भगवान विष्णु की कथा-गरुड़ का जन्म

भगवान विष्णु की कथा-गरुड़ का जन्म 

भगवान विष्णु की कथा-गरुड़ का जन्म 

महर्षि कश्यप की तेरह पत्नियां थीं। लेकिन विनता और कद्रू नामक अपनी दो पत्नियों से वे विशेष प्रेम करते थे। एक दिन महर्षि जब आनंद भाव में बैठे थे तो उनकी दोनों पत्नियां उनके समीप पहुंची और पति के पांव दबाने लगीं। प्रसन्न होकर महर्षि ने बारी-बारी से दोनों को संबोधित किया- “तुम दोनों ही मुझे विशेष प्रिय हो। तुम्हारी कोई इच्छा हो तो बताओ।” 

कद्रू बोली- “स्वामी ! मेरी इच्छा है कि मैं हजार पुत्रों की मां बनूं।” 

फिर महर्षि ने विनता से पूछा। विनता ने कहा-“मैं भी मां बनना चाहती हूं स्वामी ! किंतु हजार पुत्रों की नही, बल्कि सिर्फ एक ही पुत्र की। लेकिन मेरा पुत्र इतना बलवान हो कि कद्रू के हजार पुत्र भी उसकी बराबरी न कर सकें।”

 महर्षि बोले-“शीघ्र ही मैं एक यज्ञ करने जा रहा हूं। यज्ञोपरांत तुम दोनों की मां बनने की इच्छाएं अवश्य पूरी होंगी।”

महर्षि कश्यप ने यज्ञ किया। देवता और ऋषि-मुनियों ने सहर्ष यज्ञ में हिस्सा लिया। यज्ञ संपूर्ण करके महर्षि कश्यप पुन: तपस्या करने चले गए। कुछ माह पश्चात विनता ने दो तथा कद्रू ने एक हजार अंडे दिए। कुछ काल के पश्चात कद्रू ने अपने अंडे फोड़े तो उनमें से काले नागों के बच्चे निकल पड़े। कद्रू ने खुशी से चहकते हुए विनता को पुकारा–“विनता! देखो तो मेरे अंडों से कितने प्यारे बच्चे बाहर निकले हैं।” 

विनता बोली-“सचमुच बहुत खूबसूरत हैं कद्रू ! बधाई हो, अब मैं भी अपने दोनों अंडों को फोड़कर देखती हूं।” 

यह कहकर विनता अपने दोनों अंडों के पास गई। उसने एक अंडा फोड़ दिया, लेकिन अंडे के अंदर से एक बच्चे का आधा बना शरीर देखकर वह सहम गई। बोली-“हे भगवान! जल्दबाजी में मैंने ये क्या कर डाला। यह बच्चा तो अभी अपूर्ण है।”

तभी फूटे हुए अंडे के अंदर से बालक बोल पड़ा-“जल्दबाजी में अंडा फोड़कर तुमने बहुत बड़ा अपराध कर डाला है। फलस्वरूप तुम्हें कुछ समय तक दासता करनी होगी।” 

विनता बोली-“अपराध तो मुझसे हो ही गया। लेकिन इसका निराकरण कैसे होगा पुत्र?” 

अपूर्ण बालक बोला-“दूसरे अंडे को फोड़ने में जल्दबाजी मत करना। यदि तुमने ऐसा किया तो जीवन भर दासता से मुक्त नहीं हो पाओगी। क्योंकि उसी अंडे से पैदा होने वाला तुम्हारा पुत्र तुम्हें दासता से मुक्ति दिलाएगा।” 

इतना कहकर अंडे से उत्पन्न अपूर्ण बालक आकाश में उड़ गया और विनता दूसरे अंडे के पकने तक इंतजार करने लगी। समय पाकर अंडा फूटा और उसमें से एक महान तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ, जिसका नाम गरुड़ रखा गया। गरुड़ दिन-प्रतिदिन बड़ा होने लगा और कद्रू के हजार पुत्रों पर भारी पड़ने लगा। परिणामस्वरूप विनता और कद्रू के संबंध दिन-प्रतिदिन कटु से कटुतर होते गए। 

फिर एक दिन जब विनता और कद्रू भ्रमण कर रही थीं। कद्रू ने सागर के किनारे दूर खड़े एक सफेद घोड़े को देखकर विनता से कहा- “बता सकती हो विनता! दूर खड़ा वह घोड़ा किस रंग का है?” 

विनता बोली-“सफेद रंग का।” 

कद्रू बोली-“शर्त लगाकर कह सकती हो कि घोड़ा सफेद रंग का ही है। मुझे तो इसकी पूंछ काले रंग की नजर आ रही है।” 

विनता बोली-“तुम्हारा विचार गलत है। घोड़ा पूंछ समेत सफेद रंग का है।” 

दोनों में काफी देर तक यही बहस छिड़ी रही। आखिर में कद्रू ने कहा-“तो फिर हम दोनों में शर्त हो गई। कल घोड़े को चलकर देखती हैं। यदि वह संपूर्ण सफेद रंग का हुआ तो मैं हारी, और यदि उसकी पूंछ काली निकली तो मैं जीत जाऊंगी। उस हालत में जो भी हम दोनों में से जीतेगी, तो हारने वाली को जीतने वाली की दासी बनना पड़ेगा। बोलो तुम्हें मंजूर है?” 

विनता बोली- “मुझे मंजूर है।” 

रात को ही कद्रू ने अपने सर्प पुत्रों को बुलाकर कहा-“आज रात को तुम सब उच्चैःश्रवा घोड़े की पूंछ से जाकर लिपट जाना। ताकि सुबह जब विनता देखे तो उसे घोड़े की पूंछ काली नजर आए।”

 योजनानुसार नाग उच्चैःश्रवा की पूंछ से जाकर लिपट गए। परिणामस्वरूप सुबह जब कद्रू ने विनता को घोड़े की पूंछ काले रंग की दिखाई तो वह हैरान रह गई। बोली-“ऐसा कैसे हो गया। कल तो इसकी पूंछ बिल्कुल सफेद थी।”

 कद्रू बोली-“खूब तसल्ली से देख लो। घोड़े की पूंछ आरंभ से ही काली है। शर्त के मुताबिक तुम हार चुकी हो। इसलिए अब तुम्हें मेरी दासी बनकर रहना पड़ेगा।” 

विवशतापूर्वक विनता को कद्रू की दासता स्वीकार करनी पड़ी। माता को उदास देखकर गरुड़ ने पूछा- “मां! आप इतनी उदास क्यों रहती हैं।” विनता ने अपनी शर्त हारकर दासी बनने की बात बताई तो गरुड ने पुनः पूछा-“क्या ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे आप कद्रू की दासता से मुक्त हो जाएं?” .. 

विनता बोली-“यह तो कद्रू से ही पूछना पड़ेगा। यदि वह प्रसन्न हो जाती है तो मुझे दासता से मुक्त कर देगी।” 

गरुड़ अपनी माता विनता को लेकर कद्रू के पास पहुंचा और कहा-“क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप मेरी माता को अपनी दासता से मुक्त कर दें।” 

कद्रू बोली-“हो सकता है। बशर्ते कि तुम मेरे पुत्रों को अमृत लाकर दे दो।” 

यह सुनकर गरुड़ सोच में पड़ गया। उसने अपनी माता से पूछा- “मां! अमृत कहां मिलेगा जिसे लाकर मैं तुम्हें दासी जीवन से मुक्त कर सकूँ।” 

विनता ने कहा-“अमृत का पता तुम्हारे पिता बता सकते हैं पुत्र! तुम उन्हीं के पास जाकर पूछो।” 

गरुड़ महर्षि कश्यप के पास पहुंचा। कश्यप अपने पुत्र को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। गरुड़ ने उनसे पूछा- “पिताश्री ! मैं अमृत लाकर अपनी माता को दासता से मुक्ति दिलाना चाहता हूं। कृपया मुझे बताइए कि अमृत कहां मिलेगा।” 

महर्षि बोले-“पुत्र! देवराज इंद्र ने अमृत की सुरक्षा के लिए बहुत व्यापक प्रबंध कर रखा है। वहां तक पहुंचना बड़ा कठिन है।” ।

गरुड़ बोला- “इंद्र ने कितने ही कड़े सुरक्षा प्रबंध क्यों न कर रखे हों। मगर मैं अमृत ले आऊंगा। आप मुझे सिर्फ उस स्थान का पता बता दीजिए।” 

महर्षि कश्यप ने गरुड़ को इंद्र का पता बता दिया। गरुड़ ने फिर पूछा-“पिताजी ! मुझे भूख बहुत लगती है। कृपया यह भी बता दीजिए कि इस लंबे मार्ग में क्या खाकर अपना पेट भरूं?”

महर्षि बोले-“अमृत जिस स्थान पर रखा है उस सरोवर तक पहुंचने में तुम्हें वक्त लग जाएगा। इस बीच समुद्र के किनारे तुम्हें निषादों की अनेक बस्तियां मिलेंगी। ये निषाद बहुत पतित हैं और इनके आचरण असुरों जैसे हैं। तुम इन्हें खाकर अपनी भूख मिटा लेना।” 

गरुड़ बोला-“और उसके बाद भी मेरा पेट न भरा तो?” 

भगवान विष्णु की कथा-गरुड़ का जन्म 

महर्षि बोले- “सरोवर के अंदर एक विशाल कछुआ रहता है और उसके साथ ही वन में एक महा भयंकर हाथी भी रहता है। दोनों ही बहुत क्रूर और आसुरी प्रवृत्ति के हैं। तुम उन्हें भी खा सकते हो।” 

पिता का आदेश पाते ही गरुड़ अमृत सरोवर की ओर बढ़ चला। मार्ग में उसने निषादों को खाकर अपनी भूख मिटाई। फिर अमृत सरोवर पर पहुंचकर कच्छप और हाथी को अपने पंजों में दबाया और दोनों को खाने के लिए किसी उचित जगह की तलाश में उड़ चला।”

सोमगिरि पर्वत पर लहलहाते ऊंचे वृक्षों को देखकर जैसे ही उसने एक वृक्ष पर बैठना चाहा तो उनके भार से वृक्ष की शाखा टूटकर नीचे गिरने लगी। यह देख गरुड़ तुरंत उड़ा और दूसरे वृक्ष पर जा बैठा। जिस शाखा पर वह बैठा उस शाखा पर उसने उल्टे लटके कुछ ऋषियों को तपस्या करते देखा। लेकिन वह शाखा उनके भार से टूटकर नीचे गिरने लगी। यह देख गरुड़ ने शाखा को चोंच में दबाया और हाथी तथा कच्छप को पंजे में दबाए हुए वह अपने पिता के आश्रम की ओर उड़ चला।

कश्यप के आश्रम में गरुड़ ने उड़ते-उड़ते अपने पिता से पूछा-“पिताजी ! मेरे भार से उस पेड़ की शाखा टूट गई है जिस पर कुछ ऋषि उलटे लटके तपस्या कर रहे थे। मुझे बताइए अब मैं इस शाखा को कहां छोडूं?” 

महर्षि कश्यप बोले-“तुमने बहुत अच्छा किया पुत्र! जो सीधे यहां चले आए। शाखा, से उल्टे लटके हुए ये बालखिल्य ऋषिगण हैं। अगर इन्हें कष्ट पहुंचा तो ये शाप देकर तुम्हें भस्म कर देंगे।” 

गरुड बोला—”तो फिर बताइए अब मैं क्या करूं?” 

महर्षि बोले-“ठहरो, मैं ऋषिगणों से प्रार्थना करता हूं कि वे अपना स्थान छोड़कर नीचे आ जाएं।” 

महर्षि कश्यप ने ऋषिगणों से प्रार्थना की। बालखिल्य ऋषियों ने कश्यप की प्रार्थना स्वीकार कर शाखा छोड़ दी और वे हिमालय में तपस्या करने चले गए। चोंच में दबी शाखा को नीचे फेंककर गरुड़ ने भी आनंद से कछुए और हाथी का आहार किया और तृप्त होकर पुनः अमृत लाने के लिए उड़ चला। गरुड़ अमृत सरोवर के पास पहुंचा तो अमृत की रक्षा करते हुए महाकाय देवों और अमृत कलश के चारों ओर घूमते हुए चक्र को देखकर वह हैरान हो गया। उसने सोचा कि ये देव और चक्र देवराज इंद्र ने अमृत कलाश की सुरक्षा लिए लगाए हुए हैं। चक्र में फंसकर मेरे पंख कट सकते हैं। इसलिए मैं अत्यंत छोटा रूप धारण कर इसके मध्य में प्रवेश करूंगा। 

गरुड़ को देखकर एक देव ने कहा-“यह कोई असुर है जो वेश बदलकर अमृत चुराने यहां तक पहुंचा है। हमें इसे खत्म कर देना चाहिए।” 

दोनों देव विद्युत गति से गरुड़ पर टूट पड़े। लेकिन गरुड़ ने अपने पैने पंजों और तीखी चोंच से उन्हें इतना घायल कर दिया कि शीघ्र ही वे दोनों बेहोश होकर गिर पड़े। गरुड़ ने अमृत कलश पंजों में दबाया और वापस उड़ चला। 

होश में आते ही दोनों रक्षक देव घबराए हुए इंद्र के पास पहुंचे और गरुड़ द्वारा अमृत कलश ले उड़ने की घटना बता दी। 

यह सुनकर इंद्र चकित होकर बोला- “ऐसा कैसे हो गया। सरोवर में रहनेवाले विशाल कच्छप और तट पर रहनेवाले महाकाय हाथी का क्या हुआ?” 

“उन दोनों को भी उस विशाल गरुड़ ने अपना भोजन बना लिया है। 

यह सुनकर इंद्र अपनी देव सेवा की एक टुकड़ी के साथ वज्र उठाए इंद्रपुरी से निकला और गरुड़ की खोज में बढ़ चला। आकाश मार्ग में उड़ते हुए शीघ्र ही उसने गरुड़ को देख लिया और अपना वज्र चला दिया। इंद्र के वज्र का गरुड़ पर कोई असर न हुआ। उसके डैनों से सिर्फ एक पर (पंख) वज्र से टकराकर नीचे आ गिरा। देव गरुड़ पर टूट पड़े किंतु कुछ ही समय में गरुड़ ने उन्हें अपनी पैनी चोंच की मार से अधमरा कर दिया। 

यह देख इंद्र सोचने लगा—’यह तो महान पराक्रमी है। मेरे वज्र का इस पर जरा भी असर नहीं हुआ। जबकि मेरे वज्र के प्रहार से पहाड़ तक टूटकर चूर्ण बन जाते हैं। ऐसे पराक्रमी को शत्रुता से नहीं मित्रता से काबू में करना चाहिए।’ यह सोचकर इंद्र ने गरुड से कहा-‘पक्षीराज ! मैं तुम्हारी वीरता से बहुत प्रभावित हुआ हूं। इस अमृत कलश को मुझे सौंप दो और बदले में जो भी वर मांगना चाहते हो मांग लो।” 

गरुड़ बोला-“यह अमृत मैं अपने लिए नहीं, अपनी माता को दासता से मुक्त कराने के लिए नाग माता को देने के लिए ले जा रहा हूं। इसलिए यह कलश मैं तुम्हें नहीं दूंगा।”

इंद्र बोला-“ठीक है, इस समय तुम कलश ले जाकर नाग माता को सौंप दो किंतु उन्हें इसे प्रयोग मत करने देना। उचित मौका देखकर मैं वहां से यह कलश गायब कर दूंगा।” 

गरुड़ बोला-“अगर मैं तुम्हारी बात को मान लूं तो बदले में मुझे क्या मिलेगा?” 

इन्द्र बोला-“तुम्हारा मनपसंद भरपेट भोजन । तब मैं तुम्हें इन्हीं नागों को खाने की इजाजत दे दूंगा।”

गरुड़ बोला-‘यही तो मैं चाहता हूं। नाग मेरे स्वादिष्ट भोजन हैं किंतु एक ही पिता की संतान होने के कारण मैं इन्हें खाते हुए हिचकता हूं। अब मेरी हिचक दूर हो गई। अब मैं आपके कथनानुसार ही कार्य करूंगा।” 

यह कहकर गरुड़ अमृत कलश लेकर कद्रू के पास पहुंचा और उससे बोला-“माते ! अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मैं अमृत कलश ले आया हूं। अब आप अपने वचन से मेरी माता को मुक्त कर दें।” 

कद्रू ने उसी क्षण विनता को वचन मुक्त कर दिया और अगली सुबह अमृत नागों को पिलाने का निश्चय कर वहां से चली गई। रात को उचित मौका देखकर इंद्र ने अमृत कलश उठा लिया और पुन: उसी स्थान पर पहुंचा दिया। 

दूसरे दिन सुबह नाग जब वहां पहुंचे तो अमृत कलश गायब देखकर दुखी हुए। उन्होंने उस कुशा को ही जिस पर अमृत कलश रखा था चाटना आरंभ कर दिया जिसके कारण उनकी जीभ दो हिस्सों में फट गई।

गरुड़ की मातृभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु गरुड़ के सम्मुख प्रकट हो गए और बोले- ‘मैं तुम्हारी मातृभक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हूं पक्षीराज ! मैं चाहता हूं कि अब से तुम मेरे वाहन के रूप में मेरे साथ रहा करो।” 

गरुड बोला-”मैं बहुत भाग्यशाली हूं प्रभु जो स्वयं आपने मुझे अपना वाहन बनाना स्वीकार किया। आज से मैं हर क्षण आपकी सेवा में रहूंगा और आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।” 

इस तरह उसी दिन से पक्षीराज गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन के रूप में प्रयुक्त होने लगे। गरुड़ के भगवान विष्णु की सेवा में जाते ही देवता भयमुक्त हो गए। 

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