SSC Essay topics 2021 | SSC CHSL essay topics in hindi

SSC CHSL essay topics in hindi

SSC Essay topics 2021 | SSC CHSL essay topics in hindi

प्रश्न : “नेपाल से स्वस्थ रिश्ते कायम रखने की जिम्मेदारी भारत पर है” विषय पर एक निबंध लिखिए। 

उत्तर : नेपाल से स्वस्थ रिश्ते कायम रखने की जिम्मेदारी भारत पर है 

भारत और नेपाल के सम्बन्ध अनादिकाल से है। दोनों पड़ोसी देशों की धार्मिक, सांस्कृतिक भाषायी एवं ऐतिहासिक स्थिति में बहुत अधिक समानता है। स्वतंत्रतोपरान्त भारत और नेपाल ने अपने विशेष सम्बन्धों को 1950 ई. के भारत-नेपाल शांति एवं मैत्री संधि से नयी ऊर्जा प्रदान की गयी। परन्तु कालान्तर में भारत-नेपाल सम्बन्ध स्थायी नहीं रह सके और इनके सम्बन्धों में उतार-चढ़ाव का दौर आज तक जारी है। 

हालांकि भारत एक जिम्मेदार देश के रूप में जाना जाता है और वह हमेशा अपने पड़ोसियों के प्रति जिम्मेदारी को गंभीरता से देखने का प्रयास करता है। फिर भी कुछ ऐसे तत्व हैं जिनके कारण अनायास पड़ोसियों से सम्बन्ध नाजुक स्थिति में पड़ जाते हैं। विशेषकर भारत, नेपाल के प्रति हमेशा सकारात्मक रूख अपनाए हुए हैं। जुलाई 1950 में भारत, नेपाल मित्रता सन्धि के तहत नेपाली नागरिकों को भारत में समान आर्थिक, एवं शैक्षणिक अवसरों को उपलब्ध कराया गया हैं। 

संधि में कहा गया है कि विकास कार्यों में भारत -नेपाल को प्राथमिकता दे, वर्तमान में नेपाल भी इस बात पर बहुत जोर दे रहा है। 

भारत-नेपाल के बीच बहुत पुराने और व्यापक भौगोलिक-सांस्कृतिक नृजातीय संबंध हैं जिन्हें पूरा विश्व जानता-समझता है। रिश्तों में उतार-चढ़ाव द्विपक्षी सम्बन्धों में आम बात है। नई सरकार के गठन के बाद भारत ने नेपाल के प्रति काफी विश्वास जताया एवं प्रधानमंत्री ने नेपाल की न सिर्फ सांस्कृतिक आत्मा को स्पर्श किया, बल्कि एक अरब डॉलर आसान ऋण की पेशकश भी की। मोदी ने नेपाल को यह भरोसा दिलाने की कोशिश भी की कि भारत दोस्त की हैसियत से नेपाल का सहयोग करेगा। 

दोनों देशों के बीच महाकाली नदी पर 5600 मेगावाट की पंचेश्वर बहुउद्देशीय परियोजना, संचार, यातायात एवं खाद्य-सामग्री संबन्धी समझौते हाल ही में हुए हैं। नेपाल में आये भूकंप में सबसे पहले भारत सरकार ने नेपाल की हर संभव मदद की जिसकी पूरे विश्व में सराहना हुई। परन्तु 20 सितम्बर, 2015 को नेपाली संविधान लागू होने के साथ ही भारत-नेपाल सम्बन्धों में दुराव सा आ गया है। एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के अध्यक्ष प्रचंड़ ने कहा कि भारत का ‘यस मैन’ नेपाल नहीं है। 

नेपाल ने भारत पर आर्थिक नाकेबन्दी का आरोप भी लगाया है जबकि तराई आधारित राजनीतिक दलों के विरोध-प्रदर्शन के कारण ऐसा हो रहा है। समावेशी संविधान नहीं होने से तराई क्षेत्रों के ‘मधेशी- थारु’ लोगों में आक्रोश है जिसके कारण भारत से नेपाल को सामान की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। फलस्वरूप नेपाल आर्थिक संकट से जूझ रहा है। 

हाल के दिनों में नेपाल के प्रति चीनी सक्रियता बढ़ी है। 16 अक्टूबर, 2015 को चीन की ऑफिशियल मीडिया द्वारा नेपाली प्रधानमंत्री को ‘प्रो-चाइना’ घोषित किया गया है। लेकिन सच्चाई ये है कि भारत एवं नेपाल को मिलकर काम करना होगा क्योंकि हमारी नृजातीय, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक समझ एवं संस्कृति का स्थान कोई और नहीं ले सकता है। 

भारत सरकार को दोनों देशों के मध्य तनावपूर्ण सम्बन्धों को सामान्य करने की पहल करनी होगी। दक्षिण एशिया एवं पूरा विश्व इस समय भारत एवं नेपाल सम्बन्धों पर नजर रखे हुए हैं। नई दिल्ली ने नये प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह से ही दक्षिण एशिया की साझा संस्कृति को समझा है। इस संदर्भ में भी उसे वही अभिवृत्ति अपनानी होगी। 

प्रश्न : ‘आरक्षण’ विषय पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर : आरक्षण 

भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय को मूलभूत आदर्श के रूप में स्वीकार किया गया है। यही कारण है कि इसका उल्लेख संविधान की प्रस्तावना में भी किया गया है। जैसा कि हम जानते हैं कि भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था प्राचीन काल से ही विद्यमान है। जिसके कारण एक शोषणकारी सामाजिक व्यवस्था का उद्भव हुआ। परिणाम स्वरूप भारत में तथाकथित शूद्र वर्ण के विरुद्ध अनेक भेदभावपूर्ण प्रथाओं का जन्म हुआ। अतः संविधान निर्माताओं ने समाज के ऐसे वर्गों जिन्हें विभिन्न क्षेत्रों में समुचित प्रतिनिधित्व एवं सम्मान प्राप्त नहीं है,के लिए आरक्षण के रूप में कुछ विशेष प्रबंध किये है। 

आरक्षण के माध्यम से समाज में समता स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसे वंचित वर्गों को समाज के द्वारा दिया जाने वाला मुआवजा के रूप में भी देखा जाता है। अनुपातिक समानता पर आधारित आरक्षण व्यवस्था को संविधान के अनुच्छेद-15 तथा 16 के द्वारा समर्थन प्राप्त है। इसके अतिरिक्त किसी भी राष्ट्र के ऐसे नागरिको को जो विषमतामूलक सामाजिक परिस्थितियों के कारण राष्ट्र की मुख्य धारा में भली प्रकार से शामिल नहीं हो सके हैं, विशेष प्रावधान करना वांछनीय प्रतीत होता है। 

उपर्युक्त प्रावधानों के बावजूद वर्तमान में हम ऐसे समाज का निर्माण करने में विफल रहे हैं जहाँ समाज के प्रत्येक वर्ग को यथोचित प्रतिनिधि त्व प्राप्त हो सके। अतः हमारे सम्मुख यह प्रश्न उपस्थित होता है कि वे कौन से कारण हैं जो हमारे प्रयासों के मार्ग में बाधक बने हुए हैं। दरअसल इसके मूल में कुछ हद तक आरक्षण की व्यवस्था का अतार्किक क्रियान्वयन भी रहा है। जिसके चलते हम समाज के त्रणमूल वर्ग तक इसका लाभ नहीं पहुँचा सके हैं। उदाहरण के लिए आरक्षण की व्यवस्था का समयानुकूल मूल्यांकन न होना, लाभान्वित व्यक्तियों को तार्किक ढंग से इससे बाहर न करना, क्रीमी लेयर की सीमा को राजनीतिक उद्देश्यों से परिवर्तित करना इत्यादि। उक्त कारणों के चलते वंचित वर्गों में भी अब एक प्रकार का विभाजन देखा जा रहा है जहाँ कुछ लोगों के द्वारा ही आरक्षण का निरंतर लाभ प्राप्त किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त आरक्षण को समय-सीमाबद्ध रूप से न लागू किये जाने से गैर आरक्षण प्राप्त वर्गों में भी असंतोष बढ़ता जा रहा है इसका उदाहरण हम हरियाणा. राजस्थान गजरात तथा महाराष्ट में अलग-अलग वर्गों द्वारा आरक्षण की माँग के रूप में देख सकते हैं। 

हाल ही में केन्द्र सरकार द्वारा पिछड़े वर्गों को प्राप्त आरक्षण में लाभान्वित वर्गों और अपेक्षतः कम लाभान्वित वर्गों के विश्लेषण के लिए किये गये प्रयास सराहनीय प्रतीत होते हैं। परंतु ऐसे मुद्दों को राजनीतिक रूप से तटस्थ होकर देखा जाना चाहिए। विगत् कुछ वर्षों में निजी क्षेत्र में आरक्षण की माँग जोर पकड़ती जा रही है। अतः अब समय आ गया है कि इस विषय पर व्यापक विचार विमर्श किया जाए। यह हमारे नीति निर्माताओं की विफलता ही कही जाएगी कि उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण के विवेकीकरण की दिशा में कदम बढ़ाते हुए अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जन जाति के लिए क्रीमीलेयर की सीमा निर्धारित करने संबंधी विचार को जन्म दिया है। 

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि चित वर्गों को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए किये गए विगत प्रयास व्यापक विश्लेषण की माँग कर रहे हैं जिन्हें अनदेखा करके हम अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो सकते हैं। 

प्रश्न : ‘भ्रष्टाचारः कारण निवारण’ विषय पर एक निबंध लिखिए। 

उत्तर : भ्रष्टाचार: कारण निवारण जब कोई व्यक्ति न्याय व्यवस्था के मान्य नियमों के विरूद्ध जाकर अपने स्वार्थ साधन हेतु गलत आचरण करने लगता है, तो व्यक्ति के इस प्रकार के आचरण ‘भ्रष्टाचार’ कहलाता है। क्षणिक रूप से व्यक्ति विषेश को भले लाभ दिखाई देता है, किन्तु व्यापक रूप से भ्रष्टाचार से सम्पूर्ण समाज सहित उस व्यक्ति को भी हानि पहुँचती है। अतः भ्रष्टाचार किसी भी देश अथवा समाज को धीरे-धीरे कमजोर कर देता है। 

वर्तमान में किसी व्यवहार विशेष को भ्रष्टाचार नहीं कहा जाता बल्कि भ्रष्टाचार में कई व्यवहार हैं जिनमें कुछ इस प्रकार है- रिश्वत, कालाबाजारी, जान बूझ कर वस्तुओं का दाम बढ़ाना, पैसा लेकर काम करना, सस्ता सामान लाकर मंहगा बेचना, आदि। इन व्यवहारों का प्रयोग व्यक्ति के जीवन के जिस क्षेत्र में किया जाता है उतने प्रकार के भ्रष्टाचार सामने आते हैं। जैसे राजनीति में भ्रष्टाचार को राजनीतिक भ्रष्टाचार, प्रशासन में प्रशासनिक भ्रष्टाचार, नैतिक भ्रष्टाचार, आर्थिक भ्रष्टाचार, निजी कम्पनी भ्रष्टाचार यहाँ तक की तकनीकि में भी भ्रष्टाचार का उपयोग हो रहा है। भ्रष्टाचार के इन अनेक स्वरूपों का विस्तार अथवा पहुँच इतना व्यापक हो गया हैं कि यह किसी क्षेत्र, समाज अथवा देश तक में सीमित नहीं रहा है बल्कि यह एक वैश्विक समस्या बन गया है। 

प्रश्न उठता है कि इस प्रकार की समस्या जिससे प्रत्येक देश अथवा समाज को हानि है का कारण क्या है? इसके कई कारण हो सकते हैं जिसमें कुछ इस प्रकार हैं- असंतोष, स्वार्थ और असमानता। असंतोष से अभिप्राय जब किसी को अभाव के कारण कष्ट होता है तो वह भ्रष्ट आचरण करने के लिए विवश हो जाता हैं। वहीं स्वार्थ और असमानता का संबंध आर्थिक, समाजिक या सम्मान एवं पद प्रतिष्ठा के कारण उत्पन्न होती है। जिसके कारण व्यक्ति अपने आप को इसकी पूर्ति के लिए भ्रष्ट बना लेता है। हीनता और ईर्ष्या की भावना का शिकार हुआ व्यक्ति भ्रष्टाचार को अपनाने के लिए विवश हो जाता है। साथ ही रिश्वतखोरी, भाई-भतीजावाद आदि भी भ्रष्टाचार को जन्म देते हैं। आज इसके कुछ प्रमुख उदाहरण विद्यमान हैं जैसे – कोयला घोटाला, 2 जी घोटाला, व्यापम परीक्षा में व्यापक भ्रष्टाचार (म० प्र०) एन आर एच एम घोटाला (उ० प्र०) आई. पी. एल स्पॉट फिक्सिंग, बिहार टॉपर घोटाला इसके कुछ प्रमुख उदाहरण है। 

भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सामाजिक तथा प्रशासानिक दोनों स्तर पर कार्य करना चाहिए। लोगों में नैतिकता के भावना का विकास करना तथा प्रशासनिक स्तर पर अधिक से अधिक सेवाओं को तकनीक का प्रयोग करते हुए उसकों ऑनलाइन करना। साथ ही भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्तियों के लिए कठोर दण्ड का प्रावधान करना। इसके लिए कारावास तथा जुर्माना दोनों में कठोरता होनी चाहिए जिससे भ्रष्टाचार करने से पहले व्यक्ति सौ बार सोचे। 

निष्कर्ष – भ्रष्टाचार हमारे नैतिक जीवन मूल्यों पर सबसे बड़ा प्रहार है। भ्रष्टाचार से जुड़े लोग अपने स्वार्थ में अंधे होकर राष्ट्र का नाम बदनाम कर रहे हैं। अत: आवश्यकता इस बात की है कि इस कैंसर रूपी बीमारी के लिए सिर्फ ‘पेनकिलर’ ही प्रभावी नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर इसका ऑपरेशन भी किया जाय। 

प्रश्न : ‘मानवाधिकार’ विषय पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर : मानवाधिकार

मानव के रूप में क्या अधिकार हो और किस सीमा तक किसी रूप में उनकी प्रत्याभूति शासन की ओर से हो इस संबंध में मानव सभ्यता के प्रारम्भ से ही विवाद चला आ रहा है। सामान्यतः मानव के मौलिक अधिकारों में जीवन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, जीविका का अधि कार, वैचारिक स्वतंत्रता का अधिकार समानता का अधिकार संगठन बनाने का अधिकार तथा स्वतंत्र रूप से धार्मिक विश्वास का अधिकार आदि है। 

मानव अधिकारों के प्रसंग में सबसे प्रख्यात अभिलेखों के रूप में हम सन् 1215 के इग्लैण्ड के मैग्नाकार्टा अभिलेख तथा 1628 के अधिकार याचिका पत्र को ले सकते हैं। इसके बाद राज्यस्तर पर संवैधानिक प्रावधान द्वारा मानव के मूल अधिकारों की रक्षा की व्यवस्था एक मान्य परम्परा बन गयी। सन् 1936 में सोवियत रूस में नागरिक अधिकारों को मान्यता दी गयी तथा इसी क्रम में अन्य देशों के साथ भारत में 1950 में अधि कारों की संवैधानिक व्यवस्था की गयी। 

वस्तुत: जनतंत्र की अवधारणा मानव अधिकारों को सुनिश्चित करने की बढ़ती हुई आवश्यकता के साथ स्पष्ट रूप से जुड़ी हुई है। इसके अभाव में न तो कोई व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है, और न ही सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है। मानव अधिकारों की सुरक्षा के अभाव में जनतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। 

सैनिक एवं प्रतिक्रियावादी शासकों द्वारा अधिकारों के भद्दे दुरूपयोग ने ही जनसाधारण में एक नवीन जागृति उत्पन्न की है। जहाँ कहीं मानव अधिकारों, को नकारा गया है वहीं अन्याय, क्रूरता तथा अत्याचार का नग्न ताण्डव देखा गया है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि मानवता बुरी तरह से अपमानित हुई और जनमानस की अवस्था निरंतर बिगड़ती चली गयी।

यद्यपि मानवअधिकारों की जानकारी तथा इन्हें प्राप्त करने के लिए स्त्री, बच्चों तथा पुरूषों का मानव अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए नियमित संघर्ष द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त ही प्रारम्भ हुआ। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवअधिकारों की मान्यता व एकता का विचार विश्व के समक्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के साथ आया। संयुक्त राष्ट्र के अनुच्छेद 3 में कहा गया है कि मानवाधिकार का एक ही उद्देश्य है आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मानवीय रूप की अंतर्राष्ट्रीय समस्या के समाधान तथा जाति, लिंग, भाषा, धर्म एवं सभी प्रकार के भेदभाव के बिना मौलिक अधिकारों तथा स्वतंत्रता के संवर्द्धन व प्रोत्साहन के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की प्राप्ति करना होगा। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की आर्थिक सामाजिक परिषद ने 1946 में ‘मानव अधि कार आयोग’ की स्थापना की। अयोग की सिफारिशों के आधार पर 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक घोषणा पत्र जारी किया, इसे मानवाधिकारों के घोषणा पत्र के नाम से जाना जाता है। 1950 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसम्बर को प्रतिवर्ष मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाने की घोषणा किया। 

आज विश्व के कई देशों द्वारा मानव अधिकारों को सम्पूर्ण मानवता की वस्तु नहीं माना जाता। दक्षिण अफ्रीका, युगांडा, नामिबिया, ग्वाटेमाला, पाकिस्तान, बर्मा आदि देशों में व्यापक पैमाने पर मानव अधिकारों का हनन किया जाता है। 

भारत में हमेशा से मानव अधिकारों के प्रति सजग रहा है, और विश्व मंच पर मानव अधिकारों का समर्थन करता रहा है, श्रीलंका, फिजी तथा दक्षिण अफ्रीका आदि देशों के सम्बंध में भारतीय नीति इसका जवलंत उदाहरण है। मानव अधिकारों का हनन तथा उनका उलंघन विश्व के समक्ष एक गम्भीर समस्या बनी हुई है जो आधुनिक सभ्यता पर लगा हुआ काला धब्बा साबित हो रहा है। यदि मानवअधिकारों के क्रम को रोका नही गया तो यह एक ऐसी आँधी का रूप धारण कर लेगा जो सम्पूर्ण मानवता को तिनके की भाँति उड़ा ले जायेगा। 

प्रश्न : ‘जल संकट : कारण एवं निवारण’ विषय पर एक निबंध लिखिए। 

उत्तर : जल संकट: कारण एवं निवारण 

आज पूरे भारत में पानी की समस्या एक व्यापक समस्या का रूप धारण कर चुका है। भारत में पानी की कमी पिछले 30-40 साल की तुलना में तीन गुना हो गयी है। देश की कई छोटी-छोटी नदियाँ सूख गयी हैं, या सूखने के कगार पर हैं। बड़ी-बड़ी नदियों में पानी का प्रवाह धीमा होता जा रहा है।

कुएं सूखते जा रहे हैं, हमारे देश के 55 से 60 फीसदी लोगों को अपने पानी की आवश्यकता की पूर्ति भूजल द्वारा होती है लेकिन अब भूजल की उपलब्धता को लेकर भारी कमी महसूस की जा रही है। पूरे देश में भू जल का स्तर प्रत्येक साल औसतन 1 मीटर नीचे सरकता जा रहा हैं, नीचे सरकता भू जल का स्तर देश के लिए चुनौती है। 

इसके लिये अनेक कारण उत्तदायी हैं, जैसे कृषि के लिए अधिक से अधिक जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर भू जल का दोहन, ग्लोबल वार्मिंग के कारण वर्षा का असामान्य वितरण, नदियों में जल की उपलब्धता में कमी तथा वर्षा जल का उचित जल संरक्षण न हो पाना जैसी अनेक समस्याएँ जल संकट के लिए उत्तरदायी 

कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि आर्सेनिक तथा नमक तक भूमि के ऊपरी सतह पर निकल आया है। पंजाब के कई इलाकों में भू जल और 50 प्रतिशत परंपरागत कुएं और कई लाख ट्यूबेल सूख चुके है। गुजरात में प्रत्येक वर्ष भू जल का स्तर 5 से 10 मीटर नीचे खिसक रहा है तमिलनाडु में यह औसत मीटर है, यह समस्या आन्ध्र प्रदेश उत्तर प्रदेश पंजाब और बिहार में भी है। सरकार इन समस्याओं का समाध Tन नदियों को जोड़ कर निकालना चाहती है। इस परियोजना के तहत गंगा और ब्रहमपुत्र के अलावा उत्तर भारत की चौदह और अन्य नदियों के बहाव को जोड़ कर पानी को दक्षिण भारत तक पहुँचाया जायेगा क्योंकि दक्षिण भारत की कई नदियाँ सूखती चली जा रही हैं। 

पेयजल की कमी से अब कई क्षेत्रों में तनाव उत्पन्न होने लगा है। यह स्थिति पूरे विश्व में देखने को मिल रही है। खासकर उत्तर अफ्रीका और पश्चिम एशिया में विकराल रूप धारण करती जा रही है। भारत में भी इस समस्या ने कई क्षेत्रों को वर्तमान समय में प्रभावित किया है, महाराष्ट्र का लातूर जल संकट एवं पंजाब हरियाणा तथा दिल्ली में जल के विभाजन को लेकर होने वाला जन आन्दोलन इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। ऐसी समस्यायें अन्य क्षेत्रों जैसे बुंदेलखण्ड, की समस्या पिछले दिनों अपने चरम पर पहुँच गयी थी जिसके लिए सरकार को इन क्षेत्रों के लिए ‘जल रेल’ चलानी पड़ी थी। जल ही जीवन है। और पानी की हर बूंद कीमती है। यह सर्वज्ञात है कि पृथ्वी पर पेय जल की उपस्थिति मात्र 3 प्रतिशत हैं। इसलिए इसके इस्तेमाल सावधानी पूर्वक होनी चाहिए, इसके लिए व्यापक राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय प्रयास की आवश्कता है। 2003 में स्टॉकहोम में हुए प्रथम विश्व जल सम्मेलन में इसका रोडमैप तैयार किया गया। 

निष्कर्ष- जल के बिना हमारे जीवन की कल्पना करना भी कठिन है परन्तु विडंबना है कि जल के महत्व के समझते हुए भी व्यक्ति इसके सरंक्षण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठा रहा है। प्रदूषण और जल की बर्बादी के परिणामस्वरूप अब हमारे पीने के लिए ही शुद्ध जल उपलब्ध नही हो पा रहा है। जिसके दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं है। यह भविष्य के लिए कदापि उचित नहीं है। जल जीवन के लिए अमृत के है इसलिए जीवन को बचाने के लिए पानी का सरंक्षण अति आवश्यक है। 

प्रश्न : ‘अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता’ विषय पर एक निबंध लिखिए। 

उत्तर : अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता 

द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका को देखने के बाद वैश्विक समुदाय ने एक ऐसे विश्व के निर्माण की योजना बनायी जो आपसी टकराव को रोकने और विश्व शान्ति के लिए प्रभावी रूप से कार्य कर सके। संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना इसी दर्शन से प्रेरित थी। नवीन संस्था के निर्माण में उन सभी मुद्दों का समाधान करने का प्रयास किया गया जो पूर्ववर्ती लीग ऑफ नेशंस की विफलता के लिए उत्तरदायी थे। इसी क्रम में कुछ राष्ट्रों को विशेषाधिकार प्राप्त राष्ट्र के रूप में चिह्नित किया गया। जिनमें सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों का नाम विशेषरूप से उल्लेखनीय है। 

परंतु बदलती वैश्विक परिस्थितियों ने उक्त व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लगाया है। आज की राजनैतिक परिस्थितियों में सात दशक पुराने संस्थागत् ढाँचे ने अपनी प्रासंगिकता खो दी है। तथा कुछ अन्य देश अधिक महत्व और अधिकारों के लिए सुयोग्य प्रतीत होते हैं। हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के लिए आयोजित चुनावों में सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य देश ब्रिटेन को भारत से मुँह की खानी पड़ी है और यह पहला अवसर है जब अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में सुरक्षा परिषद् के किसी स्थायी सदस्य का कोई प्रतिनिधि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में नहीं होगा। 

उपर्युक्त घटनाक्रम संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की अपार लोकप्रियता का द्योतक है। जो इस तथ्य को उजागर करता है कि संयुक्त राष्ट्र का मौजूदा ढाँचा लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं है। ध्यातव्य है कि विश्व की 60% आबादी रखने वाले एशिया महाद्वीप को सुरक्षा परिषद् की स्थायी सीटों में मात्र प्रतिनिधित्व प्राप्त है। इसी प्रकार दूसरी सर्वाधिक आबादी वाले अफ्रीका महाद्वीप का सुरक्षा परिषद् की स्थायी सीटों पर कोई प्रतिनिधि नहीं है। 

अतः यह कहा जा सकता है कि सुरक्षा परिषद् की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में लोकतांत्रिक मूल्यों का घोर अभाव है। परिणामतः इसमें सुधार की मांग तीव्र होनी स्वाभाविक है। एक अन्य मत यह है कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय सदस्य देशों की संख्या दहाई के अंक में थी तथा सुरक्षा परिषद् में सदस्यों की संख्या 15 थी परंतु वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों की संख्या में लगभग तीन गुने की वृद्धि हो चुकी है जबकि सुरक्षा परिषद् के सदस्यों की संख्या यथावत बनी हुयी है। 

उक्त तथ्य यह दर्शाते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में ढाँचागत बदलाव अब आवश्यक हो गया है। यदि संयुक्त राष्ट्र में समयानुरूप सुधार नहीं किये गए तो यह अपने उद्देश्यों की पूर्ति करने में सफल नहीं हो सकेगा। अतः यह आवश्यक है कि इस संस्था में अपेक्षित सुधार करके इसे लोकतांत्रिक चरित्र प्रदान किया जाए। 

प्रश्न : ‘औद्योगीकरण’ विषय पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर : औद्योगीकरण

मुनष्य इस सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ रचना है। खाना, बैठना, रहना आदि प्रक्रियाएँ तो सभी जीव करते हैं परन्तु मनुष्य में चिंतन क्षमता आ जाने से वह विशिष्ट हो गया है। अपनी बुद्धि और विचारशीलता से वह अपनी समस्त कामनाओं को साकार रूप दे सकता है मुनष्य की इसी सोच और विचारधारा ने उसे पंख प्रदान कर दिये है। सफलताओं ने उसके साहस व उत्साह को चौगुना कर दया है। आज वैज्ञानिक प्रगति के कारण औद्योगीकरण की प्रक्रिया इतनी तीव्र हो गयी है कि उसे वातावरणीय सामंजस्य बनाये रखने में अनेक कठिनाइयों को सामना करना पड़ रहा है। 

बढ़ते औद्योगीकरण से वातावरण में प्रदूषण की मात्रा इतनी बढ़ गयी है कि पर्यावरण के सन्तुलन का खतरा मंडराने लगा है। औद्योगिक विकास का सबसे अधिक प्रभाव महानगरों एवं अन्य घनी आबादी वाले शहरों में देखने को मिलता हैं शहरों व महानगरों में जनसंख्या घनत्व अधिक होने से मोटर वाहनों, गाड़ियों व दुपहिया वाहनों की संख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हुई हैं।

ये वाहन अपने धुएँ मे कार्बन मोनोक्साइड जैसी विषैली गैस छोड़ते हैं जो हमारी स्वास्थ्य प्रक्रिया में बाधक बनती है तथा साथ ही अनेक बीमारियों को जन्म देती हैं। वायु प्रदूषण फैलने से वायुमण्डल में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जा रही है। 

एक सर्वेक्षण के अनुसार जापान की राजधानी टोकियो को विश्व का सबसे प्रदूषित शहर घोषित किया गया। टोकियो में आज स्थिति यह है कि वहाँ ऑक्सीजन का अनुपात इतना अधिक प्रभावित हुआ है कि जगह-जगह ऑक्सीजन के सिलिण्डर लगाए गये है। जिसे आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य ऑक्सीजन ले सके। 

यातायात के साधनों के अतिरिक्त बड़े-बड़े कारखानें मिलें आदि न केवल वायु प्रदूषण को बढ़ाते हैं अपितु जल प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण आदि के लिए भी उत्तरदायी हैं। कल कारखानों से निकला अपशेष पानी के साथ बह कर नदियों में प्रक्षेपित हो जाता है। जिससे स्वच्छ जल प्रदूषित हो जाता है। जिसके फल स्वरूप मनुष्य को पीने के लिये साफ पानी नही मिल पाता है तथा साथ ही जलीय जन्तुओं का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाता है। 

औद्योगिक विकास के चलते लोगों का गाँव से शहर की ओर पलायन जारी है जिससे शहरों का घनत्व बढ़ता ही जा रहा है। इन परिस्थितियों में नगरों व महानगरों की विस्तार की आवश्यकता पड़ती है। लोगों को मकान प्रदान करने व उनकी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बड़ी मात्रा में वृक्षों का कटाव होता है।

कच्चे माल की आपूर्ति के लिये मनुष्य जंगलों का सफाया कर रहा है, जिससे वायु प्रदूषण को और बढ़ावा मिल रहा हैं। क्योंकि वृक्ष ही ऐसे माध्यम हैं जो वायु को शुद्ध करते हैं। इसके साथ ही वन्य जीव संरक्षण की समस्याँ भी उत्पन्न होती जा रही है। जंतुओं की अनेक प्रजातियाँ मनुष्य की स्वार्थ लोलुपता व औद्योगीकरण की भेंट चढ़ जाती है। 

पर्यावरण को सुरक्षित व संतुलित रखने के लिए आवश्कता है कि, रसायनों व अन्य हानिकारक अवशेष उत्पन्न करने वाले कारखानों को नगरों से दूर खुले स्थान पर विस्थापित करें। नगरों के गंदे जल को नदियों में प्रक्षेपित करने से पूर्व उसका समुचित उपचार करें, वृक्षारोपण पर विशेष ध्यान दें तथा इसी जागरूकता हेतु जन जागृति अभियान चलायें। विश्व स्तर पर परमाणु हथियारों का बहिष्कार हो ताकि युद्ध की विभीषिका से मानव जाति को बचाया जा सकें। 

प्रश्न : ‘काला धन की समस्या’ विषय पर एक निबंध लिखिए। 

उत्तर : काला धन की समस्या

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है, अपने कल्याणकारी उद्देश्यों की पूर्ति अर्थात् औद्योगिक व्यापारिक तथा आर्थिक विकास, राष्ट्रीय आय में वृद्धि, न्याय तथा समानता पर आधारित वितरण तथा आय की असमानता की समाप्ति के लिए यह आवश्यक है कि सरकार की आय तथा वित्तीय साधनों में कभी किसी प्रकार की रूकावट नही आनी चाहिए। 

इसके लिए यह आवश्यक है कि हमारी अर्थव्यवस्था ऐसी हो जिससे देश के वित्तिय साधनों का विनियोजन आर्थिक विकास के सहायक क्षेत्रों में हो। विगत कुछ वर्षों से हमारा देश अनेक आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से गुजर रहा है। क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था के समानान्तर एक और अर्थव्यवस्था है, जो देश की वास्तविक अर्थों में अर्थव्यवस्था बन गयी है। यह व्यवस्था काले धन की है, जो हमारी राजनीति का प्राण तथा हमारी नयी पश्चिमी पंचसितारा संस्कृति, शानदार होटलों की वैभव वाली संस्कृति का उपासक है।

काले धन की प्रवृत्ति में वृद्धि का प्रमुख कारण विभिन्न प्रकार की अवैध गतिविधियों का संचालन है। वर्तमान परिदृश्य में भ्रष्टचार रिश्वतखोरी, भाई-भतीजावाद, कर चोरी आदि के कारण धन इकट्ठा करने की प्रवृत्ति को बल मिला है। इसे काले धन के रूप में या तो लोगों के द्वारा छुपा लिया जाता है अथवा उसे पुन: विभिन्न प्रकार की ऐसी ही गतिविधियों में लगा दिया जाता है। जिससे कि उसका पता न लग सके। इस कारण यह प्रक्रिया निरन्तर गतिमान रहती है। भारत में काले धन की समस्या यद्यपि विभिन्न कारणों से उभरी है। इसके मुख्य कारण है कर बचाना, कर चोरी, तस्करी, घूसखोरी भोगविलास युक्त वस्तुओं का आकर्षण, ब्लैकमेलिंग आदि। कर चोरी काले धन की बढ़ोतरी में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। 

आज बड़े-बड़े पूँजीपति और उद्योगपति विभिन्न प्रकार के तरीकों से कर चोरी करते हैं इसके लिए वे सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों को धन के लालच से मिलाकर अपनी गतिविधियों को निरंतर संचालित करते हैं। दूसरी तरफ सरकारी अधिकारी अतिरिक्त धन पा कर खुश हो जाते हैं। और कर आरोपण तथा वसूली में ढिलाई बरतते हैं। इस प्रकार इन वर्गों का अतिरिक्त धन काले धन में बदला जाता है। तस्करी के माध्यम से आस-पास के देशों से बड़ी मात्रा में धन विभिन्न प्रकार के सामानों और वस्तुओं के रूप में देश के अंदर आ जाता है।

काले धन को रोकने के लिए सभी सरकारी व्यक्तियों के आय के स्रोत का वर्षवार आवलोकन किया जाए। इसके अंतर्गत निजी स्कूल तथा संस्थाओं को लाया जाय, इसके साथ ही इनकी आय से जुड़ने वाली राशि का समस्त ब्यौरा इंटरनेट पर दिया जाय जिससे आम लोग भी सम्पति और आय संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकें। कर-भार की दरों को सरकार द्वारा कम किया जाये जिससे लोग अपनी अतिरिक्त आय पर कर देने में कोताही न बरते। इस संबन्ध में महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि कर वसूली से संबंधी प्रक्रिया का सरलीकरण किया जाय, जिससे पढ़े लिखे लोगों के साथ-साथ ऐसे लोगों को भी कर जमा करने में समस्या का सामना न करना पड़े, जो कागजी कार्यवाहियों को समझने में असमर्थ होते हैं, और इसी आधार पर जाने अंजाने ये कर की चोरी में लिप्त हो जाते हैं। काले धन की वसूली हेतु समय-समय पर सरकार को राहत पूर्ण योजनाओं का क्रियान्वयन करते रहना चाहिए। जिससे लोग कर अदा करने के लिए प्रेरित हो सकें। 

प्रश्न : ‘प्रतिभा पलायन’ विषय पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर : प्रतिभा पलायन

किसी भी समाज या राष्ट्र की दिशा और दशा का मुख्य निर्धारक तत्त्व इसकी बौद्धिक सम्पदा होती है। बौद्धिक संपदा के क्षरण एवं पलायन को किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता है। इस लिहाज से हमारा देश वर्षों से इस आपदा से ग्रस्त रहा है- जहाँ तमाम कोशिशों के बावजूद प्रत्येक वर्ष औतसन 5000 से लेकर 8000 तक छात्र विदेशों को जाते हैं। उल्लेखनीय है कि ऐसे सभी छात्र अपने-अपने क्षेत्रों के सर्वोच्च प्रतिभाशाली छात्र होते हैं, इनमें से 75-80 प्रतिशत प्रतिभा का पलायन तो केवल पश्चिमी देशों- अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जर्मनी और इंग्लैंड की ओर होता है और शेष 20-25 प्रतिशत छात्र दुनिया के अन्य विकसित देशों में चले जाते है।

यह जानकर आश्चर्य होगा कि आई.आई.टी. के भी लगभग 60 प्रतिशत छात्र किसी न किसी तरह देश छोड़कर विदेश चले जाते हैं। जिसमें से कुछ लोग ही लौट कर वापस आते हैं, और तत्संबधित क्षेत्र में अपनी सेवाएँ देते हैं। हमारे देश में प्रतिभापलायन की लगभग यही स्थिति मेडिकल, मैनेजमेण्ट, कंप्यूटर्स आदि क्षेत्रों की है- जहां की सर्वोच्च प्रतिभा का बड़ा भाग विदेशों को चला जाता है। 

यदि गंभीरता से विचार करें तो प्रतिभा पलायन के संबंध में प्रो. मजूमदार का कथन सत्य के काफी निकट जान पड़ता है। इस देश में यदि प्रतिभा को इसकी उपलब्धियाँ प्रदान की जाए तो उनके असीमित ज्ञान व ऊर्जा का उपयोग राष्ट्र निर्माण में किया जा सकता है। हमारे यहाँ आजादी के इतने वर्षों के बाद भी आज तक ना तो इसके प्रतिभा के अनुरूप एक स्तरीय व्यवस्था कायम हो पायी है और ना ही कार्य संस्कृति। ऊपर से तकनीकि क्षेत्र में हमारा पिछड़ापन ऐसे में कोई व्यक्ति निजी सुख-सुविध ाओं की कुर्बानी दे कर भी अपने लक्ष्य को अंजाम देना चाहे तो वह हथेली पर सरसों उगाने वाला आश्चर्य ही हो सकता है। 

किसी देश के मस्तिष्क को लगातार पोषण पुनः पूर्ति और उन्नति की आवश्यकता होती है। पैसों में यद्यपि बहुत आकर्षण होता है फिर भी वह इन महामानवों को सदा के लिए सीमाओं में बाँध कर नहीं रख सकता। वे अपनी प्रतिभा को परिपक्वता तक पहुँचाने तथा योग्यता को परिपूर्णता तक ले जाना चाहते हैं। 

यद्यपि भौतिक संपदा बहुत बड़ा आकर्षण होता है परन्तु जिस आवश्यकता की पूर्ति ये लोग करना चाहते है इसका यह तुच्छ भाग ही है। जब कोई वैज्ञानिक अपने देश को छोड़ता है और किसी दूसरे देश को अपना लेता है तो उसकी इस कार्रवाई की प्रेरक वे आशाएँ है जो उसके स्वप्नों को पूरा कर उसकी महत्त्वकांक्षाओं के मार्ग को प्रशस्त करता है। 

विकसित देशों के रहन-सहन के ऊँचे स्तर की चमक-दमक ने विकसशील क्षेत्र के लोगों को सदा ही अत्यधिक आकृष्ट किया है, और प्रतिभाशाली लोग और विशेषज्ञ भी इस मोह-जाल से अपने आप को नहीं बचा पाए। 

दूसरी तरफ आर्थिक उदारवाद के चलते आज जब हमारा देश भी एक नई व्यवस्था, नए प्रबंधन, नई तकनीकी व्यवस्था और एक नये कार्य-संस्कृति को ओर बढ़ रहा है। तो ऐसे में यहाँ भी वैसी सभी संभावनाएँ जन्म लेने लगी है कि अब बौद्धिक पलायन पर पूरी तरह काबू पाया जा सकता है। ऐसे में चाहिए की हम इन सबके लिए दूसरों पर दोषारोपण न करके अपने अंदर उन खामियों, उन दबावों को तलाशने की कोशिश करें तथा उनपर गंभीरता से विचार-विमर्श करें। 

प्रश्न : ‘भारत में बाल कुपोषण’ विषय पर एक निबंध लिखिए। 

उत्तर : भारत में बाल कुपोषण 

शरीर के लिए आवश्यक संतुलित आहार लम्बे समय तक नहीं मिलना हीं कुपोषण है। कुपोषण के कारण बच्चों, महिलाओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती हैं, जिससे वे आसानी से कई तरह की बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। 

विकसित देशों की अपेक्षा विकासशील देशों में कुपोषण की समस्या विकराल है। इसका प्रमुख कारण है गरीबी। धन के अभाव में गरीब लोग पर्याप्त, पौष्टिक चीजें जैसे- दूध, फल, घी इत्यादि नहीं खरीद पाते। कुछ तो अनाज से मुश्किल से पेट भर पाते हैं। लेकिन गरीबी के साथ ही एक बड़ा कारण अज्ञानता तथा निरक्षरता भी हैं। अधिकांश लोगों, विशेषकर गाँव-देहात में रहने वाले व्यक्तियों अपने बच्चों के भोजन में आवश्यक वस्तुओं का समावेशा नहीं करते। इस कारण से स्वयं तो इस रोग से ग्रस्त होते ही हैं साथ ही अपने परिवार को भी कुपोषण का शिकार बना देते हैं। 

एसीएफ की रिपोर्ट बताती है कि भारत में कुपोषण जितनी बड़ी समस्या है, वैसा पूरे दक्षिण एशिया में और कहीं देखने को नहीं मिला है। रिपोर्ट में लिखा गया है कि “भारत में अनुसूचित जन जाति (28%) अनुसूचित जाति (21%) पिछड़ी जाति (20%) और ग्रामीण समुदाय (21%) पर अत्यधिक कुपोषण का बहुत बड़ा बोझ है”। ___ भारत में कुपोषण निवारण हेतु समय-समय पर सरकार द्वारा कदम उठाये जाते रहे हैं। जून 2011 में केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा ‘जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम’ की शुरूआत की गयी। इस कार्यक्रम के जरिये सुरक्षित मातृत्व के उपाय सुनिश्चित किय गये। तथा जच्चा-बच्चा की स्वास्थ्य एवं देख-रेख पर ध्यान केंद्रित किया गया। 

भारत में चल रहे एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम, को कुपोषण मिटाने का दुनिया का सबसे बड़ा कार्यक्रम माना जाता है। इस वृहद कार्यक्रम के जरिए बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया गया। वर्ष 2005-06 और 2006-07 में इसे और व्यापक बनाते हुए समग्र रूप से स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और प्रशिक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए, ‘किशोर शक्ति योजना’ को भी संचालित किया गया। इस कार्यक्रम के तहत जहाँ कुपोषित बच्चों के लिए ग्रामीण स्तर पर मिनी अस्पताल खोले जा रहे हैं। वहीं जागरूकता अभियान चलाये जा रहे हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 देश के समस्त नागरिकों के लिए ‘जीवन के अधिकार’ की घोषणा करता है। बिना भोजन के जीवन के आदर्शों को कभी पूरा नहीं किया जा सकता है। इन सब प्रयासों के बावजूद भी अभी हालत सही नहीं है। योजनाओं का ढुलमुल क्रियान्वयन इस माली हालत का सबसे बड़ा कारण है अतः योजनाओं के शीघ्र एवं समुचित कार्यान्वयन के लिए सरकार एवं समाज को समन्वित रूप से कदम उठाने की आवश्यकता है। 

कुपोषण से जहां एक ओर मानव संसाधन विनष्ट हो रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर राष्ट्रनिर्माण कि प्रक्रिया बाधित हो रही हैं। अत: केन्द्र और राज्य सरकार को स्थानीय लोगों के सहयोग से इस भयावह स्थिति के विरूद्ध समन्वित प्रयास करना चाहिए तभी हमारा देश कुपोषण मुक्त हो सकेगा और राष्ट्र विश्व पटल पर विकसित देशों की बराबरी पर खड़ा हो सकेगी। 

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