स्वतंत्रता दिवस पर निबंध-Independence Day essay in hindi(15 August पर निबंध)

15 August पर निबंध

स्वतंत्रता दिवस पर निबंध-Independence Day essay in hindi

स्वतंत्रता दिवस पर निबंध-  15 अगस्त, 1947 का दिन भारतीय इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है, जहाँ से उन्मुक्त भारत का अभिनव अध्याय खुलता है। इसी 15 अगस्त को विदेशी शासन के काले बादल छंटे थे, विदेशियों के अत्याचारों का करकापात बंद हुआ था, उनके शोषण का शोणितस्राव रुका था। उस दिन की उपा बंदिनी नहीं थी, उस दिन की सुहावनी किरणों पर दासता की कोई परछाईं नहीं थी। उस दिन कहीं भी गुलामी की वह दुर्गंध नहीं थी। उस दिन का सिंदूरी सबेरा पक्षियों की चहचहाहट और देशवासियों की खिलखिलाहट से अनुगुंजित हो रहा था। जनजीवन ने मुद्दत के बाद नई अंगड़ाई ली थी। एक नई ताजगी का ज्वार सर्वत्र लहरा रहा था। 

1292 ई० में ही तराइन के मैदान में पृथ्वीराज की पराजय के साथ-साथ हमारे स्वातंत्र्य-सूर्य को ग्रहण लग गया था, किंतु 1757 ई० के पलासी-युद्ध में तो उसे अँगरेज-असुर ने पूरी तरह ग्रस लिया। परिणामतः, भारतमाता पूरी बंदिनी हो गई और हम उनकी संतान पूर्णतः लौह-श्रृंखलित । हम जानते हैं कि जब स्वतंत्रता चली जाती है, तब जीवन निस्तेज होता है, उसमें कोई उत्साह नहीं रहता। स्वतंत्रता यदि स्वर्ग है, तो परतंत्रता साक्षात नरक। परतंत्रता संसार का सबसे घृणित पाप है। सुप्रसिद्ध चिंतक सुकरात ने कभी कहा था कि परतंत्रता अत्याचार और डकैती की अमानुषी प्रणाली है। 

आर० जी० इगरसोल ने कहा था कि नेत्रों के लिए जैसे प्रकाश है, फेफड़ों के लिए जैसे वायु है, हृदय के लिए जैसे प्यार है, उसी प्रकार मनुष्य की आत्मा के लिए स्वतंत्रता है। इस खोई हुई स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए हमारे अनगिनत नौजवान फाँसी के तख्ते पर हँसते-हँसते झूल गए, कितनी माताओं ने अपने नौनिहालों को ममता की गोद से उछालकर भाले की नोकों पर टँग जाने के लिए हृदय पर पत्थर रख लिया, कितनी बहनों ने अपने माथे में सिंदूर के बदले राख का टीका लगाना स्वीकार किया। आजादी का इतिहास लिखने में काली स्याही कभी सक्षम नहीं हो पाती उसे लिखने के लिए खून की धारा बहानी पड़ती है। 

वीर भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम, सुभाषचंद्र बोस जैसे वीरबाँकरों की शहादत पर, गोखले-तिलक-गाँधी की तपस्या पर, वीर सुभाष और सावरकर के दुर्दीत साहस पर, जलियाँवाला बाग की रक्तसिंचित भूमि की बयार पर स्वतंत्रता का सरज दमका था-इसी 15 अगस्त 1947 के दिन । अँगरेज-शासकों ने अपना बोरिया-बिस्ता गोल किया था और भागे थे सात समुंदर पार । 

15 अगस्त, 1947 को सारे भारतवर्ष में यह स्वतंत्रता-दिवस किस धूमधाम, किस शान-शौकत से मनाया गया था—इसे वे ही जानते हैं, जिन्होंने अपनी आँखों देखा होगा। लगता था, हमारी धरती के भाग्य फिर से जाग उठे हैं। क्या गाँव, क्या नगर, क्या खेत, क्या पहाड़, क्या रेगिस्तान-सर्वत्र आनंद का पारावार लहरा उठा था। गली-गली में उमंगों के कंकम उड रहे थे-खुशियों के हिंडोले पर जनमत हिल्लोलित हो रहा था। बहुत दिनों की बीमारी से मुक्त व्यक्ति को जिस प्रकार भोजन अच्छा लगता है, बहुत दिनों तक अँधेरे बंद कमरे में कैद रहने के बाद खुली हवा जितनी मनभावनी लगती है, वही स्थिति उस दिन भारत में बच्चे-बच्चे की थी। 

तब से हर वर्ष यह 15 अगस्त हमारे समक्ष एक राष्ट्रीय पर्व की भाँति आता है, खुशियों की बहार लुटा जाता है। इस दिन देशभर में जन-अवकाश (Public holiday) रहता है। कचहरी, कार्यालय, न्यायालय, राजकीय भवन, विद्यालय महाविद्यालय-सब पर तिरंगा झंडा फहराया जाता है; ‘जन-गण-मन-अधिनायक जय हे भारत भाग्यविधाता’-यह राष्ट्रगीत गाया जाता है, स्वतंत्रता के महत्त्व को समझानेवाले भाषण दिए जाते हैं। मिठाइयाँ खिलाई और खाई जाती हैं, नाच-गाने, कविगोष्ठी, मुशायरे आदि के विशेष कार्यक्रम रहते हैं।

रात में घर-बाहर दीपमालिकाओं से सजाया जाता है। नगर के मुख्य द्वारों पर विशेष सजावट रहती है। लगता है, एक बार पुनः समय से पूर्व ही दीपावली आ गई हो। होटलों में गजब बहार होती है। पत्रिकाएँ तो रंग-बिरंगे चित्रों, तरह-तरह की कहानियों और निबंधों से सज जाती 

है|15 अगस्त आनंद और त्याग का मंगलपर्व तो है ही, साथ ही हमारी वेदना और कचोट, हमारे आत्मदर्शन एवं आत्मपरीक्षण का स्मारक-दिवस भी है। यदि हम अपने इस कर्दममय वर्तमान से सचेत नहीं हुए, तो हमारी आजादी की नैया इसी में फंस जाएगी, जिससे उबर पाना बहुत ही मुश्किल है। यदि हमने समय रहते समस्याओं की अंध घाटियों को पार नहीं किया, तो हमारी स्वतंत्रता का सूरज डब जाएगा और तब पता नहीं, कितनी लंबी रातों के बाद पुनः नया सबेरा दमकेगा। 

 हमें स्मरण रखना चाहिए कि शताब्दियों की साधना का यह पौधा अक्षयवट तभी बन सकता है, जब हम अपने स्वार्थों के कुत्सित घेरे मिटा दें, राष्ट्रप्रेम का दिव्य उत्स हमारे रोम-रोम से फूटे, इसके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए हम त्याग और तपस्या के अग्निपथ की यात्रा निरंतर जारी रखें।

More from my site

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *