कृष्ण भगवान की कहानी-रासलीला | भगवान कृष्ण और ब्रह्मा जी

कृष्ण भगवान की कहानी

कृष्ण भगवान की कहानी-रासलीला

भगवान कृष्ण, राधा और गोपियां प्रतिदिन रासलीला करते थे। रासलीला के दौरान वे मधुर संगीत पर नाचते। गोपियां एक घेरा बना लेतीं और वे मिलकर डांडिया रास करते। डांडिया रास के समय उनके हाथों में लकड़ी की छोटी-छोटी डंडियां होतीं। राधा और कृष्ण एक-दूसरे के प्यार में मग्न होकर घेरे के बीच नाचते। भगवान कृष्ण के लिए राधा का प्रेम दुनियावी प्रेम से पूरी तरह अलग था। उनके दिल आपस में इस तरह मिले थे कि वे एक-दूसरे के साथ न रहने पर भी आपस में बातें करते थे। राधा उनकी मित्र और सलाहकार थीं। वे दस वर्ष से अधिक समय तक उनके साथ रहीं। जब श्रीकृष्ण मथुरा गए, तो उन्हें एक-दूसरे का वियोग सहना पड़ा। 

भगवान कृष्ण को गोपियों के प्रति अपार प्रेम था। वे प्रायः अपना बहु रूप बना लेते थे, ताकि कोई भी गोपी खुद को उपेक्षित महसूस न करे। इस तरह किसी भी गोपी को राधा से जलन नहीं होती थी। क्योंकि सबको यह लगता था कि श्रीकृष्ण उनके साथ नृत्य कर रहे हैं। 

तब वन में चारों ओर दिव्य संगीत की मधुर ध्वनि गूंज उठती थी।

भगवान श्रीकृष्ण सभी गोपियों के साथ घेरा बनाकर नाचते। घेरे के बीच राधा और श्रीकृष्ण रहते। आसपास नाच रही गोपियों के साथ भी श्रीकृष्ण होते। श्रीकृष्ण की यह लीला ही उन्हें गोपियों का प्रिय बनाती थी। गोपियां श्रद्धा और भक्ति के साथ उनके प्रति समर्पित हो जातीं। ऐसा लगता था कि आत्मा और परमात्मा का मिलन हो रहा हो। 

कृष्ण भगवान की कथा – श्रीकृष्ण और शंखचूड़

भगवान कृष्ण और बलराम प्रायः यमुना नदी के किनारे जाते थे। दोनों को यमुना नदी का किनारा बहुत अच्छा लगता था। जब श्रीकृष्ण बांसुरी बजाने लगते, तो उनके सभी दोस्त, गोपियां और यहां तक कि गौएं भी दौड़कर यमुना नदी के किनारे पहुंच जातीं। फिर सब लोग मिलकर नृत्य करने लगते। नित्य की तरह उस दिन भी वे सब भगवान कृष्ण के आसपास घेरा बनाकर नाच रहे थे। तभी अचानक शंखचूड़ नामक राक्षस वहां से गुजरा। वह गोपियों की सुंदरता पर मोहित हो गया। शंखचूड़ कुछ गोपियों को अपने साथ ले जाना चाहता था। ज्यों ही उसने चुपके से कुछ गोपियों को पकड़ा, वे मदद के लिए चिल्लाने लगीं, “कृष्ण! कृष्ण!! हमारी रक्षा करो। यह राक्षस हमें उठाकर ले जा रहा है।” । 

कृष्ण भगवान की कथा - श्रीकृष्ण और शंखचूड़

 गोपियों की आवाजें सुनकर श्रीकृष्ण और बलराम तत्काल उस राक्षस का पीछा करने लगे। शंखचूड़ ने भगवान कृष्ण के बारे में काफी सुन रखा था। जब शंखचूड़ को पता चला कि श्रीकृष्ण उसके पीछे आ रहे हैं, तो वह गोपियों को वहीं छोड़कर भाग खड़ा हुआ। लेकिन श्रीकृष्ण ने उसे जा दबोचा और उसके सिर पर गहरा प्रहार किया। ऐसे में शंखचूड़ ने अपने प्राण त्याग दिए। 

तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने शंखचूड़ का वह आभूषण उतार लिया, जिसे उसने अपनी छाती पर पहन रखा था। फिर उन्होंने वह आभूषण बलराम को पहनने के लिए दे दिया। गोपियों ने भगवान कृष्ण को उनके प्राण बचाने के लिए धन्यवाद दिया। 

कृष्ण भगवान की कहानी सुनाओ- भगवान कृष्ण और ब्रह्मा जी

एक दिन भगवान कृष्ण अपने ग्वाल मित्रों के साथ पशुओं को चराने के लिए यमुना नदी के किनारे गए। जब वे खेल रहे थे, तो कुछ बछड़े वन में चले गए। अतः श्रीकृष्ण बछड़ों को खोजने के लिए वन की ओर चल पड़े। तभी सृष्टि के देवता ब्रह्मा जी ने उनके साथ एक चाल चलने की योजना बनाई। वे सभी ग्वालों और गौओं को गहरी नींद में सुलाकर एक गुफा में ले गए। जब भगवान कृष्ण वन से वापस आए, तो उन्होंने देखा कि कोई भी ग्वाला वहां नहीं था। जब वे बहुत खोजने पर भी नहीं मिले, तो उन्होंने अपने योगबल से सभी ग्वालों और बछड़ों का निर्माण किया, फिर शाम को उनके साथ घर वापस चले गए। 

कृष्ण भगवान की कहानी सुनाओ- भगवान कृष्ण और ब्रह्मा जी

ब्रह्मा जी अपनी चाल का असर देखने के लिए शाम को वृंदावन गए। वहां उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ आराम से खेल रहे थे। ब्रह्मा जी आश्चर्य चकित हो गए। तब भगवान कृष्ण ने ब्रह्मा जी को बताया कि उन्होंने क्या किया है। ब्रह्मा जी को अब बछड़ों और ग्वाल बालों के बजाय चारों तरफ भगवान कृष्ण ही दिखाई देने लगे।

ब्रह्मा जी मुस्कराए बिना नहीं रह सके। भगवान कृष्ण ने उन्हें यह सबक सिखा दिया था कि हर मनुष्य के भीतर प्रभु का अंश समाया हुआ है, जिसे दिव्य दृष्टि से ही देखा जा सकता है। 

Lord Krishna Stories in Hindi-अघासुर का क्रोध

अघ नामक राक्षस बहुत बलशाली था। भगवान कृष्ण ने बकासुर और पूतना को मौत के घाट उतार दिया था। अघासुर उनका छोटा भाई था। वह बदले की आग में जल रहा था। राजा कंस ने उस आग को भड़काते हुए कहा कि वह भगवान कृष्ण का वध कर दे। अघासुर बोला, “मैं कसम खाता हूं कि अपने भाई और बहन की मौत का बदला अवश्य लूंगा।” यह सुनकर दुष्ट कंस मुस्कराने लगा। अब शीघ्र ही उसका काम बनने वाला था। 

अघासुर ने खुद को आठ मील लंबे एक विशाल सांप में बदल दिया, जिसका मुंह किसी बड़ी गुफा के समान खुलता था। इसके बाद वह मुंह खोलकर ग्वालों का इंतजार करने लगा, जो उधर से आते-जाते थे। जब ग्वाले भगवान कृष्ण के साथ घूमकर वापस आ रहे थे, तो उन्होंने रास्ते में वह गुफा देखी। वे हैरानी से उसके मुंह के अंदर चले गए। भगवान कृष्ण जानते थे कि वह गुफा नहीं, सांप रूपी विशाल राक्षस है। जब तक श्रीकृष्ण इस बारे में अपने साथियों को बताते, तब तक वे सांप के मुंह के भीतर जा चुके थे। 

Lord Krishna Stories in Hindi-अघासुर का क्रोध

ऐसे में भगवान कृष्ण ने अघासुर को मारने की । योजना बना ली, जो एक विशाल सांप के रूप में था और उनके दोस्तों को निगल । गया था। उन्होंने अपने मन में सोचा, ‘यह विशाल राक्षस मेरा वध करने आया है। मैं भी इसके मुख में प्रवेश करूंगा और इसके प्राण ले लूंगा।’ 

फिर भगवान कृष्ण भी उस विशाल सांप के मुख में चले गए। यह देखकर देवगण घबरा गए। उन्होंने सोचा कि भगवान कृष्ण ने भी अपने प्राण त्याग दिए। इधर अघासुर ने खुशी से हुंकार भरी। उसे लगा कि वह श्रीकृष्ण को मारने में सफल हो गया था। 

श्रीकृष्णा की सम्पूर्ण कथा-श्रीकृष्ण द्वारा नंद की रक्षा

तभी भगवान कृष्ण भीतर से ही अघासुर का गला घोंटने लगे। ऐसे में उसका दिमाग चकराने लगा। उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी। शीघ्र ही अघासुर का दम घुट गया। जब वह मर गया, तो सभी ग्वाल-बाल उसके मुख से बाहर आ गए। उन्हें खरोंच तक नहीं आई थी। उन्होंने कहा, “कृष्ण! हम जानते थे कि तुम हमारी जान बचाने के लिए अवश्य आओगे।” भगवान कृष्ण भी उन्हें सही-सलामत देखकर बहुत खुश हुए। 

जब अघासुर भगवान कृष्ण के हाथों मारा गया, तो उसकी आत्मा का कायाकल्प हो गया। बकासुर और पूतना के छोटे भाई ने ग्वालों तथा श्रीकृष्ण को मारना चाहा, लेकिन अभी वे उसके पेट में ही थे कि वह स्वयं मारा गया। इस कारण उसकी दुष्ट आत्मा पवित्र हो गई। सभी देवता हैरानी से उसे देखते रह गए। उसकी आत्मा एक प्रकाश में बदली और भगवान कृष्ण के भीतर समा गई। देवगण बोले, “प्रभु का दिव्य प्रकाश ऐसा है कि प्रत्येक व्यक्ति इसके भीतर समाना चाहता है।” उन्होंने भगवान कृष्ण पर पुष्पों की वर्षा की और स्वर्ग की अप्सराएं नाचने लगीं। उन्होंने वेद मंत्रों का पाठ किया। इस तरह दुष्ट राक्षस का अंत होते ही धरती और स्वर्ग में शांति छा गई। 

श्रीकृष्णा की सम्पूर्ण कथा-श्रीकृष्ण द्वारा नंद की रक्षा

इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अगर दुष्ट व्यक्ति भी सच्चे दिल से अपने पापों की क्षमा मांगता है, तो प्रभु उस पर अपनी कृपा दृष्टि अवश्य करते हैं। भगवान कृष्ण ने अघासुर नामक बलशाली राक्षस का वध करके उसे मुक्ति प्रदान की, क्योंकि अंत समय में उसे अपनी भूल का एहसास हो गया था और उसने स्वयं को प्रभु के चरणों में सौंप दिया था। उसका यह प्रायश्चित ही उसकी आत्मा को पवित्र करने में सफल रहा। 

अघासुर ने जो भी किया, वह बदले की भावना के कारण किया। उसने कंस की बातों में आकर प्रभु के प्राण लेने चाहे। कंस ने उसका विवेक भ्रष्ट कर दिया था कि उसे भगवान कृष्ण को मार डालना चाहिए। अघासुर उसकी बातों में आकर यह पाप कर्म करने को राजी हो गया था, परंतु अंत समय में उसे अपनी भूल का एहसास हो गया। उसकी समझ में आ गया कि कंस ने उसे उकसाकर ऐसा करने को इसलिए भेजा, क्योंकि वह स्वयं भगवान कृष्ण के प्राण लेना चाहता था। अंत समय में आई सद्बुद्धि ने ही दुष्ट राक्षस के सारे पाप धो दिए। 

इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि दूसरों की बातों में न आएं और जो भी काम करने जा रहे हों, उसके अच्छे या बुरे परिणाम का विचार स्वयं कर लें। विवेकवान व्यक्ति कभी किसी के उकसावे में आकर बुरा काम नहीं करता। 

भगवान कृष्ण और व्योमासुर

कंस प्रायः भगवान कृष्ण को मारने के लिए योजनाएं बनाता रहता था, मगर वह हर बार स्वयं मात खा जाता था। इस बार उसने श्रीकृष्ण को मारने के लिए राक्षसराज मयासुर के पुत्र व्योमासुर को भेजा। व्योमासुर एक ग्वाले का रूप धारण करके भगवान कृष्ण के दोस्तों के दल में शामिल हो गया और उनके साथ लुका-छिपी खेलने लगा। इसी बीच वह कुछ ग्वालों को अपने साथ एक गुफा में ले गया और उनसे कहा कि वे लोग वहां छिपेंगे। ऐसे में किसी को पता नहीं चलेगा। व्योमासुर सोच रहा था, ‘जब श्रीकृष्ण अपने साथियों को खोजते हुए यहां आएंगे, तब मैं उनके प्राण ले लूंगा।’ 

भगवान कृष्ण और व्योमासुर

इधर जब श्रीकृष्ण को अपने साथियों के गायब होने का पता चला, तो वे सीधे उसी गुफा में जा पहुंचे। व्योमासुर उनकी ही प्रतीक्षा कर रहा था।

“मैं राक्षसराज मयासुर का पुत्र व्योमासुर हूं। मैं तुम्हारे शरीर का एक-एक अंग अलग कर दूंगा।” उसने भगवान कृष्ण को धमकाया। तत्पश्चात व्योमासुर एक विशाल पर्वत का रूप धारण करके अपने भार तले भगवान कृष्ण को दबाने की कोशिश करने लगा। 

भगवान कृष्ण ने व्योमासुर को अपने एक ही प्रहार से धराशायी कर दिया। वह स्वयं टुकड़े-टुकड़े होकर इधर-उधर बिखर गया। समस्त ग्वाले भगवान कृष्ण की इस विजय पर खुशी से झूम उठे। अब उन्हें अपना रक्षक मिल गया था। उन्हें किसी भी राक्षस से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं थी। 

श्रीकृष्णा की सम्पूर्ण कथा-श्रीकृष्ण द्वारा नंद की रक्षा

भगवान कृष्ण को राक्षसों के अलावा देवों का भी सामना करना पड़ता था। एक बार उनके पिता नंद बाबा यमुना नदी में स्नान करने के लिए गए। तब जल देवता उनका अपहरण करके वरुण देव के पास ले गया। वरुण देव का विशाल महल जल के नीचे बना था, जिसमें सभी तरह के जलचर रहते थे। नंद बाबा को उस महल में बंदी बना दिया गया। 

श्रीकृष्णा की सम्पूर्ण कथा-श्रीकृष्ण द्वारा नंद की रक्षा

भगवान कृष्ण ने सोचा, ‘मेरे पिता अभी तक स्नान करके क्यों नहीं लौटे। मुझे मालूम करना चाहिए कि वे कहां रह गए।’ तत्पश्चात श्रीकृष्ण यमुना नदी के किनारे पहुंचे। वहां नंद बाबा को न पाकर उन्हें अनुमान हो गया कि उनके पिता के साथ क्या हुआ होगा। वे उसी समय वरुण देव के महल में जा पहुंचे। उनके दिव्य प्रकाश से सारे जलचर अंधे हो गए। वरुण देव ने उनके पैर छूते हुए कहा, “भगवान कृष्ण! मैं यह सम्मान पाकर धन्य हो गया। आपके चरणों का स्पर्श करने वाला व्यक्ति जन्म और मरण के चक्र से सदैव के लिए मुक्त हो जाता है।” 

फिर वरुण देव ने भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी कि उन्होंने उनके पिताश्री का अपहरण किया था। भगवान कृष्ण बहुत दयालु स्वभाव के थे। उन्होंने वरुण देव को क्षमा कर दिया और अपने पिता के साथ घर वापस लौट गए। नंद बाबा ने अपने पुत्र श्रीकृष्ण को गले से लगा लिया। अब उन्हें संसार में किसी का भी भय नहीं था। उन्हें पूर्णतः विश्वास हो गया था कि कोई भी दुष्ट या राक्षस उनके पुत्र का बाल भी बांका नहीं कर सकता। 

राधा को मिला शाप

जब राधा और कृष्ण बड़े हुए, तो उनके बीच अच्छी दोस्ती हो गई। एक बार भगवान कृष्ण श्रीदामा नामक एक गोपी से बात कर रहे थे। तभी वहां राधा आ गईं। श्रीदामा के साथ श्रीकृष्ण को बैठा देखकर वे क्रोधित हो उठीं। श्रीदामा ने कहा, “राधा! मेरे प्रभु को कुछ मत कहना, वरना मैं तुम्हें शाप दे दूंगी।” यह सुनकर राधा का गुस्सा भड़क उठा। वे बोली, “मैं तुम्हें शाप देती हूं कि अगले जन्म में तुम एक गरीब परिवार में पैदा होगी और तुम्हें अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ेगा।” 

अब श्रीदामा के भी गुस्से का अंत नहीं रहा। उसने कहा, “राधा! मैं तुम्हें शाप देती हूं कि तुम मेरे प्रभु से पूरे सौ वर्षों तक अलग रहोगी।” 

राधा को मिला शाप

यह सुनकर राधा कांप उठीं और रोने लगीं। भगवान कृष्ण ने राधा को दिलासा देना चाहा। वे उनका दुख समझकर व्याकुल हो गए थे। भगवान कृष्ण यह बात अच्छी तरह जानते थे कि दोनों शाप अवश्य फलीभूत होंगे, अतः वे राधा और श्रीदामा के लिए दुखी हो गए। क्योंकि वे उन दोनों से हार्दिक स्नेह रखते थे।

ऐसी स्थिति में भगवान कृष्ण ने उन्हें समझाया कि हमें कभी गुस्से में आकर अपने मुंह से कोई गलत बात नहीं निकालनी चाहिए। भगवान कृष्ण की बात सुनकर राधा और श्रीदामा को अपनी भूल का एहसास हुआ, लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था। अब तो उन दोनों को इन शापों का फल भुगतना था। 

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