Success tips for students in hindi-हर स्थिति में प्रसन्नचित रहिए

Success tips for students in hindi-

Success tips for students in hindi-हर स्थिति में प्रसन्नचित रहिए (Develop the Art of Pleasure)                         

1.हर क्षण प्रसन्न रहने वाले व्यक्ति की जिन्दगी प्रसन्नता से भरी होती है. सफलता से प्रसन्नता प्राप्त हो, यह अपेक्षित नहीं, किन्तु प्रसन्नता से हर सफलता हरी होती है. वस्तुतः प्रसन्नता-सम्पन्न व्यक्ति ही वास्तविक सम्पन्नता को उपलब्ध हो सकता है. आनन्द से भरा व्यक्ति ही जीवन की सार्थकता को उपलब्ध हो सकता है. सदैव प्रसन्न रहना और लोगों को प्रसन्न रखना एक बहुत बड़ी कला है, जो इस कला में पारंगत होता है, वही सफल होता है,

2. प्रसन्नता भीतर से आनी चाहिए, लेकिन यह तब ही संभव है, जब भीतर रिक्तता हो. यदि आप भीतर से प्रसन्न होंगे तो प्रसन्नता की झलक आपके चेहरे पर स्वतः ही छलक उठेगी और तब आस-पास के वातावरण में प्रसन्नता की फुलवारी महक उठेगी. ऊपर से औढ़ी हुई प्रसन्नता का सहारा मत लीजिए और लोगों की बनावटी प्रसन्नता के धोखे में कभी मत आइए.

3. जो अपने काम के साथ गाना भी गाता है, वो सबको भाता है. वैसे तो काम करना ही प्रसन्नता की बात होनी चाहिए. कोई भी सफलता पूर्णतः आपकी तब ही हो सकती है, जब कि वह आपके लिए प्रसन्नता की बात हो. जिन्दगी आपके नाम हो सकती है, बशर्ते कि यह आपके लिए प्रसन्नता की बात हो.

4.परमात्मा ने अपनी अनुपम कृति के रूप में मानव शरीर का सृजन किया और उसमें एक पवित्र आत्मा का प्रावधान कर दिया. यहाँ तक तो सब ठीक था, किन्तु परमात्मा ने काफी सोच विचार कर इस शरीर में एक चंचल ‘मन’ का भी प्रावधान कर दिया, व्यक्ति के तमाम उपद्रवों एवम् कष्टों का कारण बस यह ‘मन’ ही है. प्रसन्न रहने के लिए इस ‘मन’ को साधना पड़ता है. अतः तन से ही नहीं, मन से भी प्रसन्न रहिए. मन से ही नहीं, दिल से भी प्रसन्न रहिए. दिल से ही नहीं, दिमाग से भी प्रसन्न रहिए. यही समग्रता है. समग्रता ही सफलता है.

5. प्रसन्नता उतनी ही सहज एवम् स्वाभाविक है, जितनी कि हमारी ‘श्वास’ है. हँसने और रोने के लिए किसी भाषा की आवश्यकता नहीं होती. सबका हँसना और रोना एक सा ही होता है. आदमी ही नहीं, दुनिया का हर प्राणी हँसने और रोने को आसानी से समझ लेता है. इसलिए सदैव प्रसन्न रहिए. आपकी प्रसन्नता आपके लिए ही नहीं सबके लिए प्रसन्नता की बात है. प्रसन्नता केवल अभ्यास की बात है, इसके लिए कुछ भी खर्चने की आवश्यकता नहीं होती. प्रसन्नता तो जितनी लुटाओ, उतनी ही लौट कर आती है.

6. जब आप ऐसा काम करने में सफल हो जाते हैं, जिसके लिए आप आश्वस्त नहीं थे या जिसके लिए दूसरों को आपकी क्षमता पर विश्वास नहीं था, तब आपको सबसे बड़ी प्रसन्नता होती है. लेकिन यह तब ही सम्भव है, जब आप काम करते समय निरन्तर आनन्द में उतरते रहें. आनन्द में उतरते हुए आनन्द को काम में और काम को आनन्द में रूपान्तरित करते रहें. 

7.प्रसन्नता का रहस्य जिज्ञासा में छिपा होता है और जिज्ञासा का रहस्य सफलता में. किन्तु यह भी सच है कि सफलता का रहस्य प्रसन्नता में छिपा होता है. वस्तुतः वही सफल हो सकता है, जो अपनी और दूसरों की प्रसन्नता का रहस्य समझता हो. हर परिस्थिति में प्रसन्न रहना ही व्यक्ति की सबसे बड़ी सम्पत्ति है, यही बैंक बैलेन्स है, यही जमा पूँजी है. जब भी आप किसी को याद करते हैं, उसका हँसता हुआ चेहरा ही याद आता है. रोते हुए चेहरे को कोई भी याद रखना नहीं चाहता.

8. हम केवल ‘वर्तमान’ में ही प्रसन्न हो सकते हैं. ‘कल’ प्रसन्न थे या ‘कल’ प्रसन्न होंगे, इस आधार पर आज प्रसन्न नहीं हो सकते. जब वर्तमान का हर क्षण प्रसन्नता के साथ गुजरता है, तब हम भूत या भविष्य में अप्रसन्न कैसे हो सकते हैं. भूत और भविष्य का निर्माण तो वर्तमान से ही होता है और जब वर्तमान प्रसन्नता से भरा हो तो भूत-भविष्य भी प्रसन्नता-युक्त ही होंगे.

9. अकूत कष्टों एवम् विषम परिस्थितियों में भी यदि हम टूटते नहीं हैं, सहजता से आगे बढ़ते रहते हैं. हर बात पर सिर कूटते नहीं है, तो इससे बढ़कर प्रसन्नता की बात और हो ही क्या सकती है! अगर कोई बीमारी टल नहीं सकती, तो बेहतर है बीमारी का भी आनन्द उठाया जाय. ऐसा आनन्द रोज-रोज तो मिल नहीं सकता. कुछ भी असंभव नहीं है, अगर हम हर परिस्थिति में प्रसन्न चित्त रहने की कला विकसित कर लें.

दृष्टान्त- एक किसान अपनी सरसों की फसल के साथ बहुत खुश था. सूखे के कारण अगले साल खेत पड़त रह गया. फिर भी वह खाली खेत के साथ ही खुश था. यह सोचकर कि अगले साल तो बरसात होगी ही. किन्तु दुर्भाग्यवश अगले साल भी बरसात नहीं हुई, फिर भी किसान खुश था. कम से कम खेत तो उसके पास था ही. किन्तु लगातार सूखे के कारण खेत बिक गया, फिर भी वह खुश था. दूसरों के खेत तो मौजूद थे. किन्तु दुर्भाग्यवश लगातार सूखे के कारण उसे आस-पास काम मिलना भी बन्द हो गया. मजबूरी में किसान को अपना घर भी बेचना पड़ा. अब तो वह बिल्कुल खानाबदोश हो गया । था. जहाँ काम मिला, वही चला गया. फिर भी खुश था. कम से कम जीवित तो था, जीवित होने से बड़ी खुशी र और हो भी नहीं सकती. यानी ‘हम है’ यही क्या कम XP है. ऐसा सोच लेने पर हर विपरीत परिस्थिति अनुकूल होती चली जायेगी. 

 Self development tips in hindi-‘अहम्’ को अपने से बड़ा मत होने दीजिए (Do Not Let Your Ego to Be Taller Than You) 

1.संस्कृत के ‘अहम्’ शब्द का अर्थ होता है ‘मैं’. भाषा कोई भी हो, ‘अहम्’ का हर पर्याय अहंकार से भरा होता है. अहम् का अणु जब जगत से जुड़ता है, तब दुख उपजता है और जब आत्मा से जुड़ता है, तब दिव्य होकर उमड़ता है. इसलिए अहम् को जगत से मत जुड़ने दीजिए.

2. सच तो यही है कि अहम्कारी लोगों ने ही परमात्मा की परिकल्पना की है. हर आदमी चाहता है कि ऊपर वाला सिर्फ उसकी ही फिक्र करे. जरा सोचिए, क्या ईश्वर के पास अपना कोई कार्य नहीं है ? इसलिए बेहतर तो यही है कि आप अपना कार्य करें और ईश्वर को अपना कार्य करने दें. आदमी अपने अहम् के कारण ईश्वर को अपने अनुकूल ढ़ालने में लगा रहता है, लेकिन जब ईश्वर अपने अहम् पर आ जाता है, तब आदमी की कुछ भी नहीं चल पाती है.

3. हम अपने ‘अहम्’ के कारण ही व्यक्ति अथवा प्रकृति के सामने झुकने में अपना अपमान समझते हैं. इसीलिए हमने भगवान को पत्थर बनाकर हर जगह बिठा दिया है और हम पत्थर के आगे झुकने में अपनी शान समझते हैं. कारण स्पष्ट है, पत्थर के आगे झुकने में किसी के ‘अहम् को चोट नहीं पहुँचती है. पत्थर कोई प्रतिक्रिया नहीं करता. हम अपनी सुविधानुसार झुक लेते हैं और अपनी सुविधानुसार भगवान बिठाते रहते हैं. सबसे बड़ा आश्चर्य तो यही है कि हमने पत्थर को परमात्मा से भी बड़ा मान लिया है. अर्थात् हमने अपने अहम् को भगवान से भी बड़ा कर लिया है.

4. दुनिया की सबसे छोटी कविता ‘I, Why?’ भी अहम् को चुनौती देती हुई ही सामने आयी है. सच भी यही है कि आज तक आदमी ने अपने अहम् के कारण ही पग-पग पर चोट खाई है. देखा जाय तो आदमी ने केवल एक ही चीज का निर्माण किया है और वह है ‘अहंकार’. व्यक्ति द्वारा निर्मित अन्य वस्तुयें तो वस्तुतः ‘अहंकार’ के ही सह-उत्पाद हैं. ‘अहम्’ भारीपन एवम् बैचेनी पैदा करता है. अहम् तो रेत का किला है, जो कभी भी गिर सकता है. बल्कि वह तो गिरा हुआ ही है. उसका होना तो महज भ्रम ही हो सकता है. अहम् का अन्त सदा अहंकार में होता है और अहंकारी व्यक्ति गिरा हुआ ही होता है. व्यक्ति जितना छोटा होता है, उसका अहम् उतना ही बड़ा होता है. और अहम् जितना बड़ा होता है, आदमी उतना ही कष्ट उठाता है.

6. दस गरीब आदमी एक कमरे में आराम से सो सकते हैं, किन्तु दो राजा एक राज्य में एक साथ नहीं रह सकते. यदि आप चाहते हैं कि लोग आपको भला कहें तो अपने अहम् को अपने से छोटा करना ही पड़ेगा. अहम् को बिल्कुल छोड़ा तो नहीं जा सकता, आज तक कोई छोड़ भी नहीं पाया है, किन्तु कम तो किया ही जा सकता है. ‘अहम्’ तो सबसे बड़ी नकारात्मक ऊर्जा है, जिसके रहते आप कभी सफल नहीं हो सकते. 

 7.लाखों-करोड़ों वर्षीय मानव सभ्यता की तुलना में किसी एक व्यक्ति का क्रियाशील कार्यकाल मुश्किल से पैंतीस साल का हो सकता है. जरा सोचिए, एक नितान्त ही नगण्य अन्तराल और नगण्य योगदान के लिए ‘अहम्’ से भरे होने का औचित्य ही क्या है ? जरा हिसाब लगाइए, आपके पास ‘अहम्’ करने लायक ऐसा क्या है, जो दूसरों के पास नहीं है ? शरीर, विचार, भाषा, सम्पदा, परिवार सब कुछ तो समाज से ही प्राप्त किया है, फिर ‘अहम्’ किस बात का ? याद रखें, अहम् का असर आपके स्वास्थ्य और आपके कार्यकलापों पर ही पड़ता है, दूसरों पर नहीं पड़ता. इसलिए अहम् को छोटा करने पर ही कोई व्यक्ति सफल हो सकता है. सफलता से विनम्रता आती है, अहंकार नहीं आता.

8.आदमी की मूंछ और कुत्ते की पूँछ सदा ऊँची ही रहती है. इसके लिए दोनों को काफी कठिनाइयाँ भी उठानी पड़ती हैं. कुत्ते की पूँछ मालिक के सामने हिलने तो लगती है, किन्तु आदमी की मूंछ तो मन्दिर में भी ऊँची ही रहती है. देखा जाय तो मन्दिरों की इमारतें मूंछों के कारण ही खड़ी होती हैं. आदमी अपनी मूंछ को ऊपर से जितनी छोटी करता है, उसके भीतर की मूंछ उतनी ही बड़ी हो जाती है. यदि आपको जीवन में कुछ कर गुजरना है तो अपने भीतर की मूंछों को बड़ी मत होने दीजिए.

9. सन्त कबीर ने कितनी मजेदार बात कही है ‘प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय । राजा पा जेइ रूचे, शीश देइ ले जाय ।। अर्थात् प्रेम को उपलब्ध होने के लिए सिर कटवाना होगा, क्योंकि सिर ही अहम् एवम् विचारों का घर होता है, अपने सिर को अहम् व विचारों से रिक्त करना होगा, तब ही आपके और प्रेम के बीच की बाधा हटेगी.

दृष्टान्त- (क) घमण्डी लाल को इस बात का बड़ा घमण्ड था कि वह नास्तिक था. अपने अकाट्य तर्कों के आधार पर वह सबसे उलझता रहता था. ईश्वर को नकारने में उसके ‘अहम्’ की ही पुष्टि होती थी. एक बार वह भयंकर रूप से बीमार हुआ. मृत्यु निकट थी. एक सन्त उसके पास आया और सुझाव रखा कि कम से कम अब तो ईश्वर का स्मरण कर लो. घमण्डी लाल ने आँखें खोलते हुए हाथ जोड़ कर बोला-‘परमात्मा का शुक्र है कि मैं नास्तिक हूँ’. अर्थात् नास्तिक से नास्तिक व्यक्ति भी ईश्वरीय सत्ता में विश्वास रखता है. अपने अहम् के कारण भले ही वह कुछ भी कहता रहे. अर्थात् अहम् को नियंत्रित किये बगैर कोई भी जीवन की सफलता को उपलब्ध नहीं हो सकता. 

(ख) नत्थू लाल भयंकर नास्तिक था. अपने कमरे की दीवारों पर जगह-जगह लिख रखा था-‘GOD IS NOWHERE.’ (ईश्वर कहीं नहीं है) जीवन की ढलान पर नत्थू लाल को लकुआ मार गया. वह लाचार एवम् बेबस हो गया. इस पर कुछ लोगों ने सलाह दी कि ‘इस अर्थहीन ‘अहम्’ में क्या रखा है ? कम से कम अब तो ईश्वरीय सत्ता में विश्वास कर लो. नत्थू लाल ने इस पर गंभीरतापूर्वक विचार किया. उसे अहसास हुआ कि उसका ‘अहम्’ ईश्वर के कारण ही है. वह मन ही मन ईश्वर का स्मरण करने लगा. ‘अहम्’ तिरोहित होने लगा. नत्थू लाल धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा. दीवारों पर लिखे गये वाक्य में अब उसने थोड़ा-सा संशोधन कर दिया. NOW HERE शब्द के W एवम् H के बीच एक डेश लगाते हुए इसे दो भागों में विभक्त कर दिया. अब वाक्य हो गया GOD-IS-NOW-HERE (ईश्वर अब यहीं हैं) अर्थात् ‘अहम्’ को हटाने के लिए एक छोटे से डेश की ही आवश्यकता होती है. यही जीवन की सफलता है. 

Self improvement tips in hindi- अपने क्रोध पर काबू रखिए (Keep Your Temper) 

Self improvement tips in hindi-

1.मन की तीन वृत्तियाँ होती हैं-देहात्मक, आवेशात्मक एवम् रसात्मक. देहात्मक जैसे-सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास आदि, आवेशात्मक जैसे-भय, काम, क्रोध आदि, रसात्मक जैसे-प्रेम, श्रृद्धा, काम, आनन्द आदि. अर्थात् क्रोध भी मन की एक वृत्ति ही है. इसलिए क्रोध पर काबू रखने के लिए मन को साधना पड़ेगा और मन को साधने के लिए ध्यान में उतरना पड़ेगा. जब मन सध जाए तो सभी वृत्तियाँ अपने आप सध जायेंगी.

2. क्रोध एक नकारात्मक ऊर्जा है. क्रोध भीतरी व बाहरी कारणों से आता है, क्रोध के दौरान हृदय की गति बढ़ जाती है, रक्तचाप भी बढ़ जाता है. साथ ही एनर्जी हारमोन्स के स्तर में वृद्धि हो जाती हैं. क्रोध से तनाव बढ़ता है, कोलेस्ट्रोल बढ़ता है, प्रतिरोधी क्षमता कम हो जाती है, तीव्र संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है. इसलिए क्रोध-वृत्ति को नियन्त्रित रखना आवश्यक है,

3. जो क्रोधित नहीं हो सकता, वह मूर्ख होता है. किन्तु जो क्रोधित नहीं होता, वही समझदार होता है. क्रोधित होना आसान है, किन्तु सही बात पर, सही वक्त पर और सही व्यक्ति पर क्रोधित होना इतना आसान नहीं है. इसलिए यदि क्रोधित होने से पहले इन सभी पहलुओं पर विचार कर लिया जाए तो फिर संभवतः कोई क्रोधित हो ही नहीं सकेगा. क्रोध तो एक तात्कालिक अभिव्यक्ति है, इसलिए यदि इसे थोड़ा सा भी विलम्बित कर दिया जाय तो क्रोध पर नियन्त्रण स्वतः ही हो जायेगा.

4. जब जीवन हमारे अनुसार नहीं चलता, जब कोई कार्य या व्यक्ति हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप खरा नहीं उतरता, तब हमें गुस्सा आता है. विषय चिन्तन से आसक्ति और आसक्ति से कामनायें उत्पन्न होती हैं. कामनाओं में विघ्न पड़ने पर गुस्सा आता है. जब प्रेम व करूणा में कमी आती है, तब क्रोध की बारी आती है. जिस वक्त क्रोध मस्तिष्क पर आधिपत्य कर लेता है, तब विचार शक्ति शून्य हो जाती है. क्रोधित व्यक्ति का मुख तो खुला रहता है, किन्तु आँखें बन्द हो जाती हैं. इसलिए जहाँ तक हो सके, क्रोध से बचिए.

5. शराब पीने या क्रोधित होने पर आदमी पशुता में लौट जाता है. याद रखें, शराब पीकर या क्रोधित होकर दुनिया को नहीं बदला जा सकता. इसलिए दुनिया जैसी है, वैसी ही स्वीकार करें. पर हाँ, यदि आप अपने आपको बदल लेते हैं तो दुनिया आपको बदली हुई ही लगेगी. किसी ने ठीक ही कहा है “जिसे रूठना, मनना और मनाना आता है, खुदा भी उसके पीछे-पीछे चला आता है।’

6. जिस प्रकार छोटा बर्तन जल्दी गर्म हो जाता है अथवा जल्दी छलक उठता है, उसी प्रकार औछा आदमी भी जल्दी ही लाल पीला होकर क्रोधित हो उठता है. इसलिए छिछले नहीं, गहरे बनिए, धीर और गंभीर व्यक्तित्व के धनी बनिए. याद रखिए, आपकी किसी न किसी कमजोरी का परिणाम ही क्रोध है. क्रोध ही सफलता की राह में सबसे बड़ा अवरोध है. इस अवरोध को हटाइए, क्रोध को बोध में बदलिए. तब सर्वत्र आपकी प्रशंसा होगी, हर काम में आपको सफलता प्राप्त होगी.

7. याद रखें, क्रोध में लिए गए निर्णय प्रायः गलत ही होते हैं. क्रोध एक खर्चीली विलासिता है, जिसे बड़े लोग ही भोग सकते हैं. क्रोध में हम खोते ही खोते है, पाते कुछ भी नहीं. आपके क्रोधित होने पर यदि सामने वाला व्यक्ति शान्त रहता है, तब आपका क्रोध आपके पास ही लौट आयेगा. तब आप कितने आग बबूला होंगे. लौटे हुए क्रोध को आप आसानी से हजम नहीं कर पायेंगे. आपके क्रोधित होने पर यदि सामने वाला भी तत्काल ही क्रोधित हो उठे, तब जो घमासान होगा, वह देखने लायक होगा. अर्थात् क्रोधित होना या दूसरे के गुस्से पर उत्तेजित होना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है.

8. क्रोध और हिंसा पाशविक वृत्तियाँ हैं. आदमी भी पशुता के दौर से गुजर कर ही आया है, इसीलिए अभी तक क्रोध व हिंसा को छोड़ नहीं पाया है. आदमी की तमाम समस्याओं का कारण भी यही है. तमाम महायुद्धों का कारण भी यही है. यह सही है कि हम क्रोध और हिंसा को पूरी तरह छोड़ नहीं सकते, किन्तु नियन्त्रित तो कर ही सकते हैं.

9. क्रोध पर काबू रखने के बहुत से तरीके हो सकते हैं. हर तरीका हर व्यक्ति पर लागू नहीं हो सकता, फिर भी यदि आप चाहें तो अपने क्रोध पर काबू रख सकते हैं. कुछ साधारण तरीके-(A) क्रोध के दौरान अपनी दोनों मुठ्ठियाँ कसकर बन्द करलें और धीरे-धीरे खोलें. ऐसा कम से कम दस बार करें. (B) लम्बे-लम्बे सांस लें और क्रोध को सांसों के साथ धीरे-धीरे बाहर निकलने दें. (C) आवेश के आते ही आँखे बन्द करलें और मन ही मन दस तक गिनें. (D) आँखें बन्द करके ‘ओम नमः शिवायः’ या ‘ओम शांति, शांति, शांति … का मन ही मन उच्चारण शुरू कर दें. (E) अपना स्थान बदल लें, खड़े हो तो बैठ जाये, बैठे हो तो खड़े हो जाय, कमरे से बाहर निकल कर टहलने लगें, खुले में हो तो कमरे में आ जायें, किसी अन्य वस्तु पर अपना ध्यान केन्द्रित करलें. (F) नियमित रूप से ध्यान और प्राणायाम करें, गुस्सा आयेगी ही नहीं. (G) गुस्सा आते ही एकदम बोलना बन्द करदें. (H) यदि सामने वाला क्रोध से भरा हो तो मुस्कुराहट के साथ उसकी सुनें और कोई प्रतिक्रिया न दें. (1) क्रोध को संयम के साथ व्यक्त करें. (J) गुस्से को रचनात्मक कार्यों में रूपान्तरित करें. (K) समस्या का समाधान करें, याद रखें, आप हमेशा सही नहीं हो सकते.

दृष्टान्त- महान दार्शनिक गुरजिएफ ने अपनी आत्मकथा में एक स्थान पर लिखा है कि उसकी माँ ने मरते समय उसे एक बात कही थी-‘यदि किसी पर क्रोध आ जाए तो अपने क्रोध की अभिव्यक्ति चोबीस घंटे से पहले मत करना.’ अर्थात् तत्काल प्रतिक्रिया करने और अपने आपको सही सिद्ध करने की लगातार कोशिश करने के कारण ही विवाद पैदा हो जाता है और छोटे से छोटे विवाद को विस्फोटक होने में कोई समय नहीं लगता. 

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