प्रेमचंद की कहानी अलग्योझा 

अलग्योझा कहानी की समीक्षा pdf

प्रेमचंद की कहानी अलग्योझा 

भोला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने के बाद दूसरी सगाई की तो उसके लड़के रग्घू के लिए बुरे दिन आ गये। रग्घू की उम्र उस समय केवल दस वर्ष की थी। चैन से गांव में गुल्ली-डंडा खेलता फिरता था। मां के आते ही चक्की में जुतना पड़ा। पन्ना रूपवती स्त्री थी और रूप और गर्व में चोली-दामन का नाता है। वह अपने हाथों से कोई मोटा काम न करती। गोबर रग्घू निकालता, बैलों को सानी रग्घू देता। रग्घू ही जूठे बरतन मांजता। भोला की आंखें कुछ ऐसी फिरीं कि उसे अब रग्घू में सब बुराइयां-ही बुराइयां नजर आतीं। पन्ना की बातों को वह प्राचीन मर्यादानुसार आंखें बन्द करके मान लेता था। रग्घू की शिकायतों की जरा भी परवाह न करता। नतीजा यह हुआ कि रग्घू ने शिकायत करना छोड़ दिया। किसके सामने रोये? बाप ही नहीं, सारा गांव उसका दुश्मन था। बड़ा जिद्दी लड़का है, पन्ना को तो कुछ समझता ही नहीं; बेचारी उसका दुलार करती है, खिलाती पिलाती है। यह उसी का फल है। दूसरी औरत होती, तो निबाह न होता। वह तो कहो, पन्ना इतनी सीधी-सादी है कि निबाह होता जाता है। सबल की शिकायतें सब सुनते हैं, निर्बल की फरियाद भी कोई नहीं सुनता। रग्घू का हृदय मां की ओर से दिन-दिन फटता जाता था। यहां तक कि आठ साल गुजर गये। और एक दिन भोला के नाम मृत्यु का सन्देशा आ पहुंचा।

पन्ना के चार बच्चे थे-तीन बेटे और एक बेटी। इतना बड़ा खर्च और कमाने वाला कोई नहीं। रग्घू अब क्यों बात पूछने लगा। यह मानी हुई बात थी। अपनी स्त्री लायेगा और अलग रहेगा। स्त्री आकर और भी आग लगायेगी। पन्ना के चारों ओर अंधेरा-ही-अंधेरा दिखाई देता था। पर कुछ भी हो, वह रग्घू की आसरैत बनकर घर में न रहेगी। जिस घर में उसने राज किया, उसमें अब लौंडी न बनेगी। जिस लौंडे को अपना गुलाम समझा, उसका मुंह न ताकेगी। वह सुन्दर थी, अवस्था भी कुछ ऐसी ज्यादा न थी। जवानी अपनी पूरी बहार पर थी। क्या वह कोई दूसरा घर नहीं कर सकती? यही न होगा, लोग हंसेंगे। बला से! उसकी बिरादरी में क्या ऐसा होता नहीं। ब्राह्मण-ठाकुर थोड़े ही थी कि नाक कट जायेगी यह तो ऊंची जातों में होता है कि घर में चाहे जो कुछ करो, बाहर परदा ढका रहे। वह तो संसार को दिखाकर दूसरा घर कर सकती है। फिर वह रग्घू की दबैल बनकर क्यों रहे? 

भोला को मरे एक महीना गुजर चुका था। संध्या हो गई थी। पन्ना इसी चिन्ता में पड़ी हुई थी कि सहसा उसे ख्याल आया, लड़के घर में नहीं हैं। यह बैलों की लौटने की बेला है, कहीं कोई लड़का उनके नीचे न आ जाय। अब द्वार पर कौन है, जो उनकी देखभाल करेगा। घर से बाहर निकली, तो देखा रग्घू सामने झोंपड़े में बैठा ऊख की गड़ेरियां बना रहा है, तीनों लड़के उसे घेरे खड़े हैं और छोटी लड़की गर्दन में हाथ डाले उसकी पीठ पर सवार होने की चेष्टा कर रही है। पन्ना को अपनी आंखों पर विश्वास न आया। आज तो यह नई बात है! शायद दुनिया को दिखाता है कि मैं अपने भाइयों को कितना चाहता हूं और मन में छुरी रक्खी हुई है। घात मिले तो जान ही ले ले। काला सांप है, काला सांप। कठोर स्वर में बोली-तुम सब-के-सब वहां क्या करते हो? घर में आओ, सांझ की बेला है, गोरू आते होंगे। 

रग्घू ने विनीत नेत्रों से देखकर कहा-मैं तो हूं ही काकी, डर किस बात का है? 

बड़ा लड़का केदार बोला-काकी, रग्घू दादा ने हमारे लिए दो गाड़ियां बना दी हैं। यह देख, एक पर हम और खुन्नू बैठेंगे, दूसरी पर लछमन और झुनिया। दादा दोनों गाड़ियां खींचेंगे। 

यह कहकर वह कोने से छोटी-छोटी गाड़ियां निकाल लाया, चार-चार पहिए लगे थे, बैठने के लिए तख्ते और रोक के लिए दोनों तरफ बाजू थे। 

पन्ना ने आश्चर्य से पूछा-ये गाड़ियां किसने बनायीं? 

केदार ने चिढ़कर कहा-रग्घू दादा ने बनायी हैं, और किसने। भगत के घर से बसूला और रुखानी मांग लाये और झटपट बना दीं। खूब दौड़ती हैं काकी! बैठ खुन्नू, मैं खींचूं। 

खुन्नू गाड़ी में बैठ गया। केदार खींचने लगा। चर-चर का शोर हुआ, मानो गाड़ी भी इस खेल में लड़कों के साथ शरीक है। 

लछमन ने दूसरी गाड़ी पर बैठकर कहा-दादा खींचो। 

रग्घू ने झुनिया को भी गाड़ी में बैठा दिया और गाड़ी खींचता हुआ दौड़ा। तीनों लड़के तालियां बजाने लगे। पन्ना चकित नेत्रों से यह दृश्य देख रही थी और सोच रही थी कि यह वही रग्घू है या और। 

थोड़े देर के बाद दोनों गाड़ियां लौटीं; लड़के घर में आकर इस यान यात्रा के अनुभव बयान करने लगे। कितने खुश थे सब, मानो हवाई जहाज पर बैठ आये हों। 

खुन्नू ने कहा-काकी सच, पेड़ दौड़ रहे थे। लछमन-और बछिया कैसी भागीं, सब-की-सब दौड़ी। केदार–काकी, रग्घू दादा दोनों गाड़ियां एक साथ खींच ले जाते हैं। 

झुनिया सबसे छोटी थी। उसकी व्यंजनाशक्ति और उछल-कूद नेत्रों तक परिमित थी-तालियां बजा-बजाकर नाच रही थी। 

खुनू-अब हमारे घर गाय भी आ जायेगी काकी! रग्घू दादा ने गिरधारी से कहा है कि हमें गाय ला दो। गिरधारी बोला-कल लाऊंगा। 

केदार–तीन सेर दूध देती है काकी! खूब दूध पीयेंगे। 

इतने में रग्घू भी अन्दर आ गया। पन्ना ने अवहेलना की दृष्टि से देखकर पूछा-क्यों रग्घू, तुमने गिरधारी से कोई गाय मांगी है? 

रग्घू ने क्षमा प्रार्थना के भाव से कहा-हां मांगी तो है, कल लावेगा। पन्ना-रुपये किसके घर से आयेंगे? यह भी सोचा है। 

रग्घू-सब सोच लिया है काकी। मेरी यह मुहर नहीं है। इसके पच्चीस रुपये मिल रहे हैं; पांच रुपये बछिया के मुजरा दे दूंगा। बस गाय अपनी हो जायेगी।

पन्ना सन्नाटे में आ गयी। अब उसका अविश्वासी मन भी रग्घू के प्रेम और सज्जनता को अस्वीकार न कर सका। बोली-मुहर को क्यों बेचे देते हो। गाय की अभी कौन जल्दी है। हाथ में पैसे हो जायें, तो ले लेना। सूना सूना गला अच्छा न लगेगा। इतने दिनों गाय नहीं रही; तो क्या लड़के नहीं जिये? 

रग्घू दार्शनिक भाव से बोला-बच्चों के खाने-पीने के यही दिन हैं काकी। इस उम्र में न खाया, तो फिर क्या खायेंगे। मुहर पहनना मुझे अच्छा भी नहीं मालूम होता, लोग समझते होंगे कि बाप तो मर गया, इसे मुहर पहनने की सूझी है। 

भोला महतो तो गाय की चिन्ता ही में चल बसे, न रुपये आये और न गाय मिली, मजबूर थे। रग्घू ने वह समस्या कितनी सुगमता से हल कर दी। आज जीवन में पहली बार, पन्ना को रग्घू पर विश्वास आया, बोली-जब गहना ही बेचना है, तो अपनी मुहर क्यों बेचोगे। मेरी हंसली ले लेना। 

रग्घू-नहीं काकी! वह तुम्हारे गले में बहुत अच्छी लगती है। मर्दो को क्या, मुहर पहने या न पहने। 

पन्ना-चल, मैं बूढ़ी हुई। मुझे अब हंसली पहनकर क्या करना है। तू अभी लड़का है, तेरा सूना गला अच्छा न लगेगा। 

रग्घू मुस्करा कर बोला-तुम अभी से कैसे बूढ़ी हो गयीं? गांव में, कौन तुम्हारे बराबर है? 

रग्घू की सरल आलोचना ने पन्ना को लज्जित कर दिया। उसके रूखे मुरझाये मुख पर प्रसन्नता की लाली दौड़ गयी। 

पांच साल गुजरे गये। रग्घू का-सा मेहनती, ईमानदार, बात का धनी दूसरा किसान गांव में न था। पन्ना की इच्छा के बिना कोई काम न करता। उसकी उम्र अब 23 साल की हो गयी थी। पन्ना बार-बार कहती-भइया बहू को विदा करा लाओ। कब तक नैहर में पड़ी रहेगी। सब लोग मुझी को बदनाम करते हैं कि यही बहू को नहीं आने देती, मगर रग्घू टाल देता था। कहता था कि अभी जल्दी क्या है। उसे अपनी स्त्री के रंग-ढंग का कुछ परिचय दूसरों से मिल चुका था। ऐसी औरत को घर में लाकर वह अपनी शान्ति में बाधा नहीं डालना चाहता था। 

आखिर एक दिन पन्ना ने जिद करके कहा-तो तुम न लाओगे? ‘कह दिया कि अभी कोई जल्दी नहीं है।’ 

‘तुम्हारे लिए जल्दी न होगी, मेरे लिए तो जल्दी है। मैं आज आदमी भेजती हूं।’

‘पछताओगी काकी, उसका मिजाज अच्छा नहीं है।’ _ ‘तुम्हारी बला से। जब मैं उससे बोलूंगी ही नहीं; तो क्या हवा से लड़ेगी। रोटियां तो बना लेगी। मुझसे भीतर-बाहर का सारा काम नहीं होता, मैं आज बुलाये लेती हूं?’ । 

‘बुलाना चाहती हो, बुला लो; मगर फिर वह न कहना कि यह मेहरिया को ठीक नहीं करता, उसका गुलाम हो गया।’ 

‘न कहूंगी, जाकर दो साड़ियां और मिठाई ले आ।’ 

तीसरे दिन मुलिया मैके से आ गई। दरवाजे पर नगाड़े बजे। शहनाइयों की मधुर ध्वनि आकाश में गूंजने लगी। मुंह-दिखावे की रस्म अदा हुई। वह इस मरुभूमि में निर्मल जल-धारा थी। गेहुंआ रंग था, बड़ी-बड़ी नोकीली पलकें, कपोलों पर हल्की सुर्जी, आंखों में प्रबल आकर्षण, रग्घू उसे देखते ही मन्त्र-मुग्ध हो गया। 

प्रात:काल पानी का घड़ा लेकर चलती, तब उसका गेहुंआ रंग प्रभात की सुनहली किरणों से कुन्दन हो जाता, मानो उषा अपनी सारी सुगन्ध, सारा विकास और सारा उन्माद लिए मुस्कराती चली जाती हो। 

मुलिया मैके से ही जली-भुनी आयी थी, मेरा शौहर छाती फाड़कर काम करे और पन्ना रानी बनी बैठी रहे, उसके लड़के रईसजादे बने घूमें। मुलिया से यह बरदाश्त न होगा। वह किसी की गुलामी न करेगी। अपने लड़के तो अपने होते ही नहीं, भाई किसके होते हैं। जब तक पर नहीं निकलते हैं, रग्घू को घेरे हुए हैं। ज्यों ही जरा सयाने हुये, पर झाड़कर निकल जायेंगे। बात भी न पूछेगे। 

उस दिन उसने रग्घू से कहा-तुम्हें इस तरह गुलामी करनी हो तो करो मुझसे न होगी। 

रग्घू–तो फिर क्या करूं, तू ही बता? लड़के तो अभी घर का काम करने लायक भी नहीं हैं।

मुलिया-लड़के रावत के हैं, कुछ तुम्हारे नहीं हैं। यही पन्ना है, जो तुम्हें दाने-दाने को तरसाती थी। सब सुन चुकी हूं। मैं लौंडी बनकर न रहूंगी। रुपये-पैसे का मुझे कुछ हिसाब नहीं मिलता। न जाने तुम क्या लाते हो? 

और वह क्या करती है। तुम समझते हो रुपए घर ही में तो हैं; मगर देख लेना, तुम्हें जो एक फूटी कौड़ी भी मिले। 

रग्घू–रुपए-पैसे तेरे हाथ में देने लगूं, तो दुनिया क्या कहेगी, यह तो सोच।

मुलिया-दुनिया जो चाहे, कहे। दुनिया के हाथों बिकी नहीं हूं। देख लेना, भाड़ लीपकर हाथ काला ही रहेगा। फिर तुम अपने भाइयों के लिए मरो, मैं क्यों मरूं। 

रग्घू ने जवाब न दिया-उसे जिस बात का भय था, वह इतनी जल्द सिर पर आ पड़ी। अब अगर उसने बहुत तथ्योंथंभी किया, तो साल-छ: महीने और काम चलेगा। बस, आगे यह डोंगा चलता नजर नहीं आता। बकरे की मां कब तक खैर मनायेगी? 

एक दिन पन्ना ने महुए का सुखावन डाला। बरसात शुरू हो गई थी। बखार में अनाज गीला हो रहा था। मुलिया से बोली-बहू, जरा देखती रहना, मैं तालाब से नहा आऊं।

मुलिया ने लापरवाही से कहा- मुझे नींद आ रही है, तुम बैठकर देखो, एक दिन न नहाओगी तो क्या होगा। 

पन्ना ने साड़ी उठाकर रख दी, नहाने न गई। मुलिया का वार खाली गया। 

कई दिन के बाद एक शाम को पन्ना धान रोपकर लौटी, अंधेरा हो गया था। दिन भर की भूखी थी, आशा थी, बहू ने रोटी बना रखी होगी, मगर देखा तो यहां चूल्हा ठंडा पड़ा हुआ था, और बच्चे मारे भूख के तड़प रहे थे। मुलिया से आहिस्ते से पूछा-आज अभी चूल्हा नहीं जला? 

केदार ने कहा-आज दोपहर को भी चूल्हा नहीं जला काकी! भाभी ने कुछ बनाया ही नहीं। 

पन्ना-तो तुम लोगों ने खाया क्या? 

केदार-कुछ नहीं, रात की रोटियां थीं, खुन्नू और लछमन ने खायीं। मैंने सत्तू खा लिया। 

पन्ना-और बहू ? केदार–वह तो पड़ी सो रही है, कुछ नहीं खाया। 

पन्ना ने उसी वक्त चूल्हा जलाया और खाना बनाने बैठ गयी। आटा गूंधती थी और रोती थी। क्या नसीब है, दिन भर खेत में जली, घर आई तो चूल्हे के सामने जलना पड़ा। 

केदार का चौदहवां साल था। भाभी के रंग-ढंग देखकर सारी स्थिति समझ रहा था। बोला-काकी, भाभी अब तुम्हारे साथ रहना नहीं चाहती। पन्ना ने चौंककर पूछा-क्या, कुछ कहती थी? 

केदार-कहती कुछ नहीं थी; मगर है उसके मन में यही बात। फिर तुम क्यों नहीं छोड़ देतीं? जैसे चाहे रहे; हमारा भी भगवान् है। 

पन्ना ने दांतों से जीभ दबाकर कहा-चुप, मेरे सामने ऐसी बात भूलकर भी न कहना। रग्घू तुम्हारा भाई नहीं, तुम्हारा बाप है। मुलिया से कभी बोलोगे, तो समझ लेना जहर खा लूंगी। 

दशहरे का त्योहार आया। उस गांव से कोस-भर पर एक पुरवे में मेला लगता था। गांव के सब लड़के मेला देखने चले। पन्ना भी लड़कों के साथ चलने को तैयार हुई; मगर पैसे कहां से आयें? कुंजी तो मुलिया के पास थी। 

रग्घू ने आकर मुलिया से कहा-लड़के मेले जा रहे हैं, सबों को दो दो आने पैसे दे दे। 

मुलिया ने त्योरियां चढ़ाकर कहा-पैसे घर में नहीं हैं। रग्घू-अभी तो तेलहन बिका था, क्या इतनी जल्दी रुपये उठ गये? मुलिया-हां, उठ गये। 

रग्घू-कहां उठ गये? जरा सुनूं, आज त्योहार के दिन लड़के मेला देखने न जायेंगे? 

मुलिया-अपनी काकी से कहो, पैसे निकालें, गाड़कर क्या करेंगी। 

खूटी पर कुंजी लटक रही थी। रग्घू ने कुंजी उतारी और चाहा कि संदूक खोले कि मुलिया ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली-कुंजी मुझे दे दो, नहीं तो ठीक न होगा। खाने-पहनने को भी चाहिए, कागज-किताब को भी चाहिए, उस पर मेला देखने को भी चाहिए। हमारी कमाई इसलिये नहीं है कि दूसरे खायें और मूंछों पर ताव दें।।

पन्ना ने रग्घू से कहा- भइया, पैसे क्या होंगे। लड़के मेला देखने न जायेंगे। 

रग्घू ने झिड़ककर कहा-मेला देखने क्यों न जायेंगे? सारा गांव जा रहा है। हमारे ही लड़के न जायेंगे। 

यह कहकर रग्घू ने अपना हाथ छुड़ा लिया और पैसे निकालकर लड़कों को दे दिये; मगर कुंजी जब मुलिया को देने लगा, तब उसने उसे आंगन में फेंक दिया और मुंह लपेटकर लेट गयी। लड़के मेला देखने न गये। 

इसके बाद दो दिन गुजर गये। मुलिया ने कुछ नहीं खाया और पन्ना भी भूखी रही। रग्घू कभी इसे मनाता, कभी उसे; पर न यह उठती न वह। आखिर रग्घू ने हैरान होकर मुलिया से पूछा-कुछ मुंह से तो कह, चाहती क्या है? 

मुलिया ने धरती को सम्बोधित करके कहा-मैं कुछ नहीं चाहती, तू मुझे मेरे घर पहुंचा दे। 

रग्घू-अच्छा उठ, बना खा। पहुंचा दूंगा। 

मुलिया ने रग्घू की ओर आंखें उठाईं। रग्घू उसकी सूरत देखकर डर गया। वह माधुर्य, वह मोहकता, वह लावण्य गायब हो गया था। दांत निकल आये थे, आंखें फट गयी थीं और नथुने फड़क रहे थे। अंगारे की-सी लाल आंखों से देखकर बोली-अच्छा, तो काकी ने यह सलाह दी है, यह मन्त्र पढ़ाया है? तो यहां ऐसी कच्ची नहीं हूं। तुम दोनों की छाती पर मूंग दलूंगी। हो किस फेर में। 

रग्घू-अच्छा, तो मूंग ही दल लेना। कुछ खा-पी लेगी, तभी तो मूंग दल सकेगी। 

मुलिया-अब तो तभी मुंह में पानी डालूंगी, जब घर अलग हो जायेगा। बहुत झेल चुकी, अब नहीं झेला जाता। 

रग्घू सन्नाटे में आ गया, एक मिनट तक तो उसके मुंह से आवाज ही न निकली। अलग होने की उसने स्वप्न में भी कल्पना न की थी। उसने गांव में दो-चार परिवारों को अलग होते देखा था। वह खूब जानता था, रोटी के साथ लोगों के हृदय भी अलग हो जाते हैं। अपने हमेशा के लिए गैर हो जाते हैं। फिर उसमें वही नाता रह जाता है, जो गांव के और आदमियों में। रग्घू ने मन में ठान लिया था कि इस विपत्ति को घर में न आने दूंगा; मगर होनहार के सामने उसकी एक न चली। आह! मेरे मुंह में कालिख लगेगी, दुनिया यही कहेगी कि बाप के मर जाने पर दस साल भी एक में निबाह न हो सका। फिर किससे अलग हो जाऊं। जिनको गोद में खिलाया, जिनको बच्चों की तरह पाला, जिनके लिए तरह-तरह के कष्ट झेले, उन्हीं से अलग हो जाऊं। अपने प्यारों को घर से निकाल बाहर करूं। उसका गला फंस गया। कांपते हुए स्वर में बोला-तू क्या चाहती है कि मैं अपने भाइयों से अलग हो जाऊं? भला सोच तो; कहीं मुंह दिखाने लायक रहूंगा? 

मुलिया तो मेरा इन लोगों के साथ निबाह न होगा?

रग्घू-तो तू अलग हो जा। मुझे अपने साथ क्यों घसीटती है। 

मुलिया तो मुझे क्या तुम्हारे घर में मिठाई मिलती है, मेरे लिए क्या संसार में जगह नहीं है? 

रग्घू-तेरी जैसी मर्जी, जहां चाहे रह। मैं अपने घर वालों से अलग नहीं हो सकता। जिस दिन इस घर में दो चूल्हे जलेंगे, उस दिन मेरे कलेजे के दो टुकड़े हो जायेंगे। मैं यह चोट नहीं सह सकता। तुझे जो तकलीफ हो, वह मैं दूर कर सकता हूं। माल-असबाब की मालकिन तू है ही, अनाज-पानी तेरे ही हाथ है, अब रह क्या गया है? अगर कुछ काम-धन्धा करना नहीं चाहती, मत कर। भगवान् ने मुझे समाई दी होती, तो तुझे तिनका तक उठाने न देता। तेरे यह सुकुमार हाथ-पांव मेहनत-मजूरी करने के लिए बनाये ही नहीं गये हैं; मगर क्या करूं अपना कुछ बस ही नहीं है। फिर भी तेरा जी कोई काम करने को न चाहे, मत कर; मगर मुझसे अलग होने को न कह, तेरे पैरों पड़ता हूं |

मुलिया ने सिर से आंचल खिसकाया और जरा समीप आकर बोली मैं काम करने से नहीं डरती, न बैठे-बैठे खाना चाहती हूं; मगर मुझसे किसी की धौंस नहीं सही जाती। तुम्हारी ही काकी घर का काम-काज करती हैं, तो अपने लिए करती हैं, अपने बाल-बच्चों के लिए करती हैं। मुझ पर कुछ एहसान नहीं करतीं। फिर मुझ पर धौंस क्यों जमाती हैं। उन्हें अपने बच्चे प्यारे होंगे, मुझे तो तुम्हारा आसरा है। मैं अपनी आंखों से यह नहीं देख सकती कि सारा घर तो चैन करे, जरा-जरा से बच्चे तो दूध पीयें, और जिसके बल-बूते पर गृहस्थी थमी हुई है, वह मढे को तरसे। कोई उसका पूछने वाला न हो। जरा अपना मुंह तो देखो, कैसी सूरत निकल आयी है। औरों के तो चार बरस में अपने पढे तैयार हो जायेंगे। तुम तो दस साल में खाट पर पड़ जाओगे। बैठ जाओ, खड़े क्यों हो? क्या मारकर भागोगे! मैं तुम्हें जबरदस्ती न बांध लूंगी यहां ऐसे निर्मोहियों से पाला पड़ेगा, तो इस घर में भूल से न आती। आती भी तो मन न लगाती, मगर अब तो मन तुमसे लग गया। घर भी जाऊं, तो मन यहां ही रहेगा। और तुम जो हो, मेरी बात नहीं पूछते।

मुलिया की ये रसीली बातें रग्घू पर कोई असर न डाल सकीं। वह उसी रुखाई से बोला–मुलिया, मुझसे यह न होगा। अलग होने का ध्यान करते ही मेरा मन न जाने कैसा हो जाता है। यह चोट मुझसे न सही जायेगी।

मुलिया ने परिहास करके कहा-तो चूड़ियां पहनकर अन्दर बैठो न। लाओ मैं मूंछे लगा लूं। मैं तो समझती थी कि तुममें भी कुछ कस-बल है। अब देखती हूं, तो निरे मिट्टी के लोदे हो।। 

पन्ना दालान में खड़ी दोनों की बातचीत सुन रही थी। अब उससे न रहा गया। सामने आकर रग्घू से बोली-जब वह अलग होने पर तुली हुई है, फिर तुम क्यों उसे जबरदस्ती मिलाये रखना चाहते हो? तुम उसे लेकर रहो, हमारे भगवान् मालिक हैं। जब महतो मर गये थे, और कहीं पत्ती की भी छांह न थी, जब उस वक्त भगवान् ने निबाह दिया, तो अब क्या डर? अब तो भगवान् की दया से तीनों लड़के सयाने हो गये हैं। अब कोई चिन्ता नहीं। 

रग्घू ने आंसू भरी आंखों से पन्ना को देखकर कहा-काकी, तू भी पागल हो गयी है क्या? जानती नहीं, दो रोटियां होते ही दो मन हो जाते हैं। 

पन्ना-जब वह मानती ही नहीं, तब तुम क्या करोगे? भगवान् की यही मरजी होगी, तो कोई क्या करेगा। परालब्ध में जितने दिन एक साथ रहना लिखा था, उतने दिन रहे, अब उसकी यही मरजी है, तो यही सही। तुमने मेरे बाल-बच्चों के लिए जो कुछ किया, वह मैं भूल नहीं सकती। तुमने इनके सिर पर हाथ न रक्खा होता तो आज इनकी न जाने क्या गति होती, न जाने किसके द्वार पर ठोकरें खाते होते, न जाने कहां-कहां भीख मांगते फिरते। तुम्हारा जस मरते दम तक गाऊंगी, अगर मेरी खाल तुम्हारे जूते बनाने के काम में आये, तो खुशी से दे दूं। चाहे तुमसे अलग हो जाऊं, पर जिस घड़ी तुम पुकारोगे, कुत्ते की तरह दौड़ी आऊंगी। यह भूलकर भी न सोचना कि तुमसे अलग होकर मैं तुम्हारा बुरा चाहूंगी। जिस दिन तुम्हारा 

अनभल मेरे मन में आयेगा, उसी दिन विष खाकर मर जाऊंगी। भगवान् करे, तुम दूधों नहाव, पूतों फलो। मरते दम तक यही असीस मेरे रोएं-रोएं से निकलती रहेगी। और अगर लड़के भी अपने बाप के हैं, तो मरते दम तुम्हारा पोस मानेंगे। 

यह कहकर पन्ना रोती हुई वहां से चली गई। रग्घू वहीं मूर्ति की तरह खड़ा रहा।आसमान की ओर टकटकी लगी थी और आंखों से आंसू बह रहे थे। 

पन्ना की बातें सुनकर मुलिया समझ गयी कि अब अपने पौ बारह हैं। चटपट उठी, घर में झाडू लगाया, चूल्हा जलाया और कुएं से पानी लाने चली। उसकी टेक पूरी हो गयी थी। 

गांव में स्त्रियों के दो दल होते हैं-एक बहुओं का, दूसरा सासों का। बहुएं सलाह और सहानुभूति के लिए अपने दल में जाती हैं, सासें अपने दल में। दोनों की पंचायतें अलग होती हैं। मुलिया को कुएं पर दो-तीन बहुएं मिल गयीं। एक ने पूछा-आज तो तुम्हारी बुढ़िया बहुत रो-धो रही थी।

मुलिया ने विजय के गर्व से कहा-इतने दिनों से घर की मालकिन बनी हुई हैं, राज-पाट छोड़ते किसे अच्छा लगता है। बहन, मैं उनका बुरा नहीं चाहती; लेकिन एक आदमी की कमाई में कहां तक बरकत होगी। मेरे भी तो यही खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने के दिन हैं। अभी उनके पीछे मरो, फिर बाल-बच्चे हो जायें, उनके पीछे मरो। सारी जिन्दगी रोते ही कट जाये। 

एक बहू-बुढ़िया यही चाहती है कि यह बस जन्म भर लौंडी बनी रहें। मोटा-झोटा खाएं और पड़ी रहें। 

दूसरी बहू-किस भरोसे पर कोई मरे। अपने लड़के तो बात नहीं पूछते, पराये लड़कों का क्या भरोसा? कल इनके हाथ पांव हो जायेंगे, फिर कौन पूछता है। अपनी-अपनी मेहरियों का मुंह देखेंगे। पहले से ही फटकार देना अच्छा है। फिर तो कोई कलक न होगा। 

मुलिया पानी लेकर गयी, खाना बनाया और रग्घू से बोली-जाओ नहा आओ, रोटी तैयार है। 

रग्घू ने मानो सुना ही नहीं। सिर पर हाथ रखकर द्वार की तरफ ताकता रहा। 

मुलिया-क्या कहती हूं, कुछ सुनाई देता है ? रोटी तैयार है, जाओ नहा आओ। 

रग्घू-सुन तो रहा हूं, क्या बहरा हूं? रोटी तैयार है, तो जाकर खा ले। मुझे भूख नहीं है। 

मुलिया ने फिर कुछ नहीं कहा। जाकर चूल्हा बुझा दिया, रोटियां उठाकर छींके पर रख दी और मुंह ढांककर लेट रही। 

जरा देर में पन्ना आकर बोली-खाना तो तैयार है, नहा-धोकर खा लो! वह भी तो भूखी होगी? 

रग्घू ने झुंझलाकर कहा-काकी, तू घर में रहने देगी कि मुंह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊं? खाना तो खाना ही है, आज न खाऊंगा, कल खाऊंगा; लेकिन अभी मुझसे न खाया जायेगा। केदार क्या अभी मदरसे से नहीं आया? 

पन्ना-अभी तो नहीं आया, आता ही होगा। 

पन्ना समझ गयी कि जब तक वह खाना बनाकर लड़कों को न खिलायेगी और खुद न खायेगी, रग्घू न खाएगा। इतना ही नहीं, उसे रग्घू से लड़ाई करनी पड़ेगी, उसे जली-कटी सुनानी पड़ेगी, उसे यह दिखाना पड़ेगा कि मैं ही उससे अलग होना चाहती हूं, नहीं तो वह इसी चिन्ता में घुल-घुलकर प्राण दे देगा। यह सोचकर उसने अलग चूल्हा जलाया। और खाना बनाने लगी। इतने में केदार और खुन्नू मदरसे से आ गये। पन्ना ने कहा-आओ बेटा, खा लो रोटी तैयार है। 

केदार ने पूछा-भइया को बुला लूं न? पन्ना-तुम आकर खा लो। उनकी रोटी बहू ने अलग बनायी है। 

खुन्नू-जाकर भइया से पूछ न आऊं? 

पन्ना-जब उनका जी चाहेगा, खायेंगे। तू बैठकर खा, तुझे इन बातों से क्या मतलब। जिसका जी चाहेगा, खायेगा, जिसका जी न चाहेगा न खायेगा। जब वह और उसकी बीबी अलग रहने पर तुले हैं, तो कौन मनाये? 

केदार–तो क्यों अम्मांजी, क्या हम अलग घर में रहेंगे? पन्ना-उनका जी चाहे एक घर में रहें, जी चाहे आंगन में दीवार डाल लें। 

खुन्नू ने दरवाजे पर आकर झांका, सामने फूस की झोंपड़ी थी, वहीं खाट पर पड़ा रग्घू नारियल पी रहा था। 

खुन्नू-भइया तो अभी नारियल लिए बैठे हैं। पन्ना-जब जी चाहेगा खायेंगे। केदार-भइया ने भाभी को डांटा नहीं? 

मुलिया अपनी कोठरी में पड़ी सुन रही थी। बाहर आकर बोली-भइया ने तो नहीं डांटा, अब तुम आकर डांटो। 

केदार के चेहरे का रंग उड़ गया। फिर जबान न खोली। तीनों लड़कों ने खाना खाया और बाहर निकले। लू चलने लगी थी। आम के बाग में गांव के लड़के-लड़कियां हवा से गिरे हुए आम चुन रहे थे। केदार ने कहा आज हम भी आम चुनने चलें, खूब आम गिर रहे हैं। 

खुन्नू-दादा जी बैठे हैं………। लक्षमन-मैं न जाऊंगा, दादा घुड़केंगे। केदार-वह तो अब अलग हो गये। लक्षमन-तो अब हमको कोई मारेगा, तब भी दादा न बोलेंगे? केदार-वाह, तब क्यों न बोलेंगे? 

रग्घू ने तीनों लड़कों को दरवाजे पर खड़े देखा, पर कुछ बोला नहीं! पहले तो वह घर से बाहर निकलते ही उन्हें डांट बैठता था; पर आज वह मूर्ति के समान निश्चल बैठा रहा। अब लड़कों को कुछ साहस हुआ। कुछ दूर और आगे बढ़े। रग्घू अब भी न बोला, कैसे बोले। वह सोच रहा था, काकी ने लड़कों को खिला-पिला दिया, मुझसे पूछा तक नहीं। क्या उसकी आंखों पर भी परदा पड़ गया है। अगर मैंने लड़कों को पुकारा और वह न आये तो? मैं उनको मार-पीट तो सकूँगा। लू में सब-के-सब मारे-मारे फिरेंगे। कहीं बीमार न पड़ जायें। उसका दिल मसोसकर रह जाता था; लेकिन मुंह से कुछ कह न सकता था। लड़कों ने देखा कि यह बिलकुल नहीं बोलते, तो निर्भय होकर चल पड़े। 

सहसा मुलिया ने आकर कहा-अब तो उठोगे कि अब भी नहीं? जिनके नाम पर फाका कर रहे हो, उन्होंने मजे से लड़कों को खिलाया और आप खाया अब आराम से सो रही हैं। ‘मोर पिया मेरी बात न पूछे मोर सुहागिन नांव।’ एक बार भी तो मुंह से न फटा कि भइया, खा लो। 

रग्घू को इस समय मर्मान्तक पीड़ा हो रही थी। मुलिया के इन कठोर शब्दों ने घाव पर नमक छिड़क दिया। दुःखित नेत्रों से देखकर बोला-तेरी जो मर्जी थी, वही तो हुआ। अब जा ढोल बजा! 

मुलिया-नहीं, तुम्हारे लिए थाली परोसे बैठी हैं!

रग्घू–मुझे चिढ़ा मत। तेरे पीछे मैं भी बदनाम हो रहा हूं। जब तू किसी की होकर नहीं रहना चाहती; तो दूसरे को क्या गरज है, जो तेरी खुशामद करे। जाकर काकी से पूछ, लड़के आम चुनने गये हैं, उन्हें पकड़ लाऊं। 

मुलिया अंगूठा दिखाकर बोली-यह जाता है ! तुम्हें सौ बार गरज हो जाकर पूछो। 

इतने में पन्ना भी भीतर से निकल आयी। रग्घू ने पूछा-लड़के बगीचे में चले गये काकी, लू चल रही है। 

पन्ना-अब उनका कौन पुछत्तर है। बगीचे में जायें, पेड़ पर चढ़ें, पानी में डूबें । मैं अकेली क्या-क्या करूं? 

रग्घू–जाकर पकड़ लाऊं? 

पन्ना-जब तुम्हें अपने मन से नहीं जाना है, तो फिर मैं जाने को क्यों कहूं? तुम्हें रोकना होता, तो रोक न देते? तुम्हारे सामने ही तो गये होंगे।

पन्ना की बात पूरी न हुई थी कि रग्घू ने नारियल कोने में रख दिया और बाग की तरफ चला। 

रग्घू लड़कों को लेकर बाग से लौटा, तो देखा मुलिया अभी तक झोंपड़ी में खड़ी है। बोला-तू जाकर खा क्यों नहीं लेती। मुझे तो इस बेला भूख नहीं 

मुलिया ऐंठकर बोली-हां, भूख क्यों लगेगी। भाइयों ने खाया, वह तुम्हारे पेट में पहुंच ही गया होगा। 

रग्घू ने दांत पीसकर कहा-मुझे जला मत मुलिया, नहीं अच्छा न होगा। खाना कहीं भागा नहीं जाता। एक बेला ना खाऊंगा, तो मर न जाऊंगा। क्या तू समझती है, घर में आज कोई छोटी बात हो गई है? तूने घर में चूल्हा नहीं जलाया, मेरे कलेजे में आग लगाई है। मुझे घमण्ड था कि और चाहे कुछ हो जाय, पर मेरे घर में फूट का रोग न आने पावेगा, पर तूने मेरा घमंड 

चूर कर दिया। परालब्ध की बात है। 

मुलिया तिनककर बोली-सारा मोह-छोह तुम्हीं को है कि और किसी को भी है? मैं तो किसी को तुम्हारी तरह बिसूरते नहीं देखती। 

रग्घू ने ठण्डी सांस खींचकर कहा-मुलिया घाव पर नोन न छिड़क। तेरे ही कारन मेरी पीठ में धूल लग रही है। मुझे इस गृहस्थी का मोह न होगा, तो किसे होगा? मैंने ही तो इसे मर-मर जोड़ा। जिनको गोद में खेलाया, वही अब मेरे पट्टीदार होंगे। जिन बच्चों को मैं डांटता था, उन्हें आज कड़ी आंखों से भी नहीं देख सकता। मैं उनके भले के लिए भी कोई बात करूं, तो दुनिया यह कहेगी कि यह अपने भाइयों को लूटे लेता है। जा, मुझे छोड़ दे, अभी मुझसे कुछ न खाया जायेगा। 

मुलिया-मैं कसम रखा दूंगी, नहीं चुपके से चले चलो।

रग्घू-देख, अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। अपनी हठ छोड़ दे।

मुलिया-हमारा ही लहू पिये, जो खाने न उठे। रग्घू ने कानों पर हाथ रखकर कहा-यह तूने क्या किया मुलिया? मैं तो उठ ही रहा था। चल खा लूं। नहाने-धोने कौन जाय, लेकिन इतना कहे देता हूं कि चाहे चार की जगह छ: रोटिया खा जाऊं, चाहे तू मुझे घी के मटके में ही डुबा दे; पर यह दाग मेरे दिल से न मिटेगा।

मुलिया-दाग-साग सब मिट जायेगा। पहले सबको ऐसा ही लगता है। देखते नहीं हो, उधर कैसी चैन की बंसी बज रही है। वह तो मना ही रही थी कि किसी तरह यह सब अलग हो जायें। अब वह पहले की-सी चांदी तो नहीं है कि जो कुछ घर में आवे, सब गायब! अब क्यों हमारे साथ रहने लगीं। 

रग्घू ने आहत स्वर में कहा-इसी बात का तो मुझे गम है। काकी से ऐसी आशा न थी। 

रग्घ खाने बैठा. तो कौर विष के घंट-सा लगता था। जान पडता था, रोटियां भूसी की हैं। दाल पानी-सी लगती थी। पानी भी कंठ के नीचे न उतरता था। दूध की तरफ देखा तक नहीं। दो-चार ग्रास खाकर उठ आया, जैसे किसी प्रियजन के श्राद्ध का भोजन हो। 

रात का भोजन भी उसने इसी तरह किया। भोजन क्या किया, कसम पूरी की। रात-भर उसका चित उद्विग्न रहा। एक अज्ञात शंका उसके मन पर छाई हुई थी, जैसे भोला महतो द्वार पर बैठा रो रहा हो। वह कई बार चौंककर उठा। ऐसा जान पड़ा, भोला उसकी ओर तिरस्कार की आंखों से देख रहा 

वह दोनों जून का भोजन करता था; पर जैसे शत्रु के घर। भोला की शोक मग्न मूर्ति आंखों से न उतरती थी। रात को उसे नींद न आती। वह गांव में निकलता, तो इस तरह मुंह चुराये, सिर झुकाये, मानो गोहत्या की हो। 

पांच साल गुजर गये। रग्घू अब दो लड़कों का बाप था। आंगन में दीवार खिंच गई थी, खेतों में मेंड़ें डाल दी गयी थीं, और बैल-बधिये बांट लिए गये थे। केदार की उम्र अब सोलह साल की हो गई थी। उसने पढ़ना छोड़ दिया था और खेती का काम करता था। खुन्नू गाय चराता था। केवल लछमन अब तक मदरसे जाता था। पन्ना और मुलिया दोनों एक-दूसरे की सूरत से जलती थीं। मुलिया के दोनों लड़के बहुधा पन्ना ही के पास रहते। वही उन्हें उबटन मलती, वही काजल लगाती, वही गोद में लिए फिरती; मगर मुलिया के मुंह से अनुग्रह का एक शब्द भी न निकलता। न पन्ना ही इसकी इच्छुक थी। वह जो कुछ करती निर्व्याज भाव से करती थी। उसके 

दो-दो लड़के कमाऊं हो गये थे। लड़की खाना पका लेती थी। वह खुद ऊपर का काम-काज कर लेती। इसके विरुद्ध रग्घू अपने घर का अकेला था, वह भी दुर्बल, अशक्त और जवानी में बूढ़ा। अभी आयु तीस वर्ष से अधिक न थी; लेकिन बाल खिचड़ी हो गये थे, कमर भी झुक चली थी। खांसी ने जीर्ण कर रक्खा था। देखकर दया आती थी। और खेती पसीने की वस्तु है। खेतों की जैसी सेवा होनी चाहिए, वह उससे न हो पाती। फिर अच्छी फसल कहां से आती! कुछ ऋणी भी हो गया था। वह चिन्ता और भी मारे डालती थी। चाहिए तो यह था कि अब उसे कुछ आराम मिलता। इतने दिनों के निरन्तर परिश्रम के बाद सिर का बोझ कुछ हल्का होता; किन्तु मुलिया की स्वार्थपरता और अदूरदर्शिता ने लहराती हुई खेती उजाड़ दी; अगर सब एक साथ रहते, तो वह अब तक पेंशन पा जाता, मजे से द्वार पर बैठा हुआ नारियल पीता। भाई काम करता, वह सलाह देता। महतो बना फिरता। कहीं किसी के झगड़े चुकाता। कहीं साधु-सन्तों की सेवा करता; पर वह अवसर हाथ से निकल गया। अब तो चिन्ताभार दिन-दिन बढ़ता जाता था।

आखिर उसे धीमा-धीमा ज्वर रहने लगा। हृदय-शूल, चिन्ता, कड़े परिश्रम और अभाव का यही पुरस्कार है। पहले कुछ परवा न की। समझा आप ही आप अच्छा हो जायेगा; मगर कमजोरी बढ़ने लगी, तो दवा की फिक्र हुई। जिसने जो बता दिया, खा लिया। डॉक्टरों और वैद्यों के पास जाने की सामर्थ्य कहां? और सामर्थ्य भी होती, तो रुपये खर्च कर देने के सिवा और नतीजा ही क्या था। जीर्ण ज्वर की औषधि आराम है और पुष्टिकारक भोजन। न वह बसन्त-मालती का सेवन कर सकता था और न आराम से बैठकर बलवर्धक भोजन कर सकता था, कमजोरी बढ़ती ही गयी। 

पन्ना को अवसर मिलता तो वह आकर उसे तसल्ली देती; लेकिन उसके लड़के अब रग्घू से बात भी न करते थे। दवा-दारू तो क्या करते, उसका और मजाक उड़ाते। भैया समझते थे कि हम लोगों से अलग होकर सोने की ईंट रख लेंगे। भाभी भी समझती थीं, सोने से लद जाऊंगी। अब देखें, कौन पूछता है। सिसक-सिसककर न मरें, तो कह देना। बहुत ‘हाय! हाय!’ भी अच्छी नहीं होती। आदमी उतना काम करे, जितना हो सके। यह नहीं कि रुपये के लिए जान ही दे दे। 

पन्ना कहती-रग्घू बेचारे का कौन दोष है। केदार कहता-चल, मैं खूब समझता हूं। भैया की जगह मैं होता तो डंडे से बात करता। मजाल थी कि औरत यों जिद करती। यह सब भैया की चाल थी। सब सधी-बदी बात थी। 

आखिर एक दिन रग्घू का टिमटिमाता हुआ जीवन-दीपक बुझ गया। मौत ने सारी चिन्ताओं का अन्त कर दिया। 

अन्त समय उसने केदार को बुलाया था, पर केदार को ऊख में पानी देना था। डरा, कहीं दवा के लिए न भेज दें। बहाना बता दिया।

मुलिया का जीवन अन्धकारमय हो गया। जिस भूमि पर उसने मंसूबों की दीवार खड़ी की थी, अब नीचे से खिसक गई थी। जिस खूटे के बल पर वह उछल रही थी, वह उखड़ गया था। गांव वालों ने कहना शुरू किया, ईश्वर ने कैसा तत्काल दण्ड दिया। बेचारी मारे लाज के अपने बच्चों को लिए रोया करती। गांव में किसी को मुंह दिखाने का साहस न होता। प्रत्येक प्राणी उससे यह कहता हुआ मालूम होता था-‘मारे घमण्ड के धरती पर पांव न रखती थी, आखिर सजा मिल गई कि नहीं।’ अब इस घर में कैसे निबाह होगा? वह किसके सहारे रहेगी? किसके बल पर खेती होगी। बेचारा रग्घू बीमार था, दुर्बल था; पर जब तक जीता रहा, अपना काम करता रहा। मारे कमजोरी के कभी-कभी सिर पकड़कर बैठ जाता, और जरा दम लेकर फिर हाथ चलाने लगता था। सारी खेती तहस-नहस हो रही थी, उसे कौन संभालेगा? अनाज की डांठें खलिहान में पड़ी थीं, ऊख अलग सूख रही थी। वह अकेली क्या-क्या करेगी? फिर सिंचाई अकेले आदमी का तो काम नहीं। तीन-तीन मजूरों को कहां से लाये? गांव में मजूर थे ही कितने? आदमियों के लिए खींचातानी हो रही थी। क्या करे, क्या न करे? 

इस तरह तेरह दिन बीत गये। क्रिया-कर्म से छुट्टी मिली। दूसरे ही दिन सवेरे मुलिया ने दोनों बालकों को गोद में उठाया और अनाज मांड़ने चली। खलिहान में पहुंचकर उसने एक को तो पेड़ के नीचे घास के नर्म बिस्तर पर सुला दिया और दूसरे को वहीं बैठाकर अनाज मांड़ने लगी। बैलों को हांकती थी और रोती थी। क्या इसीलिए भगवान् ने उसको जन्म दिया था? देखते-देखते क्या-से-क्या हो गया? इन्हीं दिनों पिछले साल भी अनाज मांडा गया था, वह रग्घू के लिए लोटे में शरबत और मटर की घुघुनी लेकर आयी थी। आज कोई उसके न आगे है न पीछे! लेकिन किसी की लौंडी तो नहीं हूं? उसे अलग होने का अब भी पछतावा न था। 

एकाएक छोटे बच्चे का रोना सुनकर उसने उधर ताका, तो बड़ा लड़का उसे चुमकारकर कह रहा था-भैया, तुप रहो, तुप रहो। धीरे-धीरे उसके मुंह पर हाथ फेरता था और चुप करने के लिए विकल था। जब बच्चा किसी तरह न चुप हुआ तो वह खुद उसके पास लेट गया और छाती से लगाकर प्यार करने लगा; मगर जब यह प्रयत्न भी सफल न हुआ, तो वह रोने लगा।

उसी समय पन्ना दौड़ी आयी और छोटे बालक को गोद में उठाकर प्यार करती हुई बोली-लड़कों को मुझे क्यों न दे आयी बहू ? हाय! हाय ! अभी बेचारा धरती पर पड़ा लोट रहा है। जब मैं मर जाऊं, तो जो चाहे करना, अभी तो जीती हूं। अलग हो जाने से बच्चे तो नहीं अलग हो गये। 

मुलिया ने कहा- तुम्हें भी तो छुट्टी नहीं थी अम्मां, क्या करती। 

पन्ना-तो तुझे यहां आने की ऐसी क्या जल्दी थी। डांठ मांड़ न जाती तीन-तीन लड़के तो हैं, और किस दिन काम आयेंगे। केदार तो कल ही मांड़ने को कह रहा था; पर मैंने कहा-पहले ऊख में पानी दे लो; फिर अनाज मांडना। मंड़ाई तो दस दिन बाद भी हो सकती है, ऊख की सिंचाई न हुई तो सूख जायेगी। कल से पानी चढ़ा हुआ है, परसों तक खेत पुर जायेगा। तब मंडाई हो जायेगी। तुझे विश्वास न आवेगा, जब से भैया मरे हैं, केदार को बड़ी चिंता हो गयी है। दिन में सौ-सौ बार पूछता है, भाभी बहुत रोती तो नहीं है? देख, लड़के भूखे तो नहीं हैं। कोई लड़का रोता है, तो दौड़ा आता है देख अम्मां क्या हुआ, बच्चा क्यों रोता है? कल रोकर बोला-अम्मां, मैं जानता कि भैया इतनी जल्दी चले जायेंगे, तो उनकी सेवा कर लेता। कहां जगाये-जगाये उठता था, अब देखती हो; पहर रात से उठकर काम में लग जाता है। खुन्नू कल जरा-सा बोला-पहले हम अपनी ऊख में पानी दे लेंगे, तब भैया की ऊख में देंगे। इस पर केदार ने ऐसा डांटा कि खुन्नू के मुंह से फिर बात न निकली। बोला-कैसी तुम्हारी और कैसी हमारी ऊख। भैया ने जिला न लिया होता, तो आज या तो मर गये होते या कहीं भीख मांगते। आज तुम बड़े ऊख वाले बने हो! यह उन्हीं का पुन परताप है कि आज भले आदमी बने बैठे हो। परसों रोटी खाने को बुलाने गयी; तो मडैया में बैठा रो रहा था। पूछा-क्यों रोता है? तो बोला-अम्मां, भैया इसी ‘अलग्योझे’ के दुख से मर गये, नहीं अभी उनकी उमिर ही क्या थी। यह उस बखत न सूझा; नहीं उनसे क्यों बिगाड़ करते। 

यह कहकर पन्ना ने मुलिया की ओर संकेतपूर्ण दृष्टि से देखकर कहा तुम्हें वह अलग न रहने देगा बहू; कहता है, भैया हमारे लिए मर गये तो हम भी उनके बाल-बच्चों के लिए मर जायेंगे? 

मुलिया की आंखों से आंसू जारी थे, पन्ना की बातों में आज सच्ची वेदना, सच्ची सांत्वना, सच्ची सचिन्ता भरी हुई थी। मुलिया का मन कभी उसकी ओर इतना आकर्षित न हुआ था। जिनसे उसे व्यंग्य और प्रतिकार का भय था, वे इतने दयालु, इतने शुभेच्छु हो गये थे। 

आज पहली बार उसे अपनी स्वार्थपरता पर लज्जा आयी, पहली बार आत्मा ने अलग्योझे पर धिक्कारा ! 

इस घटना को हुए पांच साल गुजर गये। पन्ना आज बूढ़ी हो गयी है। केदार घर का मालिक है। मुलिया घर की मालकिन है। खुन्नू और लछमन के विवाह हो चुके हैं; मगर केदार अभी तक क्वांरा है। कहता है-मैं विवाह न करूंगा। कई जगहों से बातचीत हुई, कई सगाइयां आयीं; पर उसने हामी न भरी। पन्ना ने कम्पे लगाये, जाल फैलाये; पर वह न फंसा। कहता 

औरतों से कौन सुख । मेहरिया घर में आयी और आदमी का मिजाज बदला। फिर जो कुछ है, वह मेहरिया है। मां-बाप, भाई-बन्धु सब पराये हैं। जब भैया जैसे आदमी का मिजाज बदल गया, तो फिर दूसरों की क्या गिनती। दो लड़के भगवान के दिये हैं और क्या चाहिए। बिना ब्याह किये दो बेटे मिल गये, इससे बढ़कर और क्या होगा। जिसे अपना समझो, वह अपना है, जिसे गैर समझो, वह गैर है। 

एक दिन पन्ना ने कहा-तेरा वंश कैसे चलेगा? केदार–मेरा वंश तो चल रहा है। दोनों लड़कों को अपना ही समझता 

पन्ना-समझने ही पर है, तो तू मुलिया को भी अपनी मेहरिया समझता होगा। 

केदार ने झेंपते हुए कहा-तुम तो गाली देती हो अम्मां! पन्ना-गाली कैसी, तेरी भाभी ही तो है। केदार–मेरे जैसे लट्ठ-गंवार को वह क्या पूछने लगी। पन्ना-तू करने को कह, तो मैं उससे पूछू ? केदार नहीं मेरी अम्मां, कहीं रोने-गाने न लगे। पन्ना-तेरा मन हो, तो मैं बातों-बातों में उसके मन की थाह लूं? केदार–मैं नहीं जानता, जो चाहे कर। 

पन्ना केदार के मन की बात समझ गयी। लड़के का दिल मुलिया पर आया हुआ है; पर संकोच और भय के मारे कुछ नहीं कहता। 

उसी दिन उसने मुलिया से कहा-क्या करूं बहू, मन की लालसा मन में ही रही जाती है। केदार का घर भी बस जाता; तो मैं निश्चिन्त हो जाती। 

मुलिया-वह तो करने को ही नहीं कहते। पन्ना-कहता है, ऐसी औरत मिले, जो घर में मेल से रहे, तो कर लूं। मुलिया-ऐसी औरत कहां मिलेगी? कहीं ढूंढ़ो। पन्ना-मैंने तो ढूंढ़ लिया है। मुलिया-सच! किस गांव की है? 

पन्ना-अभी न बताऊंगी, मुदा यह जानती हूं कि उससे केदार की सगाई हो जाय, तो घर बस जाय और केदार की जिन्दगी भी सफल हो जाय। न जाने लड़की मानेगी कि नहीं! 

मुलिया-मानेगी क्यों नहीं अम्मां; ऐसा सुन्दर, कमाऊ, सुशील वर और कहां मिल जाता है। उस जनम का कोई साधु-महात्मा है, नहीं तो लड़ाई झगड़े के डर से कौन बिना ब्याहा रहता है। कहां रहती है, मैं जाकर उसे मना लाऊं। 

पन्ना-तू चाहे, तो मना ले। तेरे ही ऊपर है। 

मुलिया-मैं आज ही चली जाऊंगी अम्मां! उसके पैरों पड़कर मना लाऊंगी। 

पन्ना-बता दूं! वह तू ही है! मुलिया लजाकर बोली-तुम तो अम्मा जी, गाली देती हो। पन्ना-गाली कैसी, देवर ही तो है। मुलिया-मुझ-जैसी बुढ़िया को वह क्यों पूछेगे। 

पन्ना-वह तुझी पर दांत लगाये बैठा है। तेरे सिवा कोई और उसे भाती ही नहीं। डर के मारे कहता नहीं; पर उसके मन की बात मैं जानती हूं। 

वैधव्य के शोक से मुरझाया हुआ मुलिया का पीत बदन कमल की भांति अरुण हो उठा। दस वर्षों में जो कुछ खोया था, इसी एक क्षण में मानो ब्याज के साथ मिल गया। वही लावण्य, वही विकास, वही आकर्षण, वही लोच! 

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