वसंत ऋतु पर निबंध|Essay on Spring Season in Hindi

वसंत ऋतु पर निबंध

वसंत ऋतु पर निबंध- Spring Season essay in hindi

जिसके आगमन का समाचार सुनते ही मन-प्राणों की क्यारी-क्यारी लहलहा उठती है, अंतरात्मा की डाली-डाली मुस्करा उठती है-वह है ऋतुओं का राजा वसंत । ऋतुराज का आविर्भाव होते ही सर्वत्र स्वर्गिक माधुरी का प्याला छलकता दीखता है; वातावरण दुग्धधवल हास्य के झोंके से अनुगुंजित होता दीखता है।

उदास-निराश पहाड़ियों का सुहाग जग उठता है और वे लाल चूनर पहने नई-नवेली दुलहनों-सी सजी दीखती हैं। वृक्ष अपने तन से पुराने पत्तों के जीर्ण वस्त्र को त्यागकर, नवीन कोंपलों का परिधान धारण कर, नवजीवन की अँगड़ाइयाँ लेते दीखते हैं। गुलाब-फूल में अटकनेवाले भौरे नई खिली कलियों का आमंत्रण पाकर गुनगुनाना आरंभ करते हैं। न तो तन को विद्युत-तरंग मारनेवाला शीत है और न नागिन की तरह जिह्वाएँ खोलनेवाली लू की लपटों की आशंका ही।

एक हलका गुलाबी जाड़ा-तन-मन में गजब स्फूर्ति भरनेवाला ! न तो शीत-निशिचर के कठोर स्पर्श का उत्पीड़न है और न ग्रीष्म-दैत्य का उत्तप्त अत्याचार। अब यामिनी प्रमोदिनी हो गई है, उषा मधुरहासिनी । पादप-पत्रों के आनत अधरों का सोया संगीत जग उठता है। पारे-सी पारदर्शी नदिया मोटापा दूर होने के कारण जैसे किसी की आगमनी से नाचने लगती हैं और तब लगता है-वसंत सचमुच वसंत है, जिसमें आनंद, केवल आनंद का ही वास है। इसीलिए तो भगवान श्रीकृष्ण ने अपने श्रीमुख से अपने को ‘ऋतूनां कुसुमाकरः (ऋतुओं में मैं वसंत हूँ) कहकर इसकी महत्ता सिद्ध की थी। 

ऋतुराज वसंत के आते ही प्रकृति रानी नई वेशभूषा, नई विच्छित्ति में उपस्थित होती हैं। उसके परिधान में रंग-बिरंगे फूल टँके होते हैं। उसके स्वागत के लिए अलिकुल वाद्यवादन करते दौड़ पड़ते हैं, शिखिसमूह नर्तन करते दीख पड़ते हैं। चंपा उसके मस्तक पर छत्र धारण करता है। आम्रमंजरियाँ उसके मुकुट हैं। पक्षिसमूह उसका अभिषेक-मंत्र पढ़ता है।

पुष्पराग उड़कर चंदोबा-सा टॅग जाता है। मलयपवन उसके ऊपर पंखा झलता है। कुंदतरु निशान धारण करते हैं। पाटल के पत्ते ही उसके तरकस हैं, अशोक के पत्ते ही बाण। पलाश के पुष्प उसके धनुष हैं, लवंगलता उसकी प्रत्यंचा। मधुमक्षिकाओं की विशाल सेना सजाकर राजा वसंत ने जैसे शिशिर की पूरी सेना को परास्त कर दिया है। 

खेतों में दूर-दूर तक गेहूँ के गोरे गालों पर रूपसी तितलियाँ बल खा रही हैं-तीसी के मरकती तथा सरसों के पुखराजी फूलों पर भ्रमरों की पंक्तियाँ मँडराती हैं। मालतीलताओं को मतवाले भौरे चूम रहे हैं और उनकी कोमल कलियाँ मंद-मंद पवन के हिंडोले पर झूल रही हैं। कहीं सुग्गे की चोंच के समान टेसू के फूल खिले हैं, तो कहीं हल्दी के रंग के कनेर के फूल। रूई के फाहे की तरह कुंद-कलियाँ, आम्रमंजरियों से इत्र को मात करनेवाली भीनी-भीनी महक, दिलफरेब चाँदनी, मस्तानी काकली, गंधमाती हवा, उन्मादक गुंजार-कष्टभरे जीवन के लिए अनोखे रसायन हैं।

ऐसी मनमोहक ऋतु में गौतम बुद्ध का कथन ‘सर्वं दुःखं दुःखम्, सर्वं क्षणिकं क्षणिकम्’ मिथ्यावचन प्रतीत होता है। लगता है, जीवन में केवल आनंद का ही पारावार लहरा रहा है, सम्मोहन का साम्राज्य और अनुराग का ऐश्वर्य ही पग-पग पर लुट रहा है, उन्मुक्त यौवन की रसवंती धारा कूल-किनारा तोड़ रही है, उच्छल उत्साह की सरिता उमड़ चली है। सचमुच वासंती सुषमा की एक बाँकी चितवन पर लाख-लाख स्वर्गिक सुख न्योछावर हैं। 

यही कारण है कि संसार के प्रसिद्ध कवियों ने इसी ऋतु को सर्वाधिक पसंद किया और अक्षरबद्ध कर अक्षर बना दिया, श्लोकबद्ध कर पुण्यश्लोक कर दिया। महाकवियों ने आत्मा-परमात्मा या नायक-नायिकाओं का प्रेम-मिलन कराया, तो इसी हृदयावर्जक ऋतु में। जयदेव ने राधा-कृष्ण का मिलन इसी ऋतु में कराया, तो गोस्वामी तुलसीदास ने राम-सीता का मिलन उस जनक की पुष्पवाटिका में कराया, जहाँ वसंत ऋतु लुभाकर रह गई थी।

त्रिपुरासुर के विनाश के लिए जब कामदेव ने योगिराज शंकर की समाधि भंग करनी चाही थी, तब उसे वसंत की सहायता लेनी पड़ी थी। क्या वाल्मीकि, क्या कालिदास, क्या सूरदास, क्या तुलसीदास, क्या पद्माकर, क्या विद्यापति, क्या पंत, क्या रवींद्रनाथ ठाकुर, क्या सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ सभी ने वसंत पर कविताएँ लिखी हैं। अगरजा के महान कवियों में शेक्सपियर, मिल्टन, टेनीसन, ब्राउनिंग, स्विनबर्न थामसन-सबने वसंत का गुणगान अपनी कविताओं में किया हो। 

वसंत प्रतीक है आनंद का, उल्लास का, रूप और सौंदर्य का, मौज और मस्ती का, जवानी और रवानी का. स्फर्ति और संचेतना काः किंतु क्या पृथ्वों क सभा प्राणया के मन में इस संजीवन वसंत में भी आनंद और उल्लास की स्रोतस्विनी उमड़ पड़ती है? कदापि नहीं। तभी हमें डॉ हजारीप्रसाद द्विवेदी के वैयक्तिक निबंध वसत आ गया’ की पंक्ति याद हो आती है, “वसंत आता नहीं ले आया जाता है। यदि हम भी रूढ़ियों, अंधविश्वासों, कुसंस्कारों के जीर्ण-शीर्ण पत्रों को त्यागकर नवीनता और प्रगतिशीलता के नूतन किसलयों से अपना श्रृंगार कर सकें, तो सचमुच वसत हमार जीवन में वर्ष में केवल एक बार ही नहीं, वरन बार-बार लहराता रहेगा, इसमें संदेह नहीं।