भगवान शिव की कहानी-स्वयंभू और उनकी तीसरी आँख

भगवान शिव की कहानी

भगवान शिव की कहानी-स्वयंभू और उनकी तीसरी आँख

हिन्दू धर्म में तीन प्रमुख देव हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश, जो त्रिदेव के नाम से जाने जाते हैं। इन त्रिदेवों में ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और महेश अर्थात् शिव विनाश करते हैं। 

हजारों वर्ष पूर्व की स्वर्ग की यह बात है… एक बार ब्रह्मा और विष्णु वार्ता में लीन थे तभी ब्रह्मा ने कहा, “हे विष्णु! सृष्टि का निर्माता होने के कारण मुझे यह सोचकर ही अच्छा लगता है कि मैं आपसे श्रेष्ठ हूँ।” 

विष्णु भगवान ने इसे न माना और चुटकी लेते हुए कहा, “ब्रह्मदेव! निश्चय ही आपने सृष्टि की रचना करी है पर उसके पालन की भी तो आवश्यकता है और वह मेरा कार्य है… अतः निश्चित रूप से मेरा कार्य बड़ा और उत्तरदायित्वपूर्ण हुआ न…” 

ब्रह्मा को कुतूहल हुआ। उन्होंने पूछा, “विष्णुदेव! आपका तात्पर्य क्या है?” मधुर मुस्कान के साथ विष्णु भगवान ने कहा, “यही कि मैं आपसे श्रेष्ठ ही नहीं श्रेष्ठतर 

ब्रह्मा विष्णु से सहमत न हुए। दोनों अपनी-अपनी महत्ता और प्रभुता का बखान करते रहे। उत्तेजना बढ़ने लगी। तभी अचानक एक विशालकाय स्तम्भ उनके समक्ष प्रकट हुआ जिसे देखकर दोनों अवाक रह गए। 

ब्रह्मा ने कहा, “अरे! यह क्या है? यह कहाँ से आ गया?” 

“क्या पता? मैंने भी इसे पहले नहीं देखा है…” आश्चर्यचकित विष्णु ने कहा। 

ध्यान से स्तम्भ को निहारते हुए विष्णु ने पुनः कहा, “ब्रह्मदेव! आपने ध्यान दिया क्या… इस स्तम्भ के आदि 

और अंत का तो पता ही नहीं चल रहा है…” 

“अरे हाँ! आदि और अंत के बिना स्तम्भ?” ब्रह्मा सोच में पड़ गए। 

सुझाव देते हुए विष्णु ने कहा, “ठीक है, चलिए ढूँढते हैं… मैं पक्षी का रूप धारण करता हूँ और आप जानवर का रूप धरे… दोनों मिलकर अन्वेषण करते हैं।” 

ऐसा निर्णय कर विष्णु ने हंस का रूप धरा और स्तम्भ की ऊँचाई ढूँढने उड़ चले। ब्रह्मा ने वराह (सूअर) का रूप धरा और स्तम्भ की जड़ पृथ्वी खोदकर ढूँढने लगे। कई वर्ष व्यतीत हो गए पर उन्हें स्तम्भ की थाह न मिली। असफल होकर दोनों वापस लौट आए। 

भगवान शिव की कहानी

विष्णु भगवान ने कहा, “ब्रह्मदेव! कितनी आश्चर्यजनक बात है… यह स्तम्भ मीलों तक ऊपर गया हुआ है… मुझे तो इसका छोर नहीं मिला, क्या आप सफल हुए?” 

“विष्णुदेव, यहाँ भी वही हाल है। यह तो कोई रहस्यमय स्तम्भ लगता है जिसके मूल का कोई पता ही नहीं है…” ब्रह्मदेव ने स्वीकारा। 

ब्रह्मा और विष्णु वार्ता में लीन थे तभी उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से शिव भगवान को स्तम्भ से प्रकट होते देखा। दोनों अचंभित थे… यह स्तम्भ उनकी समझ से परे था। शिव भगवान को देखकर दोनों ने उनके ब्रह्माण्डीय विराट शक्ति का लोहा माना जो कि उन दोनों की शक्ति से कहीं अधिक थी। 

संस्कृत में शिव भगवान को स्वयंभू कहा गया है जिसका अर्थ है ‘स्वयं प्रकट हुआ’। 

इस प्रकार प्रकट हुए शिव जी के तीन नेत्र हैं, गले में सर्प लिपटा हुआ है, वे जटाधारी हैं जिस पर अर्धचंद्राकार चाँद शोभता है और वहीं से गंगा नदी का उद्गम है। वल्कल के रूप में बाघ की खाल पहन रखा है और सम्पूर्ण शरीर पर राख का लेप लगा रहता है। 

सृष्टि की बुराइयों का अंत करने के कारण शिव को ‘विनाशक’कहा गया है। इन्हीं के द्धारा युगों का अंत होता है। शिव नटराज के रूप में ताण्डव करते हैं, उनके तृतीय नेत्र से निकली हुई अग्नि सृष्टि की बुराइयों का नाश कर देती है और फिर एक नए युग का प्रारम्भ होता है। 

शिव का तृतीय नेत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उसकी कथा कुछ इस प्रकार है:- 

एकबार शिव भगवान ध्यानमग्न बैठे थे। तभी उनकी अर्धांगिनी पार्वती माता वहाँ आईं। उन्हें एक खेल सूझा और उन्होंने पीछे से आकर शिवजी की आँखें अपने हाथों से ढंक दिया। तत्काल सारी सृष्टि में अंधकार छा गया और तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। इसका आभास होते ही शिव ने अपनी ललाट के बीचों-बीच एक तीसरी आँख खोल दी। शक्ति से भरपूर इस तीसरी आँख से इतनी ज्वाला निकली कि सृष्टि पर पुनः प्रकाश फैल गया।

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