स्वाद का पता कैसे चलता है-Swad Ka pata kaise chalta hai

हमें स्वाद का पता कैसे चलता है-

 स्वाद का पता कैसे चलता है? How Taste Works The Tongue

 स्वाद का पता कैसे चलता है– हमारे शरीर में कुछ विशेष संवेदनशील कोशिकाएं होती हैं, जिन पर जब द्रव्य के कण टक्कर खाते हैं, तब उस द्रव्य के स्वाद के बारे में पता चलता है। इसके विपरीत पानी में रहने वाले प्राणियों के पूरे शरीर में ही स्वाद कलिकाएं होती हैं, जिससे वे स्वाद का पता लगाते हैं। उदाहरण के तौर पर मछलियां अपनी पूंछ के परों द्वारा भी स्वाद का पता लगाती हैं।

धरती पर रहने वाले जानवर मुंह में सघन रूप से स्थित कलिकाओं के द्वारा स्वाद का पता लगाते हैं। मनुष्यों में ये स्वाद कलिकाएं केवल जीभ पर ही स्थित होती है। आप अपनी जीभ को आइने में देखने पर पाएंगे कि वे छोटे-छोटे सूजे हुए मस्सों से ढकी हुई है, जिन्हें इल्ला या मस्से कहते हैं। स्वाद चखने की कलिकाएं इन्हीं के उभार पर स्थित होती है। 

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hamen Swad Ka pata kaise chalta hai

यहां यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि इन स्वाद कलिकाओं की संख्या विशेष प्रजातियों की जरूरत पर निर्भर करती है, जैसे कि एक बड़ी व्हेल छोटी मछलियों के झुंड को बिना चबाए क्योंकि निगल जाती है, इसलिए इसके कुछ ही कलिकाएं होती हैं या फिर बिल्कुल भी नहीं।

एक सूअर के 5500, गाय के 35000 और एक विशेष प्रकार के हिरन के करीब 50,000 स्वाद कलिकाएं होती हैं। मनुष्य सबसे ज्यादा स्वाद चखने वाला संवेदनशील प्राणी है, इसके बावजूद भी उसके पास केवल 3000 स्वाद कलिकाएं ही होती हैं।

 मनुष्य की जीभ पर स्थित स्वाद कलिकाएं अलग-अलग क्षेत्र में विभाजित होती हैं, अर्थात् ये क्षेत्र ही विभिन्न प्रकार के स्वाद चखने में संवेदनशील होते हैं, जैसे कि जीभ का पिछला भाग कड़वे के लिए, जीभ के किनारे का भाग खट्टा और नमकीन स्वाद के लिए और जीभ का अग्र नुकीला भाग मिठाई या मीठे स्वाद के लिए संवेदनशील होता है। जीभ के मध्य भाग का क्षेत्र बिना स्वाद कलिकाओं का होता है, यह किसी भी प्रकार के स्वाद को नहीं बता सकता है। 

सूंघना भी हमारी स्वाद चखने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कम-से-कम हम जिस स्वाद के बारे में सोचते हैं, वह सिर्फ स्वाद ही नहीं बल्कि वास्तव में हमारा सूंघना भी है-यह सच है। जब हम कुछ चीजों का स्वाद लेते हैं, जैसे-कॉफी, चाय, तम्बाकू, शराब, सेब, संतरा और नींबू आदि का तो उसकी खुशबू को भी हम महसूस करते हैं। 

उदाहरण के लिए जब हम कॉफी पीते हैं तो सबसे पहले उसकी गर्माहट हमें महसूस होती है, उसके बाद उसके एसिड में से निकलने वाली कड़वाहट, फिर उसमें डाला गया मीठा (यदि डाला गया है तो) के स्वाद का पता चलता है। यह तब तक नहीं होता, जब तक कि कॉफी की गर्म महक हमारे नाक और गले से होती हुई हमारे दिमाग को इसका संदेश नहीं पहुंचा देती है। क्या वास्तव में हमने कॉफी चखी है-इसको साबित करने के लिए यदि आप अपनी नाक को कपड़े सुखाने की पिन से बंद कर लेंगे, तो आप कॉफी का स्वाद बताने में ही समर्थ नहीं हो सकेंगे, बल्कि हो सकता है कि आप बिल्कुल अलग खाने और पीने वाली चीजों में भी अंतर बताने में भी असमर्थ हो जाएं।

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