Study tips in hindi-भली प्रकार समझकर अध्ययन का अभ्यास करें 

Study tips in hindi

Study tips in hindi-भली प्रकार समझकर अध्ययन का अभ्यास करें 

अध्ययन हमें आनन्द प्रदान करता है, अलंकृत करता है और योग्यता प्रदान करता है, -फ्रांसिस बेकन

अध्ययन बच्चों का खेल नहीं है, हम कष्ट सहन किए बिना अध्येता नहीं बन सकते हैं. -अरस्तू

दिमाग के लिए अध्ययन की उतनी ही आवश्यकता है जितनी शरीर को व्यायाम की. -स्पर्जन

शिक्षा प्राप्त करने के तीन आधार स्तंभ हैं-अधिक निरीक्षण करना, अधिक अनुभव करना एवं अधिक अध्ययन करना. -केथराल 

आपने  चूल्हा अथवा अँगीठी जलाते हुए किसी न किसी को अवश्य देखा होगा. जैसे-जैसे लकड़ियाँ आग पकड़ती जाती हैं, वैसे वैसे सामने बैठा व्यक्ति अतिरिक्त लकड़ियाँ लगाता जाता है. अँगीठी जलाने वाला व्यक्ति भी इसी नियम का पालन करता है, जैसे-जैसे कोयले आग पकड़ते जाते हैं, वैसे वैसे अधिकाधिक कोयले उसमें डाले जाते हैं. यदि इकट्ठी लकड़ियाँ चूल्हे में डाल दी जाएं अथवा एकदम से पूरी अँगीठी कोयलों से भर दी जाए, तो आग जलेगी ही नहीं और यदि थोड़ी-बहुत जल रही होगी, तो वह भी बुझ जाएगी. 

समझदार लोग भोजन उतना ही करते हैं, जितना आसानी से पच जाता है. ऐसा न करने वाले व्यक्ति को अनेक प्रकार के रोग हो जाते हैं. आयुर्वेद का मान्य नियम है कि स्वल्पाहारी लोग स्वस्थ रहते हैं और दीर्घजीवी होते हैं. अध्ययन करते समय भी यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम जो भी पढ़ें समझकर पढ़ें, पढ़े हुए को समझे बिना, आत्मसात् किए बिना आगे न पढ़ें. ऐसा न करने से हमारी दशा उस व्यक्ति की भाँति हो जाती है, जो पाचन क्रिया एवं पाचन शक्ति की उपेक्षा करके भोजन करता चला जाता है, 

आवश्यकता से अधिक भोजन करने का कारण प्रायः भोजन का स्वादिष्ट होना कम हो जाता है. इसी से कहा जाता है कि भोजन करते समय संयम बरतना चाहिए यानी अपनी जुबान पर काबू रखना चाहिए. 

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प्रकारांतर से हम यह भी निवेदन कर देना उचित समझते हैं कि बिना समझे जीवन में कहीं भी आगे नहीं बढ़ना चाहिए, चाहे किसी काम को करना हो, अथवा किसी स्थान पर पहुंचना हो, लोग भली प्रकार समझे बिना हाँ, समझ में आ गया’ कहकर चल देते हैं-सम्भवतः अपने को बुद्धिमान दिखाने की दृष्टि से यही कारण है कि लोग प्रायः रास्ता भूल जाते हैं, काम गलत करते हैं और अन्ततः उन्हें स्वीकार करना पड़ता है कि अच्छी तरह न समझने के कारण हमने गलती की और कष्ट पाया. 

अध्ययन करते समय भी हम लोग प्रायः जल्दी करते हैं. इसके कई कारण हो सकते हैं, परन्तु मुख्य कारण होता है यह सोच कि मैंने आज इतने पृष्ठ पढ़ लिए. परिणामतः जितनी जल्दी पढ़ने में की जाती है, भूलने की क्रिया भी उतनी ही जल्दी-जल्दी अपना काम करती है. अध-कचरे अध्ययन के आधार पर कभी-कभी लोग अपनी राय भी बनाने लगते हैं और गोष्ठियों में उसको व्यक्त करने का भी प्रयास करते हैं. ऐसे व्यक्ति शीघ्र ही अपने अधूरे ज्ञान अथवा अज्ञान का परिचय दे देते हैं. इस कोटि के अध्येताओं को लक्ष्य करके चीन के दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने कहा था कि “बिना विचार के सीखना श्रम नष्ट करना है, बिना सीखे हुए विचार करना भयानक है.” 

हम बिना समझे नित्य पचास पृष्ठ पढ़ें, समझ-समझ कर दो पृष्ठ नित्य पढ़ें. यदि हिसाब लगाया जाए कि वर्ष के अन्त में हमारे ज्ञान में कितनी वृद्धि हुई. सीधा-सा गणित है-प्रथम पद्धति का उत्तर है शून्य और दूसरी पद्धति का उत्तर है सात सौ तीस पृष्ठ. 

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि भोजन खूब चबाकर खाना चाहिए, उसको इतना चबाना चाहिए कि वह रसरूप में सरलता से परिणत हो जाए. पशु इस प्रक्रिया को जुगाली करके सम्पन्न करते हैं. कारण स्पष्ट है दाँत का काम आँत नहीं कर सकती है, ज्ञान भी वही आत्मसात् हो सकेगा, जिसको पूरी गहराई से समझ लिया जाएगा. समझ में न आने पर गुरुजन के सम्मुख जिज्ञासा प्रकट करना, अल्पज्ञता का अनुभव करते हुए प्रश्न करना सदैव हितकर रहता है. भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान देते समय यह भी उपदेश दिया था कि- 

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। 

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञान ज्ञानिन स्तत्त्वदर्शिनः ।।

अर्थात् भली प्रकार दण्डवत्, प्रणाम (तथा) सेवा (और) निष्कपट भाव से किए हुए प्रश्न द्वारा उस ज्ञान को जान. वे मर्म को जानने वाले ज्ञानीजन तुझे उस ज्ञान का उपदेश करेंगे. (श्रीमद्भगवद्गीता 4/34.) 

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ध्यातव्य है कि यदि प्रश्नकर्ता के मन में किसी प्रकार का अहंकार अथवा दुराव-छिपाव है, तो उसका ज्ञान सदैव उथला अधूरा बना रहेगा. यदि प्रश्नकर्ता को यह नहीं मालूम है कि संवत्सर क्या किसे कहता है और वह अहंकारवश किसी से जानने का भी प्रयल नहीं करता है, जो वह जीवन में कभी भी न जान सकेगा कि संवत्सर किस चिड़िया का नाम है, परिणाम होगा कभी न कभी अहंकार प्रसूत अज्ञान के प्रकट होने पर लज्जित होना. पुराणों में इस प्रकार के कई उदाहरण आते हैं जब कपटी शिष्य की विद्या आवश्यकता के समय नहीं आती है. हिन्दी उपन्यासकार जैनेन्द्र कुमार ने इस सन्दर्भ में यह महत्वपूर्ण कथन किया है-प्रश्न में जिज्ञासा है, अभीप्सा है, उससे आदमी बढ़ता है और ऊपर को उठता है, किन्तु वही जब संशय बन जाए, तब वह खाने लगता है. हम सब जानते हैं कि समस्त उपनिषद् ज्ञान गुरु शिष्य संवाद के रूप में है. प्रश्नोत्तर की प्रक्रिया द्वारा प्रश्नकर्ता ज्ञानीजन के सर्वोत्तम ज्ञान को प्राप्त करने में समर्थ होता है. इसी से कहा जाता है हम जो भी पढ़ें, उसकी गहराई तक जाने का प्रयास करें, उसको उलट पलटकर देखें, उससे सम्बन्धित कोई बात छोड़ें नहीं, यह प्रक्रिया मानसिक भोजन को रसरूप बनाकर आत्मसात करने की प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया में प्राप्त ज्ञान एवं विद्या को भूल जाने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता है. इसी को लक्ष्य करके कहा जाता है कि विद्या कण्ठ, पैसा अंट, धन वही काम में आता है जो पास में, अपनी अण्टी में है, वही विद्या काम में आती है जो कण्ठस्थ है, हमको भली प्रकार याद है. 

प्राप्त ज्ञान को सुरक्षित एवं विकसित करते रहने के लिए यह नियम बनाया गया है कि हम स्वाध्याय करें, इससे प्राप्त ज्ञान के सन्दर्भ में अपनी दुर्बलता का ज्ञान होता है और उसके सन्दर्भ में नवीन क्षितिज का उद्घाटन होता चलता है, उसकी व्याप्ति में वृद्धि होती है. आचरण संहिता का यह कथन प्रमाण है अभ्यासानुसारेण विद्या, विद्या अध्यवसाय द्वारा प्राप्त होती है, जब तक नदी को उसका गन्तव्य समुद्र प्राप्त नहीं होता है, तब तक उसकी धारा रुकती नहीं है, जब तक देवताओं को अमृत की प्राप्ति नहीं हुई, तब तक वे समुद्र का मंथन करते रहे. वास्तविक जिज्ञासु, अध्येता वही है जो विषय का सम्पूर्ण ज्ञान न होने तक उसके विषय में जिज्ञासाओं को शान्त करके ही चैन लेता है. विषय के सन्दर्भ में उक्त प्रकार की बेचैनी ही सच्चे अध्ययन की पहचान है.थोड़ा पढ़ें, गहराई में जाकर समझ कर पढ़ें. अन्यथा दिमाग पर बोझ बढ़ाने से कोई लाभ नहीं होगा, मनन और परशीलन हमारे अध्ययन के अनिवार्य अंग होने चाहिए. 

अध्ययन की सार्थकता यह है कि हम रचनाकार की आत्मा तक पहुँच जाएं और नया प्रकाश एवं नई दिशा की प्राप्ति कर सकें. मात्र शब्द-ज्ञान अध्ययन नहीं कहा जा सकता है. मात्र शब्द-ज्ञान तो मस्तिष्क के लिए भार स्वरूप हो जाता है शब्दार्थ में निहित ज्ञान की प्राप्ति ही अध्ययन का सुफल कहा जाता है. स्मरण रखिए अधूरा ज्ञान भयावह होता है. कहा भी जाता है कि अधकचरा हकीम जीवन को और अधकचरा मुल्ला ईमान को खतरे में डाल देते हैं नीम हकीम खतरे जान, नीम मुल्ला खतरे ईमान लाउत्से ने ठीक ही कहा है कि अनेक वस्तुओं के अधूरे ज्ञान की अपेक्षा कुछ न जानना अच्छा होता है, संत कवि कबीरदास ने इस तथ्य को अपनी काव्योचित भाषा में इस प्रकार व्यक्त किया है- 

जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान।

मोल करो तलवार का. पडा रहन दो म्यान ।। 

आधुनिक चिंतक एफ औसवोर्न का कथन हमारा मार्गदर्शक होना चाहिए-“A few Books well stu died and thoroughly digested, nourish the understanding, more than hundreds but gargled in the | mouth, as ordinary students do” अर्थात् भली प्रकार अध्ययन की हुई तथा पूरी तरह आत्मसात की गई थोड़ी पुस्तकें बुद्धि का पोषण उन सैकड़ों पुस्तकों की अपेक्षा अधिक करती हैं जिनको सामान्य विद्यार्थियों की भाँति मुँह में कुल्ला-सा करके छोड़ दिया जाता है अथवा मात्र सतही तौर पर पढ़कर छोड़ दिया जाता है. अध्ययन और मनन एक साथ चलने चाहिए. 

अध्ययन में उत्कृष्ट सफलता के प्रभावी कदम

प्रत्येक शब्द को हृदयंगम करने का प्रयत्न करें,

वांछित विषय में गहन रुचि विकसित करें, 

जो भी पढ़ें, उसकी गहराई तक जाएं

प्रत्येक पाठ को ध्यान से सुनिए.

सामान्य शब्दों का ही अधिक प्रयोग कीजिए.

सतत् अध्ययन की प्रवृत्ति अपनाइए.

एकनिष्ठ होकर अध्ययन कीजिए,

बोलकर पढ़ने की आदत छोडिए.

कठिन विषयों पर अधिक ध्यान दीजिए.

श्रेष्ठ शब्दकोश को ही अपनाइए,

शब्द शक्ति को अपना मार्गदर्शक बनाइए.

प्रत्येक संशय को लिखिए और उसका स्पष्टीकरण प्राप्त कीजिए, 

एक समय में एक ही विषय का अध्ययन.. 

स्मरण शक्ति ऐसे बढ़ाएँ

तथ्य पर पूरा ध्यान दीजिए.

उसमें रुचि उत्पन्न कीजिए.

उसकी प्रभावी समीक्षा कीजिए.

उस पर मनन कीजिए.

एक समय पर एक चीज कीजिए.

एक-एक शब्द को चबाकर पढ़िए,

किसी पाठ को पहले तीव्र गति से पढिए

फिर धीरे-धीरे पदिए. 

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