अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी UPSC | मानव विकास में आकाशीय प्रौद्योगिकी का योगदान 

मानव विकास में आकाशीय प्रौद्योगिकी का योगदान (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2015) अथवा जनकल्याण के कार्यों में सहायक भारत की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी 

संदर्भ चाहे वैश्विक हो या भारत का, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी ने मानव जीवन को संवारने में अप्रतिम योगदान देकर अपनी उपादेयता को सिद्ध किया है। जनकल्याण के कार्यों में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी निर्णायक साबित हुई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि जो कल तक असंभव था, उसे आज संभव बनाकर अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी ने मानव जीवन को सुविधा सम्पन्न बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मानव जीवन को संवारने वाली अनेक सौगातें अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की ही देन हैं। 

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की उपादेयता तथा जनकल्याण के कार्यों में इसके महत्त्व को ध्यान में रखकर ही भारत ने इस दिशा में ठोस पहले करनी बहुत पहले ही शुरू कर दी थीं। हमारे देश में वर्ष 1962 में ‘भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (इन्कोस्पार) की स्थापना के साथ ही भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का सूत्रपात हुआ। इस समिति का गठन परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा किया गया था। वर्ष 1969 में ‘भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति’ का पुनर्गठन कर डॉ. विक्रम साराभाई की अध्यक्षता में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना की गई। वर्ष 1972 में इसरो को स्वायत्तशासी निकाय का दर्जा दिया गया। इसी वर्ष ‘अंतरिक्ष आयोग’ की भी स्थापना की गई। इसे बाद से अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत के कदम बढ़ते गए। 

“भारत की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी अनेक स्तरों से जहां देश की प्रगति में योगदान दे रही है, वहीं जनकल्याण के कार्यों में सहायक बनकर देश के निवासियों के जीवन को संवार रही है।” 

अपने देश की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम एक सुचिंतित कार्यक्रम है, जिसका अब तक सफर अत्यंत उपलब्धिपूर्ण रहा। देश की प्रगति में अनेक स्तरों से इस कार्यक्रम का योगदान महत्त्वपूर्ण रहा। 

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के तीन महत्त्वपूर्ण घटक हैं। पहला है -भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह (इनसैट) तंत्र, दूसरा है -सुदूर संवेदन उपग्रह एवं तीसरा है-प्रमोचन तंत्र। उल्लेखनीय है कि भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह तंत्र (INSAT) एशिया प्रशांत क्षेत्र का सबसे बड़ा घरेलू उपग्रह संचार तंत्र है। 

भारत की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी अनेक स्तरों से जहां देश की प्रगति में योगदान दे रही है, वहीं जनकल्याण के कार्यों में सहायक बनकर देश के निवासियों के जीवन को संवार रही है। आज टेलीविजन आम जन जीवन से अभिन्न रूप से जुड़ चुका है। टेलीविजन सेवा उपलब्ध करवाने में तथा देश में दूरदर्शन संजाल को फैलाने में इनसैट तंत्र का महत्त्वपर्ण योगदान रहा है। उपग्रह टेलीविजन देश की 100 प्रतिशत आबादी तथा 100 प्रतिशत क्षेत्र को कवर करता है। इनसैट वीएचआरआर प्रतिबिम्बकी का उपयोग दूरदर्शन द्वारा समाचार कवरेज में किया जाता है। 

हमारे इनसैट तंत्र द्वारा जहां 40 दूरदर्शन टीवी चैनल (सभी डिजिटल) की सेवाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं, वहीं इसकी राष्ट्रीय नेटवर्किंग सेवा में सम्मिलित हैं -डीडी-1, डीडी-न्यूज, डीडी स्पोर्ट्स, डीडी-उर्दू, डीडी इंडिया एवं डीडी-भारती। 

डीटीएच सेवा उपलब्ध करवाने से हमारे इनसैट-4 उपग्रहों की भूमिका अग्रणी है। इनसैट – 4ए उपग्रह के माध्यम से टाटास्काई द्वारा, इनसैट-4बी के माध्यम से दूरदर्शन द्वारा तथा इनसैट-4बी और इनसैट-4 सीआर के माध्यम से सन डायरेक्ट व भारती एयरटेल जैसे सर्विस प्रोवाइडरों द्वारा डीटीएच सेवा उपलब्ध करवाई जा रही है। स्पष्ट है कि मनोरंजन एवं खबरों की दुनिया से हमें जोड़ने में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी केन्द्रीय भूमिका निभा रही है। सूचना के क्षेत्र में भी यह प्रौद्योगिकी विशेष रूप से सहायक सिद्ध हो रही है। हमारे देश में इनसैट दूरसंचार सेवा ने अपनी उपादेयता सिद्ध की है। इनसैट दूरसंचार नेटवर्क के साथ कार्य करते हुए 620 दूरसंचार टर्मिनल इनसैट प्रणाली की सहायता से परिचालित हो रहे हैं। बीएसएनएल सहित अनेक सरकारी और गैरसरकारी उपभोक्ता इनसैट दूरसंचार सेवा का उपभोग कर रहे हैं। इसी क्रम में इनसैट प्रणाली का लाभ हम रेडियो नेटवर्किंग सेवा में भी मिला है। इनसैट तंत्र के माध्यम से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर रेडियो नेटवर्किंग सेवाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं तथा आल इंडिया रेडिया के 235 स्टेशनों में एस.बैंड रिसीवर टर्मिनल लगाए गए हैं। इनसैट तंत्र से जुड़ने के कारण रेडियो नेटवर्किंग सेवा उच्च गुणवत्तायुक्त एवं अधिक विश्वसनीय हुई है। 

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम ने मौसम विज्ञान सेवा उपलब्ध करवाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इनसैट प्रणाली से जहां हम तूफानों और चक्रवातों की त्वरित सूचना देने में सक्षम हुए हैं, वहीं मौसम संबंधी महत्त्वपूर्ण आंकड़ों का संकलन भी करते हैं। इस प्रणाली के द्वारा हम उपरि पवनों, समद्र की सतह के तापमान तथा अवक्षेपन इंडेक्स की निगरानी करने में भी सक्षम हुए हैं। 

उपग्रह आधारित खोज एवं बचाव सेवा उपलब्ध करवाने में भी भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का योगदान सराहनीय है। यह एक अंतर्राष्ट्रीय सेवा है, जिसका सदस्य भारत भी है। अपना योगदान सुनिश्चित करने के लिए भारत ने लखनऊ एवं बंगलुरू में भू-केंद्र स्थापित किए हैं। इस सेवा को ‘कास्पास-सारसैट’ नाम दिया गया है। इसके तहत दुर्घटना होने पर संबंधित देश को खोज एवं बचाव सेवा उपग्रह के माध्यम से उपलब्ध करवाई जाती है। 

आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में इसरो का “एरो-स्पेस’ कार्यक्रम कारगर सिद्ध हुआ है। इसके तहत आपदा प्रबंधन को ध्यान में रखकर प्रतिबिंबन कार्यक्रम एवं संचार सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं। प्राकतिक आपदाओं के रूप में सम्मिलित हैं-जंगलों की आग, सूखा, बाढ़, भूस्खलन, भूकंप एवं चक्रवात आदि। 

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के जरिए हमने टेलीमेडिसिन के क्षेत्र में अच्छी प्रगति की है। इस क्षेत्र में पहल करते हुए वर्ष 2001 में इसरो द्वारा ‘टेलीमेडिसिन नेटवर्क’ की स्थापना की गई थी, जो अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि उपग्रह संचार प्रणाली के माध्यम से देश के दूर-दराज के स्थानों के लिए अल्प समय में चिकित्सा सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं। हमारे अतंरिक्ष कार्यक्रम से ही ‘ग्रामसैट’ जैसे कार्यक्रम संचालित हो रहे हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में संचार सुविधाएं बढ़ी हैं। 

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में महारत हासिल कर भारत ने अंतरिक्ष के विश्व बाजार में भी मजबूत पकड़ बनाई है। कल तक जो भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के लिए विदेशी सहायता पर निर्भर करता था, वह आज अपनी तकनीकी दक्षता से दूसरे देशों को आकर्षित कर रहा है। इसरो के वैज्ञानिक आज विदेशी कंपनियों के लिए भी उपग्रहों का निर्माण कर रहे हैं। इजरायल, फ्रांस तथा जापान सहित विश्व के अनेक देशों की दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियां इसरो से उपग्रह निर्माण हेतु करार कर चुकी हैं। भारत द्वारा सितंबर, 1992 में इसरो की विपणन इकाई एंट्रिक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (ANTRIX Corporaton Ltd) की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य इसरो द्वारा विकसित अंतरिक्ष उत्पादों, तकनीकी सलाह सेवाओं और प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण का वाणिज्यिक दोहन एवं संवर्धन करना है। वर्ष 2008 में इसे ‘मिनीरत्न’ श्रेणी के सार्वजनिक उपक्रम का दर्जा दिया गया। एंट्रिक्स वर्तमान में विभिन्न देशों, संस्थाओं एवं संगठनों को उपग्रह प्रमोचन सेवाएं, ट्रांसपोंडर लीजिंग सेवाएं, दूर संवेदन सेवाएं, मिशन सहायता सेवाएं, भू-प्रणाली सेवाएं, अंतरिक्षयान जांच सेवाएं तथा प्रशिक्षण एवं परामर्शिता सेवाएं आदि उपलब्ध कराती है। 

“यह कहना असंगत न होगा कि वर्तमान तकनीकी युग में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी भारत के समग्र विकास की एक आवश्यक तकनीक तथा अनिवार्य शक्ति के रूप में प्रदर्शित हुई है।”

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में दक्षता प्राप्त कर भारत ने उपग्रह प्रक्षेपण के बाजार में भी अपनी मजबूती पकड़ बनाई है। उपग्रहों के प्रक्षेपण के विश्व बाजार में भारत ने 26 मई, 1999 को पहली बार तब प्रवेश किया था जब पीएसएलवी-सी2 द्वारा भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह आईआरएस-पी4 के साथ दो विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया था। एक साथ तीन उपग्रहों के प्रक्षेपण की यह भारत में प्रथम घटना थी। द. कोरिया तथा जर्मनी के उपग्रहों किटसैट-3 तथा टबसैट को प्रक्षेपित करने के लिए इसरो को इन दोनों देशों से कुल मिलाकर12 लाख अमेरिकी डॉलर (लगभग 5 करोड़ रु.) प्राप्त हुए। तब से जून, 2014 में पीएसएलवी-सी23 द्वारा फ्रांसीसी उपग्रह स्पॉट-7 एवं 5 अन्य विदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण तक कुल 40 विदेशी उपग्रह प्रक्षेपित किए गए हैं जिनसे करोड़ों डॉलर की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भारत को प्राप्त हुई है। इसके अतिरिक्त अपना उपग्रह स्वयं प्रक्षेपित कर भारत अब करोड़ों अमेरिकी डॉलर की विदेशी मुद्रा की बचत कर रहा है। 

उपग्रह आधारित आंकड़ों के विश्व बाजार में भारत ने 1996 में प्रवेश किया था। वर्तमान में भारत की इस बाजार में 30 से 35 प्रतिशत तक की भागीदारी है। इसरो की वाणिज्यिक प्रशाखा एंट्रिक्स कॉरपोरेशन (Antrix Corporation) को एक-तिहाई राजस्व की प्राप्ति उपग्रह आधारित ट्रांसपोंडर सेवा से होती है। भारत की इनसैट प्रणाली विश्व की सबसे बड़ी दूरसंचार उपग्रह प्रणालियों में से एक है। 

वैश्विक उपग्रह-आधारित भू प्रेक्षण बाजार के 2013-2018 की अवधि में 11.34 प्रतिशत की कंपाउंड वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ने का आकलन व्यक्त किया गया है। भारतीय दूर संवेदन उपग्रह प्रणाली (आईआरएस) के स्थापित उपग्रह एशिया-प्रशांत क्षेत्र के अतिरिक्त विश्व के कई अन्य देशों की भू प्रेरण आंकड़ों से संबंधित आवश्यकताओं को पूरा कर रहे हैं। 

इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा उपग्रहों के निर्माण, उपग्रहों के उपकरणों के निर्माण इत्यादि से संबंधित अनुसंधानों के दौरान अनेक ऐसे उत्पादों का आविष्कार किया गया है जो आज दैनिक जीवन में प्रयोग किए जा रहे है। अंतरिक्ष निगम ऐसे आकस्मिक उत्पादों के व्यावसायिक दोहन के लिए सदैव तत्पर रहता है। लगभग 13 वर्ष पूर्व इसरो के वैज्ञानिकों ने चाय की पत्तियों की नमी मापने के लिए एक नयी तकनीक का विकास किया। टाटा टी ने हाइड्रोफोटोमीटर नामक इस तकनीक में रुचि प्रदर्शित करते हुए इसरो को इस तकनीक के विकास के लिए वित्तीय सहायता दी थी। इसरो वर्तमान में देश के लगभग 1000 उद्योगों के निकट सम्पर्क में है और उन्हें तकनीकी सहायता उपलब्ध करा रहा है। 

देश की बढ़ती तेल कंपनियों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले अग्निरोधी पाउडर ओलफेक्स इसरो द्वारा ही आविष्कृत है। इस पाउडर का प्रयोग तेल कुओं में अग्निरोधक के रूप में किया जाता है। शल्य क्रिया में प्रयोग होने वाले उपकरणों के लिए जंगरोधी धातु, एस बैंड की केबलरहित सीधे प्रसारण वाली प्रणाली, कृत्रिम अंगों के निर्माण में काम आने वाले विभिन्न प्रकार के पालीमार आदि के विकास में इसरो का मूल्यवान योगदान रहा है। इसरोपोलियोल नामक सिथेटिक पालीमर का आविष्कार इसरो की प्रयोगशाला में ही हुआ है। आज इस पालीमार का प्रयोग रेफ्रिजरेटर, गद्दा तथा कार की स्टीयरिंग बनाने में किया जा रहा है। चिकित्सकीय अनुसंधान के क्षेत्र में भी इसरो द्वारा कई महत्वपूर्ण तकनीकें एवं उत्पाद उपलब्ध कराए गए हैं। इससे के इन आकस्मिक उत्पादों की अब विश्व बाजार में भी मांग होने लगी है। उपग्रहों के उपकरणों के निर्माण में भी अब भारत दक्षता प्राप्त करने की स्थिति में आ गया है। विश्व की अनेक संचार कंपनियाँ तथा | अंतरिक्ष के क्षेत्र में अनुसंधा करने वाली संस्थाएं इसरो से कल । पुर्जे क्रय कर रही हैं। 

यह कहना असंगत न होगा कि वर्तमान तकनीकी युग में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी भारत के समग्र विकास की एक आवश्यक तकनीक तथा अनिवार्य शक्ति के रूप में प्रदर्शित हुई है। मानव विकास में इसने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। देश में दूर संवेदन उपग्रहों के उपयोग का हमें व्यापक लाभ मिला है। विशेष रूप से कृषि, वन्य क्षेत्र, भूगर्भ विज्ञान, जल व समुद्रों के मानचित्रण, अध्ययन एवं निगरानी में भारतीय सुदूर संवेदन तंत्र की भूमिका सराहनीय रही है। पर्यावरण के क्षेत्र में भी हम इससे लाभान्वित हुए 

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