SSC CGL Essay pdf in hindi | SSC CHSL Essay in Hindi

SSC CGL Essay pdf in hindi

SSC CGL Essay pdf in hindi | SSC CHSL Essay in Hindi

Essay Question list-प्रश्न : ‘भारत में लोकपाल’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

प्रश्न : ‘व्यावसायिक शिक्षा की उपादेयता’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

प्रश्न : ‘भारत में पर्यटन’ विषय पर एक निबंध लिखिए।

प्रश्न : ‘विमुद्रीकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव’ विषय पर एक निबंध लिखिए। 

प्रश्न : ‘भारत का शहरीकरण अन्ध पश्चिमीकरण के अतिरिक्त कुछ और नहीं’ विषय पर एक निबंध लिखिए। 

 

प्रश्न : ‘समावेशी विकास हेतु वित्तीय समावेशन आवश्यक है’ विषय पर एक निबंध लिखिए।

प्रश्न : ‘चुनाव में धर्म एवं जाति पर रोक’ विषय पर एक निबंध लिखिए। 

प्रश्न: ‘भारत का रक्षा क्षेत्र’ विषय पर एक निबंध लिखिए।

प्रश्न : ‘भारत में लोकपाल’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : भ्रष्टाचार राष्ट्र या समाज के लिए एक कोढ़ है, आज भ्रष्टाचार प्रशासन की एक प्रमुख समस्या बन गया है। भ्रष्टाचार को मिटाने और दूर करने के लिए विभिन्न देशों ने समय-समय पर अनेक कदम 

उठाये हैं। स्वीडन में सर्वप्रथम 1809 में संविधान के अंतर्गत ‘ओम्बुड्समैन की स्थापना की गयी। जिसका कार्य प्रशासनिक भ्रष्टाचार को रोकना था। भारत में उसे लोकपाल के नाम से जाना जाता है।

भारत में प्रशासनिक सुधार आयोग ने प्रशासन के विरुद्ध नागरिकों की शिकायतों को सुनने एवं प्रशासनिक भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सर्वप्रथम लोकपाल संस्था की स्थापना का विचार रखा था। जिसे स्वीकार नहीं किया गया। अंततः लोकपाल एवं लोकयुक्त विधेयक 17 दिसंबर, 2013 को राज्य सभा एवं 18 दिसंबर, 2013 को लोक सभा में बहुमत से पारित हुआ। 1 जनवरी 2014 को राष्ट्रपति के अनुमोदन के पश्चात् 16 जनवरी, 2014 को पूरे देश में लागू हो गया। 

लोकपाल की संस्था में एक अध्यक्ष होगा जो या तो भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या फिर कोई महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हो सकते हैं। यह भी व्यवस्था दी गयी है कि लोकपाल व्यवस्था के कम से कम आधे सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ी जाति, अल्पसंख्यकों और महिलाओं में से होने चाहिए। योग्य महत्त्वपूर्ण व्यक्ति ईमानदार एवं विशेष ज्ञान के साथ अद्वितीय योग्यता वाले हों। तथा भ्रष्टचार विरोधी नीति, लोक प्रशासन, सतर्कता, बीमा, बैंकिंग, कानून और प्रबंधन के मामलों में कम से कम 25 वर्ष का विशेष ज्ञान एवं विशेषज्ञता रखता हो। 

लोकपाल के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति हेतु राष्ट्रपति द्वारा चयन समिति का गठन एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्यों से मिलकर किया जायेगा, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा के अध्यक्ष, लोक सभा में विपक्ष के नेता, मुख्य न्यायाधीश या उनकी अनुशंसा पर नामित सर्वोच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश और राष्ट्रपति द्वारा नामित कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति होंगें। 

लोकपाल के अध्यक्ष एवं प्रत्येक सदस्य की नियुक्ति चयन समिति की अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा उनके हस्ताक्षर एवं मुहर के तहत जारी वारट से होगी। इनकी नियुक्ति पाँच वर्ष के लिए होगी उस तिथि से जिस पर उसने पद ग्रहण किया है। या जब तक वह 70 वर्ष की आयु का न हो गया हो जो भी पहले हो। हालांकि वह पदावधि से पूर्व भी त्यागपत्र दे सकता है या उसे नियत तिथि से पूर्व हटाया जा सकता है।

इस अधिनियम के तहत लोकपाल को पर्यवेक्षण एवं अधिक्षण की शक्ति होगी, और उसके द्वारा दिल्ली विशेष पुलिस शाखा को सौंपे गये मामले के संदर्भ में प्राथमिक जाँच एवं अन्वेषण के निर्देश दे सकता है। लोकपाल को सम्बद्ध दस्तावेज की तलाशी एवं जब्तीकरण के आदेश देने का अधिकार है। 

इस प्रकार भ्रष्टाचार एवं कुशासन की समस्या से निपटने के लिए लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून एक प्रभावी कदम हो सकता है, यदि इसको ईमानदारीपूर्वक प्रभावी बनाया जाय। 

प्रश्न : ‘व्यावसायिक शिक्षा की उपादेयता’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : किसी भी राष्ट्र की प्रगति तथा विकास की आधारशिला व्यावसायिक शिक्षा पर अवलम्बित है जिस पर उसके विकास का भव्य महल खड़ा होता है । व्यावसायिक शिक्षा शिक्षा की वह पद्धति है जो किसी विषय में पूर्ण तकनीकी ज्ञान दे तथा जिसे प्राप्त करके कोई व्यक्ति उस विषय विशेष से संबंधित रोजगार या व्यवसाय करने में सक्षम हो सके । आज की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा नीति में शिक्षा को व्यावसायिक बनाने की बात प्रमुख है । यही कारण है कि उसे प्रत्यक्ष कार्यों से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। इस रोजगारोन्मुख (व्यावसायिक) शिक्षा की लोकप्रियता और आवश्यकता दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है । इस शिक्षा की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह शिक्षितों को न केवल स्वावलंबी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है, बल्कि उन्हें व्यावहारिक जीवन की सच्चाई से भी जोड़े रखती है। व्यावसायिक शिक्षा के अन्तर्गत इंजीनियरिंग, मेडिकल, आईटीआई, पोलिटेक्निक, कम्प्यूटर, मैनेजमेंट, फैशन डिजाइनिंग, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, ई-कॉमर्स, डेयरी टेक्नोलॉजी, बायो टेक्नोलॉजी, फिशरीज इत्यादि अनेक क्षेत्रों में डिप्लोमा, स्नातक, स्नातकोत्तर आदि भिन्न स्तरों की शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा एवं अवसर उपलब्ध हैं। 

व्यावसायिक शिक्षा को मुख्य रूप से कृषि, वाणिज्य, गृह विज्ञान, प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी), पैरामेडिकल इत्यादि विभिन्न प्रकार के ट्रेडों में बाँटा जा सकता है। इसके अलावा कृषि विज्ञान की व्यावसायिक शिक्षा, ऑफिस मैनेजमेंट, सेल्समैनशिप, एकाउंटेंसी, ऑडिटिंग, बेकरी और कन्फेक्शनरी, टेलरिंग (सिलाई), कढ़ाई, बुनाई, टेक्सटाइल डिजाइनिंग, होटल मैनेजमेंट, फूड प्रिजर्वेशन (खाद्य पदार्थों का संरक्षण), मैपिंग (नक्शा बनाना), एयर कंडिशनिंग, फ्रिज, विद्युत उपकरणों इत्यादि के निर्माण एवं रख रखाव, एक्स-रे टेक्निशियन, फिजियोथेरेपी, पुस्तकालय विज्ञान, टूरिज्म एंड ट्रेवल मैनेजमेंट, इंटीरियर डेकोरेशन एंड डिजाइनिंग, हेल्थ एंड ब्यूटी कल्चर, फोटोग्राफी, टाइपिंग, स्टेनोग्राफी इत्यादि विविध क्षेत्रों से संबंधित शिक्षा आती है। साथ ही व्यावसायिक शिक्षा विकास के कार्यों में रेडियो, टेलीविजन, सैटेलाइट आदि आधुनिक माध्यमों का बहुलता से व्यवहार करने की व्यवस्था भी की गई है। 

सम्प्रति व्यावसायिक शिक्षा (वोकेशनल एजुकेशन) का प्रसार देश में काफी तेजी से हो रहा है तथा इस रोजगारोन्मुख शिक्षा के कारण आज हमारी युवा पीढ़ी रोजगार या स्वरोजगार के प्रति काफी आशान्वित है। इस शिक्षा के माध्यम से उनमें स्वावलम्बन का भरोसा भी बढ़ रहा है। शिक्षा का रोजगार परक होना आवश्यक है, इस बात को आज अधिकतर लोग स्वीकार करने लगे हैं, क्योंकि यह सही है कि सच्ची शिक्षा वही है जो शिक्षितों को स्वावलंबी बनाये और उसे जीवन की व्यावहारिकता से जोड़े। इस दृष्टि से व्यावसायिक शिक्षा, वह शिक्षा है जो किसी विषय में पूर्ण तकनीकी ज्ञान दे, जिसके पाने के बाद व्यक्ति उस विषय से संबंधित नौकरी कर सके अथवा अपना स्वतंत्र व्यवसाय कर सके। 

नई शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत व्यावसायिक शिक्षा प्रणाली की दिशा में एक विशाल प्रयास किया जा रहा है। जिसकी सफलता से देश में लाखों व्यक्ति एवं छात्र-छात्रायें लाभान्वित हो सकेंगे। भविष्य में इससे समाज और राष्ट्र दोनों ही को लाभ होगा। आवश्यकता केवल सही संचालन एवं कार्यान्वयन की है। यदि व्यावसायिक शिक्षा का संचालन, सामाजिक पर्यवेक्षण और समय-समय पर मूल्यांकन सही ढंग से हो तो यह देश के युवाओं को स्वावलम्बी बना सकती है। उल्लेखनीय है कि व्यावसायिक शिक्षा की वास्तविक उपादेयता व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने वालों के स्वावलम्बन में ही निहित है। 

प्रश्न : ‘भारत में पर्यटन’ विषय पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर : भारत में पर्यटन 

भारत में पर्यटन सबसे बड़ा सेवा उद्योग है, जहाँ इसका सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 6.23 प्रतिशत और भारत के कुल रोजगार में 8.78 प्रतिशत योगदान हैं। भारत में वार्षिक तौर पर 5 मिलियन विदेशी पर्यटकों का आगमन और 562 मिलियन घरेलू पर्यटकों द्वारा भ्रमण परिलक्षित होता है। भारत में पर्यटन के विकास और उसे बढ़ावा देने के लिए पर्यटन मंत्रालय नोडल एजेंसी है और “अतुल्य भारत” अभियान को देख देख करता है। 

विश्व यात्रा और पर्यटन परिषद् के अनुसार, भारत सर्वाधिक 10 वर्षीय विकास क्षमता के साथ 2009 ,-2018 तक पर्यटन का केन्द्र बन जायेगा। यात्रा एवं पर्यटन प्रतिस्पर्धा रिपोर्ट 2007 ने भारत में पर्यटन को प्रतियोगी किमतों के संदर्भ में 6 वा तथा सुरक्षा व निरापदता की दृष्टि से 39 वां दर्जा दिया है। इस क्षेत्र में 2017 में 42 प्रतिशत उछाल रही। 

पर्यटन भारत को आर्थिक रूप से बेहतर बनाने के साथ-साथ संस्कृति का निर्माण करता हैं जिससे घरेलू परिप्रेक्ष्य में देखें तो एक राज्य से दूसरे राज्य में पर्यटन से संस्कृति का आदान-प्रदान होता है। यथा पूर्वोत्तर राज्य की संस्कृति से दक्षिण और उत्तर के राज्य परिचित होते हैं और पूर्वोत्तर राज्य दक्षिण के राज्यों का आनन्द लेते हैं। वैश्विक स्तर पर भारत के लोग पश्चिम की संस्कृति का आनंद लेते मिल जाते हैं। वहीं विदेशी लोग गंगा के संगम पर डुबकी लगाते हैं, मंदिर में माथा टेकते नजर आ जाते हैं। यह सब पर्यटन से ही सम्भव हुआ है। 

संस्कृति से इतर पर्यटन से विकसित देशों से विकासशील देशों में तकनीकी का आदान प्रदान होता है तथा नयी-नयी ऐतिहासिक खोजे सम्भव हुई हैं। 

भारतीय परिप्रेक्ष्य में पर्यटन एक उभरता हुआ क्षेत्र है। हमारे यहाँ कई तरह के पर्यटन संभव हैं। मसलन शैक्षिक पर्यटन, स्वास्थ्य पर्यटन, ग्राम्य पर्यटन, धार्मिक पर्यटन, पारिस्थितिकी पर्यटन इत्यादि। 

भारत में शैक्षिक पर्यटन कोई नयी नहीं है, पीछे मुड़कर देखने पर शिक्षा के क्षेत्र में देश का स्वर्णिम अतीत नजर आता है, जब हजारों विदेशी छात्र नालंदा और तक्षशीला में शिक्षा ग्रहण करने आते थे। वहीं भारत में चरक और सुश्रुत जैसे चिकित्सकों का जन्म हुआ है। आज भी भारत में प्रतिदिन करीब 200 लोग चिकित्सा के लिए भारत आते हैं। 

गाँधी का कथन है कि भारत गाँवों में बसता हैं और इस गाँव संस्कृति को देखने के लिए देशी तथा विदेशी लोग गाँवों का भ्रमण करते हैं। इसका एक उदाहरण अजमेर के समीप पुष्कर गाँव का है जो विदेशियों के लिए वर्षों से अनुकूल बना हुआ है। 

भारत विविधता से भरा हुआ है इसलिए यहाँ पर्यटन उद्यम की अपार संभावना है। सरकार तथा जनता को प्रयास करना चाहिए की भारत में पर्यटन उद्यम को बढ़ावा मिले इसके लिए सरकार स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा भी दे रही है जो इस ओर एक प्रगतिशील कदम हैं |

प्रश्न : ‘विमुद्रीकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव’ विषय पर एक निबंध लिखिए। 

उत्तर : विमुद्रीकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव 

नवम्बर 2016 में कालेधन पर प्रहार करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री द्वारा विमुद्रीकरण की घोषणा की गयी इसके अंतर्गत 500 व 1000 मूल्य के सभी नोटों को कुछ अपवादों के साथ चलन से बाहर कर दिया गया। इस निर्णय से देश की नकद मुद्रा का एक बड़ा भाग आर्थिक व्यवहार से तटस्थ हो गया। जिससे देश में नकदी की गम्भीर रूप से कमी हो गयी, तथा लगभग तीन माह तक यही स्थिति बनी रही विमुद्रीकरण के प्रभावों को लेकर आर्थिक विशेषज्ञों में मतभेद रहे हैं। परंतु इस मुद्दे पर लगभग सभी विद्वान एक मत हैं कि विमुद्रीकरण के दीर्घकालिक परिणाम सकारात्मक होंगे। 

यदि विमुद्रीकरण के तात्कालिक प्रभावों की चर्चा की जाए तो इसके अनेक नकारात्मक तत्व उभरकर सामने आते हैं। उदाहरण के लिए नकदी की कमी के चलते माँग पक्ष में भारी कमी आयी जिससे विनिर्माण क्षेत्र को क्षति हुयी। विशेषकर छोटे उद्यम जिनका अधिकांश लेनदेन अनौपचारिक माध्यम से होता है, अधिक प्रभावित हुए। डिजिटल माध्यम से लेनदेन की कमी के कारण आम नागरिकों को रोजमर्रा के व्यय को लेकर मुद्रा की कमी के संकट से जूझना पड़ा। तथा नयी मुद्रा के आने के बाद ही स्थिति में सुधार हो सका। 

जैसा कि पहले से अनुमान लगाया गया था। आने वाले वित्तीय वर्ष की प्रथम दो तिमाहियों में अर्थव्यवस्था की प्रगति में दो प्रतिशत की गिरावट देखी गयी। इस स्थिति को सुधारने के लिए सरकार से अनेक प्रयास करने की अपेक्षा की जा रही है। इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए हाल ही में सरकार ने सड़क निर्माण में 2 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की है। अत: आने वाले वित्तीय वर्ष 2018-19 में स्थिति में पर्याप्त सुधार आने की अपेक्षा की जा सकती है। परंतु यहाँ उल्लेखनीय है कि पूर्व में सरकार द्वारा अपेक्षित बड़ी मात्रा में मुद्रा के वापस ना आने की संभावना गलत साबित हुयी तथा लगभग सम्पूर्ण मुद्रा बैंकों के पास जमा कराई जा चुकी है जिससे सरकार एक बड़े आर्थिक लाभ से वंचित ही रह गयी। 

विमुद्रीकरण के अनेक सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले हैं। उदाहरण के लिए रियल स्टेट क्षेत्र में काला धन के प्रयोग में अंकुश लगने से भूमि तथा आवासों के दाम में कमी आयी है। डिजटल भुगतान की प्रवृत्ति में दुगुने से अधिक की वृद्धि देखी गयी है। नकदी की कमी के चलते कश्मीर में पत्थरबाजी एवं नक्सली हिंसा में कमी देखी जा रही है। हाल ही में आयकर विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार आयकर दाताओं की संख्या में अक्टूबर, 2017 तक 25% की भारी बढ़त देखी गयी है। इसी के साथ क्लीन मनी अभियान के माध्यम से लगभग 2.5 लाख फर्जी कंपनियाँ पकड़ में आयी हैं। 

विशेषज्ञों का यह मानना है कि आने वाले समय में सरकार के कर राजस्व में और भी वृद्धि होगी। काला धन पर नियंत्रण से मौद्रिक और आर्थिक नीतियाँ अधिक प्रभावी होंगी। अर्थव्यवस्था में विश्वसनीयता बढ़ेगी। इन सबसे आने वाले समय में आर्थिक वृद्धि में भी तेजी देखी जा सकेगी। अत: यह कहा जा सकता है कि विमुद्रीकरण के मूल्यांकन के लिए अभी कुछ और इंतजार किये जाने की आवश्यकता है। 

प्रश्न : ‘भारत का शहरीकरण अन्ध पश्चिमीकरण के अतिरिक्त कुछ और नहीं’ विषय पर एक निबंध लिखिए। 

उत्तर : भारत का शहरीकरण अन्ध पश्चिमीकरण के अतिरिक्त कुछ और नहीं 

भारत में नगरीकरण की सुदीर्घ परम्परा रही है जो सिन्धु-घाटी सभ्यता काल से चली आ रही है। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो के नगरीय केन्द्र हड़प्पा संस्कृति के उच्च नगरीय विकास के सूचक हैं। प्राचीन काल में नगरों का अभ्युदय नदियों के किनारों पर, संगमों पर तथा विस्तृत मैदानों में हुआ। कालांतर में कमोबेश यही परम्परा पूर्व मध्यकाल तक चलती रही, फिर मध्य काल से लेकर आधुनिक काल में यूरोपीय कंपनियों के आगमन से पूर्व तक भारतीय-इस्लामिक पद्धति से नगरों का निर्माण होता रहा। परन्तु पश्चिमी देशों के आगमन के साथ एक नवीन परंपरा की नींव पड़ी। 

यह नवीन परंपरा पश्चिमी देशों विशेषकर पुर्तगालियों, फ्रान्सीसियों एवं ब्रिटिशों द्वारा स्थापित की गयी व्यापारिक कोठियों, पत्तनों आदि नगरों में देखने को मिलता है। जब भारत में कोलकाता, मुम्बई, मद्रास, सूरत, कोच्ची, जैसे नगरों की स्थापना हुई तो पाश्चात्य स्थापत्य कला के साथ-साथ नगरीय जीवन को भी भारतीयों ने आत्मसात कर लिया। वर्तमान में पश्चिमी नगरीकरण सम्पूर्ण विश्व भर में अपनाया गया है। दुनिया के बड़े-बड़े विकसित नगर- टोक्यो, बीजिंग, सिंगापुर, दुबई आदि सभी ने इसे अपनाया है। ऐसे में भारतीय नगरीकरण को हम इससे अलग करके नहीं देख सकते हैं। ___भारत में सरकार तथा निजी दोनों के द्वारा किए जा रहे शहरी विनिर्माण पश्चिमी शहरीकरण का अन्धानुशरण ही प्रतीत होता है क्योंकि भारतीय परिस्थितियों एवं जलवायु का समुचित अध्ययन किए बिना निर्माण उतने कारगर तथा लाभकारी सिद्ध नहीं हुए हैं जितने कि पश्चिम में। आज भारतीय महानगरों में अनेक समस्याएँ सामने आ रही हैं जिनमें प्रदूषण के निस्तारण की समस्या, कचरा प्रबन्धन, भीषण यातायात जाम की समस्या, पार्किंग समस्या, पार्को के अभाव की समस्या आदि हैं। इसका मूल कारण शहरों के बसाव से पूर्व सुनियोजित योजना का अभाव है। 

नगरीकरण आर्थिक विकास तथा प्रगति का एक प्रमुख घटक है। अगले कुछ दशकों में देश की सम्पूर्ण आबादी का लगभग 50% जनसंख्या नगरों में रहने लगेगी अर्थात् इसके लिए हमें नगरीकरण का विस्तार करना होगा। नगरीकरण नीति में छोटे, मध्यम तथा मध्यवर्ती नगरों में अवसं. 

रचनात्मक सुविधाओं के विकास पर अधिक बल दिया गया है। हाल ही में सरकार द्वारा स्मार्ट सिटी की स्थापना पर जोर दिया जा रहा है। 

जैसा कि विदित है कि भारत में नगरीकरण की प्राचीन परंपरा रही है। फिर यदि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो विदित होता है कि वैश्वीकरण के युग में दुनिया के तमाम देशों की तरह भारत ने भी शहरीकरण के पश्चिमी मॉडल को ही अपनाया है। भारत के महानगरों से लेकर नगरों, कस्बों एवं गाँवों तक यह प्रतिबिम्बित होती प्रतीत हो रही है।

अत: ऐसा कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि भारतीय शहरीकरण पर पश्चिम का प्रभाव व्यापक रूप से पड़ा है हालांकि इसमें स्वदेशी तत्व भी पाये जाते हैं। 

प्रश्न : ‘समावेशी विकास हेतु वित्तीय समावेशन आवश्यक है’ विषय पर एक निबंध लिखिए। 

उत्तर : समावेशी विकास हेतु वित्तीय समावेशन आवश्यक है 

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में समावेशी विकास अत्यन्त लोकप्रिय शब्द बन गया है। वृद्धि दर की प्रक्रिया में समावेशी विकास महत्त्वपूर्ण रूप से योगदान दे रहा है। समावेशी विकास आर्थिक विकास- प्रक्रिया और इसके परिणामों के लिए एक महत्त्वपूर्ण रास्ता है। राष्ट्र की अनेक महत्त्वपूर्ण समस्याओं और भारतीय अर्थव्यवस्था की तीव्र विकास, समाज के वृहद् भाग और क्षेत्रीय विषमता से बचने के लिए समावेशी विकास श्रेष्ठ विकल्प है। घरेलू क्षेत्र में वित्तीय सेवाओं की आवश्यकता को शीघ्र उपलब्ध कराने में सामान्य वित्तीय सेवाओं की अपेक्षा समावेशी विकास इसमें सहायक है। यह ध्यातव्य है कि वित्तीय क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें आर्थिक विकास की स्थिरता के लिए योग्यता के आधार पर वित्तीय सुविधायें प्रदान की जाती है।

परम्परागत वित्तीय व्यवस्था से एक सुदृढ़ रूप से सम्पन्न अच्छी वित्तीय व्यवस्था की ओर हम बढ़ रहे हैं। शहरी क्षेत्र में कर्मियों को हम आर्थिक विकल्प उपलब्ध करा रहे हैं जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले उनके परिजनों को सूदखोरों से मुक्ति मिल रही है। समावेशी विकास देश के सभी भागों को बाजारी अर्थव्यवस्था से सम्बद्ध कर रहा है जिससे निर्धनों के लिए जोखिम कम हो रहे हैं। गरीबों की सामाजिक सुरक्षा के जोखिमों को कम करने के लिए सूक्ष्म बचत, सूक्ष्म ऋण, सूक्ष्म बीमा एवं सूक्ष्म पेंशन जैसी सुविधायें प्रदान की जा रही हैं। इसके माध्यम से निर्धनों को वित्तीय समावेश के द्वारा सामाजिक समावेश तक पहुँचाने के लिए विचार किया गया है। वास्तव में समाज से निर्धनता को कम करने और सामाजिक-आर्थिक विषमता करने के लिए समावेशी को कम विकास की आवश्यकता है। सरकार द्वारा चिह्नित किए गए क्षेत्रों में वित्तीय समावेश द्वारा ही पूर्ण प्रयासों से विकास प्रक्रिया समान और समावेशी होगी। समावेशी विकास प्रक्रिया में तकनीकी की भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी। इससे एक और परिवहन लागत कम होगी तो दूसरी ओर उत्पादकता बढ़ेगी। वास्तविक रूप से हमारा सेवा क्षेत्र आर्थिक विकास को तीव्रता प्रदान करने के लिए वित्तीय सेवा क्षेत्र के योग्य है। इससे वास्तविक अर्थव्यवस्था में गुणवत्ता, कम्पन, प्रभावशीलता और उत्पादकता बढ़ेगी। 

वित्तीय समावेशी प्रक्रिया का उद्देश्य है कि उत्पादों को सामाजिक सुरक्षा के योग्य बनाया जाए और नागरिकों को वित्तीय उत्पादों के साथ पेंशन, बीमा और उपकरणों की बचत का अवसर दिया जाए। गृह निर्माण क्षेत्र भौतिक सम्पत्ति को वित्तीय सम्पति के योग्य बनाकर उपलब्ध करा रहा है जबकि इनका प्रयोग उत्पादक क्रियाओं से बदलकर आर्थिक क्रियाओं में किया जा रहा है। वित्तीय समावेशन निर्धनों की बचत के लिए सामान्य वित्तीय व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण स्थान उपलब्ध करा रहा है। यह आवश्यक है कि बैंकिंग सेवाओं को शीघ्र ही ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचाया जाए जिससे ये क्षेत्र भी भारत के विकास की कहानी बनें। इसके लिए बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के प्रावधानों को ग्रामीण क्षेत्रों के समावेशी विकास के योग्य बनाया जाए। इस परिदृश्य में प्रधानमंत्री जन-धनयोजना ग्राहक को जानो के प्रावधानों में छूट, व्यापार केन्द्रों से सम्बद्धता, बैंकों की शाखाओं को बिना बैंक वाले क्षेत्रों में खोलना आदि प्रयासों की घोषणा सही दिशा में किए गए प्रयास हैं। 

प्रश्न : ‘चुनाव में धर्म एवं जाति पर रोक’ विषय पर एक निबंध लिखिए। 

उत्तर : चुनाव में धर्म एवं जाति पर रोक 

चुनाव लोकतांत्रिक शासन का आधार हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव व्यस्था लोकतंत्र को स्थायित्व और परिपक्वता प्रदान करती हैं। काफी समय से देश में चुनाव सुधारों की मांग की जाती रही है। 

चुनाव के दौरान अपनायें जाने वाले भ्रष्ट तरीकों को समाप्त करने का प्रश्न सरकार के समक्ष काफी समय से विचाराधीन रहा। पिछले वर्षों में हुए अनुभवों ने चुनाव सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। चुनाव आयोग ने भी कुछ सुझाव सरकार के पास भेजे हैं। राजनैतिक दलों के नेताओं तथा अन्य प्रबुद्ध नागरिकों का भी अनेक सुधारों की आवश्यकता और उसके स्वरूप के बारे में अनेक मंचों से समय-समय पर ठोस विचार सामने आते रहे हैं। सरकार ने चुनाव सुधार के मुद्दों के बारे में राजनैतिक-दलों के नेताओं के साथ विचार विमर्श किया। इन सब बातों को ध्यान में रखकर सरकार ने दिसंबर, 1988 में संसद में दो विध ‘यक पास कराये एक संविधान संशाधन विधेयक दूसरा जनप्रतिनिधि विधेयक। 

उपरोक्त दोनों विधेयकों द्वारा देश को चुनाव प्रणाली में महत्त्वपूर्ण और व्यापक सुधारों का प्रावधान किया गया है। जैसे मतदाता, संबंधित उम्मीदवार संबंधित चुनाव के दौरान होने वाले भ्रष्टाचार संबंधी, चुनाव आयोग संबंधी और राजनैतिक दल संबंधी। पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में जातिवाद, धार्मिक भेदभाव और भाषावाद एक नया तथ्य बनकर उभरा है। राजनेता समाज को धर्म एवं जाति के आधार पर बाँट रहे हैं, एक दूसरे को मारने पर उतारू हैं। ब्रिटिश काल में तो अंग्रेजों ने फूट डालो राज करो की नीति को अपनाया था। आज हमारे राजनेता इसी दिशा में अग्रसर होते दिख रहे हैं। 

वर्तमान समय में चुनावों में जाति एवं धर्म का बोलबाला इतना अधिक हो गया कि इस पर सर्वोच्च न्यायालय को स्वतः संज्ञान लेना पड़ा और माननीय न्यायालय में इसे चुनावों में इस्तेमाल पर रोक लगाने का आदेश दिया। लेकिन वर्तमान के चुनाव यह बताते हैं कि हमारे शीर्ष पदों पर बैठे हुए लोग भी इससे अछूते नहीं रहे तथा बेधड़क इसका इस्तेमाल किया गया। 

इसका प्रभाव इतना व्यापक हो गया है कि आज राजनीतिक दल योग्यता और लोकप्रियता को नजरअंदाज कर जाति और धर्म को वरीयता क्रम पर नम्बर एक पर रख रही है। जिस क्षेत्र में जिस जाति या धर्म का वर्चस्व अधिक होता है वहाँ उसी धर्म एवं जाति के लोगों को उम्मीदवार बनाया जाता है। 

चुनावों में जातिय और धार्मिक भावनाओं का बड़ी ही सहजता के साथ उपयोग कर उसे भुनाने का प्रयास किया जाता हैं। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में धर्म, जाति, भाषा और नस्ल के मुद्दे को पूरी तरह राजनीति से बाहर कर पाना सम्भव नहीं है। 

निष्कर्ष : भारत में धर्मनिरपेक्ष और जातिविहीन राजनीति की कल्पना करना कठिन कार्य है। भारत जैसे विविधता वाले देश में जहाँ धर्म सिर्फ आस्था का विषय न होकर लोगों में एकता एवं दृढ़ता का परिचायक है। वहाँ धर्म को राजनीति से अलग करना सबसे मुश्किल कार्य है। जहाँ राजनीतिक दल धर्म, जाति, भाषा नस्ल के आधार पर निर्मित होती है और मतदाता भी धर्म जाति, भाषा, और नस्ल के आधार पर वर्गीकृत हैं वहाँ सार्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय ऐतिहासिक है। तथा संविधान की मूल भावना ‘धर्मनिरपेक्ष राज्य’ को बल प्रदान करता है। 

प्रश्न: ‘भारत का रक्षा क्षेत्र’ विषय पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर : भारत का रक्षा क्षेत्र

किसी देश की विश्व बिरादरी में स्थिति को समझने के लिए उस देश की युद्ध क्षमता का अवलोकन करना आवश्यक समझा जाता है। जिसे राजनीति शास्त्र की भाषा में ‘हार्ड पॉवर’ कहा जाता है। अब तक के विश्व में सुपर पावर बनने वाले देशों की सैन्य क्षमता नि:संदेह अत्यधिक रही है। अतः यदि भारत को विश्व पटल पर अपना समुचित स्थान प्राप्त करना है तो इसके लिए आवश्यक है कि भारत अपने रक्षा तंत्र में सुदृढ़ता लाए। इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारत ने अपनी सैन्य क्षमता में निरंतर वृद्धि की है। 

स्वतंत्रता के बाद संसाधनों के गम्भीर अभाव के कारण देश के रक्षा तंत्र का पर्याप्त उन्नयन नहीं किया जा सका परिणामत: भारत को अपने पड़ोसी देश चीन से हुए युद्ध में हार का मुँह देखना पड़ा। कालांतर में इस घटना से सीख लेकर रक्षा क्षेत्र में सुदृढ़ता पाने के लिए अनेक कदम उठाए गये। भारत के रक्षा कार्यक्रमों में सोवियत रुस का उल्लेखनीय योगदान रहा है। भारत के कुछ प्राथमिक लड़ाकू विमान यथा सुखोई की विविध श्रेणीयाँ, मिग विमान रूस से ही प्राप्त किये गए हैं। इसी प्रकार भारत में युद्धपोतों तथा लड़ाकू विमानों के विकास में भी रूस से पर्याप्त तकनीकी सहयोग प्राप्त हुआ है। भारत के स्वदेश आधारित मिसाइल कार्यक्रम रक्षा क्षेत्र के विकास में मील का पत्थर साबित हुए हैं जिनमें अग्नि, पृथ्वी, नाग, त्रिशूल का नाम उल्लेखनीय है। अग्नि श्रृंखला का नवीनतम् उत्पाद अग्नि-V अंतर्महाद्वीपीय श्रेणी की मिसाइल है। 

रूस के सहयोग से निर्मित ब्रह्मोस मिसाइल अपनी तीव्रता तथा विनाश क्षमता की दृष्टि से विशिष्ट है। जिसके वाणिज्यिक उत्पादन के लिए भारत प्रयासरत है। भारत ने रुस के तकनीकी सहयोग से परमाणु पण्डुिब्बी ‘अरिहंत’ का निर्माण किया है। इजराइल के सहयोग से भारत ने अपना एण्टी मिसाइल सिस्टम भी विकसित कर लिया है जो बाह्य आक्रमणों से भारत को सुरक्षा प्रदान करेगा। 

भारत के नौ सैन्य बेड़े में विमान वाहक युद्धपोत भी सुशोभित है। इसके अतिरिक्त भारत अपना स्वदेशी विमान वाहक युद्धपोत भी विकसित कर रहा है। अभी हाल ही के वर्षों में भारत ने तेजस नामक अपने पहले स्वदेशी ‘लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट’ का विकास किया है। जिससे भारतीय रक्षा प्रौद्योगिकी में महत्वपूर्ण वृद्धि हुयी है। भारत ने सैन्य दृष्टि से अत्यधि क महत्वपूर्ण स्वदेशी जी.पी.एस. प्रणाली विकसित कर ली है यह न सिर्फ भारत की सीमाओं की सुरक्षा की दृष्टि से अपितु युद्ध काल में अपने अस्त्रों के सटीक प्रयोग के लिए महत्वपूर्ण है। 

भारत की थल सेना के रक्षा उत्पादों में विश्व का आधुनिकतम् टैंक T-90 (भीष्म) सुशोभित है इसके साथ ही भारत अपना स्वदेश आधारित उन्नत आधुनिक टैंक अर्जुन का भी विकास कर रहा है। भारत 10 हजार किमी. दूरी तक मार करने में सक्षम सूर्य मिसाइल का भी विकास कर रहा 

भारत के रक्षा क्षेत्र की एक बड़ी समस्या इसके स्वदेशी विकास की कमी है जिससे हमे युद्धक साजो सामान के लिए भारी विदेशी मुद्रा व्यय करने के बावजूद विदेशी उत्पादको पर निर्भर रहना पड़ता है। अत: ‘मेक इन इण्डिया’ जैसी पहलों के माध्यम से रक्षा उत्पादों के उत्पादन में तीव्रता लाने की आवश्यकता है। हाल ही में भारत को मिसाइल टेक्नोलॉजी कन्ट्रोल रिजीम’ की सदस्यता प्राप्त हुयो है जिससे भारत को रक्षा उत्पादों के लिए तकनीकी प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। अत: हमें रक्षा उत्पादों के स्वदेशी करण पर गम्भीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। 

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