राजकुमार सिद्धार्थ की कहानी-राजकुमार सिद्धार्थ और कबूतर

राजकुमार सिद्धार्थ की कहानी

राजकुमार सिद्धार्थ की कहानी-राजकुमार सिद्धार्थ और कबूतर

राजकुमार सिद्धार्थ के पिता महाराज शुद्दोन कपिलवस्तु के राजा थे। उनकी माँ माया अत्यन्त धर्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। राजकुमार सिद्धार्थ बचपन से ही अत्यन्त शांत और सौम्य स्वभाव के थे। एक दिन वे अपने उद्यान में बैठे थे। तभी एक घायल कबूतर उनकी गोद में आ गिरा। तीर लगने से उसका एक पंख टूट गया था। 

सिद्धार्थ घायल पक्षी को भीतर लेकर गए। उन्होंने तीर निकालकर पक्षी के जख्म पर दवा लगाई और फिर पट्टी बाँध दी। उसी समय कमरे में उसके चचेरे भाई देवदत्त ने प्रवेश किया और कबूतर माँगने लगा। 

आश्चर्य से देखते हुए सिद्धार्थ ने कहा, “तुम्हारा पक्षी? यह तो मुझे उद्यान में मिला है, किसी ने इसे घायल कर दिया है।” 

देवदत्त ने कहा, “मेरे तीर से ही यह घायल हुआ है अतः इस पर मेरा अधिकार है। चलो, इसे मुझे दे दो…।” सिद्धार्थ जानते थे कि यदि यह पक्षी उसे दे दिया तो यह पक्षी को मार देगा। यह सोचकर सिद्धार्थ मूक खड़े रहे। देवदत्त ने क्रुद्ध होकर कहा, “तो तुम मेरी बात नहीं मानोगे… ठीक है चलो राजा के पास चलते हैं। वही निर्णय करेंगे कि इस पक्षी पर किसका अधिकार है” 

दोनों ने राजा के पास जाकर उन्हें पूरी बात बताई। राजा ने पल भर सोचकर कहा, ‘इस कबूतर को ही निर्णय करने दो कि वह किसके पास रहना चाहता है। पक्षी को धरती पर उतार दो और फिर तुम दोनों बारी-बारी उसके पास जाओ।” दोनों को यह बात पसंद आई। कबूतर को धरती पर छोड़ा गया। देवदत्त ने पक्षी के पास जाकर उसे बुलाया। कबूतर ने पंख फड़फड़ाए और भयभीत होकर पीछे हट गया। 

राजकुमार सिद्धार्थ की कहानी

अब सिद्धार्थ की बारी थी। ज्योंही उसने पैर आगे बढ़ाए कबूतर प्रसन्नतापूर्वक उछलकर सिद्धार्थ के हाथ में आ गया। सभी ने इस दृश्य को देखा कि कबूतर अपने रक्षक को कितना प्यार करता था। 

राजा ने मुस्कराकर कहा, “जिसने कबूतर की जान बचाई है वही इसका अधिकारी है।” देवदत्त कुछ कह न सका। राजकुमार सिद्धार्थ ने कबूतर के स्वस्थ होने तक उसका ख्याल रखा और फिर उसे उड़ा दिया। 

कई वर्षों बाद बड़े होने पर सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में घर छोड़ कर चले गए। आज उन्हें हम गौतम बुद्ध के रूप में जानते हैं जिन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की। वही बौद्ध धर्म जो सभी प्राणियों को समान भाव से प्रेम करना सिखाता है। 

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