शरीर चलाने में भी मुश्किल हो जाती है-मानो सारे शरीर की शक्ति समाप्त हो गई हो तथा भरपूर आलस छाया रहता है। बार-बार पेशाब आदि करने की भी इच्छा होती है। गर्भावस्था ही इसका मुख्य कारण है। इससे पता चलता है कि आने वाले समय के लिए आपका शरीर तैयारी कर रहा है। 

गर्भवती स्त्री की सूंघने की क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि वह दूर तक की गंध भी बड़ी आसानी से सूंघ लेती है, जिसका आपको आभास तक नहीं होता। कुछ गर्भवती स्त्रियों को गर्भ के तत्काल बाद अपना पेट कुछ फूला सा प्रतीत होता है। यद्यपि कुछ माह बाद तो शिशु होने के कारण पेट फूल ही जाएगा, लेकिन आरंभ में कुछ खास स्त्रियों को ही ऐसा अनुभव होता है। इसमें घबराने या परेशान होने की कोई बात नहीं है। इसके अतिरिक्त गर्भवती स्त्रियों के तापमान में भी वृद्धि हो जाती है और जब तक प्रसव नहीं हो जाता, तब तक बहुत सी स्त्रियों का यह तापमान एक-दो डिग्री बढ़ा ही रहता है। इसे ज्वर समझने की गलती नहीं करनी चाहिए और न ही ज्वर (बुखार) की कोई दवा लेनी चाहिए। 

यदि आपका मासिक स्राव हर माह समय पर होता है और इस बार ऐसा नहीं हुआ, तो एकदम से गर्भवती हो जाने का निर्णय नहीं कर लेना चाहिए, बल्कि अपनी लेडी डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। वह चैकअप के बाद ही आपको बता पाएगी कि सही मामला क्या है ? ऐसा किसी शारीरिक दोष के कारण हुआ है या आप वास्तव में ही गर्भवती हो गई हैं। 

गर्भावस्था के परीक्षण

गर्भावस्था की जानकारी

बहुत समय पहले गर्भ परीक्षण के निमित्त स्त्री को अधिक मात्रा में हारमोन की गोलियां दी जाती थीं। इसके फलस्वरूप गर्भ न ठहरने पर मासिक धर्म शुरू हो जाता था। लेकिन यदि गर्भ में मादा भ्रूण हो, तो ये गोलियां उसमें पुरुषत्व पैदा कर देती थीं। अतः इन गोलियों का प्रयोग सदा के लिए बंद कर दिया गया। किंतु गर्भ ठहरने पर कोई भी गोली गर्भपात का कारण नहीं बन सकती। 

वर्तमान युग में रक्त और मूत्र की जांच गर्भ की उपस्थिति जानने में सहायता करती है। रक्त और मूत्र में एच.सी.जी. (ह्यूमन कौरिऔनिक गोनेडोट्रॉपिन) होता है, जो कौरिऔन से बनता है। ये कौरिऔन ओवल (प्लेसेंटा) बनाती है। ओवल का एक भाग बच्चेदानी की दीवार से और दूसरा भाग बच्चे की नाभि से जुड़ा होता है। इसके शरीर में पैदा होते ही रक्त और मूत्र में एच.सी.जी. आ जाता है। इसी कारण स्त्री का मासिक धर्म रुक जाता है। 

एच.सी.जी. की जांच रक्त या मूत्र से की जाती है। साधारणत: डॉक्टर मूत्र की जांच ही करा लेती है। जांच मासिक धर्म आने की तिथि के दो सप्ताह बाद करनी चाहिए ताकि जांच का सही परिणाम ज्ञात हो सके। यदि जांच दो सप्ताह से पहले करवा ली जाए तो परिणाम ‘यस’ या ‘नो’ में भी आ सकता है, जिसको ‘वीकली पॉजिटिव’ कहते हैं। इस कारण ऐसी जांच पर कम विश्वास होता है। 

इस प्रकार की जांच स्त्री अपने घर के बाथरूम में गोपनीयता के साथ कर सकती है। अभी हमने बताया है कि इसमें एच.सी.जी. हारमोन की जांच होती है, जिसे प्लेसेंटा बनाता है। यह आपके रक्त से मिलने में तनिक भी विलंब नहीं करता। मूत्र में इसकी जांच होते ही आपको सकारात्मक परिणाम मिल जाएंगे। 

प्लेसेंटा कुछ संवेदनशील होते हैं। गर्भधारण के बाद रक्त में एच.सी.जी. तो होता है, पर इसकी अच्छी जांच नहीं हो पाती। यदि माहवारी के सात दिन पहले भी जांच करेंगी तो गर्भावस्था होने के बाद भी परिणाम नकारात्मक ही आएंगे। 

यदि माहवारी से एक सप्ताह बाद जांच करेंगी तो 97 प्रतिशत परिणाम आपको मिल जाएंगे। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता जाएगा, वैसे-वैसे परिणाम साफ और स्पष्ट होते जाएंगे। चूंकि इस जांच की सहायता से आपको गर्भावस्था का पहले ही अंदाजा हो जाता है, इसलिए आप पहले ही डॉक्टर से परामर्श लेकर अपनी देखभाल अच्छी तरह शुरू कर सकती हैं। 

मूत्र की जांच के बाद रक्त की जांच भी अवश्य होनी चाहिए। गर्भधारण के सप्ताह भर बाद यदि रक्त की जांच कराई जाए तो इससे एक सौ प्रतिशत पता चल जाता है कि आप गर्भवती हैं या नहीं! इसमें एच.सी.जी. की सही मात्रा व स्तर का अनुमान लगाकर गर्भावस्था की तिथि भी बताई जा सकती है। क्योंकि जैसे-जैसे गर्भावस्था का समय बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे रक्त में एच.सी.जी. की मात्रा में वृद्धि होती जाती है। जिस स्त्री को अपने गर्भवती होने में संदेह होता है, डॉक्टर उसके रक्त और मूत्र की जांच अवश्य कराती है। 

रक्त और मूत्र की जांच से गर्भावस्था का सही अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन गर्भाशय के आकार, योनि और सर्विक्स के कलर या सर्विक्स की बनावट में अंतर से भी गर्भावस्था का मेडिकल परीक्षण हो सकता है। 

एक विशेष बात यह है कि स्त्री के रक्त या मूत्र में एच.सी.जी. का स्तर दिखने पर ही इस जांच में सकारात्मक परिणाम दिखाई देते हैं। यह स्त्री के शरीर में तभी बनता है, जब वह गर्भवती होती है। इससे पहले बताया जा चुका है कि गर्भावस्था में एच.सी.जी. का स्तर प्रतिदिन बढ़ता है। यहां यह भी देखना होता है कि गर्भधारण किए हुए कितना समय बीत गया है। 

कई बार देखने में आया है कि किसी स्त्री की गर्भावस्था की जांच पहले तो सकारात्मक आई लेकिन उसके बाद की जांच में परिणाम नकारात्मक आया। इसका कारण रासायनिक गर्भावस्था हो सकती है। ऐसी गर्भावस्था आरंभ होने से पहले ही समाप्त हो जाती है। इस तरह की गर्भावस्था में अंडा फर्टिलाइज होकर गर्भाशय में इंप्लांट होने लगता है, लेकिन पूरी तरह इंप्लांट नहीं हो पाता। यह गर्भावस्था में बदलने की अपेक्षा माहवारी में नष्ट हो जाता है। अधिकतर स्त्रियों को इस बात का पता ही नहीं चलता कि वे गर्भवती हुई थीं। जब गर्भावस्था की जांच नहीं होती थी, तब स्त्री बहुत सी बातों से अनजान रहती थी। 

मेडिकल के दृष्टिकोण से रासायनिक गर्भावस्था (केमिकल प्रेग्नेंसी) एक चक्र की भांति होती है, जिसमें कोई गर्भपात नहीं होता। अनेक स्त्रियों को यह बात भी संशय में डाल देती है। यदि कोई स्त्री यह मानने को तैयार नहीं होती कि वह गर्भवती नहीं है और उसकी जांच नकारात्मक आती है, तो उसे अपनी देखभाल बहुत अच्छी तरह करनी चाहिए। संभव है कि उसका शरीर जांच से कहीं अच्छे उपाय जानता हो। ऐसी स्त्री को कुछ समय प्रतीक्षा करने के बाद पुनः अपनी जांच अवश्य करानी चाहिए। हो सकता है कि पहली जांचें समय से पहले करा ली हों, इसलिए उनका कोई परिणाम न निकला हो। 

डॉक्टर से अपने मन की बात स्त्री को कह देनी चाहिए तथा रक्त की जांच भी अवश्य करानी चाहिए। यह भी हो सकता है कि गर्भावस्था के सभी लक्षण अनुभव करने पर भी स्त्री गर्भवती न हो। यदि जांच नकारात्मक आती रहे और मासिक धर्म भी न हो रहा हो, तो उसे अपनी डॉक्टर से कहना चाहिए कि वह इन 

लक्षणों के दूसरे जैविक कारण का पता लगाए। मां बनने का सुखद एहसास प्रत्येक स्त्री को हो सकता है, इसलिए यह गर्भावस्था भावनात्मक भी हो सकती है। कई बार देखने में आया है कि जब मन की इच्छा शरीर पर भारी पड़ जाती है, तब ऐसा ही अनुभव होने लगता है। ऐसा अनुभव करना गलत बात भी नहीं है।

यदि आप वास्तव में गर्भवती हैं या हो गई हैं, तो सावधानियां बरतना शुरू कर दें और लेडी डॉक्टर के पास जाने में देर न करें। प्रारंभिक जांच से गर्भावस्था की पुष्टि हो जाने पर आपको अपने और भावी शिशु की देखभाल के लिए पौष्टिक आहार लेना आरंभ कर देना चाहिए। चाय, कॉफी व कोल्ड ड्रिंक्स अधिक मात्रा में नहीं लेनी चाहिए। शराब या तंबाकू का प्रयोग करती हैं, तो उनका त्याग कर देना चाहिए और बिना बात के दवाइयां अथवा नींद की गोलियां नहीं लेनी चाहिए। 

कुछ स्त्रियां मासिक धर्म (माहवारी) आने के लिए दवाइयां लेती हैं। इस प्रकार की दवाइयां हानिकारक होती हैं, इस कारण इनका प्रयोग अनुचित है। जैसे ही यह पता चले कि आपने गर्भधारण कर लिया है, वैसे ही अपने रहन-सहन तथा खानपान पर अधिक ध्यान देना शुरू कर दें। 

आप जब भी अपने फेमिली डॉक्टर से कोई दवा आदि लें तो उसे अवश्य सूचित करें कि आप गर्भ से हैं, ताकि कोई ऐसी दवा न दी जाए, जिससे आपको और होने वाले बच्चे को हानि पहुंचे। इसके अलावा कोई भी दवा आप अपनी इच्छा से न लें। यदि कोई दवा गर्भावस्था से पहले से चल रही हो, तो भी अपनी डॉक्टर को अवश्य सूचित करें। यदि आपको डायबिटीज हो, तो गर्भधारण से पहले उस पर काबू करें। यदि मिरगी तथा श्वास आदि की शिकायत हो या यक्ष्मा आदि का रोग हो, तो उसके लिए भी डॉक्टर से परामर्श अवश्य करें। 

आज की आधुनिक चिकित्सा पद्धति में गर्भधारण के 4 से 6 सप्ताह बाद अल्ट्रासाउंड की सहायता से भ्रूण को देखा जा सकता है तथा गर्भावस्था के 10 से 12 सप्ताह बाद भ्रूण के हृदय की धड़कन को सुना जा सकता है।

डॉक्टर से कुछ न छिपाएं 

गर्भावस्था की जानकारी

डॉक्टर से सदैव सच बात बोलनी चाहिए, कुछ भी छिपाना हानिकारक हो सकता है। उसे अपना चिकित्सीय इतिहास बेझिझक और बेखौफ बता दें। अपने खानपान की गलत आदतों के बारे में बताएं। किसी प्रकार की कोई दवा या नशीला पदार्थ सेवन करती हों, तो उस बारे में भी कहना न भूलें। कोई गुप्त रोग हो या सर्जरी आदि हुई हो तो उस बारे में बताएं। किसी लक्षण से घबरा गई हों या किसी बात का संदेह हो, तो तुरंत अपने डॉक्टर से परामर्श करें और घबराहट को दूर कर अपने संदेह का निवारण करें। डॉक्टर के निर्देशों का पालन करें। इस बात का ध्यान रखिए कि डॉक्टर आपको परामर्श देगी, आवश्यकता के समय कोई अच्छी दवा लिखेगी, लेकिन अपनी देखभाल तो आपको स्वयं ही करनी है। अत: खानपान पर विशेष ध्यान दें, उचित देखभाल करें तथा प्रसव के लिए तैयार रहें। 

लेडी डॉक्टर का चुनाव 

जब यह निश्चित हो जाता है कि आप गर्भवती हैं और सभी प्रकार की जांचों से यह सिद्ध भी हो गया है कि अब आपको मां बनने से कोई नहीं रोक सकता, तब आपको पहले से ही एक ऐसी लेडी डॉक्टर का चुनाव अपने लिए कर लेना चाहिए, जिसकी सहायता से आप अपना प्रसव काल बिता सकें-ऐसी डॉक्टर जो गर्भधारण से लेकर प्रसव काल और उसके बाद भी हर तरह के खतरे से जूझने का साहस रखती हो। वह डॉक्टर जहां प्रसूति विशेषज्ञ हो, वहीं स्त्री रोग विशेषज्ञ भी हो। ऐसी डॉक्टर न केवल आपकी प्रसूति काल में देखभाल करेगी, अपितु गर्भावस्था के अलावा अन्य स्त्री रोगों की जांच भी कर सकेगी। 

यदि आपकी प्रेग्नेंसी में किसी प्रकार का रिस्क है, तब तो आपको प्रसूति विशेषज्ञ (स्त्री रोग विशेषज्ञ) का ही चुनाव करना चाहिए। प्राय: सामान्य प्रेग्नेंसी होने के बावजूद स्त्रियां अपना प्रसव (डिलीवरी) किसी विशेषज्ञ लेडी डॉक्टर से ही करवाना पसंद करती हैं। आपके लिए भी यही उचित है कि आप ऐसी लेडी डॉक्टर का चुनाव करें जो आपको एक पेशेंट न मानकर इंसान माने और आपकी शारीरिक समस्याओं के साथ-साथ भावनात्मक उलझनें भी सुलझाए। पोषण एवं स्तनपान संबंधी हिदायतें दे। बच्चे के जन्म को एक आसान प्रक्रिया बना दे।

क्रियाकलाप 

गर्भावस्था में सामान्य क्रियाकलाप करती रहें, परंतु शारीरिक क्षमता से अधिक कार्य न करें। बहुत भारी वस्तुएं मत उठाएं तथा समुचित विश्राम करें। साथ ही नियमित व्यायाम आपको एकदम स्वस्थ रखेगा। सामान्य प्रक्रियाएं आपकी मांसपेशियों को स्वस्थ रखती हैं, जिससे आपका प्रसव सरलता से होता है।

मनःस्थिति 

अनेक प्राचीन संस्कृतियां इस बात पर जोर देती हैं कि गर्भवती स्त्री की मन:स्थिति तथा क्रियाकलाप सकारात्मक व प्रसन्नचित्त होनी चाहिए। क्योंकि वे इस बात पर विश्वास करती हैं कि जिस वस्तु से भी स्त्री (मां) प्रभावित होती है, उससे उसके भीतर पलने वाला शिशु भी प्रभावित होता है। तात्पर्य यह है कि गर्भवती स्त्री अपने भीतर के शिशु को प्रत्यक्ष रूप से अवश्य प्रभावित करती है।

गर्भवती स्त्री के न करने योग्य कार्य 

गर्भवती स्त्री को प्रसव के समय तक अधिक श्रम नहीं करना चाहिए। वह अधिक वजन न उठाए, अधिक मैथुन के फेर में न पड़े, उल्टी या दस्त लाने वाली तेज दवा न ले, दिन में सोए नहीं और रात को जागे नहीं; चिंता या शोक न करे तथा घुड़सवारी या नृत्य न करे। वह डरे नहीं, जोर से खांसे नहीं, ऊंची-नीची जगहों पर चढ़े-उतरे नहीं तथा शरीर को टेढ़ा-मेढ़ा करके न बैठे। मल, मूत्र और डकार आदि वेगों को न रोके। तेल आदि की अधिक मालिश न कराए। 

वात आदि दोषों से या चोट आदि लगने से स्त्री के जिस भाग को पीड़ा पहुंचेगी, गर्भस्थ बालक के भी उसी भाग को पीड़ा पहुंचेगी। ‘सुश्रुत संहिता’ में लिखा है कि गर्भवती स्त्री ऋतुस्नान करने के दिन से ही प्रसन्न रहे, शृंगार करे, साफ कपड़े पहने तथा मैले-कुचैले, लंगड़े-लूले, अंधे-बहरे और काने मनुष्यों का स्पर्श न करे। बदबूदार और मन बिगाड़ने वाली चीजों से दूर रहे। चित्त को पीड़ित करने वाली कहानियां न पढ़े और न ही इस तरह की बातें सुने। सड़ी-गली और बासी चीजें कदापि न खाए। सूने मकान में न रहे। श्मशान में न जाए, वृक्ष के नीचे न रहे तथा क्रोध और भय से सर्वथा परहेज करे। 

इसके अतिरिक्त कभी चिल्लाकर न बोले। बहुत ज्यादा न सोए और बहुत देर तक बैठी भी न रहे। बिना कुछ बिछाए खाली भूमि पर न सोए, उछल-कूद न करे तथा अपना मनपसंद भोजन करे। गर्भ रहने के समय से प्रसव होने तक गर्भवती स्त्री इन नियमों का पालन अवश्य करे। 

समस्या का समाधान 

यदि आप गर्भवती हो जाती हैं, तो आपको आवश्यक रूप से किसी हॉस्पिटल या नर्सिंग होम में प्रसूति ओ.पी.डी. या किसी प्रसूति विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। आमतौर पर जब स्त्री परामर्श के लिए जाती है, तब तक प्राय: तीन मास पूर्ण हो चुके होते हैं। यदि आप चिकित्सीय परामर्श लेती रहें, तो गर्भावस्था तथा प्रसव के समय बहुत कम समस्याएं आती हैं। कोई भी संभावित खतरे की स्थिति को निवारक विधियों से नियंत्रित किया जा सकता है। 

यदि यह आपकी पहली गर्भावस्था नहीं है, तो पिछली गर्भावस्थाओं, गर्भपातों, गर्भस्राव, पिछले मासिक धर्म की तिथि, गर्भनिरोधक का उपयोग एवं पिछले रोगों आदि के विषय में डॉक्टर आपसे पूछताछ कर सकती है। जो सही बात हो, आप डॉक्टर को बताएं। डॉक्टर ही आपकी समस्या का सही समाधान कर सकती है। 

एक स्त्री की समस्या यह थी कि गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन करने के बावजूद वह गर्भवती हो गई। इस बात का उसे पता ही नहीं चला तथा वह पूरे माह गोलियां लेती रही। अब वह इस चिंता से ग्रस्त थी कि कहीं गोलियों का प्रभाव उसके गर्भस्थ शिशु पर तो नहीं पड़ जाएगा? उसकी यह चिंता कम महत्वपूर्ण नहीं थी। दरअसल गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन बंद करने के बाद जब एक मासिक चक्र पूरा होता है तब गर्भधारण करना ठीक रहता है। फिर भी इसमें ज्यादा घबराने की कोई बात नहीं है, क्योंकि इस प्रकार की गर्भावस्था में गर्भस्थ शिशु को कोई हानि नहीं होती। इस बारे में कोई भी चिंता करना व्यर्थ है। 

एक गर्भवती स्त्री इस बात से मायूस थी कि उसने कंडोम और स्पर्मीसाइड्स का प्रयोग करने के बाद भी कैसे गर्भधारण कर लिया। यदि वह गर्भधारण नहीं करना चाहती थी और इससे मायूस है तो यह बात अलग है। लेकिन यदि गर्भधारण की वजह से वह मायूस नहीं है, बल्कि यह सोचकर मायूस है कि इससे उसमें कोई विकार तो नहीं उत्पन्न हो गया है, तो उसका मायूस होना बिल्कुल गलत है। इससे कभी कोई विकार नहीं हो सकता तथा गर्भावस्था के आरंभ में इनके प्रयोग से भी कोई समस्या नहीं होती। यदि गर्भावस्था मायूस नहीं कर रही है, तो प्रसन्न रहिए और आने वाले शिशु के स्वागत के लिए स्वयं को तैयार रखिए। 

गर्भनिरोधक के बहुत से उपाय हैं, जिनमें से एक आई.यू.डी. भी है। एक स्त्री आई.यू.डी. का प्रयोग कर रही थी, फिर भी गर्भवती हो गई। गर्भ रह जाने का उसे मलाल नहीं था, उसे तो यह बात परेशान कर रही थी कि अब उसका गर्भकाल सुरक्षित रहेगा या नहीं? गर्भनिरोधक के प्रयोग के बाद भी गर्भवती हो जाना एक शोचनीय बात है। ऐसा बहुत कम देखने में आया है। गर्भ रह जाने का कारण यह हो सकता है कि आई.यू.डी. सही ढंग से न लगी होगी अथवा अपने स्थान से खिसक गई होगी। डॉक्टरी जांच से यह पता लग जाता है। डॉक्टर ही इस बारे में सही निर्णय ले सकती है कि क्या करना चाहिए। यदि आई.यू.डी. अपने स्थान से खिसक गई है और उसका धागा दिख रहा है तो उसे निकाला जा सकता है, अन्यथा वह प्रसव के समय ही बाहर आएगी। 

आई..डी. का धागा गर्भावस्था के प्रारंभ में ही निकाल देना चाहिए अन्यथा संक्रमण का खतरा काफी बढ़ जाता है। यदि इसे शीघ्र नहीं निकाला जाए तो गर्भावस्था में आगे परेशानी हो सकती है। सफल व स्वस्थ गर्भावस्था के लिाकर निकालना आवश्यक है। न निकालने से गर्भपात का भय होता है। इस रक्तस्राव, ऐंठन अथवा ज्वर आदि की शिकायत भी हो सकती। डॉक्टर से कुछ न छिपाएं और डॉक्टर जो ठीक समझे, उसे करने में। 

गर्भावस्था की समस्याएं  

गर्भावस्था के दौरान शारीरिक परिवर्तन

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

2 × 5 =