पंचतंत्र की कहानियाँ with Moral-चुहिया की शादी

पंचतंत्र की कहानियाँ with Moral

पंचतंत्र की कहानियाँ with Moral-चुहिया की शादी

गंगा नदी के किनारे एक बहुत ही सुंदर आश्रम था। साधु आश्रम में पूजा-पाठ व ध्यान आदि के बीच अपना समय बिताते। वे वहां जंगली फलों तथा कंद-मूल से अपना पेट भरते और बहुत ही सादगी के साथ वहां रहते। 

आश्रम के कुलपति हर रोज नहाने व पूजा करने के लिए नदी किनारे जाते थे। एक दिन जब वे पूजा कर रहे थे तो एक चुहिया आकाश में उड़ रहे बाज के पंजों से छूट कर उनकी गोद में आ गिरी। कुलपति ने नन्ही चुहिया को एक पत्ते में लपेट लिया और आश्रम में ले आए। 

उनके परिवार में कोई संतान नहीं थी। उन्होंने चुहिया को कन्या के रूप में बदल दिया। उस दिन से वह उनकी बेटी बन कर उनके साथ रहने लगी। वे उसे अपनी इकलौती संतान की तरह लाड-प्यार देते थे। 

इसी तरह कई वर्ष बीत गए। नन्ही-सी बच्ची अब बड़ी हो गई थी। अब साधु और उनकी पत्नी को अपनी बेटी की शादी की चिंता सताने लगी। वे उसके लिए योग्य वर की तलाश करने लगे। वे चाहते थे कि उनकी बेटी को योग्य वर मिले। 

उन्हें लगा कि सूर्य उनकी बेटी के लिए सबसे अच्छा वर रहेगा। सूर्यदेव को बुलाया गया और साधु ने उन्हें बताया कि वे क्या चाहते हैं। कुलपति की बात सुन कर सूर्यदेव ने तो हामी भर दी परंतु उनकी बेटी नहीं मानी। उसने कहा कि सूरज में बहुत तेज है। वह सूरज के पास जाएगी तो जल जाएगी। 

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सूर्यदेव ने यह सलाह दी कि बादल उनसे भी ताकतवर हैं। उनके आते ही सूर्य को भी छिपना पड़ता है इसलिए साधु की बेटी के लिए बादल ही उपयुक्त वर होगा। साधु ने मेघ को बुला कर अपनी बेटी से शादी करने को कहा। 

मेघ ने हामी भर दी परंतु साधु की बिटिया नहीं मानी और बोली, “पिताजी! यह बहुत ही ठंडा, गीला और काले रंग का है। मैं इससे शादी नहीं कर सकती। मुझे इससे बेहतर दूल्हा चाहिए।” 

बादल ने वायु का नाम लिया। उसने कहा कि वायु अधिक ताकतवर है क्योंकि उसके आते ही बादल किसी भी दिशा में चलने को मजबूर हो जाते हैं। 

वायु भी साधु की बिटिया से विवाह करने के लिए मान गया, पर एक बार फिर से साधु की बिटिया ने आपत्ति जतायी और बोली, “नहीं पिता जी। यह तो हमेशा बहती रहती है। मुझे तो थोड़ा स्थिर रहने वाला पति चाहिए।” 

वायु ने कहा, “पर्वत मुझसे ताकतवर है। वह मेरा भी रास्ता रोक देता है। वही आपकी बेटी के लिए उपयुक्त वर होगा। इसका विवाह उससे ही कर दें।” 

यह सुन कर साधु ने पर्वत को बुलाना चाहा। पर्वत के कुछ कहने से पहले ही जिद्दी लड़की बोली, “अरे यह तो बहुत कठोर है। यह बिल्कुल नहीं हिलता।” बेचारे साधु ने पर्वत से कहा कि वही कोई उपयुक्त वर बताए। 

पर्वत को जब राजकुमारी के उन तर्कों की जानकारी मिली, जिनके कारण उसने तेजस्वी सूर्य को अपना पति नहीं स्वीकार किया था, तो वह समझ गया कि राजकुमारी क्योंकि असल में चुहिया है, इसलिए उसके लिए चूहा ही पति के रूप में सही रहेगा। 

पर्वत ने साधु को सलाह दी, “चूहा ठीक रहेगा। वह तो मुझमें भी छेद कर देता है। वह मुझसे भी ताकतवर है।” कुलपति के बुलाने से चूहों का राजा वहां आया। वह भी उनकी बेटी से विवाह के लिए मान गया। जब साधु ने अपनी बेटी से इस बारे में पूछा तो वह बहुत प्रसन्न हुई। उसे लग रहा था कि एक चूहा ही उसके लिए उपयुक्त वर हो सकता है। 

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इस तरह साधु ने अपनी बेटी को फिर से चुहिया बना दिया और उसका विवाह चूहों के राजा से करवा दिया। मनुष्य बनने के बाद भी वह बच्ची अपने दिल से एक चुहिया ही थी इसलिए उसे चूहा ही पसंद आया। साधु और उसकी पत्नी ने चैन की सांस ली। आखिरकार उनकी बेटी को अपने लिए उचित वर मिल ही गया था।

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