Ssc CGL, CHSL, MTS previous year descriptive papers with solution pdf in hindi

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विषय : दिए गए विषयों में से किन्हीं दो पर निबन्ध लिखिए जो प्रत्येक 500 शब्दों से अधिक न हो।

(1) अनुत्तरदायी किशोर

(2) संयुक्त परिवार और एकल परिवार

(3) बाल श्रमिक

(4) स्वास्थ्य ही धन है

(5) खरीदारी के लिए मॉल

(6) पालतू जानवर रखना (संगीत का महत्व

(8) अपारम्परिक व्यवसाय

(9) क्रोध पर नियंत्रण

(10)भारत में मानसून 

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उत्तर 

(3) बाल श्रमिक : बाल-मन सामान्यतया अपने घर-परिवार तथा आसपास की स्थितियों से अपरिचित रहा करता है। स्वच्छंद रूप से खाना-पीना और खेलना ही वह जानता एवं इन्हीं बातों का प्राय: अर्थ भी समझा करता है। कुछ और बड़ा होने पर तख्ती, स्लेट और प्रारंभिक पाठमाला लेकर पढ़ना-लिखना सीखना मानव-संतान होने के नाते उसका जन्मजात अधिकार हआ करता है। लेकिन आज परिस्थितियों कछ ऐसी बन गई और बन रही हैं कि उपर्युक्त कार्यों का अधिकार रखने वाले बालकों के हाथ-पैर रात-दिन की कठिन मेहनत-मजदूरी के लिए विवश होकर धूल-धूसरित तो हो ही चुके होते हैं, अक्सर कठोर एवं छलनी भी हो चुके होते हैं। चेहरों पर बालसुलभ मुस्कान के स्थान पर अवसाद की गहरी रेखाएँ स्थायी डेरा डाल चुकी होती हैं। फूल की तरह ताजा गंध से महकते रहने योग्य फेफड़ों में धूल, धुआँ, रोएँ-रेशे भरकर उसे अस्वस्थ एवं दुर्गन्धित कर चुके होते हैं। गरीबीजन्य बाल-मजदूरी करने की विवशता ही इसका एकमात्र कारण मानी जाती है। ऐसे बाल मजदूर कई बार तो डर, भय बलात् कार्य करने जैसी विवशता के बोझ तले दबे-घुटे प्रतीत हुआ करते हैं और कई बार बड़े-बूढ़ों की तरह दायित्व-बोध से दबे हुए भी। कारण कुछ भी हो, बाल-मजदूरी न केवल किसी एक स्वतंत्र राष्ट्र बल्कि समूची मानवता के माथे पर कलंक है। 

छोटे-छोटे बालक मजदूरी करते हुए घरों, ढाबों चायघरों, छोटे होटलों आदि में तो अक्सर मिल ही जाते हैं, छोटी-बड़ी फैक्टरियों के अस्वस्थ वातावरण में भी मजदूरी का बोझ ढोते हुए दीख जाया करते हैं। कश्मीर का कालीन-उद्योग दक्षिण भारत का माचिस एवं पटाखे बनाने वाला उद्योग, महाराष्ट्र, गुजरात और बंगाल का बीड़ी-उद्योग तो पूरी तरह से टिका ही हुआ है, बाल-मजदूरों के श्रम पर। इन स्थानों पर इन सुकुमार बच्चों से बारह-चौदह घंटे काम लिया जाता है; पर बदले में वेतन तो बहुत कम दिया हो जाता है, अन्य किसी प्रकार की कोई सुविधा इन्हें नहीं दी जाती। यहाँ तक कि इनके स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं रखा जाता। इतना ही नहीं, यदि ये बेचारे बीमार पड़ जाते हैं,तब भी इन्हें छुट्टी नहीं दी जाती बल्कि ढीठ बनकर काम करते रहना पड़ता है। यदि छुट्टी कर लेते हैं, बीमारी के कारण काम करने में असमर्थ और अशक्त हो जाने के कारण काम पर नहीं आ पाते, तो उस दिन का वेतन काट लिया जाता है। कई मालिक तो छुट्टी करने पर दुगुना वेतन काट लिया करते हैं। ढाबों, चायघरों, आदि में या फिर हलवाइयों की दुकानों पर काम कर रहे बच्चों-बालकों की दशा तो और भी दयनीय हुआ करती है। कई बार तो उन्हें बचा-खुचा जूठन ही खाने-पीने को बाध्य होना पड़ता है। बेचारे वहीं बेंचों पर या भट्ठियों की बुझती आग के पास चौबीस घंटों में दो-चार घंटे सोकर गर्मी-सर्दी काट लेते हैं। बात-बात पर गालियाँ तो सुननी ही पड़ा करती हैं, मालिकों-मैनेजरों के लात-घूसे भी सहने पड़ते हैं। यदि दूसरों की भूल से भी कोई काँच का गिलास या कप-प्लेट टूट जाता है, तो उस समय मार-पीट और गाली-गलौज सहने के साथ जुर्माना भी इन्हीं बेचारे बाल-मजदूरों को भरना पड़ता है। इतना ही नहीं, मालिकों की अपनी गलती से भी यदि कोई सामान्य-सी वस्तु इधर-उधर हो या चोरी हो जाती है, तो चोर होने का खिताब पाकर कई तरह के उत्पीड़नों का शिकार भी इन्हीं बेचारों को होना पड़ता है। इस प्रकार बाल-मजदूरों का जीवन बड़ा ही दयनीय एवं यातनामय हुआ करता है। 

बाल मजदूरों का एक अन्य वर्ग भी है। कंधे पर झोला लादे इस वर्ग के मजदूर इधर-उधर फिंके हुए गंदे, फटे, तुड़े-मुड़े कागज बीनते दिखाई दे जाते हैं या फिर पोलिथीन के लिफाफे तथा पुराने प्लास्टिक के टुकड़े एवं टूटी-चप्पलें-जूते आदि। कई बार गंदगी के ढेरों को कुरेद कर उनमें से टिन, प्लास्टिक, लोहे आदि की वस्तुएँ चुनते, राख में कोयले के टुकड़े बीनते हुए भी इन्हें देखा जा सकता है। ये सब चुनकर कबाड़खानों पर जा कर बेचने पर इन्हें बहुत कम दाम मिल पाता है जबकि ऐसे कबाड़ खरीदने वाले लखपति-करोड़पति बन जाया करते हैं। बाल-मजदूरों के इस तरह के और वर्ग भी हो सकते हैं। 

आखिर में बाल-मजदूर आते कहाँ से हैं? सीधा-सा उत्तर है कि एक तो गरीबी की मान्य रेखा से भी नीचे रहने वाले घर-परिवारों से आया करते हैं। फिर चाहे ऐसे घर-परिवार ग्रामीण हों या नगरीय झुग्गी-झोंपड़ पट्टियों के निवासी, दूसरे अपने घर-परिवार से गुमराह होकर आए बालक। पहले वर्ग को विवशता तो समझ में आती है कि वे लोग मजदूरी करके अपने घर-परिवार के अभावों की खाई पाटना चाहते हैं। दूसरे उन्हें पढ़ने-लिखने के अवसर एवं सुविधाएँ ही नहीं मिल पाती। लेकिन दूसरे गुमराह होकर मजदूरी करने वाले बाल-वर्ग के साथ कई प्रकार की कहानियाँ एवं समस्याएँ जुड़ी रहा करती हैं। जैसे पढ़ाई में मन न लगने या अनुत्तीर्ण हो जाने पर मार के डर से घर-परिवार से दूर भाग आना, सौतेली माँ या माता-पिता के सौतेले एवं कठोर व्यवहार से पीड़ित होकर घर त्याग देना, बुरी आदतों और बुरे लोगों की संगत के कारण घरों में न रह पाना या फिर कामचोर होना आदि कारणों से घरों से भाग कर और नगरों में पहुँच कई बार अच्छे घर-परिवार के बालकों को भी विषम परिस्थितियों में मजदूरी करने के लिए विवश हो जाना पड़ता है। इसके अलावा और भी कई वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। 

देश का भविष्य कहे-माने जाने वाले बच्चों-बालकों को किसी कारण से मजदूरी करनी पड़े, इसे मानवीय नहीं कहा जा सकता। एक तो घरों में बालकों के रह सकने योग्य सुविधाएँ-परिस्थितियाँ पैदा करना आवश्यक है, दूसरे स्वयं राज्य को आगे बढ़कर बालकों के पालन की व्यवस्था सम्भालनी चाहिए, तभी समस्या का समाधान संभव हो सकता 

(4) स्वास्थ्य ही धन है: 

मानव जीवन में स्वास्थ्य का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है । स्वस्थ मनुष्य के लिए सभी कुछ प्राप्य है, अस्वस्थ व्यक्ति के लिए सभी कुछ दुर्लभ है। इस संघर्षपूर्ण मानव जीवन के लिए सुस्वास्थ्य का होना आध ारभूत जरुरत है, अन्यथा व्यक्ति का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। डार्विन द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत ‘सर्वोपयुक्त प्राणी ही अपना अस्तित्व कायम रख सकता है इस संबंध में विशेष तौर पर उल्लेखनीय है । इस सिद्धान्त का आशय यह है कि पृथ्वी पर वही प्राणी अपने अस्तित्व को बचाने में सफल होता है जो प्रकृति और अन्य प्राणियों द्वारा सृजित घात-प्रतिघातों का सफल प्रतिरोध कर सकता है । यह प्रतिरोध स्वस्थ रहकर ही किया जा सकता है। सुस्वास्थ्य का आशय रोगमुक्त और पुष्ट शरीर से है। वस्तुतः शरीर ही समस्त क्रिया-व्यापार का साधन है, लेकिन स्वास्थ्य के अभाव में शरीर अभिशाप बन जाता है और समस्त क्रिया व्यापार ठप पड़ जाता है। जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें कठिन संघर्ष करना पड़ता है और रोगग्रस्त शरीर के साथ यह संघर्ष करना संभव नहीं होता है। 

प्रसिद्ध उक्ति-‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है’-से कौन नहीं परिचित है। यदि शरीर स्वस्थ नहीं है तो मानसिक शक्ति की कामना करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। दुर्बलता और अस्वस्थता के कारण मानसिक विकृति उत्पन्न होती है। विकृत मस्तिष्क से क्या अपेक्षा की जा सकती है ? ऐसी अवस्था में वैचारिक परिशुद्धता और उच्चता की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । वस्तुतः विचारों की श्रेष्ठता और रचनात्मकता के लिए मानसिक पावनता और सबलता जरूरी है तथा इसके लिए शारीरिक परिपुष्टता अर्थात् सुस्वास्थ्य का होना सर्वथा जरूरी है। इसलिए सुस्वास्थ्य को ईश्वरीय उपहार माना गया है । इस ईश्वरीय उपहार की आवश्यकता सभी को होती है। ईश्वर अथवा प्रकृति प्रदत्त इस उपहार के अभाव में मनुष्य न तो विद्या की साधना कर सकता है और न धर्म की ही । अस्वस्थ मनुष्य अपनी संतान के साथ-साथ अपने परिवार, समाज व देश सबके लिए अभिशाप बन जाता है। 

अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए प्रत्येक मनुष्य को स्वस्थ आदतों के प्रति सजग रहना चाहिए । स्वास्थ्य के नियमों का कठोरता से पालन करना प्रत्येक व्यक्ति का परम कर्तव्य है। इसके लिए आहार व विहार में संयम बरतना भी जरूरी है। कहा गया है कि ‘रोगों से बचाव रोगमुक्त होने से अच्छा है।’ रोगों से बचाव का आशय वैसे प्रयत्नों से है जिनके द्वारा अपने शरीर में रोगाणुओं के प्रवेश को रोका जा सकता है तथा शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की कमी पर अंकुश लगाया जा सकता है। रोगमुक्त रहने के लिए आवश्यक टीकाकरण, सफाई, भोजन एवं आराम से संबंधित नियमों के अनुपालन के लिए व्यक्तिगत कोशिश के साथ-साथ सामुदायिक कोशिश भी की जानी चाहिए। 

स्वस्थ रहना प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक महत्त्वपूर्ण दायित्व भी है। स्वस्थ व्यक्ति ही परिवार, समाज एवं राष्ट्र के निर्माण में अपेक्षित भूमिका का निर्वाह कर सकता है। अस्वस्थ व्यक्ति परिवार, समाज एवं राष्ट्र के लिए बोझ बन जाता है । उसके प्रति सभी तिरस्कार के भाव रखते हैं और वह एक अवांछित इकाई के रूप में अपना जीवन ढोने के लिए विवश हो जाता है। स्वस्थ व्यक्ति दीर्घायु होता है और अपने सुकृत्यों से इतिहास लिखने में सफल होता है । रोगग्रस्त पाण्डु इतिहास में चर्चा का विवश नहीं बन सका, लेकिन तन से अत्यधिक बलशाली घटोत्कच अपने लघुजीवनकाल के बावजूद याद किया जाता है। पाण्डु को भी यदि याद किया जाता है तो केवल उनके पाँच पराक्रमी पुत्रों के कारण। 

इस प्रकार स्वास्थ्य की महिमा अपार है। स्वस्थ रहने के लिए यह जरूरी है कि हम स्वास्थ्य के मूल नियमों का पालन करें। ‘सादा भोजन उच्च विचार’ से संबंधित अवधारणा इस दृष्टि से सर्वथा अनुकरणीय है। किसी प्रकार के मादक द्रव्यों, धूम्नपान, तम्बाकू आदि का सेवन शरीर के लिए सर्वथा घातक सिद्ध होता है, इसलिए इनसे परहेज करना श्रेयस्कर है। शरीर पर घातक प्रभाव डालने वाले दुर्व्यसनों से भी परहेज करना चाहिए। अपने आहार-विहार में संयम बरतकर हम सुदीर्घ और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। 

SSC CHSL EXAM-09.07.2017

1.बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध जिसमें आप का क्या योगदान होगा इस समस्या को सुलझाने में?

2. आपका नाम अमित/ अमिता है। आप अपने दोस्त सर्वर को पत्र लिखें जिसमें भारत सरकार की डिजिटल इंडिया स्कीम का वर्णन हो। 

उत्तर 

1.बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ 

भारत में निरंतर पुरुषों की तुलना में महिलाओं की घटती संख्या तथा उनकी शिक्षा के प्रति समाज में व्याप्त दुराग्रह को दूर करने के लिए ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत की गई है। महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा स्वावलम्बन आदि की महती “आवश्यकता को ध्यान में रखकर देखें तो यह योजना एक क्रान्तिकारी कदम है। 

प्रधानमंत्री की महत्त्वाकांक्षी योजना ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का शुभारंभ 22 जनवरी, 2015 को हरियाणा के पानीपत से किया गया। इस योजना के शुभारंभ के लिए हरियाणा को इसलिए चुना गया क्योंकि वहाँ 0-6 आयु समूह में लिंगानुपात महज 879 है जो कि राष्ट्रीय औसत 919 से काफी कम है। इस योजना के जागरूकता के लिए माधुरी दीक्षित को ब्रांड अम्बेस्डर बनाया गया है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के तीन उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं- (1) कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम (2) कन्याओं के अस्तित्व को बचाना और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना। (3) बालिकाओं की शिक्षा और भागीदारी सुनिश्चित करना। इस योजना की सफलता के लिए स्थानीय समुदाय की दो महिलाओं (कार्यकर्ताओं) को जोड़ा जाएगा। 

हालाँकि इस योजना का क्रियान्वयन-महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय, परिवार कल्याण मंत्रालय एवं मानव संसाधन मंत्रालय संयुक्त रूप से कर रहे हैं। फिर भी इसकी सफलता व्यापक जन भागीदारी से ही सम्भव है। इसके लिए हमें अपनी पितृसत्तात्मक सोच बदलनी होगी, बेटी-बेटा के बीच विभेद को मिटाना होगा तथा सबसे बढ़कर इस अवधारणा को बदलने के लिए जन जागरूकता का व्यापक प्रचार-प्रसार करना होगा। लैंगिक असमानता की भावना को दूर करने का सबसे बड़ा हथियार शिक्षा है यद्यपि यह हमारे समाज की विडंबना है कि दिल्ली, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा इत्यादि उच्च शिक्षा दर वाले राज्यों में अपेक्षाकृत कन्या भ्रूण हत्या की घटनाएँ ज्यादा घटित होती हैं। 

सरकार के साथ-साथ आम नागरिक की सहभागिता के प्रयासों से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना सार्थक सिद्ध होती दिख रही है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक हरियाणा का लिंगानुपात 2015 में जहाँ 879 था, वहीं अप्रैल 2017 में 950 के स्तर पर पहुँच गया। यह परिवर्तन बहुआमी रूप में देखने को मिल रहा है लेकिन अभी सुरक्षा तथा शिक्षा के क्षेत्र में अधिक बल देने की आवश्यकता है। 

इस योजना का भविष्योन्मुखी होना अत्यन्त आवश्यक है। जिसके लिए इसे सार्वजनिक विमर्श का विषय बनाना, सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत के रूप में स्थानीय महिला संगठनों/युवाओं की सहभागिता लेते हुए पंचायती राज्य संस्थाओं, स्थानीय निकायों और जमीनी स्तर पर जुड़े हुए कार्यकर्ताओं आदि के समायोजित प्रयासों से इसे सफल बनाया जा सकता है। 

सशक्त भारत का निर्माण आधी आबादी के सशक्तिकरण को अनदेखा करके संभव नहीं हो सकता। अतः समय रहते बेटियों के प्रति दुर्भावना को त्यागना, उनकी परवरिश, शिक्षा, आदि सुनिश्चित करना हमें अपना नैतिक कर्तव्य समझना होगा। तभी हमें सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल, पी.वी. सिंधु, बछेन्द्री पाल जैसे अनेक प्रतिभाशाली बेटियों से परिचय हो पाएगा जो देश को गौरवान्वित कर रही हैं। 

2. 69/23 

मधवापुर, 

इलाहाबाद दिनांक 

प्रिय मित्र सर्वर, 

सप्रेम नमस्कार। 

बहुत दिनों से मैं तुम्हें ‘डिजिटल इंडिया’ योजना के बारे में बताना चाहता था। परन्तु अति व्यस्तता के कारण संभव न हो सका। जैसा कि तुम्हें ज्ञात है ‘डिजिटल इंडिया’ भारत सरकार द्वारा “सरकारी कामकाज का डिजिटलीकरण करना है, जिससे सभी सरकारी सेवाएँ इलेक्ट्रॉनिक तरीके से सर्वसुलभ हो सके” चलायी गई योजना है। ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान 11 जुलाई, 2015 से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रारम्भ किया गय है। इसके द्वारा सूचना क्रान्ति के दूसरे दौर का सूत्रपात किए जाने का प्रयास किया जा रहा है। डिजिटल इंडिया के तीन लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं पहला, देश में व्यापक स्तर पर आधारभूत डिजिटल सेवाओं का विकास करना। दूसरा- जनता को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से सरकारी सेवाएँ तथा प्रशासनिक सेवाएँ ‘ऑन डिमांड’ उपलब्ध कराना तथा तीसरा- भारतीय नागरिकों को तकनीकी दृष्टि से सक्षम और सबल बनाना है। इसके लिए जरूरी है कि तकनीकी उपकरणों, सुविधाओं, ज्ञान और सूचनाओं को समाज के सभी स्तरों तक पहुंचाया जाए। 

‘डिजिटल इंडिया’ की अवधारणा तकनीकी दुनिया के ताजा रुझानों के अनुरूप है। मित्र सर्वर ‘डिजिटल इंडिया योजना’ में विकास के कुल नौ स्तम्भ चिह्नित किए गए हैं- जिसमें ब्रॉडबैण्ड, हाइवेज, सर्वत्र उपलब्ध मोबाइल कनेक्टिविटी, इंटरनेट के सार्वजनिक प्रयोग की सहज सुविधा, ई-प्रशासन, ई-क्रान्ति, जिसका अर्थ सेवाओं की इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण रोजगार के लिए सूचना प्रौद्योगिकी तथा अर्ली हार्वेस्ट कार्यक्रम शामिल है। ध्यान देने वाली बात है कि इस परियोजना के पूर्णत: लागू होने की समय सीमा 2019 निर्धारित की गई है। इस योजना के माध्यम से केन्द्र तथा राज्य सरकार के विभागों को ‘ऑनलाइन’ किया जा रहा है। कैशलेस अर्थव्यवस्था की परिकल्पना इसी परिप्रेक्ष्य में की गई है। ‘डिजिटल इंडिया’ अनंत संभावनाओं का द्वार है, साथ ही ‘साइबर सुरक्षा’ जैसी समस्याएँ भी हैं। 

इस परियोजना के माध्यम से बैंकिंग, पुलिसिंग, विदेशी निवेश तथा व्यापार, कृषि उत्पादन तथा वितरण, आम नागरिकों तक सरकारी योजनाओं का हस्तांतरण आदि को सम्मिलित किया गया है। 

मुझे विश्वास है कि मेरे द्वारा आप को प्रेषित की गई जानकारी “डिजिटल इंडिया’ योजना के बारे में जानने की उत्सुकता का निदान करने में सहायक होगी। फिर भी किसी प्रकार का प्रश्न आपके मन में उठे तो निःसन्देह पत्र के माध्यम से अवश्य पूर्छ। 

तुम्हारे अन्य साथियों को भी

मेरी शुभकामना

तुम्हारा अभिन्न 

अमित 

दिनांक 13-9-2017

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