राजा विक्रम और बेताल की कहानी-राजकुमारी चंद्रलेखा

राजा विक्रम और बेताल की कहानी

राजा विक्रम और बेताल की कहानी-राजकुमारी चंद्रलेखा

राजा विक्रमादित्य सावधानी से पीपल के पेड़ के पास पहुंचे। लाश पहले की तरह उल्टी लटकी हुई थी। उन्होंने उसे पेड़ से नीचे उतारा, अपने कंधों पर रखा और अपने राज्य की ओर चल दिए। रास्ते में बेताल उन्हें एक दूसरी कहानी सुनाने लगा 

मगध राज्य में चंद्रलेखा नामक एक सुंदर राजकुमारी रहती थी। दूर-दूर के राजकुमार उससे शादी करना चाहते थे, लेकिन उसे अपने लिए कोई योग्य वर नहीं दिखता था। 

इस तरह दिन बीतने लगे। चंद्रलेखा की मां को चिंता होने लगी। एक दिन उन्होंने राजकुमारी चंद्रलेखा से पूछा, “तुम विवाह के लिए आने वाले प्रस्तावों को क्यों इन्कार कर देती हो?” 

राजकुमारी चंद्रलेखा ने कुछ पल सोचा, फिर बोली, “मेरा पति साहसी, बलशाली और प्रतिभावान होना चाहिए।” तब उसकी मां ने कहा, “तुम स्वयं विवाह के लिए आने वाले राजकुमारों में से किसी ऐसे राजकुमार को चुन लो, जिसमें ये सब गुण हों।” 

राजा विक्रम और बेताल की कहानी

कुछ दिनों बाद राजकुमार वीरेंद्र शादी का प्रस्ताव लेकर आया। राजकुमारी ने उससे पूछा कि उसमें क्या गुण है? राजकुमार ने बताया कि वह लोगों का भविष्य बता सकता है। उसकी भविष्यवाणी कभी गलत नहीं होती। राजकुमारी ने उसे अपने महल में मेहमान के तौर पर रहने को कहा। 

अगले दिन राजकुमार उदयवीर महल में आया, तो राजकुमारी ने उससे भी वही प्रश्न पूछा। उसने बताया कि उसके पास एक ऐसा रथ है, जो धरती पर चलने के साथ-साथ आसमान में उड़ भी सकता है। राजकुमार उदयवीर को भी मेहमानखाने में भेज दिया गया। 

एक दिन बाद राजकुमार धनंजय विवाह का प्रस्ताव लेकर आया। उससे भी उसका हुनर पूछा गया, तो उसने बताया कि वह एक बलशाली योद्धा है। कोई भी व्यक्ति उसका मुकाबला नहीं कर सकता। यह सुनकर उसे भी मेहमान बनकर रहने को कहा गया। 

सभी राजकुमार महल के मेहमानखाने में मेहमान बनकर रह रहे थे। उनके आराम और भोजन आदि का बहुत अच्छा प्रबंध किया गया था, लेकिन वे हमेशा वहां नहीं रह सकते थे। उन्हें अपने राज्य भी वापस जाना था। इसलिए चंद्रलेखा से जल्दी फैसला करने को कहा गया। 

सब कुछ अच्छी तरह चल रहा था, तभी अचानक एक मुसीबत आ गई। चंद्रलेखा महल से गायब हो गई। रानी ने राजकुमार वीरेंद्र को बुलाया और उससे कहा, “तुम देखकर बताओ कि मेरी बेटी कहां है?” 

राजकुमार वीरेंद्र ने कागज पर कुछ गणना की और बोला, “एक राक्षस राजकुमारी का अपहरण करके अपने किले में ले गया है। वह उससे शादी करना चाहता है।” यह सुनकर रानी ने बाकी राजकुमारों को भी बुलवा लिया और उनसे आग्रह किया, “आप लोग मेरी बेटी चंद्रलेखा को बचाएं।” 

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तीनों राजकुमार तुरंत इस काम में जुट गए। वीरेंद्र ने राक्षस के महल तक जाने का नक्शा बनाया। उदयवीर अपना जादुई रथ ले आया और धनंजय ने हाथ में तलवार ले ली। तीनों राजकुमार चंद्रलेखा को बचाने के लिए चल दिए। 

राजकुमारों के पहुंचते ही राक्षस उन पर हमला करने के लिए किले से बाहर आ गया। धनंजय ने उसके साथ भयंकर युद्ध किया। आखिर में धनंजय ने उसका सिर अपनी तलवार से काट दिया। 

ज्यों ही राक्षस का सिर कटा, वह वहीं धड़ाम से गिर पड़ा। राक्षस के चंगुल से आजाद होने के बाद चंद्रलेखा ने सबको धन्यवाद दिया। तीनों राजकुमारों ने राजकुमारी को बताया कि उन्होंने किस तरह उसे राक्षस से बचाने के लिए अपना योगदान दिया था। 

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राजकुमारी तीनों राजकुमारों के साथ महल में वापस आ गई। रानी ने सबको धन्यवाद दिया। सभी बहुत प्रसन्न थे। लेकिन तीनों राजकुमारों के बीच यह बहस छिड़ी थी कि राजकुमारी का विवाह किससे होगा। हर किसी को लग रहा था कि उसी के कारण राजकुमारी के प्राणों की रक्षा हुई थी, अतः राजकुमारी चंद्रलेखा पर उसी का दावा बनता था। 

आखिर में यह तय हुआ कि इस बारे में राजकुमारी से ही पूछा जाए। अब राजकुमारी को फैसला करना था कि उसके लिए योग्य वर कौन-सा था। यूं तो उन तीनों ने मिलकर उसे राक्षस से बचाया था, लेकिन उसका विवाह किसी एक राजकुमार से हो सकता था। 

बेताल बोला, “विक्रम! तुम बताओ, राजकुमारी ने अपना पति किसे चुना? उसके लिए योग्य वर कौन-सा था? अगर तुमने उत्तर नहीं दिया, तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।” 

राजा विक्रमादित्य कुछ क्षण चुप रहे, फिर बोले, “बेताल! कहते हैं कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस। यहां राजकुमार धनंजय ही राजकुमारी चंद्रलेखा के लिए योग्य वर है। अगर वह राक्षस को न मारता, तो राजकुमारी चंद्रलेखा को महल में लाना संभव न हो पाता।” 

राजा विक्रम और बेताल की कहानी

बेताल बोला, “तुमने बिल्कुल सही उत्तर दिया, विक्रम! लेकिन मेरी चेतावनी के बावजूद तू बोला, इसलिए मुझे वापस पेड़ पर जाना होगा।” 

यह कहते हुए बेताल राजा विक्रमादित्य के कंधे से उड़कर पीपल के पेड़ की ओर चल दिया। राजा अपनी तलवार लेकर उसके पीछे दौड़ पड़े। वे सोच रहे थे कि उन्हें बेताल की लाश हर हाल में प्राप्त करके उस साधु को सौंपना है, जो अपने आश्रम में बैठा उनका इंतजार कर रहा है। राजा को अपनी प्रजा से बहुत लगाव था और वे उसके कल्याण हेतु साधु की बात मानने को तैयार हो गए थे। 

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