पाशुपतास्त्र की कहानी | Story of Pashupatastra

पाशुपतास्त्र की कहानी

पाशुपतास्त्र की कहानी – पशुपतास्त्र 

पशुपत नामक पवित्र अस्त्र भगवान शिव के पास था। उसे पाने के लिए अर्जुन ने कैलाश पर्वत पर जाकर शिवजी की घोर तपस्या करी। शिवजी तपस्या से प्रसन्न हो तो गए पर वे पशुपतास्त्र अर्जुन को तुरन्त नहीं देना चाहते थे। पशुपतास्त्र देने से पहले वह अर्जुन की भक्ति की परीक्षा लेना चाहते थे।

शिव भगवान ने एक शिकारी का रूप धारण किया और अर्जुन के पास गए। उस समय अर्जुन अपने ऊपर हमला करने वाले एक जंगली सूअर पर निशाना साध रहा था। भगवान शिव ने सुअवसर देखकर एक तीर सूअर पर चला दिया। एक साथ अर्जुन और शिव दोनों का तीर सूअर को लगा और वह वहीं ढेर हो गया। 

सूअर को दूसरे शिकारी का तीर लगा देखकर अर्जुन परेशान हो उठा। उसने कहा, “जिस सूअर पर मैं निशाना लगा रहा था। उसे तुमने क्यों मारा? मैं तुम्हें युद्ध के लिए ललकारता हूँ। यदि तुम जीतोगे तो सूअर तुम्हारा होगा।” 

सत्यता से अनभिज्ञ अर्जुन और शिव के मध्य युद्ध होने लगा। युद्ध काफी समय तक चला। शिव भगवान की असीमित शक्ति थी पर अर्जुन थोड़े समय के बाद थकने लगा। उसने कहा, “कृपया मुझे थोड़ा समय दो। मैं थोड़ा विश्राम करना चाहता हूँ तथा भगवान शिव की अराधना करना चाहता हूँ।” शिकारी ने अर्जुन का अनुरोध् मान लिया। अर्जुन ने मिट्टी से शिव की मूर्ति बनाई और उसे फूलों की माला बनाकर पहनाया।

अचानक एक चमत्कार हुआ। मूर्ति के गले की फूलों की माला अदृश्य होकर शिकारी के गले में आ गई। अर्जुन तत्काल समझ गए कि वह शिकारी और कोई नहीं वरन् स्वयं भगवान शिव हैं। अर्जुन उनके पैरों पर गिरकर उनसे क्षमा याचना करने लगा। भगवान शिव ने प्रकट होकर अर्जुन को आशीर्वाद दिया और कहा, “तुमने बहुत बहादुरी दिखाई है। मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हुआ हूँ यह पशुपतास्त्र धारण करो। इसका सदा सदुपयोग करना।” Send Favourite Edit Delete More 

पशुपतास्त्र ग्रहण कर अर्जुन ने भगवान शिव को नमन किया। यह दृश्य देखने कई देवता आकाश मार्ग से नीचे उतर आए। अर्जुन को मृत्युदेव यम, जलदेव, वरुणदेव, धनदेव कुबेर ने भी उपहार स्वरूप अस्त्र दिए। इन्द्रदेव ने स्वर्ग के अपने महल में कुछ दिनों के लिए अर्जुन को निमंत्रित किया। अर्जुन ने महल की सुंदरता देखी तो देखता ही रह गया। वहाँ वह कुछ दिनों तक अतिथि रूप में रहा। अर्जुन ने वहाँ रहकर चित्रसेन से नृत्य कला की शिक्षा ली। 

पाशुपतास्त्र की कहानी

अर्जुन जब अतिथिरूप में महल में रहा था स्वर्ग की एक अप्सरा उर्वशी उससे प्रेम कर बैठी। एक दिन आकर उसने कहा, “हे राजकुमार, आपकी सुन्दरता और गुणवत्ता ने मुझे मोह लिया है और मैं आपको अपना दिल दे बैठी हूँ।” अर्जुन यह सुनकर सन्न रह गया। उर्वशी अप्रतिम सौन्दर्य और यौवन की मूर्ति थी। अर्जुन ने कहा, “यह असम्भव है। मैंने सदा माँ की भाँति आपका आदर किया है। ऐसा सोचना भी मेरे लिए पाप है।” 

इससे उर्वशी को बहुत चोट पहुँची। क्रोधित होकर उसने कहा, “मेरे जिस सौन्दर्य से कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहता वह भी तुम्हारे लिए व्यर्थ है? अर्जुन, मैं तुम्हें श्राप देती हूँ… अपने जीवन का एक वर्ष तुम्हें किन्नर के रूप में व्यतीत करना होगा उस समय तुम न तो पुरुष रहोगे और न ही स्त्री। एक अस्वीकृत स्त्री कैसाअनुभव करती है यह तब तुम्हें समझ आएगा।” 

उर्वशी अर्जुन के गुणों के प्रति आकृष्ट तो थी ही। थोड़े समय के बाद क्रोध शांत होने पर उसने पुनः कहा, “श्राप के प्रभाव के समय का चयन तुम्हारे हाथ में होगा। 

अर्जुन ने सिर झुकाकर श्राप को स्वीकार किया और उर्वशी को शीश नवाया। तत्पश्चात् वन में प्रतीक्षारत अपने भाइयों के पास अर्जुन लौट गया। 

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