अकबर बादशाह की कहानी-ईमानदारी का अंडा

अकबर बादशाह की कहानी

अकबर बादशाह की कहानी-ईमानदारी का अंडा

बीरबल पूरे राज्य में अपनी हाजिरजवाबी और चतुराई के साथ-साथ अन्य खूबियों के लिए भी जाने जाते थे। वे बच्चों से बहुत प्रेम करते थे। दरअसल वे स्वयं भी बच्चों की तरह ही मासूम और भोले-भाले थे और उनकी इसी खूबी के कारण अकबर उन्हें इतना चाहते थे। जब भी शाही दरबार में किसी विषय पर भारी-भरकम बहस छिड़ती तो वे बीरबल ही थे जो बहुत सरलता से सारी समस्या सुलझा दिया करते। अकबर चाहते थे कि वे बीरबल की इस खूबी को दरबार के सामने लाएं ताकि वे दूसरे दरबारियों  को दिखा सकें कि उन्हें अपने इस मंत्री से इतना लगाव और स्नेह क्यों है। वे चाहते थे कि दूसरे लोग भी बीरबल के स्वभाव से सबक लें कि सबको अपने भीतर रहने वाले  बच्चे की तरह जिंदादिल और सकारात्मक सोच वाला बने रहना चाहिए।

उन्होंने सबके लिए एक मजेदार खेल रखा। अकबर ने आदेश दिया कि सारे दरबारी और मंत्री अगले दिन, बीरबल के आने से पहले, दरबार में आएं। उन्होंने अपने सहायक को आदेश दिया कि वह अंडों से भरी टोकरी लाए और सबको एक-एक अंडा दे दे। उन्हें कहा गया कि वे उसे छिपा कर रख लें और बीरबल के सामने न निकालें। 

कुछ ही देर बाद, बीरबल दरबार में पधारे। अकबर ने उनसे कहा, “बीरबल मेरे दोस्त! कल रात मैंने एक सपना देखा। वह मुझे पूरी तरह से याद नहीं आ रहा। शायद मैंने उसमें यह देखा कि मेरे पास एक उपाय है जिससे मैं अपने ईमानदार दरबारी की पहचान कर सकता हूं। दरअसल मेरे पास ऐसी पहचान करने के लिए एक उपाय भी है।”

अकबर बादशाह की कहानी

बीरबल को अकबर की पूरी बात समझ नहीं आई। उन्होंने पूछा, “जहांपनाह! ऐसा कैसे संभव हो सकता है?” अकबर बोले, “कुछ अंडों को महल के तालाब के बीचोंबीच रखा गया है, जो वहां से एक-एक अंडा बाहर लाएगा, वही ईमानदार दरबारी होगा।” इसके बाद सभी दरबारियों को बारी-बारी से बाग में भेजा गया ताकि वे अंडे निकाल कर ला सकें। उनके पास तो पहले से ही अंडे थे। वे केवल बाग का चक्कर लगा कर आए और सबने अपना-अपना अंडा बादशाह के आगे रख दिया। 

अंत में बीरबल की बारी आई। वे तालाब में उतरे तो उन्हें कोई अंडा दिखाई नहीं दिया। वहां तो दूर-दूर तक कोई अंडा नहीं था। तब उन्हें समझ आ गया कि अकबर उन्हें मूर्ख बनाना चाह रहे थे। यह जहांपनाह की कोई चाल थी। अकबर और दरबारी देखना चाहते थे कि इन हालात में अब बीरबल क्या करेंगे। 

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अगले ही पल, बीरबल दरबार में एक मुर्गे की नकल करते हुए आए। वे एक मुर्गे की तरह चल रहे थे। और मुंह से मुर्गे की आवाजें निकाल रहे थे। अकबर ने उनसे कहा, “आप वह अंडा लाए हैं ताकि आपकी ईमानदारी की परख हो सके।” 

बीरबल बोले, “महाराज! मैं अंडा नहीं दे सकता। आप देखिए, मैं मुर्गी नहीं, मुर्गा हूं। मेरे लिए अंडा देना तो असंभव होगा।” सभी दरबारी हंसने लगे और अकबर को भी कोई जवाब नहीं सूझा। 

बीरबल ने एक बार फिर अपनी चतुराई के कारण खुद को विजेता साबित कर दिया था। 

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