राजा हरिश्चंद्र की कथा | Story of King Harishchandra

राजा हरिश्चंद्र की कथा |

राजा हरिश्चंद्र की कथा | Story of King Harishchandra

बहुत समय पहले अयोध्या में हरीशचन्द्र नामक राजा शासन करते थे। उनकी पत्नी तारामती थीं और एक पुत्र, जिसका नाम रोहित था। राजा बुध्दिमानी पूर्ण शासन करते थे और प्रजा पर ध्यान देने के कारण प्रजा भी उनसे प्रेम करती थी। 

अक्सर लोग उनकी उदारता का उल्लेख किया करते थे। जब भी कोई अपनी इच्छा लेकर उनके पास गया तो उन्होंने कभी मुंह नही मोड़ा। एक दिन ऋषि विश्वामित्र उनके दरबार में आए थे। राजा अपने सिंहासन से नीचे उतरकर महान ऋषि के आगे नतमस्तक हो गए। ऋषि विश्वामित्र ने कहा, “महाराज, मैंने सुना है कि यदि आप के पास कोई कुछ मांगने आता है तो आप किसी को वापस नहीं करते हैं। क्या आप मेरी इच्छा को परा करने के लिए कछ भी बलिदान करने को तैयार हैं?” राजा ने कहा, “मैं कुछ भी बलिदान करने को तैयार हूं।” तब विश्वामित्र ने कहा, “दक्षिणा के रूप में आप मुझे अपना राज्य दे दीजिए। क्या आप मुझे यह दे देंगे?” राजा ने एक बार फिर विश्वामित्र के सामने सिर झुकाया और कहा, “हां प्रभु, यह सब अब आपका है। मैं अपनी पत्नी और बेटे के साथ आज ही महल छोड़ दूंगा।” 

परन्तु विश्वामित्र संतुष्ट नही हुए थे। उन्होंने कहा, “इस दक्षिणा को और भी प्रभावी बनाने के लिए आपको मुझे कुछ धन भी देना होगा।” राजा हरीशचन्द्र ने अपनी पत्नी और अपने पुत्र को एक ब्राह्मण को बेच दिया, जिसने उन्हे एक दास के रूप में इस्तेमाल किया। राजा ने खुद को श्मशान के चौकीदार को बेच दिया था। 

दिन बीतते गए। रानी तारामती और उनका पुत्र रोहित दास के रूप में ब्राह्मण के घर में सेवा करने लगे। एक दिन जब रोहित बगीचे में फूल तोड़ने गया, तब उसे एक सांप ने काट लिया। रोहित की तुरंत मृत्यु हो गई। जब उसकी मां को यह समाचार मिला, तो वह उसके लिए शोक करने लगी। अन्तिम क्रियाकर्म के लिए वह उसे श्मशान ले गई। लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे। जब श्मशान के चौकीदार के नौकर ने उससे कर देने के लिए कहा, तो उसने अपनी आंखे नीची कर ली और चुपचाप खड़ी हो गई। तारामती इस बात से अनजान थी कि चौकीदार का नौकर कोई और नहीं, उनका पति ही है। हरीशचन्द्र भी अपनी पत्नी को नही पहचान पाए थे |

राजा हरिश्चंद्र की कथा |

उसने कहा, “यदि तुम्हारे पास कर चुकाने के लिए पैसे नहीं हैं, तो तुम अपना मगंलसूत्र क्यों नही बेच देती हो?” रानी के पास एक वरदान था कि उसके पति के अलावा और कोई उसके मगंलसूत्र को नही देख पाएगा। जैसे ही हरीशचन्द्र ने यह कहा, तारामती को पता चल गया कि वह उनके ही पति थे। उसने हरीशचन्द्र को उनके पुत्र के मृत्यु के बारे में बताया। तारामती के पास उसकी साड़ी के अलावा और कुछ नही था। उसने आधी साड़ी से अपने पुत्र के शरीर को ढका और आधी साड़ी कर के रूप में अपने पति को दे दी। 

यह देखकर सभी देवता स्वर्ग से उतर आए और उन्हें आशीर्वाद दिया। भगवान विष्णु ने रोहित की ज़िंदगी लौटा दी और कहा, “हे महान राजा, हम आपकी परीक्षा ले रहे थे हम सब आपके द्वारा किये गए कार्यो से बहुत प्रभावित हुए हैं। हम आपका राज्य आपको लौटा रहे हैं और अब आप स्वर्ग जा सकते हैं।” हरीशचन्द्र ने कहा कि वह ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि वह अभी भी अपने चौकीदार मालिक के नौकर हैं। 

देवताओं ने उसे बताया कि वह चौकीदार कोई और नहीं बल्कि भगवान यम हैं। तब हरीशचन्द्र ने कहा, “एक राजा होने के नाते मैं अपने लोगों को छोड़कर स्वर्ग में कैसे जा सकता हूं?” देवताओं ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि स्वर्ग जाना तो इनके कर्म पर निर्भर करता है। 

तब राजा ने कहा, “इस मामले में, मैं अपने पुण्य और धार्मिकता को छोड़ दूंगा ताकी मेरी जगह मेरे लोग स्वर्ग को जा सकें।” सभी देवतागण हरीशचन्द्र के आचरण से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा हरीशचन्द्र और उसकी प्रजा के सभी लोगों को मृत्यु के बाद स्वर्ग जाने की अनुमति दे दी। 

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