कृष्ण भगवान की कथा-पृथ्वी ने की भगवान विष्णु से शिकायत 

कृष्ण भगवान की कथा-

कृष्ण भगवान की कथा-पृथ्वी ने की भगवान विष्णु से शिकायत 

बहुत-बहुत समय पहले की बात है। पृथ्वी (धरती माता) राक्षसों और शैतानों के दुष्ट कर्मों से परेशान हो गई थी। वह सुमेरु पर्वत पर भगवान ब्रह्मा से सहायता मांगने गई और रोती हुई बोली, “प्रभु! उग्रसेन का पुत्र, दुष्ट कंस मुझ पर अत्याचार कर रहा है। उसने अरिष्ट, धेनुका, केशि, प्रलंब, नरक, सुंद आदि राक्षसों को भी अपने साथ मिला लिया है। वे सब मिलकर मेरा नाश कर रहे हैं। कृपया मेरी रक्षा करें।” भगवान ब्रह्मा ने पृथ्वी की प्रार्थना सुनी और भगवान विष्णु से फरियाद की। 

भगवान विष्णु प्रकट होकर बोले, “हे पृथ्वी! तुम डरो मत। धरती पर केशों की दो लटें-कृष्ण और उनके बड़े भाई संकृष्ण (बलराम) के रूप में जन्म लेंगी। वे दोनों मिलकर राजा कंस और अन्य दुष्ट राजाओं का नाश करेंगे।” यह सुनकर पृथ्वी खुशी से फूली नहीं समाई और भगवान विष्णु को धन्यवाद देती हुई चली गई। उसे विश्वास हो गया था कि अब शीघ्र ही राजा कंस तथा अन्य दुष्ट राजाओं का धरती से सफाया हो जाएगा। 

कृष्ण भगवान की कथा- दुष्ट राजा कंस

कंस मथुरा नगरी का दुष्ट राजा था। वह बहुत निर्दयी था, लेकिन अपनी बहन देवकी से अत्यंत स्नेह रखता था। देवकी का विवाह शूरसेन के पुत्र वासुदेव से हुआ। कंस अपनी बहन देवकी से इतना प्यार करता था कि वह स्वयं देवकी और वासुदेव के रथ को हांकता हुआ चल पड़ा। तभी उसे एक आकाशवाणी सुनाई दी, “हे मूर्ख कंस! क्या तू जानता भी है कि तू किसका रथ हांक रहा है? वासुदेव और देवकी की आठवीं संतान के हाथों तेरा वध होगा।” 

कृष्ण भगवान की कथा- दुष्ट राजा कंस कंस

यह सुनकर कंस गुस्से से भर गया। उसने रथ रोका और अपनी तलवार म्यान से खींच ली। वह देवकी की हत्या करना चाहता था। तभी वासुदेव ने कहा, “हे कंस! मेरी पत्नी की हत्या मत करो। अगर तुम मेरे और मेरी पत्नी के प्राण नहीं लोगे, तो मैं स्वयं अपनी सारी संतानें उनके जन्म के तुरंत बाद तुम्हें दे दूंगा।” वासुदेव की बात सुनकर कंस शांत हो गया। उसने देवकी और वासुदेव की जान बख्श दी। लेकिन कंस ने उन दोनों को कारागार में डाल दिया। शर्त यह थी कि जैसे ही उनकी संतान जन्म ले, वैसे ही वे उसे कंस को सौंप दें।

नारद जी एक दिव्य संत थे। एक दिन वे कंस के पास जाकर बोले, “हे कंस, तूने मेरा बहुत अच्छा स्वागत किया है, इसलिए मैं तेरी सहायता करना चाहता हूं। तू देवकी और वासुदेव के आठवें पुत्र से सावधान रहना। 

वह भगवान विष्णु का अवतार होगा और उसके हाथों ही तेरा वध होगा।” यह सुनकर राजा कंस हंसने लगा और बोला, “मैं अत्यंत ताकतवर हूं। अगर चाहूं, तो किसी देवता को भी मार सकता हूं। मैंने पहले ही देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल दिया है। मैं उनकी हर संतान को पैदा होते ही मार डालूंगा। ऐसे में मुझे क्या भय!” 

तत्पश्चात दुष्ट कंस ने देवकी और वासुदेव के छह बच्चों को जन्म लेते ही मार डाला। देवकी और वासुदेव आंसू बहाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे। जब सातवीं संतान का जन्म होने वाला था, तो देवकी बहुत दुखी थी। ऐसे में भगवान विष्णु ने इसका हल खोज निकाला। वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी गोकुल में रहती थी। भगवान विष्णु ने सातवें पुत्र को रोहिणी की कोख में भेज दिया। इस तरह वह दुष्ट कंस के हाथों मारे जाने से बच गया। सातवें पुत्र का नाम बलराम रखा गया। 

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देवकी और वासुदेव की सातवीं संतान तो सुरक्षित हो गई थी, लेकिन अब उन्हें आठवीं संतान की चिंता सता रही थी। उन्होंने भगवान विष्णु की स्तुति की। भगवान विष्णु प्रकट हुए। उनके आने से कारागार में अद्भुत प्रकाश फैल गया। उन्होंने कहा, “तुम लोग चिंता मत करो। शीघ्र ही मैं तुम्हारे आठवें पुत्र के रूप में जन्म लेकर दुष्टों का नाश करूंगा।” इसके बाद भगवान विष्णु ने देवकी और वासुदेव को बताया कि अब उन्हें क्या करना होगा। 

कृष्ण भगवान की कथा- दुष्ट राजा कंस कंस

भगवान विष्णु बोले, “तुम्हारे मित्र नंद गोकुल में गोपालों के । मुखिया हैं। उनकी पत्नी यशोदा एक पुत्री को जन्म देने वाली है, जिसका नाम योगमाया होगा। जब मेरा जन्म हो, तो तुम मुझे इस कारागार से निकालकर गोकुल में अपने मित्र नंद के पास ले जाना और योगमाया को इस कारागार में ले आना।” 

वासुदेव ने कहा, “प्रभु! मेरे पैरों में बेड़ियां पड़ी हैं। मैं इस कारागार से बाहर नहीं निकल सकता। ऐसे में गोकुल जाकर यह काम कैसे कर सकूँगा?” भगवान विष्णु ने कहा, “वासुदेव, जब गोकुल जाने का समय आएगा, तो कोई भी बाधा तुम्हारी राह नहीं रोक सकेगी।” भगवान विष्णु की बात सुनकर देवकी और वासुदेव संतुष्ट हो गए। 

अब देवकी और वासुदेव को यकीन हो गया कि उनके नवजात पुत्र को कोई भी नहीं मार सकेगा। लेकिन उन्हें योगमाया की चिंता होने लगी। वासुदेव ने भगवान विष्णु से कहा, “कंस तो योगमाया के प्राण ले लेगा।” भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया, “योगमाया को कोई नहीं मार सकता। वे तो केवल कंस को चेतावनी देने के लिए शिशु के रूप में आएंगी और फिर अपने धाम को लौट जाएंगी।” यह सुनकर देवकी और वासुदेव के आनंद की सीमा न रही। वे समझ गए कि उनकी सभी प्रकार की चिंता निर्मूल है। सब कुछ भगवान विष्णु के कथनानुसार ही घटित होगा, क्योंकि वे सृष्टि के पालक हैं। फिर समय आने पर सारी घटनाएं उसी प्रकार संपन्न हुईं। 

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