शिव और पार्वती की कहानी | Story of Shiva and Parvati

शिव और पार्वती की कहानी

शिव और पार्वती की कहानी | Story of Shiva and Parvati

इधर शिव सती की मृत्यु से शोकमग्न थे और उधर ताड़कासुर नामक राक्षस घोर तपस्या में मग्न अपनी शक्ति का विस्तार कर रहा था। अजेय होने का वर पाकर वह न केवल मानव बल्कि देवताओं के लिए भी चिंता का कारण बन रहा था। परेशान देवताओं ने ब्रह्मा जी से जाकर प्रार्थना करी, “हे ब्रह्मदेव! कृपया ताड़कासुर से हमारी रक्षा करें। हमारी शक्तियाँ कमजोर पड़ने लगी हैं। यदि उसका वध नहीं हुआ तो तीनों लोकों पर संकट मंडराने लगेगा।” 

ब्रह्मा जी ने देवताओं को आश्वस्त करते हुए कहा, “आप चिंतित न हों। मैं स्वयं भी इसी पर मनन कर रहा था। शिव तो सत्ती की मृत्यु के पश्चात् से ही एकांतवास में है। उन्हें उनका कर्तव्यबोध् कराना आवश्यक है। शिव का पुत्र ही इसका एकमात्र उपाय है। आप महादेवी के पास जाकर उनसे प्रार्थना करें, वह अवश्य आपलोगों की सहायता करेंगी।” 

देवगण ने महादेवी के पास जाकर ब्रह्मा जी की कही बात बताकर उनसे प्रार्थना करी। महादेवी ने कहा, “हे देवगण! अधर्म के नाश के लिए यदि शिव का अंश जन्म लेता है तो मैं पार्वती के रूप में जन्म लेकर शिव से विवाह करूंगी।” 

इस प्रकार हिमालय राज और रानी मेना के घर देवी पार्वती ने जन्म लिया। उनके जन्म के तुरंत बाद नारद ने वहाँ पहुँचकर सभी को आशीर्वाद दिया। उन्होंने घोषणा करी, “यह एक दिव्य संतान है और यह शिव से विवाह करेगी।” 

शिव और पार्वती की कहानी

विधाता की योजना के अनुसार धीरे-धीरे पार्वती अत्यन्त सुंदर कन्या के रूप में बड़ी हुईं। अन्य बालिकाओं से भिन्न वे सदा शिव भक्ति में डूबी रहती थीं। बड़े होने पर वे हिमालय पर जाकर शिव के लिए तपस्या करने लगीं। काफी समय बीत गया। अंततः उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर एक दिन शिव ने प्रकट होकर पूछा, “हे पार्वती! तुमने मेरे लिए तपस्या क्यों की? क्या वर चाहती हो? बताओ मैं तुम्हें क्या आशीर्वाद दूँ?” 

पार्वती ने उत्तर दिया, “हे प्रभु! मेरा परम सौभाग्य जो आपने मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि डाली। मैं आपकी परम भक्त तो हूँ ही… पर मैं आपकी पत्नी बनकर आजीवन आपकी सेवा करना चाहती हूँ।” 

सती के प्रति अपनी आसक्ति के कारण शिव भगवान पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकारने के इच्छुक नहीं थे। उन्हें यह तो पता था कि पार्वती पूर्व जन्म में सती थी। उन्होंने विवाह की बात न स्वीकारते हुए पार्वती से कहा, “हे पार्वती! तुम्हें अपनी सेवा में पाकर मैं प्रसन्न होऊँगा।” 

उस दिन से अविवाहित पार्वती खुशी-खुशी शिव भगवान की सेवा करने लगीं। यह क्रम वर्षों तक चला। 

इधर अधीर देवगण ताड़कासुर के उत्पात से परेशान थे। वे शांति चाहते थे। उधर शिव पार्वती से विवाह नहीं करना चाहते थे। देवताओं को चिंता थी कि किस प्रकार शिव को विवाह के लिए राजी किया जाए… तभी देवताओं को एक युक्ति सूझी। वे सीधे प्रेम के देव ‘कामदेव’ के पास गए और उनसे प्रार्थना करी, “हे प्रेम के देव कामदेव! हमें आपकी सहायता की आवश्यकता है।” 

अचानक सहायता मांगने आए देवों केा देखकर कामदेव अचम्भित रह गए। उन्होंने विनम्र भाव से पूछा, “हे देव! कृपया बताएँ मैं आपके क्या काम आ सकता हूँ?” । 

देवताओं ने उन्हें बताया, “ताड़कासुर नामक दैत्य का अंत शिव और पार्वती के पुत्र से ही संभव है किन्तु सती के विरह के कारण शिव प्रभु पार्वती से विवाह के इच्छुक नहीं हैं। हमारी इच्छा है कि आप अपने बाणों के प्रभाव से कुछ ऐसा करें कि शिव पार्वती के प्रति आकृष्ट होकर उनसे विवाह कर लें।” 

कामदेव सन्न रह गए। उन्होंने कहा, “क्या? शिव? यह तो अत्यन्त कठिन कार्य है… आप लोग तो शिव के क्रोध से परिचित ही हैं… यदि उन्होंने क्रोध में आकर मुझे श्राप दे दिया तो?” 

देवताओं ने कामदेव को आश्वस्त करते हुए कहा, “आप निश्चिंत रहें। ऐसा कुछ भी नहीं होगा। सती ने ही पार्वती के रूप में जन्म लिया है। आप ही इस कार्य को करने में सक्षम हैं। अन्यथा ताड़कासुर से हमें त्राण ही नहीं मिलेगा।” 

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