श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कहानी |Story of friendship of Shri Krishna and Sudama

श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कहानी

श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कहानी |Story of friendship of Shri Krishna and Sudama

श्रीकृष्ण और सुदामा बचपन के मित्र थे। जब भगवान कृष्ण द्वारका पर राज कर रहे थे, तो सुदामा बहुत गरीबी में जी रहे थे। एक दिन उनकी पत्नी से अपने बच्चों की भूख नहीं देखी गई। उन्होंने अपने पति से कहा, “क्या आप भगवान कृष्ण से मदद नहीं मांग सकते?” सुदामा पत्नी की बात मान गए। लेकिन उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि वे अपने मुंह से कुछ नहीं मांगेंगे। सुदामा की पत्नी ने अपने पड़ोसी से दो मुट्ठी चिड़वा उधार लिया और पति को दे दिया, ताकि वे उसे भगवान कृष्ण को उपहार में दे सकें। 

जब सुदामा द्वारका पहुंचे, तो श्रीकृष्ण उन्हें देखकर बहुत प्रसन्न हुए। जब उन्होंने सुदामा के हाथ में पोटली देखी, तो उसे छीन ली और कहा, “अरे वाह! चिड़वा! यह तो मैं बहुत स्वाद से खाता हूं।” फिर उन्होंने एक मुट्ठी चिड़वा खा लिया। जब वे दूसरी मुट्ठी भरने लगे, तो रुक्मिणी ने उन्हें रोका और बोली, “प्रभु! इससे ही उनकी सारी जरूरतें पूरी हो जाएंगी।” अगली सुबह सुदामा अपने नगर की ओर वापस चल दिए। 

जब सुदामा अपने घर पहुंचे, तो वे हैरान रह गए। वहां तो एक विशाल महल खड़ा था। उनकी पत्नी और बच्चे बाहर आए। उन्होंने कीमती कपड़े और आभूषण पहन रखे थे। सुदामा ने अपनी आंखों में आंसू भरकर भगवान कृष्ण को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया। सुदामा की पत्नी ने अपने पति को बताया कि किस तरह राजा के कर्मचारियों ने उनकी झोंपड़ी को महल में बदला और उनके पूरे घर में धन-धान्य का ढेर लगा दिया। 

कृष्ण और द्रौपदी की कहानी –भगवान कृष्ण के बंधु

भगवान कृष्ण अक्सर पांडवों के साथ रहते थे। पांडव पांच भाई थे। वे हस्तिनापुर के राजा पांडू और उनकी रानियों कुंती एवं माद्री के पुत्र थे। युधिष्ठिर, भीम एवं अर्जुन कुंती के पुत्र थे तथा नकुल और सहदेव माद्री के पुत्र थे। श्रीकृष्ण के पिता वासुदेव कुंती के भाई थे। अतः पांडव श्रीकृष्ण के फुफेरे भाई थे। पांडू से विवाह के पूर्व कुंती को महर्षि दुर्वासा से यह आशीर्वाद मिला था कि यदि वे किसी धार्मिक मंत्र का उच्चारण करें, तो उन्हें पुत्र संतान की प्राप्ति होगी। 

कृष्ण लीला की स्टोरी-भगवान कृष्ण के बंधु

कुंती ने उत्तेजना में आकर भगवान सूर्य का ध्यान लगाया और उनके मंत्रों का उच्चारण किया, जिसके फलस्वरूप उन्होंने कर्ण नामक एक पुत्र को जन्म दिया। कुंती को डर था कि यदि विवाह से पूर्व उनके पुत्र के बारे में लोगों को पता चल गया, तो अनर्थ हो जाएगा। अतः उन्होंने नन्हे कर्ण को एक टोकरी में रखकर गंगा नदी में बहा दिया। आदिरथ नामक एक योगी ने नन्हे कर्ण को प्राप्त किया और उसकी देखभाल की।

विचित्रवीर्य के दो पुत्र थे-धृतराष्ट्र और पांडू। इनमें धृतराष्ट्र सबसे बड़े थे। धृतराष्ट्र बहुत बुद्धिमान किंतु आंखों से अंधे थे। उनकी पत्नी का नाम गांधारी था। गांधारी ने विवाह के पश्चात अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी। गांधारी का मानना था कि यदि उनके पति धृतराष्ट्र इस दुनिया को नहीं देख सकते, तो वे भी आज के बाद इस दुनिया को नहीं देखेंगी। 

जब पांडू अपनी पत्नियों के साथ वनवास को चले गए, तो धृतराष्ट्र हस्तिनापुर के राजा बनाए गए। राजा धृतराष्ट्र तथा रानी गांधारी के सौ पुत्र थे, जिन्हें कौरवों के नाम से जाना जाता था। उनमें से दुर्योधन सबसे बड़ा था। पांडू की मृत्यु के पश्चात युधिष्ठिर तथा उनके भाइयों को इंद्रप्रस्थ का राज्य दे दिया गया। दुर्योधन हमेशा अपने चचेरे भाइयों अर्थात पांडवों से बहुत जलता था और उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास करता था। वह अपने मामा शकुनि के कहने पर चलता था, जो उसे सदैव बुरे कार्यों की शिक्षा देता था। शकुनि धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी का बड़ा भाई था। 

कृष्ण लीला की स्टोरी-भगवान कृष्ण के बंधु

एक दिन शकुनि ने दुर्योधन से कहा, “युधिष्ठिर को पांसे फेंकने का खेल बहुत पसंद है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि यह खेल किस प्रकार खेला जाता है। तुम उन्हें अपने साथ जुआ खेलने के लिए बुलावा भेजो। मेरे जैसा जुआ खेलने वाला आज तक पैदा नहीं हुआ। मैं उन्हें जुए में हरा दूंगा और इस प्रकार हम उनका राज्य जीत लेंगे।” 

दुर्योधन को अपने मामा शकुनि की यह बात पसंद आई। उसने अपने पिता धृतराष्ट्र से आग्रह किया कि वे पांडवों को अपने महल में आने के लिए निमंत्रण दें। पहले तो धृतराष्ट्र ने इस बात के लिए मना कर दिया, लेकिन जब दुर्योधन ने उन्हें उस घटना के बारे में याद दिलाया, जिसमें पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने उसे अंधे की औलाद कहकर उसका अपमान किया था, तो धृतराष्ट्र भी पांडवों को निमंत्रण देने के लिए राजी हो गए। 

धृतराष्ट्र के मन में भी दुर्योधन ने बदले की भावना भर दी थी। वे भी चाहते थे कि किसी तरह पांडवों का अपमान हो और भरी सभा में उन्हें लज्जित होना पड़े। द्रौपदी का इतना साहस कि वह उनके पुत्र को अंधे की औलाद कहकर उपहास करे।

युधिष्ठिर ने निमंत्रण पाते ही अपने भाइयों तथा द्रौपदी सहित वहां आने और जुआ खेलने की सहमति दे दी। दुर्योधन ने दरबार में जुआ खेलने का प्रबंध किया था। उसने बहुत से राजाओं को वहां निमंत्रित किया था। लेकिन उसने भगवान कृष्ण को वहां नहीं बुलाया था। 

कृष्ण लीला की स्टोरी-भगवान कृष्ण के बंधु

शकुनि ने अपने प्रिय पांसों के द्वारा युधिष्ठिर को कई बार हराया। युधिष्ठिर बार-बार अपनी दौलत जुए में लगाते और हारते गए। यही नहीं, वे अपना राज्य और भाइयों को भी दांव पर लगाकर हार गए। अंत में उन्होंने अपनी पत्नी द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया और हार गए। ऐसी स्थिति में दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने अपने भाई दुशासन को आदेश दिया कि वह द्रौपदी को घसीटता हुआ दरबार में लाए। 

भगवान कृष्ण द्रौपदी को अपना मित्र और बहन मानते थे। शिशुपाल के वध के दौरान जब उनकी उंगली में घाव हो गया था और उसमें से खून बहने लगा था, तो द्रौपदी ने अपनी साड़ी में से थोड़ा कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था। भगवान कृष्ण ने द्रौपदी की इस सेवा के बदले उसे यह वचन दिया था कि वे इस उपकार का बदला कभी न कभी अवश्य चुकाएंगे। और अब वह समय आ गया था, जब द्रौपदी को वास्तव में भगवान कृष्ण की मदद की जरूरत थी। 

दुशासन द्रौपदी के पास यह खबर लेकर गया कि उसके पांडव पति जुए में दुर्योधन से सब कुछ हार गए हैं। उन्होंने द्रौपदी को भी दांव पर लगाया और हार गए। अब द्रौपदी उनकी संपत्ति है। उसे कौरवों की दासी बनकर रहना होगा। फिर दुशासन द्रौपदी को विशाल दरबार में घसीटता हुआ लाया। 

दुर्योधन ने दुशासन को आदेश दिया कि वह द्रौपदी के शरीर से सारे कपड़े उतार दे। जब द्रौपदी ने देखा कि उसके पति उसकी मदद करने में असमर्थ हैं, तो उसने अपनी रक्षा के लिए भगवान कृष्ण को पुकारा। 

अचानक उसी समय एक महान चमत्कार हुआ। भगवान कृष्ण प्रकट हुए और उन्होंने द्रौपदी की साड़ी बहुत लंबी कर दी। दुशासन द्रौपदी के शरीर से साड़ी खींचता जा रहा था, लेकिन द्रौपदी की साड़ी समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही थी। दुशासन साड़ी खींचता-खींचता बुरी तरह थक गया और जमीन पर बैठकर हांफने लगा। 

कृष्ण लीला की स्टोरी-भगवान कृष्ण के बंधु

दरबार में उपस्थित सभी राजा इस चमत्कार को देखकर हैरान थे। दुशासन द्रौपदी के शरीर से उसकी साड़ी उतारने में असफल हो गया था। तभी भीम ने कहा, “मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि दुशासन की छाती चीर दूंगा और उसका लहू पिऊंगा। मैं दुर्योधन की वह जंघा भी तोड़ डालूंगा, जिस पर बैठने का इशारा करते हुए उसने द्रौपदी से भद्दा मजाक किया था।” 

द्रौपदी ने भी कौरवों को शाप दे दिया। धृतराष्ट्र द्रौपदी के शाप तथा भीम की प्रतिज्ञा से डर गए। उन्होंने द्रौपदी से क्षमा मांगी और द्रौपदी सहित पांडवों को वनवास में रहने की शर्त पर वहां से जाने की अनुमति दे दी। शर्त के अनुसार पांडवों को बारह वर्ष तक वनवास में रहना था। वनवास के पश्चात तेरहवां वर्ष उन्हें अज्ञातवास में बिताना था, ताकि कोई भी व्यक्ति उन्हें पहचान न सके। यदि इस दौरान वे पहचान लिए गए, तो उन्हें फिर से बारह वर्ष के वनवास और तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास को जाना होगा। 

 krishna katha in hindi- द्रौपदी की प्रार्थना

कौरवों द्वारा धोखे से जुए में हारने के पश्चात पांडवों को बारह वर्ष के लिए वनवास में जाना पड़ा। द्रौपदी ने भगवान सूर्य की पूजा की। इसके बदले में उसे भगवान सूर्य से एक अक्षय पात्र मिला, जो सारा दिन भोजन से भरा रहता था। लेकिन जब द्रौपदी उसमें से भोजन खा लेती, तो उसके बाद उस दिन उसमें भोजन नहीं रहता था। 

krishna katha in hindi- द्रौपदी की प्रार्थना

एक दिन दुर्वासा ऋषि अपने हजारों शिष्यों सहित पांडवों के पास पधारे। दुर्वासा ऋषि को उनके गुस्से के लिए जाना जाता था। उस दिन द्रौपदी सबको खिलाने के बाद स्वयं भी भोजन कर चुकी थी, अतः उसने भगवान कृष्ण का स्मरण किया। भगवान कृष्ण प्रकट हुए और उन्होंने द्रौपदी से वह अक्षय पात्र लाने को कहा। उन्होंने देखा कि पात्र में चावल का एक दाना चिपका हुआ था। श्रीकृष्ण ने वह दाना उठाकर खा लिया। फिर बोले, “धन्यवाद द्रौपदी! मेरा पेट भर गया।” इतना कहकर श्रीकृष्ण अदृश्य हो गए। द्रौपदी कुछ नहीं समझ पाई। तभी दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्य स्नान करके वहां आ गए। उन सबके पेट भी भरे हुए थे, इसलिए उन्होंने कुछ नहीं खाया। वे सब बिना कुछ खाए वहां से चले गए। द्रौपदी ने भगवान कृष्ण की ओर से मिली मदद के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। 

दरअसल उस दिन भगवान कृष्ण ने उस अक्षय पात्र से चावल का जो दाना खाया था, उससे ही सबका पेट भर गया था। जब द्रौपदी ने भगवान कृष्ण से इस बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा, “मैं ही ब्रह्माण्ड हूं। जब मेरा पेट भर गया, तो अन्य लोग कैसे भूखे रह सकते थे।” 

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