भारत : नरम राज्य अथवा कठोर राज्य पर निबंध

भारत : नरम राज्य अथवा कठोर राज्य पर निबंध

भारत : नरम राज्य अथवा कठोर राज्य (India : Soft State or Hard State) 

नरम राज्य से आशय राज्य की उस कार्यशैली से होता है, जिसके चलते राज्य के लिए कानून-व्यवस्था से जुड़े कठोर निर्णय लेना मुश्किल होता है, जबकि कठोर राज्य को इस प्रकार का निर्णय लेने में कोई भी हिचक या मुश्किल नहीं होती है। यदि हम थोड़ा पीछे मुड़ कर देखें तो पाते हैं कि मामला चाहे देश की आंतरिक सुरक्षा का हो अथवा बाह्य दबावों का, इनसे निपटने में भारत की भूमिका अधिकांशतः एक नरम राज्य की ही रही है, कभी-कभी तो आलोचना की हद तक। यही कारण है कि जहां देश में नक्सली हिंसा और आतंकवाद ने सिर उठाया है, वहीं हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान और चीन भी अक्सर हमें आंखें दिखाते रहते हैं। 

“विख्यात अर्थशास्त्री गुन्नार मिर्डल ने छठवें दशक में लिखित ‘एशियन ड्रामा’ नामक पुस्तक में भारत को नरम राज्य के रूप में संबोधित किया था।” 

भारत राज्य के नरम राज्य होने का संभवतः प्रथम उदाहरण 1989 में देखने को मिला था जब तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद की पुत्री रुबिया सईद का आतंकवादियों द्वारा अपहरण किया गया। रुबिया सईद को मुक्त कराने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह की सरकार ने उग्रवादियों को समक्ष घुटने टेकते हुए अल्ताफ अहमद, जावेद जरगर, शेरखान, नूर मोहम्मद तथा मोहम्मद कलवाल जैसे पांच खूखार पाक प्रशिक्षित उग्रवादियों को रिहा कर दिया। इस कांड के साथ पड़ी गलत परंपरा ने बाद के वर्षों में भारत सरकार और राज्य सरकारों को समय-समय पर संकट में डालने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1991 में नेशनल कांफ्रेंस के सांसद सैफुद्दीन सोज की पुत्री नाहिदा इम्तियाज की रिहाई के एवज में केंद्र सरकार की सहमति पर खूखार उग्रवादी मुश्ताक मोहम्मद को रिहा किया गया। उसी वर्ष अगस्त माह में आतंकवादियों ने राज्य की नरमी का लाभ उठाने के लिए इंडियन ऑयल के कार्यकारी निदेशक के. दुरैस्वामी का अपहरण कर लिया। तत्कालीन गृहमंत्री एस.बी. चह्वाण की पहल पर उग्रवादी जावेद शल्ला सहित नौ अन्य उग्रवदियों की रिहाई की गयी। सितंबर 1993 में जम्मू-कश्मीर में पाक प्रशिक्षित उग्रवादियों ने हजरत बल दरगाह को अपने कब्जे में लेकर 170 नागरिकों को बंधक बना लिया। 32 दिनों तक चले इस नाटक के बाद तत्कालीन पी. वी. नरसिंह राव सरकार ने लगभग 40 उग्रवादियों को रिहा किया। इन सभी घटनाओं में भारत ने नरम राज्य का चरित्र ही उजागर किया है। 

वर्ष 1999 के अंतिम सप्ताह में चंद आतंकवादियों द्वारा किये गए भारतीय विमान के अपहरण तथा बाद में कंधार में संपन्न नाटकीय घटनाक्रम में विमान के बंधकों को छुड़ाने के एवज में भारत की विभिन्न जेलों में बंद चार खूखार उग्रावदियों की रिहाई की शर्मनाक घटना से भारत की न केवल देश में फजीहत हुई बल्कि विदेशों में भी भारत की आलोचना की गयी। भारत सरकार द्वारा विमान अपहर्ताओं के समक्ष इस प्रकार से घुटने टेकने की नीति ने बुद्धिजीवियों तथा राजनीतिक विश्लेषकों को यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या भारत एक नरम राज्य (Soft state) है। मुंबई पर हुए आतंकी हमलों के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच जिस तरह का वाक् युद्ध चला था उसमें भारत के नरम राज्य होने का चरित्र ही उजागर हुआ था। हमलों के दौरान भी आतंकवादियों से मुकाबले के लिए केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार की सुस्ती देश के नरम रवैये का ही इजहार करता था। करकरे और सालस्कर जैसे जांबाज पुलिस अधिकारियों की मौत के बाद ही केंद्र सरकार द्वारा ठोस रवैया अख्तियार किया गया। हालांकि तब तक देश को भारी क्षति हो चुकी थी। 

“ऐसा नहीं है कि भारत की भूमिका सदैव नरम राज्य की ही रही है। इस तस्वीर का दूसरा रुख भी है। अनेक मौकों पर भारत ने कठोर राज्य की भूमिका का भी निर्वहन किया।” 

नरम राज्य के प्रसंग में विख्यात अर्थशास्त्री गुन्नार मिर्डल ने छठवें दशक में लिखित ‘एशियन ड्रामा’ नामक पुस्तक में भारत को नरम राज्य के रूप में संबोधित किया था। यह बात उन्होंने साधारण प्रसंग में ही कही थी किंतु इसका आशय काफी गहरा और व्यापक था। मिर्डल का कहना था कि भारत जैसे मूलतः अलोकतांत्रिक समाज में लोकतांत्रिक राज्य का कर्त्तव्य बनता है कि वह लोकतंत्र को राजनीति से सामाजिक बनाने के लिए कुछ कड़े निर्णय ले। मिर्डल का कहना है कि इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए भारत राज्य ने कानून तो कई बनाए हैं किंतु उनको अमल में लाने के लिए प्रभावकारी व्यवस्था नहीं की गयी है। जहां प्रभावकारी व्यवस्था की भी गयी है वहां इतनी कमियां हैं कि चोर दरवाजे खुद-बखुद खुल जाते हैं। देश के भ्रष्ट राजनेता तथा भ्रष्ट नौकरशाह अपराधियों से सांठ गांठ के लिए इसी दरवाजे का इस्तेमाल करते हैं। 

ऐसा नहीं है कि भारत की भूमिका सदैव नरम राज्य की ही रही है। इस तस्वीर का दूसरा रुख भी है। अनेक मौकों पर भारत ने कठोर राज्य की भूमिका का भी निर्वहन किया। 1995 में जम्मू कश्मीर में सक्रिय उग्रवादी गुट अलफरान ने पांच विदेशी नागरिकों को बंधक बनाकर अपने 20 साथियों को रिहा करने की मांग की थी। इस प्रकरण में भारत सरकार ने अलफरान की मांगों को नहीं पूरा किया और अंततः पांचों विदेशी नागरिकों की हत्या उग्रवादियों द्वारा कर दी गयी। 

श्रीमती इंदिरा गांधी के संपूर्ण कार्यकाल में भारत का चरित्र एक कठोर राज्य के रूप में दिखाई देता है। इस काल में 1971-72 में भारत ने पाकिस्तान की सेना को आत्मसमर्पण के लिए विवश किया। महाबली अमेरिका की रंचमात्र भी परवाह न करते हुए भारत ने बांग्लादेश के गठन में सहयोग किया जबकि बंगाल की खाड़ी में सातवां बेड़ा भेजकर अमेरिका लगातार भारत को धमका रहा था। इसी काल खण्ड में भारत की राजसत्ता ने इमरजेंसी लगाकर एक कठोर राज्य के वीभत्स रूप का भी दर्शन कराया। एक कठोर राज्य अपने ही लोगों पर कितना दमन और अत्याचार कर सकता है यह जानने के लिए इस काल खण्ड को स्मरण कर लेना ही काफी है। 

26/11 के हमले के बाद से केंद्र सरकार देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर कुछ चिंतित दिखी है। इस परिप्रेक्ष्य में केन्द्र सरकार द्वारा तटरक्षक सुरक्षा बल, सशस्त्र बल न्यायाधिकरण, कोबरा फोर्स, फोर्स-वन जैसे संगठनों/संस्थाओं का गठन किया गया है। भारतीय दण्ड संहिता सहित कई अन्य अधिनियमों में संशोधन का भी प्रस्ताव है। नेशनल काउंटर टेरेरिज्म सेंटर, राष्ट्रीय जांच एजेंसी का गठन भी इसी परिप्रेक्ष्य में किया गया है। नक्सली गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए नक्सल विरोधी योजना को भी केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूरी दी गयी है। सरकार आतंकियों और देश-विरोधी तत्वों के साथ किसी भी सूरत में नरम नहीं है। आतंकवादी संगठनों के खिलाफ भी कभी कोई | नरमी नहीं बरती जाती । हां, चूंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, ऐसे | में, सभी को साथ लेकर चलना होता है और सभी की राय भी लेनी जरूरी होती है। सरकार ने आतंकवादियों, हिंसा फैलाने वालों और । कानन-व्यवस्था का उल्लंघन करने वाले लोगों के साथ हमेशा ही सख | रुख अपनाया है। कश्मीर में इसी कारण सेना और राज्य पुलिस | आतंकवादियों की घुसपैठ को रोकने में सफल रही है। मुंबई में आतंकी । हमले के आरोपी कसाब व संसद पर पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को फांसी देकर भारत ने हाल में ही एक कठोर राज्य की उम्दा मिसाल पेश की है। इधर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर जिस तरह से सख्त रुख अख्तियार करना शुरू किया है, वह एक अच्छा संकेत है। कुछ समय पूर्व राजनीतिक नेतृत्व का विश्वास हासिल कर भारतीय सेना ने जिस तरह से म्यांमार की सीमा में घुसकर भारतीय सेना के काफिले पर हमला करने वाले 15 उग्रवादियों को ढेर किया, उससे ध्वनित होता है कि राष्ट्रीय महत्त्व के संवेदनशील मुद्दों पर भविष्य में भारत का रवैया कठोर राज्य का ही रहेगा। वस्तुतः इस परिप्रेक्ष्य में भारत को एक आदर्श स्थिति बनानी होगी और यह स्थिति ऐसी होनी चाहिए जिसमें नीतियों में पारदर्शिता दिखे। घरेलू मामलों में लोकतांत्रिक मूल्यों को ध्यान में रखकर संवेदनशीलता का परिचय देना होगा, जबकि देश की आंतरिक एवं वाह्य सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर कठोर रुख का परिचय देना होगा। 

वास्तव में देखा जाये तो भारत न तो सख्त राज्य है और न ही नरम बल्कि यह एक ढुलमुल नीतियों वाला राज्य है जो अपने देशवासियों के लिए तो सख् है किन्तु विदेशी आतताई के लिए नरम है। विश्व मंच पर भी यह कभी कठोर रुख का परिचय देता है तो कभी अत्यधिक लचीला और नरम हो जाता है। कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त उग्रवादियों को पकड़ने के लिए एक तरफ सरकार करोड़ों रुपए व्यय करती है तो दूसरी तरफ वर्षों तक जेलों में रख कर उनकी सुरक्षा पर करोड़ों रुपये व्यय करती है। यहां यह भी उल्लिखित करना आवश्यक होगा कि देश में स्थित विभिन्न मानवाधिकारवादी संगठनों द्वारा अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण भी कभी-कभा सरकारें अपराधियों के विरुद्ध यथोचित कार्यवाही नहीं कर पाती। किसी अपराधी को मृत्युदण्ड दिए जाने के बाद उसके क्रियान्वयन को रुकवाने के लिए मानवाधिकारवादी संगठनों की बिना वजह की सक्रियता के अनेक उदाहरण मिल जायेंगे। यह सुखद है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़े मामलों में राजसत्ता की शक्ति का सही इस्तेमाल कर रही है। ऐसा करते हुए सरकार को जहां जनाकांक्षाओं का सम्मान करते हुए जनोन्मुख होकर एक समृद्ध लोकतांत्रिक परम्परा को विकसित करते हुए नरम राज्य की उत्कृष्ट मिसालें पेश करनी चाहिए, वहीं राष्ट्र की सुरक्षा एवं अस्थिरता से जुड़े मुद्दों पर सख्त रवैया अपनाते हुए कठोर राज्य की उम्दा मिसालें पेश करनी चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में राज्य की नीतियां पारदर्शी होनी चाहिए तथा एक ऐसे संवेदनशील राज्य की पहचान विकसित करनी चाहिए जो कि लोकतंत्रात्मक संदर्भो में तो संवेदनशील दिखे, जबकि आलोकतांत्रिक एवं अराजक संदर्भो में दमनात्मक। विश्व मंच पर भी उसकी यही भूमिका होनी चाहिए। 

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