भक्त श्रवण कुमार की कहानी-भक्त श्रवण कुमार

भक्त श्रवण कुमार की कहानी

भक्त श्रवण कुमार की कहानी- भक्त श्रवण कुमार

किसी समय की बात है… श्रवण कुमार नामक एक बालक था। उसके माता-पिता दोनों अंधे थे। श्रवण उनके सभी कार्य करता तथा जी भरकर उनकी सेवा भी करता था। उसने मन में प्रतिज्ञा करी थी कि वह अपने माता-पिता की हर इच्छा पूरी करेगा। 

एक दिन उसके पिता ने कहा, “पुत्र अब हम लोग वृद्ध हो रहे हैं। मृत्यु से पूर्व तीर्थाटन की इच्छा है।” यातायात के साधन न होने के कारण उन दिनों तीर्थाटन सुगम नहीं था। पर श्रवण ने हिम्मत नहीं हारी। एक छड़ी के दोनों छोरों पर उसने एक-एक टोकरी बाँधी मानो तराजू हो। टोकरी में उसने अपने माता-पिता को बिठाया और छड़ी को कंधे पर उठाकर ले चला। 

अनेक पवित्र जगहों से होता हुआ वह अयोध्या के जंगल से गुजर रहा था। माता-पिता को प्यास लगी। श्रवण ने एक पेड़ की छाया देखी। उन्हें वहीं नीचे उतारा और पात्र में जल लाने सरयू नदी के तट पर गया। 

अयोध्या के महाराज दशरथ शिकार का शौक रखते थे। उस दिन वे अकेले ही शिकार पर आए थे। वे आवाज की दिशा में तीर चलाकर शिकार करने में सिद्धहस्त थे। 

जैसे ही श्रवण पात्र में जल भरने लगा। दशरथ ने जल भरने की आवाज को जल पीते हुए हिरण की आवाज समझी। आवाज की दिशा में उन्होंने तीर छोड़ दिया। वह तीर श्रवण को लगा और तत्काल एक चीख के साथ वह भूमि पर गिर पड़ा। चीख सुनकर दशरथ दौड़े आए। एक निरपराध् बालक को भूमि पर पड़ा देखकर वह बहुत आहत हुए। राजा दशरथ उस बालक को नहीं मारना चाहते थे। अपनी गलती पर उन्हें बहुत पश्चात्ताप हुआ, उन्होंने श्रवण को अपनी गोद में लिटा लिया। श्रवणने राजा से कहा, “हे राजन्! मैं अपने माता-पिता के लिए जल लेने आया था। कृपया अब यह जल और यह दुखद समाचार उन तक पहुँचा दें।” इन्हीं शब्दों के साथ श्रवण की आँखे बंद हो गयीं। दुखी राजा ने श्रवण को लगा तीर बाहर निकाला और जल लेकर उसके माता-पिता के पास गए। राजा ने चुपचाप उन्हें जल दिया। न जाने कैसे वृद्ध ब्राह्मण ने यह समझ लिया कि यह उनका पुत्र नहीं हैं। उन्होंने कहा, 

“आप कौन हैं और मेरा पुत्र कहाँ है? आप जबतक नहीं बताएँगे तब तक मैं जल ग्रहण नहीं करूंगा।” 

भक्त श्रवण कुमार की कहानी

राजा दशरथ ने सारी बात बताई। उन्हें अपने कंधे पर उठाकर श्रवण के पास ले गए। श्रवण के वृद्ध माता-पिता का दुःख से हाल बेहाल था। वृद्ध ब्राह्मण ने राजा को श्राप देते हुए कहा, “जैसे आज हमलोग पुत्र शोक से दुःखी हैं उसी प्रकार एक दिन तुम भी पुत्र शोक से दुःखी होओगे।” वर्षों बाद वह श्राप सत्य हुआ। उनके पुत्र भगवान् राम को चौदह वर्ष के लिए बनवास पर जाना पड़ा और पुत्र शोक से राजा दशरथ की मृत्यु हो गई। 

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