शिव और सती की कहानी | Story of Shiva and Sati

शिव और सती की कहानी

शिव और सती की कहानी | Story of Shiva and Sati

ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति की पहली पत्नी से सत्ताईस पुत्रियाँ थीं और दूसरी पत्नी से एक पुत्री थी जिसका नाम दक्षायिनी या सती था। दक्ष ने सती का पालन-पोषण एक राजकुमारी की भांति किया था। उसके बड़े होने पर वे सती का विवाह किसी देव, ऋषि या राजकुमार के साथ करना चाहते थे। किन्तु सती शिव भगवान के प्रति आकर्षित हो गईं। अजेय तथा दिव्य शक्तियों से युक्त दक्ष को अघोरी शिव के साथ अपनी पुत्री का विवाह करना बिल्कुल पसंद नहीं था। दृढ़ निश्चयी सती ने शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या प्रारम्भ कर दी। समय के अंतराल में शिव ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया किन्तु दक्ष शिव भगवान को कभी भी अपने दामाद के रूप में स्वीकार न कर सके। 

एक बार ब्रह्मा ने एक महान् यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने शिव, विष्णु और सती को भी निमंत्रित किया। सभी आमंत्रित गण अनुष्ठान के लिए बैठे थे। अंत में दक्ष आए। शिव के अतिरिक्त सभी ने उठकर उनका सम्मान किया। ईश्वर में शिव का उच्च पद होने के कारण शिव बैठे रहे। दक्ष ने इसे शिव का घमंड तथा अपना अपमान समझा और प्रतिज्ञा करी, “यदि शिव स्वयं को मुझसे बड़ा समझता है, तो मैं भी उसे उसकी जगह दिखाकर ही रहूंगा।” 

तदनुसार, दक्ष ने महायज्ञ का आयोजन किया। शिव को छोड़ शेष सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया। सती को जब इस यज्ञ का पता चला तो उन्होंने अपने पिता के घर जाने की अनुमति शिव से मांगी। शिव ने कहा, “सती (दक्षायिनी), तुम्हारे पिता ने जान बूझकर हम दोनों को नहीं बुलाया है। मुझे अपना दामाद नहीं स्वीकार कर पाने के कारण उन्होंने एक तरह से हमारा अपमान किया है। हमें भी इसकी अवहेलना करनी चाहिए।” 

पर सती नहीं मानी। उन्होंने कहा, “नहीं प्रभु, ऐसी कोई बात नहीं है। यह आयोजन पिता जी का है और पुत्री होने के कारण उसमें जाना मेरा अधिकार है।” । 

शिव भगवान ने पुनः कहा, “सती, मैं तुम्हें सचेत कर रहा हूँ कि तुम्हारे पिता के मन में कुछ तो कुचेष्टा चल रही है। बिना निमंत्रण वहाँ जाने पर तुम्हें अपमानित होना पड़ेगा।” 

“ऐसा कदापि नहीं हो सकता है प्रभु। वह मेरे पिता हैं और फिर यदि वे अपमान भी करें तो क्यों बुरा मानना है…” 

“सती, यदि तुम मेरी इच्छा के विरुद्ध जाना चाहती हो तो अपमानित होकर वापस मत आना। मैं स्वाभिमानी हूँ और मेरी भार्या होने के कारण तुम्हें मेरी बात माननी चाहिए।” 

दृढ़ निश्चयी सती पति के मना करने पर भी अपने पिता के यज्ञ के आयोजन में चली गईं। उन्हें आया देख दक्ष ने अपना मुँह फेर लिया। 

यज्ञ में सभी प्रिय एवं परिचित जनों के नाम की आहुतियाँ दी जा रही थीं। दक्ष ने शिव और सती को जान बूझकर इससे दूर रखा था। यह देख सती ने कहा, “पिता जी, शिव प्रभु की प्रतिनिधि मैं यहाँ उपस्थित हूँ। कृपया उनके हिस्से की आहुति मुझे दें।” 

व्यंग्यपूर्ण हँसी हँसते हुए दक्ष ने कहा, “हूँ… अपना भाग मांगने का तुम्हारा साहस कैसे हुआ? अब मैं तुम्हें अपने परिवार का सदस्य ही नहीं मानता हूँ। जब तुम ही अजनबी हो तो तुम्हारा पति भी तो अजनबी हुआ। इसी कारण मैंने तुम दोनों को निमंत्रित नहीं किया था। तुम्हारे आगमन की अपेक्षा मैंने कभी नहीं करी थी।” 

सती इससे अधिक अपमान सह न सकीं। कोपातुर सती ने दक्ष को चेतावनी देते हुए कहा, “आप अत्यंत अहंकारी हैं… अपने इसी अहंकारी स्वभाव के कारण आपका विनाश होगा। शिव भगवान आपको और आपके पूरे राज्य को विनष्ट कर देंगे… आप बस देखते रहिए।” 

यह कहकर सती प्रज्ज्वलित हवन कुण्ड में कूद पड़ी। सती की मृत्यु का पता चलते ही शिव क्रोधित हो उठे। उनका क्रोध् बेकाबू हो गया। उन्होंने अपने गणों, वीरभद्र और भद्रकाली को आज्ञा दी, “जाओ, यज्ञ को नष्ट कर दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दो।” 

शिव और सती की कहानी

गणों ने शिव की आज्ञा का पालन किया। उपस्थित अतिथियों में आतंक छा गया और भगदड़ मच गई। अंततः गणों ने दक्ष का सिर काट डाला। 

ब्रह्मा को पुत्र की मृत्यु के पीछे शिव का हाथ होने की बात पता चली तो वे व्याकुल होकर शिव के पास गए और कहा, “महेश्वर, यह ठीक है कि दक्ष का कृत्य अक्षम्य था पर सर्वश्रेष्ठ होने के कारण आपको तो उसे क्षमा करना चाहिए था… मैं अपने पुत्र दक्ष के लिए आपसे क्षमा याचना करता हूँ। कृपया उसे जीवन दान दें और यज्ञ को पूरा होने दें।” 

ब्रह्मा की बातों से संतुष्ट शिव ने जाकर पुनः यज्ञ प्रारम्भ करवाया। दक्ष को प्राणदान दिया। पुनः उसे बकरे का सिर लगाकर जीवित कर दिया। यज्ञ कुण्ड के पास उन्होंने सती का अधजला शरीर देखा। वह व्यथित हो उठे। अपने कंधे पर सती को उठाकर उन्होंने ताण्डव नृत्य प्रारम्भ कर दिया। 

देवता उनके दुःख और ताण्डव से दुःखी होकर विष्णु भगवान से प्रार्थना करने लगे, “हे विष्णु भगवान! आप ही उन्हें इस व्यथा से निकाल सकते हैं। उन्हें रोकिए अन्यथा अनर्थ हो जाएगा। सारा ब्रह्माण्ड प्रभावित हो रहा है… चारों ओर असंतुलन और अव्यवस्था व्याप्त हो रही है… कुछ करिए, प्रभु…” 

विष्णु भगवान ने कहा, “मैं सती के शरीर का विघटन कर दूंगा जिससे शिव वापस अपने निवास स्थान पर जा सकें।” 

तदनुसार, विष्णु भगवान ने सुदर्शन चक्र से सती के पार्थिव शरीर को विघटित किया। विघटित शरीर के वे इक्यावन भाग अलग-अलग जगहों पर गिरे जिसे ‘शक्ति पीठ’ के नाम से जाना जाता है। 

बाद में शिव भगवान हिमालय पर्वत पर वापस लौट आए और दुःखी शिव ध्यानमग्न हो गए। समय के अंतराल में सती ने पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया।

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