भगवान विष्णु के वराह अवतार की कथा | Story of varaha avatar of lord vishnu in Hindi

भगवान विष्णु के वराह अवतार की कथा

भगवान विष्णु के वराह अवतार की कथा| Story of varaha avatar of lord vishnu in Hindi –वराह अवतार 

बहुत समय पहले, सृष्टि के आरम्भ में, भगवान ब्रह्मा जी ने चार बालकों की रचना की और उन्हें अनंत काल तक मानस ऋषि के रूप में रहने का वरदान दिया। इन चारों ऋषिगण के नाम सनक, सन्नदन, सनातन, और सनतकुमार थे। इन चार ऋषियों के पास अव्दितीय शक्तियां यीं। एक बार, इन सभी ने भगवान विष्णु के दर्शन करने का निर्णय लिया। अपने पिता भगवान ब्रह्मा से अनुमति और आशीर्वाद लेने के बाद, यह चारों ऋषि भगवान विष्णु के निवास स्थान बैकुंठ लोक के लिए चल पड़े। बैकुंठ लोक के सात द्वार हैं। इन चार ऋषियों ने छह द्वारों को पार कर लिया, लेकिन सातवें द्वार पर जय और विजय ने उन्हें रोक दिया। 

मानस ऋषि होने के कारण सभी ने अपनी कमर पर ही वस्त्र धारण किये थे। जय और विजय ने उन सभी को यह कहते हुए अपमानित किया कि उन्होंने उचित वस्त्र भी नहीं पहने हैं। उन चारों ने जय और विजय को यह याद दिलाया कि वे ब्रह्मा के पुत्र हैं, परन्तु जय और विजय ने उनकी एक बात नहीं सुनी। उन्होंने बाल ऋषियों पर अशान्ति फैलाने का आरोप लगाया और वैकुंठ लोक से बाहर फेंकने की धमकी दी। उन चारों ऋषियों को बहुत अधिक क्रोध आया और उन्होंने जय और विजय को पृथ्वी पर राक्षसों के रूप में पैदा होने का श्राप दे दिया। 

भगवान विष्णु के वराह अवतार की कथा

उसी वक्त भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी के साथ प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने कहा कि “ आप दोनों का व्यवहार क्षमा योग्य नहीं है। इन ऋषियों ने पहले कभी किसी को श्राप नहीं दिया था, इसलिए इनके श्राप का प्रभाव बना रहेगा।” 

तब जय और विजय, उन चार ऋषियों के पैरों मे गिर गये और दया की विनती करने लगे। ऋषियों ने कहा, “तुम्हारे श्राप हटाये नहीं जा सकते परन्तु तुम्हारा श्राप कम जरूर हो जाएगा। इसके लिए तुम्हारा जन्म पृथ्वी पर केवल तीन बार होगा और हर बार तुम्हारा अंत खुद भगवान विष्णु के द्वारा होगा। इस प्रकार तुम्हें मुक्ति प्राप्त होगी और तुम अपने निवास स्थान पर वापस आ जाओगे।” 

इस प्रकार जय और विजय ने पृथ्वी पर दानव भाइयों हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष के रूप में पहली बार जन्म लिया। ऐसा कहा जाता है कि जब उन्होंने जन्म लिया तब धरती और आकाश दोनों को हिला के रख दिया था। सभी देवता भयभीत हो गए थे कि यदि जन्म लेने पर यह इतने क्रूर हैं तो बड़े होने पर वह क्या करेंगे? 

वर्ष बीतते गये और हिरण्याक्ष भगवान ब्रह्मा जी के भक्त के रूप में बड़ा होने लगा। हजारों सालों की कठिन तपस्या के लिए खुद को समर्पित करने के बाद उसके सामने ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उसे अपनी इच्छा का एक वरदान मांगने को कहा। हिरण्याक्ष ने कहा, “हे प्रभु, मुझे आशीर्वाद दें कि मैं कभी भी किसी मनुष्य, देवता या दानव के द्वारा मारा नहीं जा सकू। “ ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया और चले गए। 

इसके बाद दानव राजा हिरण्याक्ष ने एक ऐसे तानाशाह कि तरह शासन किया, जिसे दुनिया ने कभी नहीं देखा था। उसे अपनी अमरता पर इतना विश्वास था कि उसने पृथ्वी पर शान्ति को भंग करना शुरू कर दिया। सबसे पहले वह समुद्र के बीच में खड़ा हो गया और अपनी कमर को एक तरफ से दूसरी तरफ घूमने लगा। उसके इस प्रकार करने से समुद्र मंथन होने लगा जिसके कारण जल देवता वरुण को बहुत अधिक दुःख हुआ। जब वह प्रकट हुए तो हिरण्याक्ष ने वरुण को युद्ध के लिए ललकारा। हिरण्याक्ष को भगवान ब्रह्मा के द्वारा वरदान प्राप्त होने के कारण वरुण उसे पराजित भी नहीं कर सकते थे। इसलिए वह भगवान विष्णु के पास मदद मांगने गए। 

भगवान विष्णु के वराह अवतार की कथा

इस बीच वरुण के पराजित होने से हिरण्याक्ष का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ गया। पाताललोक तक जाने के लिए उसने पृथ्वी को लिया और समुद्र में डुबोने लगा। इसके कारण सभी देवता चिंतित हो गये और वरुण देवता के साथ मिलकर मदद के लिये भगवान विष्णु से प्रार्थना करने लगे। 

तब भगवान विष्णु ने एक जंगली सुअर के रूप में अवतार लिया। उस जंगली सुअर ने हिरण्याक्ष को युद्ध के लिये चुनौती दी। अहंकार में डूबा हुआ हिरण्याक्ष सहमत हो गया। लेकिन वह भूल गया कि भगवान ब्रह्मा से मिले वरदान से वह केवल मनुष्य, देवता और दानव से ही जीत सकता है। भगवान ब्रह्मा के वरदान ने यहां काम नहीं किया, क्योंकि हिरण्याक्ष एक पशु से लड़ रहा था। इसलिए सुअर ने आसानी से हिरण्याक्ष को पराजित कर दिया और पृथ्वी को पाताललोक से वापस लाया। 

भगवान विष्णु के वराह अवतार की कथा

हिरण्याक्ष का वध करने के लिये भगवान विष्णु द्वारा लिये गए इस अवतार को वरहावतार के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार भगवान विष्णु के वरहावतार द्वारा हिरण्याक्ष का वध करने से द्वारपाल श्राप से मुक्त हुए। 

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