स्वामी विवेकानंद की जीवनी-Biography Of Swami Vivekananda

स्वामी विवेकानन्द की जीवनी

स्वामी विवेकानंद की जीवनी – Biography Of Swami Vivekananda In Hindi

स्वामी विवेकानंद जन्म : 12 जनवरी 1863, मृत्यु : 8 जुलाई 1902 

‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ महापुरुष जन्म लेते हैं. उनका आविर्भाव समाज के हितार्थ होता है. समाज की रूढ़िवादी परंपरा का अनुसरण स्वामी विवेकानंद नहीं करते थे।अपितु समाज को बदल डालते हैं.  वर्तमान भारत के नीव डालने वाले ऐसे वीर सन्यासी स्वामी विवेकानंद ऐतिहासिक पुरुष थे| प्राणहीन आचार के कंकाल मात्र भारतीय समाज में प्राण स्पंदित किए और भारत की प्राचीन वेदांतिक परम्परा को आधुनिक युगोपयोगी रूप प्रदान किया|

मात्र 39 वर्ष 5 माह की आयु में उन्होंने चिर-समाधि प्राप्त की, परन्तु इस अत्यल्पकाल में ही उन्होंने वर्तमान भारत की एक सुदृढ़ आधारशिला प्रतिष्ठित की|स्वामी विवेकानन्द ने अपने देहान्त के कुछ दिन पूर्व एक महत्वपूर्ण उक्ति कही थी, जिसे उनके गुरु भ्राता स्वामी प्रेमानन्द ने सुना था. “यदि उस समय भारत में कोई दूसरा विवेकानंद होता तो वह समझ पाता कि विवेकानंद ने भारत के लिए क्या किया|

एक  युवा  संन्यासी के रूप में भारतीय संस्कति की गंध विदेशों में बिखेरने वाले विवेकानंद हित्य दर्शन और इतिहास के प्रकांड विद्वान थे |श्रीरामकृष्ण परमहंस से प्रभावित होकर वे आस्तिकता की ओर उन्मुख हुए थे और 1890 से उन्होंने सारे भारत में घूम-घूमकर ज्ञान की ज्योति जलानी शुरू कर दी। 31 मई, 1893 को वे शिकागो (अमेरिका) में ‘सर्वधर्म सम्मेलन’ में भाग लेने के लिए गए। 11 सितंबर को उन्होंने वहां अपना ऐतिहासिक भाषण दिया, जिसके मृत्यु : 8 जुलाई, 1902 समक्ष विश्व के मनीषियों का सिर श्रद्धा से झुक गया। 

1895 में वे इंग्लैंड रवाना हुए और वहां भी भारतीय धर्म और दर्शन का प्रसार किया। 1897 में भरतीयों की सेवा के लिए उन्होंने भारत में ‘रामकृष्ण मिशन’ (Rama Krishna Mission) की स्थापना की तथा अमेरिका में उन्होंने ‘वेदांत सोसाइटी’ (Vedant Society) की स्थापना की। विवेकानंद ने सदैव भारतीयों को अपनी संस्कृति और राष्ट्रीयता का सम्मान करने की प्रेरणा दी। 

स्वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम ‘नरेंद्रनाथ’ था। उनका जन्म 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता (पश्चिम बंगाल) के एक संपन्न परिवार में हुआ था। 16 वर्ष की आयु में उन्होंने कोलकाता से (1879 में) एंट्रेस की परीक्षा पास की। अपने शिक्षाकाल में वे सर्वाधिक लोकप्रिय और एक जिज्ञासु छात्र थे, किंतु हर्बर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) के नास्तिकवाद का उन पर पूरा प्रभाव था।

 श्रीरामकृष्ण परमहंस से मिलकर वे महान आस्तिक ‘विवेकानंद’ में बदल गए। परमहंस जी के अवसान के बाद उन्होंने भारतीय अध्यात्म एवं मानव-प्रेम के प्रचार का दायित्व अपने कंधों पर उठा लिया। इस महान ओजस्वी और यवा व्यक्तित्व का 8 जुलाई, 1902 को अल्पायु में ही महाप्रयाण हो गया। 

‘योग’, ‘राजयोग’ तथा ‘ज्ञानयोग’ जैसे ग्रंथों की रचना करके विवेकानंद ने यवा जगत को एक नई राह दिखाई है, जिसका प्रभाव जनमानस पर यगो-यगों तक छाया रहेगा। कन्याकुमारी में निर्मित उनका स्मारक आज भी उनकी महानता की कहानी कह रहा है। 

स्वामी विवेकानन्द 

सुधारक गण असफल हुए हैं. इसका क्या कारण है ? यही कि उनमें से केवल कुछ गिने-चुने लोगों ने ही अपने धर्म का भली-भाँति अध्ययन और चिन्तन किया है. समस्त धर्मों के प्रस्त्रवरण को समझने के लिए जिस साधना की आवश्यकता होती है, उसमें से कोई भी उस साधना में से होकर नहीं गया है.ईश्वर की कृपा से मैं दावे से कह सकता हूं कि मैंने इस समस्या का हल कर दिया 

                                        –स्वामी विवेकानन्द 

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